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शौर्यपथ / उनके सामने दो विकल्प थे- किसी पुरअम्न मुल्क में एक खुशहाल जिंदगी और दूसरा, अपने गरीब व नाकाम देश (सोमालिया) में लौटकर खौफ व दुश्वारियों के बीच जीना। डॉक्टर हौवा अब्दी ने अपने वतन से वफा का रास्ता चुना। और बड़ी बात यह कि उन्हें अपने इस फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। तब भी नहीं, जब एक आतंकी समूह के सैकड़ों गुर्गों ने उनके अस्पताल पर हमला कर दिया था।
सन 1947 में मोगादिशु के एक खाते-पीते परिवार में हौवा पैदा हुईं। पिता खुद शिक्षित थे, इसलिए उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजने में कभी कोताही नहीं की। मगर जब हौवा 12 साल की थीं, प्रसव के दौरान उनकी मां की मौत हो गई। वेदना से छटपटाती मां का चेहरा हौवा के भीतर जैसे नक्श हो गया। काश! उनकी मां को कोई डॉक्टर बचा लेता।
महज 12 साल की हौवा पर अचानक चार छोटी बहनों की देखरेख की जिम्मेदारी आ पड़ी। दादी थीं, मगर उम्रदराज होने के कारण जल्दी ही थक जाती थीं। ऐसे में, हौवा ने सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए खुद से एक वादा किया कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर ही बनेंगी, ताकि किसी की मां को यूं मरने से बचा सकें। पढ़ने में तो वह शुरू से ही जहीन थीं, अब उसके साथ एक बड़ा मकसद आ जुड़ा था।
सन 1964 की बात है। हौवा तब 17 साल की थीं। हायर सेकेंडरी की तालीम मुकम्मल हो रही थी और यहीं से उन्हें अपने सपने की तरफ मुुड़ना था। संयोग से उसी वक्त उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ का वजीफा मिल गया और वह मास्को पहुंच गईं। और फिर वहां से कीव। कीव अब यूके्रन की राजधानी है। वहां पर मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात अदन मोहम्मद से हुई। अदन भी सोमाली थे। वहीं पढ़ रहे थे। दोनों ने 1973 में शादी कर ली।
कीव से स्नातक और स्त्री रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद हौवा वापस अपने मुल्क लौट आईं और यहां सरकारी अस्पतालों में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान वह दो बेटी और एक बेटे की मां बन चुकी थीं। जिंदगी ठीक गुजर रही थी, मगर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देख हौवा बहुत दुखी रहती थीं। सोमालिया में अस्पताल बहुत कम थे और मरीज ज्यादा। गरीबी, भूख, कुपोषण ने तो जैसे इस भूखंड से गहरी नातेदारी पाल ली है। खैर, जब भी किसी महिला के प्रसव के दौरान मरने की खबर सुनतीं, तो हौवा बेचैन हो उठतीं। लगता, जैसे मां तड़प रही हैं।
लिहाजा 1983 में उन्होंने अपनी पैतृक जमीन पर एक कमरे का क्लिनिक शुरू किया। सोमालिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ने खुद उन्हें इसकी इजाजत दी थी। हौवा अब आसपास की खानाबदोश, कबाइली औरतों को प्रेरित करने लगीं कि वे उनके पास सुरक्षित प्रसव के लिए आएं। मुफ्त, किफायती इलाज और काबिलियत ने हौवा को दूर-दूर तक मशहूर कर दिया। मगर 1991 में सोमालिया गृह युद्ध की चपेट में आ गया। इसके बावजूद हौवा मानव सेवा से नहीं डिगीं। 5 मई, 2010 की सुबह लगभग 750 लड़ाकों ने हौवा अब्दी अस्पताल पर धावा बोल दिया। हौवा कुछ समझ पातीं, उसके पहले ही उनकी कनपटी से बंदूक सटाकर एक आतंकी गरज उठा- ‘तुम क्यों अस्पताल चला रही हो? अव्वल तो तुम औरत हो, और फिर बूढ़ी भी। इसे फौरन बंद करो।’
हौवा ने गौर किया, किशोरवय के ये गुर्गे उस समूह के थे, जो हाथ काट डालने और व्यभिचार के आरोपियों को पत्थर मार-मारकर मौत के घाट उतार देने के लिए कुख्यात है। फिर भी उन्होंने पूरे साहस के साथ कहा, ‘मैं अपना अस्पताल नहीं छोड़ूंगी। अगर मरूंगी भी, तो अपनों के बीच और पूरी गरिमा के साथ।’ आतंकियों ने कई दिनों तक अस्पताल को अपने कब्जे में रखा। इस बीच कई बच्चे इलाज के अभाव में मर गए। फिर तो आस-पास की सैकड़ों औरतें हौवा के समर्थन में अस्पताल के इर्द-गिर्द जमा हो गईं। बढ़ते जन-आक्रोश और वैश्विक दबाव के आगे आतंकियों को झुकना पड़ा। वे न सिर्फ अस्पताल छोड़कर भागने को बाध्य हुए, बल्कि उन्होंने डॉक्टर हौवा से लिखित में माफी भी मांगी।
सन् 1983 में एक कमरे से शुरू हुए हौवा अब्दी अस्पताल में आज चार सौ बेड और तीन-तीन ऑपरेशन थिएटर हैं, उनकी दोनों बेटियां भी डॉक्टर बन चुकी हैं और हाथ बंटाती हैं। आधा दर्जन से अधिक डॉक्टरों और चालीस से अधिक नर्सों के साथ यह अस्पताल हजारों लोगों की खिदमत कर रहा है। इसके साथ ही गृह युद्ध में यतीम हुए बच्चों व बेवा औरतों के लिए भी हौवा ने पनाहगाह और स्कूल शुरू किए हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह अब तक करीब 90 हजार सोमाली लोगों की जिंदगी में उम्मीद की किरण लेकर आई हैं। इसके लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है।
एक सफल या सार्थक जिंदगी में से हौवा ने अपने लिए सार्थक जीवन चुना है। और उनके इस फैसले पर पूरी मानवता को फख्र होगा। सोमाली लोगों की ‘मामा हौवा’को काफी सारे लोग सोमालिया की मदर टेरेसा भी कहते हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह हौवा अब्दी, डॉक्टर व मानवाधिकारवादी
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारतीय चुनाव आयोग लोकसभा की एक सीट और विधानसभाओं की 56 सीटों पर उपचुनाव कराने को तैयार है, तो इससे पता चलता है कि महामारी की वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रुकेगी। मंगलवार को आठ सीटों के लिए तय उपचुनाव को जब रद्द किया गया था, तब यह माना जा रहा था कि कोरोना के दौर में मतदान आधारित कोई चुनाव नहीं हो सकेगा। लेकिन यह साफ हो गया है कि जिन सीटों पर अब आयोग चुनाव के लिए तैयार है, उनमें वे आठ सीटें भी शामिल हैं। आठ सीटों को लेकर जल्दी इसलिए भी है, क्योंकि इनके लिए 7 सितंबर तक चुनाव हो जाने चाहिए। बाकी बची 49 सीटों के लिए सितंबर का पूरा समय है। सब कुछ ठीक रहा और स्थानीय प्रशासन ने कोई अड़ंगा नहीं लगाया, तो आयोग चुनाव प्रक्रिया तेज कर देगा। वैसे भी, बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल ही रही हैं। समय पर चुनाव कराना आयोग की जिम्मेदारी है और अगर वह इसे निभाने को लालायित है, तो उसकी सराहना होनी चाहिए। हालांकि काफी कुछ सरकारों को भी तय करना है। अगस्त, सितंबर तक कोरोना जिन इलाकों में काबू में आ जाएगा, वहां तो ज्यादा परेशानी नहीं होगी, मगर उसी दौर में कोरोना चरम पर रहा, तो चुनाव टालने की नौबत आ सकती है। इतना तय है कि कोरोना के समय चुनाव कराने के लिए ज्यादा संसाधन, वाहन और सुरक्षा बलों की जरूरत पडे़गी। हर एक मतदान केंद्र पर बचाव के दिशा-निर्देशों की पालना कराना आसान नहीं होगा। लंबी लाइन और मतदाताओं की परस्पर दूरी को बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
सर्वाधिक 27 सीटों पर मध्य प्रदेश में उपचुनाव होने हैं। मणिपुर में 11, गुजरात में आठ, तो उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में चार-चार सीटें और झारखंड में भी दो सीटें खाली हैं। हरियाणा, छत्तीसगढ़ इत्यादि में भी सीटें खाली हैं। संविधान के तहत इन सीटों को खाली नहीं रखा जा सकता। रिक्त विधानसभा क्षेत्रों के नागरिकों के अधिकारों की बहाली और किसी सांविधानिक संकट से बचने के लिए चुनाव जरूरी हैं। हो सकता है, जो प्रतिनिधि ऐसे मुश्किलों के बीच से चुनाव जीतकर आएं, वे जनता के बेहतर सेवक साबित हों। हो सकता है, जो सरकारें कोरोना के दौर में बनें, वे शायद ज्यादा समर्पित और संवेदनशील हों।
एक बड़ी महामारी के समय चुनाव का दुर्लभ अनुभव देश को होने जा रहा है। विभिन्न पार्टियां वर्चुअल रैलियां आयोजित कर रही हैं। ऐसे में, अपेक्षित शारीरिक दूरी बरतते हुए भी लोगों से संपर्क करना और मतदान के लिए रिझाना कैसे संभव है, यह देखना दिलचस्प होगा। हो सकता है, विशाल रैलियों और जनसभाओं में होने वाली बेहिसाब भीड़ से प्रभावित होने का मौका न मिलने पर लोग अपने प्रतिनिधि के बारे में सही फैसला कर सकें। ऐसा नहीं है कि कोरोना के समय दुनिया में चुनाव बंद हो गए हैं। दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में कोरोना के समय में ही चुनाव हुए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव 3 नवंबर को तय है और इसकी प्रक्रिया भी वहां शुरू हो चुकी है। दुनिया के जिम्मेदार लोकतंत्रों ने यह संकेत दे दिया है कि कोरोना की वजह से चुनाव नहीं रुकने वाले। किसी बहाने से चुनाव से बचना ठीक नहीं। कोरोना के समय सुरक्षित चुनाव कुछ महंगा पड़ सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल रखने के लिए हमें इस लागत से गुजरना होगा।
ओपिनियन / शौर्यपथ / आज ‘विजय दिवस’है। ठीक 21 बरस पहले हमने संसार के सबसे दुर्गम इलाकों में से एक में थोपी गई जंग जीतकर साबित कर दिया था कि हिन्दुस्तानियों के हौसले कभी पस्त नहीं होते। युद्ध-नीति के मुताबिक, हर जय-पराजय के अपने निश्चित सबक होते हैं। क्या नई दिल्ली के सत्ता-सदन ने इस अनुभव का पर्याप्त लाभ उठाया? लद्दाख की सीमाओं पर पसरे तनाव ने इस सवाल को बेहद मौजूं और धारदार बना दिया है।
पहले कारगिल की बात। इसकी जड़ें अतीत में धंसी हुई थीं। साल 1984 में सियाचिन की बर्फीली चोटियां गंवाने के बाद जनरल जिया के समक्ष तत्कालीन डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स-पाकिस्तान ने एक जवाबी कार्ययोजना पेश की। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी फौज को सर्दियों में कारगिल की चोटियों पर चढ़कर श्रीनगर-लेह राजमार्ग को काट देना था। जिया ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। वजह? उन दिनों वह अपने आका अमेरिका के साथ मिलकर अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को बाहर करने में लगे थे। उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि कारगिल के जवाब में अगर भारत ने समूचा युद्ध छेड़ दिया, तो रावलपिंडी का रक्षा प्रतिष्ठान दो मोर्चों के बीच सैंडविच तो नहीं बन जाएगा?
परवेज मुशर्रफ ने इसे नए संदर्भों में देखा। उनकी अगुवाई में फल-फूल रहे ‘गैंग ऑफ फोर’ ने पुरानी योजना को झाड़-पोंछकर नया जामा पहना दिया। परवेज मुशर्रफ इससे इतने मुतमइन थे कि बिना प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बताए, उन्होंने ‘नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री’ के जवानों को कूच के आदेश दे दिए। यह अभियान इतना गोपनीय रखा गया कि थल सेना के अन्य कमांडरों के साथ वायु सेना के आला अफसर तक इससे अनजान रहे। भारत ने जब अपनी सरजमीं खाली कराने के लिए हवाई हमले शुरू किए, तब वे हक्का-बक्का रह गए। समूचा सत्ता प्रतिष्ठान उनसे असहमत था, सेना के अन्य अंग अनभिज्ञ थे और भारतीय प्रतिक्रिया अनपेक्षित थी।
वे भारतीय वायु सेना की कार्रवाई का प्रतिरोध भी नहीं कर सकते थे। नई दिल्ली जो कर रही थी, अपनी जमीन पर कर रही थी। नियंत्रण रेखा लांघने का मतलब होता युद्ध, जिसके लिए वे उस समय तैयार न थे। यही नहीं, तब तक उन्होंने यह भी नहीं माना था कि भारतीय चौकियों पर कब्जा जमाए बैठे लोग उनके नियमित सैनिक हैं। जनरल मुशर्रफ किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए और नवाज शरीफ हताश। निराशा भरे माहौल में इन्हें 4 जुलाई, 1999 को ह्वाइट हाउस की चौखट चूमनी पड़ी। उस बैठक के दौरान बिल क्लिंटन की मुद्रा बेहद कठोर थी। शरीफ ने कुछ शर्तों के साथ वापसी की बात कही। क्लिंटन ने कहा कि आपकी कोई शर्त नहीं मानी जाएगी। पाकिस्तान की भलाई इसी में है कि उसके दस्ते शराफत से वापस चले जाएं। नतीजतन, पाक फौजियों को लौटना पड़ा था। इस प्रक्रिया में भी उनके तमाम फौजी मारे गए। मुशर्रफ का यह गुनाह बेलज्जत साबित हुआ।
मुझे याद है, उन दिनों भी समझदार लोग कह रहे थे कि इस जीत का उल्लास मनाइए, पर सबक भी सीखिए। हमारी सीमाएं विशाल और बहुआयामी हैं। इनकी हिफाजत के लिए हम अभी तक तैयार नहीं हैं। तब 1962 की चीन से हुई जंग को भी याद किया गया था। जुलाई 1999 से जुलाई 2020 तक एनडीए और यूपीए ने दस-दस बरस हुकूमत की, पर सीमा सुरक्षा के मामले में हम आज भी सौ फीसदी अंकों के अधिकारी नहीं हैं। चीन के इस अतिक्रमण ने कारगिल और मुंबई पर आतंकवादी हमले सहित तमाम पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। हम चीन, पाकिस्तान और आतंक के हमसायों से तब तक नहीं जूझ सकते, जब तक कि सीमाएं सुरक्षित न हों।
चीन ने पिछले दिनों लद्दाख में वही तरीका अख्तियार किया, जो कारगिल में पाकिस्तान ने किया था। उनके सैनिक उस समय कारगिल की चोटियों पर जम चुके थे, जब अटल बिहारी वाजपेयी दोस्ती की बस लेकर लाहौर में अपना खैरमकदम करा रहे थे। चीनी राष्ट्रपति ने भी कुछ माह पूर्व 11 अक्तूबर, 2019 को चेन्नई के समीप मामल्लपुरम में भारतीय आतिथ्य का लुत्फ उठाया था। कभी पल्लव सम्राटों की आर्थिक राजधानी रहे इस शहर से चीन को भी तिजारत होती थी। लगा था, पुराने दिन लौट रहे हैं, पर कूटनीति भले मनोभावों की कीमत पर ही फलती-फूलती है।हालांकि, बीजिंग की नीयत में खोट पहले से ही नजर आ रही थी। इससे पहले डोका ला और उससे भी पहले दौलत बेग ओल्डी, दीपसांग में दोनों देशों की सेनाएं हफ्तों तक आमने-सामने रही थीं। हमें इसलिए भी सतर्क रहना चाहिए था, क्योंकि कई वर्षों से पीएलए के दस्ते वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास निर्माण कर रहे थे। उनके दस्ते ऐसी दुर्गम जगहों पर निरंतर अभ्यास कर रहे थे। इसीलिए संघर्ष के वक्त तैयारी के मामले में चीनी हमसे कहीं आगे थे।
यही वजह है कि जब वे अंदर आए, तो उन्हें वापस लौटाना कारगिल से कहीं ज्यादा दुष्कर साबित हो रहा है। अभी तक यह भी साफ नहीं हो सका है कि ये वापस लौटे हैं, तो कितना लौटे हैं? प्रधानमंत्री की घोषणा के बावजूद विपक्षी दल और कई अवकाश प्राप्त सैन्य व कूटनीतिक सेवा के अधिकारी इसे मानने को तैयार नहीं हैं। पर एक बात तय है कि शी जिनपिंग और उनकी सत्ता चौकड़ी को अंदाज नहीं था कि भारत इतनी दृढ़ता से पेश आएगा। 15 जून को गलवान में हमारे जवानों ने शहादत दी और अब जो आंकडे़ सामने आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि चीनी सैनिकों को अधिक तादाद में हताहत होना पड़ा। तब से अब तक सीमा और कूटनीति के मोर्चे पर कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।
ध्यान दें। आज की भांति कारगिल के मामले में भी भारतीय नेकनीयती जगजाहिर थी और इसका खामियाजा पाकिस्तान को उठाना पड़ा। उसने अमेरिका की हमदर्दी हमेशा के लिए खो दी और यह कहने का हक भी कि भारतीय भूमि पर खूंरेजी करने वाले लोग दहशतगर्द नहीं, बल्कि मुजाहिदीन हैं। अब यही हाल चीन का हो रहा है। उसे दुनिया भर में कडे़ प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका सहित पश्चिम के सारे देश उसकी हरकत के खिलाफ हैं। इंग्लैंड, जापान और तमाम देशों ने भारत की तरह चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं। उसके उपनिवेशवादी विस्तार को रोकने का सबसे बढ़िया तरीका यही है कि हम बीजिंग की कारोबारी सत्ता पर चोट करें। विश्व बिरादरी यही कर रही है। क्या देंग जियाओ पिंग की नीति को हवा में उड़ा डालने वाले शी जिनपिंग भी वही गलती कर बैठे हैं, जो कभी जनरल अयूब खां और भुट्टो की जोड़ी अथवा जनरल परवेज मुशर्रफ ने की थी? चाहे जो हो, पर यह तय है कि हमें अपनी ऐतिहासिक भूलों से बचना होगा। भारत शताब्दियों से अपनी सीमाओं की निगहबानी के मामले में नादान साबित होता रहा है। यह आत्मघाती सिलसिला अब थम जाना चाहिए।शशि शेखर
रायपुर/ शौर्यपथ / राजधानी रायपुर में लॉकडाउन के बावजूद स्टील सिटी के पास एक पॉश कालोनी में 4 लड़कियों केे साथ 5 युवकों को संदिग्ध हालत में पुलिस ने गिरफ्तार किया हैै। छापेमारी के दौरान ये सभी युवक-युवतियां संदिग्ध हालात में मिले। पकड़ी गई लड़कियों ने अपने आपको एक्सिस बैंक देवेन्द्र नगर में कर्मचारी बताया है जिसकी पुलिस जांच कर रही है पुलिस ने देर रात स्टील सिटी के पास में छापा मार कारवाई की। बताया जाता है कि स्टील सिटी के पास कॉलोनी के रहवासी भी एक बैंक कर्मी लेडी से बहुत परेशान थे उसके घर में लगातार कई दिनों तक अलग-अलग कार ,मोटरसाइकिल में कई संदिग्ध लड़कों और लड़कियों का आना-जाना लगातार जारी था आज लॉकडाउन के दौरान भी बैंक कर्मी लेडी के घर लड़के और लड़कियों का आने का सिलसिला जारी रहा तब कॉलोनी वालों ने भी इस मामले पर मोर्चा खोलते हुए थाना को फोन से सूचना दिया कि एक घर में आधा दर्जन से अधिक लड़के लड़कियां मौजूद है एवं संदिग्ध हालत में दरवाजा बंद कर के अंदर में बैठे हैं तब थाना के पुलिस दल ने इस दौरान चार लड़की और पांच युवकों सहित नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। बताया जा रहा है पकड़ी गई एक युवती एक्सिस बैंक देवेन्द्र नगर रायपुर में काम करती है और पति दुबई में रहता है। युवती यहां पर एक कॉलोनी में अपने बच्चों के साथ रहती है। पूर्व में भी युवती के बारे में पुलिस को शिकायत मिल चुकी है। इस संबंध में खम्हारडीह थाना प्रभारी ममता शर्मा अली ने बताया कि, कॉलोनी के लोगों के द्वारा शिकायत मिली थी, जिसके बाद कार्रवाई करते हुए नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पकड़े गए लोगों के खिलाफ 151 के तहत कार्रवाई की गई है,अभी जांच की जा रही है।।
भिलाई नगर / शौर्यपथ / नगर पालिक निगम भिलाई क्षेत्र अंतर्गत आने वाले जोन क्रमांक 4 क्षेत्र में 10 करोड़ की लागत से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जाएगा! इस प्लांट की खासियत यह होगी कि वर्तमान में खुर्सीपार में बने हुए बीएसपी क्षेत्र के जोन क्रमांक 1, जोन क्रमांक 2 एवं जोन क्रमांक 3 जो कि वार्ड क्रमांक 36 तथा 37 एवं आसपास के वार्ड को सम्मिलित किया हुआ है इन एरिया के मल जल, गंदा पानी, बरसाती पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से शुद्ध करने का कार्य किया जाएगा! वर्तमान में खुर्सीपार अंतर्गत बीएसपी क्षेत्र के जोन क्रमांक 1,2,3 में निर्मित बीएसपी क्वार्टर से निकला हुआ गंदा पानी तेलहा नाला में बहाया जा रहा है! जिससे नाले का पानी प्रदूषित हो रहा है! बता दें कि सीवेज सिस्टम पूर्व से बीएसपी के समय का बिछा हुआ है, परंतु प्रबंधन द्वारा उपचारित नहीं किया जा रहा है! प्रदूषण से बचाने के लिए तेलहा नाला के दोनों तरफ निगम द्वारा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण किया जाएगा! *चार करोड़ 16 लाख की लागत से स्थापित होगा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट* सहायक अभियंता अखिलेश चंद्राकर ने जानकारी देते हुए बताया कि दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण किया जाएगा! खुर्सीपार अंतर्गत आने वाले बीएसपी के जोन क्रमांक एक में 1.1 एमएलडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तथा जोन क्रमांक दो एवं तीन के क्षेत्र को कवर करते हुए तीन एमएलडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जाएगा, इन दोनों एमएलडी को बनाने की लागत तकरीबन चार करोड़ 16 लाख की होगी! इसके अतिरिक्त पंप, स्टोरेज कलेक्शन एवं पाइप का विस्तारीकरण भी किया जाएगा! *तेलहा नाला को प्रदूषण से मिलेगी मुक्ति* सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन जाने से खुर्सीपार क्षेत्र के बीएसपी क्वार्टर एवं एवं समीप का बरसाती पानी, मलजल एवं गंदा पानी को तेलहा नाला में बहाने के बजाय इससे ट्रीटमेंट कर शुद्ध किया जाएगा उसके उपरांत ही नाला में बहाया जाएगा! माननीय एनजीटी के भी निर्देश के तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बेहद आवश्यक हो गया है! *ट्रीटमेंट उपरांत सिंचाई में किया जा सकता है उपयोग* सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में उपचारित करने के पश्चात शुद्ध पानी का उपयोग पौधों एवं उद्यानों की सिंचाई में किया जा सकता है खासकर ग्रीष्म ऋतु में पानी की अधिक आवश्यकता होती है! इसके लिए इस उपचारित जल का उपयोग अब विभिन्न कार्यों में किया जा सकता है इससे आवश्यकता अनुसार स्टोर करके भी रखा जा सकता है! औद्योगिक क्षेत्रों में भी पानी की अधिक मांग होती है इन उद्योगों को राशि निर्धारित कर पानी उपयोग के लिए दिया जा सकता है! *5 साल तक एजेंसी करेगी देखरेख* कार्यपालन अभियंता संजय बागड़े ने बताया कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के बेहतर संचालन के लिए निर्माण करने वाली एजेंसी को 5 साल तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का रखरखाव, देखरेख करना होगा! *पूरे भिलाई निगम क्षेत्र के मल जल को किया जा सकता है उपचारित* उल्लेखनीय है कि निगम क्षेत्र में सक्शन पंप के माध्यम से घरों एवं विभिन्न शौचालय इत्यादि के मल एवं गंदगी को निकाला जाता है! इस गंदगी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में ले जाकर इसे उपचारित किया जा सकता है, इस तरह से पूरे निगम क्षेत्र से निकले हुए मल, गंदगी इत्यादि को उपचारित करने के लिए सीवेज प्लांट बेहद कारगर साबित होगा! महापौर एवं भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव के प्रयासों से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए 10 करोड़ की राशि की स्वीकृति है! अब इसके जल्द निर्माण के लिए कयावद जारी हो चुकी है
रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश के पीएचई मंत्री गुरु रूद्र कुमार का 23 जुलाई को जन्मदिन था . और 23 जुलाई से ही दुर्ग जिले में व 22 जुलाई से रायपुर में लॉक डाउन प्रारंभ हुआ . प्रशासन की माने तो यह लॉक डाउन कोरोना संक्रमण के विस्तार को रोकने के लिए लगाया जा रहा है ताकि 7 दिनों के लॉक डाउन में कोरोना संक्रमण की चेन ब्रेक हो . लॉक डाउन ज़रूरी भी इसलिए हो गया कि प्रदेश में लगातार कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे है और सरकार के प्रयासों पर विपक्ष लगातार ऊँगली उठा रही है .
इस लॉक डाउन में प्रदेश में ऐसे कई मामले आये जहा यादगार पल को भी जनता ने अकेले परिवार के बीच मनाया और शासन के आदेशो का पालन कर घर में लॉक रहे दो वक्त की रुखी सुखी खा ली किन्तु घर में ही रहे ताकि संक्रमण के रोकथाम में शासन के आदेशो का पालन हो सके .
किन्तु यही विचार सत्ता में बैठे मंत्री नहीं कर पाए , जनप्रतिनिधि नहीं कर पाए . बड़ी बड़ी बाते कहकर जनता को शासन के आदेशो का पालन करने और सरकार के कार्यो का समर्थन करने की बात कहने वाले मंत्री अपने ही उपर ये नियम क्यों लागू नहीं कर पाते क्या शासन के नियम से उपर है मंत्री .

दुर्ग जिले से मंत्री गुरु रूद्र कुमार 23 जुलाई को अपना जन्मदिन मना रहे थे और उनको बधाई देने वालो की लम्बी फौज दुर्ग से रायपुर तक थी . एक ओर जहां आम जनता 12 बजे के बाद नहीं निकल सकता शासन के आदेश के अनुसार वही मंत्री जी को बधाई देने वालो के लिए कोई समय सीमा नहीं थी कोई भी कभी भी कितनी भी संख्या में किसी भी जिले से पहुँच सकता था ऐसा रुतबा है प्रदेश के मंत्री महोदय का और उनके समर्थको का जिनके लिए लॉक डाउन के नियमो का कोई अर्थ नहीं . लॉक डाउन के नियम सब्जी वालो पर लागू होते है जो समय से थोड़ा ज्यादा बैठ जाए , लॉक डाउन के नियम दूध बेचने वालो पर लागू होते है जो समय सीमा के बाद भी बचे हुए दूध को बेचने की कोशिश करते है , लॉक डाउन के नियम उन पर लागू होते है जो सालो से मोर्निंग वाक कर रहे है स्वस्थ हवा ले रहे है किन्तु नियमो के चलते या तो जुर्माना भर रहे है या फिर घर में बैठे है क्या यही है लॉक डाउन का नियम क्या ऐसे ही सुशासन की बात करेंगे प्रदेश सरकार के मंत्री जी , जनप्रतिनिधि गण . क्या जनता के द्वारा चुने सेवक जनता से अलग हो गए कानून इनके लिए अलग हो गया .
क्या इसी लिए सत्ता की चाह थी कि सत्ता में आते ही शासन के नियम जिनको धरातल में लाने की जिम्मेदारी मंत्री जी की , जनप्रतिनिधियों की भी होती है वही शासन के नियमो की धज्जी उडाये ? और प्रशासन के अधिकारी मौन होकर अपना सारा गुस्सा आम जनता पर उतारे ? क्या ऐसे होता है लॉक डाउन ?
भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र की नब्ज के रूप में काम करने वाला विभाग है, इन्टीग्रेटेड कंट्रोल सिस्टमजिसे हम इंकास विभाग के नाम से जानते हैं। इस विभाग का प्रमुख कार्य है फाइबर ऑप्टिक डेटा नेटवर्क का रखरखाव, पीएलसी आधारित सिस्टम का मेंटेनेंस, हॉट शॉप्स व मिल्स में प्रोसेस ऑटोमेशन को चलाने हेतु पीएलसी स्पेयर्स की खरीदी, विभिन्न ब्रेकडाउन्स का निराकरण आदि।
इंकास की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई। यह विभाग हमारे संयंत्र में प्लांट स्वचालन और कम्प्यूटरीकरण तथा डेटा संचार के क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। 1986 से पहले, संयंत्र में अधिकांश उपकरण कंप्यूटर संगत नहीं थे। परन्तु संयंत्र के ऑटोमेशन के लिए कंप्यूटर संगत प्रक्रिया को लागू करना इसकी पहली आवश्यकता थी। इसलिए विभाग के लिए पहला काम कंप्यूटर संगत प्रक्रिया संकेतों को प्राप्त करने के लिए उचित उपायों की पहचान कर इसे प्राप्त करना था। इस जरूरत को विभाग ने इंस्ट्रूमेंटेशन विभाग और प्रोडक्शन शॉप्स के सक्रिय सहयोग के साथ पूरा किया। यह स्वचालन की दिशा में पहला कदम था।
महाप्रबंधक प्रभारी इंकास के शंकरसुब्रमण्यन ने स्टील प्लांट के क्रमिक ऑटोमेशन की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया कि हमारे संयंत्र में 5 अलग-अलग स्तर के ऑटोमेशन सिस्टम लगे हुए हैं। लेवल-0 में सेंसरों और माप उपकरणों का उपयोग किया गया है, लेवल-1 क्षेत्र विशेष में स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया नियंत्रण प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, लेवल-2 में शॉप लेवल ऑटोमेशन शामिल है, लेवल-03 के तहत केंद्रीय निगरानी प्रणाली और प्रबंधन सूचना प्रणाली लगाई गई है, लेवल-04 में ईआरपी/एमईएस के माध्यम से व्यापारिक लेनदेन के लिए ऑटोमेशन किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि इंकास का गठन विभिन्न उत्पादन और सेवा इकाइयों में स्वचालन प्रणाली की पहचान, अवधारणा और कार्यान्वयन के लिए किया गया था और यह उनकी सुचारू कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करता है।
इंकास विभाग का कार्यक्षेत्र प्लांट, माइंस तथा अस्पताल से लेकर टाउनशिप क्षेत्र में फैला हुआ है। प्लांट के भीतर के क्षेत्र को 5 जोन में विभाजित किया गया है-आयरन जोन, स्टील जोन, मिल्स जोन, एनर्जी मैनेजमेंट जोन और नेटवर्किंग ग्रुप। विभाग का सम्पर्क अपने फाइब्रो ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से संयंत्र के प्रत्येक क्षेत्र के कोने-कोने में है। इसके अलावा, इंकास विभाग संयंत्र की नई परियोजनाओं के तहत लगे विभिन्न विभागों जैसे यूआरएम, ब्लास्ट फर्नेस-8, कोक ओवन बैटरी-11 एवं एसएमएस-3 में अत्याधुनिक ऑटोमेशन की अवधारणा, सिस्टम को बनाए रखने, डेटा साझा करने के लिए नेटवर्क कनेक्शन, उत्पादों के डिस्पैच तथा ब्रेकडाउन्स के समाधान हेतु अपनी भूमिका का बखूबी निर्वहन कर रहा है।
इंकास विभाग के महाप्रबंधक एम पी सिंह ने बताया कि प्लांट और टाउनशिप क्षेत्र में व्यवसाय और प्रक्रिया अनुप्रयोगों को चलाने के लिए, 2 कोर स्विच, 15 एरिया स्विच/राउटर्स, 4 एग्रेगेशन स्विच और 500 से अधिक एज स्विच लगाए गए हैं। साथ ही संचार व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु एक प्रतिबद्ध सर्वर सिस्टम को मेंटेन किया जाता है जिसके माध्यम से संचार की आवश्यकता को बनाए रखने के लिए ईमेल, इंटरनेट प्रॉक्सी और एंटीवायरस जैसी इन्फ्रास्ट्रक्चर सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। लगभग 500 किमी फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से संयंत्र के लगभग 6000 उपयोगकर्ताओं तथा टाउनशिप के 750 उपयोगकर्ताओं को जोड़ा गया है। वे आगे कहते हैं कि ईआरपी के माध्यम से डेटा साझा करना, सेल नेट के माध्यम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा, प्लांट के अंदर उपकरणों से डेटा कैप्चर करने और डेटा की उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सांविधिक प्रदूषण उत्सर्जन संबंधित पर्यावरण डेटा उपलब्ध कराया जाता है। विभाग द्वारा संयंत्र के उत्पादन गतिविधियों को सक्षम और सुचारू बनाए रखने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता है। वर्ष 2013 से इंकास में कार्यरत् ओसीटी श्री कुंचे साई किरण का कहना है कि उन्हें खुशी है कि उन्हें आयरन जोन में प्रोसेस ऑटोमेशन कार्य को संपादित करने का मौका मिला है। जिसके तहत सॉफ्टवेयर्स व पीएलसी प्रोग्रामिंग को अपडेट करने से लेकर वर्चुअल सर्वर की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ एचएमआई क्लाइंट के माध्यम से नेटवर्किंग को सक्षम बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं। उन्हें गर्व है कि एसपी-3, कोक ओवन बैटरी-11, ब्लास्ट फर्नेस-8 और ओएचपी-बी में मॉडेक्स परियोजनाओं की कमीशनिंग में सहयोग प्रदान किया है।
रायपुर / शौर्यपथ / भाजपा द्वारा सोशल मीडिया में चलाए जा रहे बने रिहिस डॉक्टर रमन कार्यक्रम पर कांग्रेस ने तंज कसा प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि रमन सिंह के 15 साल के शासनकाल मे भाजपा 15 सीट में सिमट गई।भाजपा के जितने मिसकाल वाले 56 लाख सदस्य है उतना वोट भी भाजपा को नही मिला।2018 के विधानसभा चुनाव में हुई भाजपा की करारी हार और रमन सिंह को जनता के द्वारा नकारे जाने के बाद भी यदि भाजपा के लिए डॉक्टर रमन सिंह बढ़िया है?तो 2019 में आरएसएस भाजपा ने डॉ रमन सिंह को प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया? डॉ रमन सिंह वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से ज्यादा पढ़े लिखे हैं।15 साल तक मुख्यमंत्री भी रहे हैं।चीन की यात्रा भी किये है?अडानी को कोल माईनस भी दिये है?रिलायंस का टावर लगवाने में मदद किये है? भाजपा के बड़े नेताओं की कंस्ट्रक्शन कंपनी को बड़े बड़े कंस्ट्रक्शन वर्क,साफ सफाई का ठेका,एनजीओ का काम दिलाकर फायदा पहुँचाये है।इस दौरान कमीशन खोरी और भ्रष्टाचार की काली कमाई से आरएसएस और भाजपा के बड़े नेताओं को भी लाभ पहुंचाते रहे हैं।भाजपा समर्थित अदानी अंबानी को मदद करते रहे हैं?पंचायतों की विकास मद की राशि से भीड़ बुलाकर भाजपा के बड़े नेताओं पर फूल बरसाते रहे है।भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों,बेटी बेटा दमाद सब को छत्तीसगढ़ में बड़े बड़े ओहदे दिये।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि 15 साल के रमन सरकार के कुशासन भ्रष्टाचार कमीशनखोरी अराजकता से छत्तीसगढ़ की जनता पीड़ित रही है। उस दौरान प्रतिदिन 2 किसान आत्महत्या करते थे।आउट सोर्सिंग से भर्ती कर युवाओं को छला गया। छत्तीसगढ के जल जंगल जमीन वन संपदा,खनिज संपदा का दोहन किया गया। आदिवासियों की जमीन छीनी गई। भाजपा रमन के 15 साल के शासनकाल के दौरान छत्तीसगढ़ का जन जन हताश परेशान था। उस दौरान मात्र आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी जुड़े हुए लोग ही खुश थे।रमन सरकार के दौरान कमीशन खोरी भाजपा का मूल काम था।विकास कार्यों के नाम से भ्रष्टाचार करना कमीशन खोरी करना गरीबों के मकान दुकान को तोड़ना आदिवासियों की जमीन को अनैतिक तरीके से हथियाना सहित रेत माफिया शराब माफिया अमानक बीज खाद दवाइयां के कार्यों को संरक्षण देने काम भाजपा के नेताओ के संरक्षण में होते रहे।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार के 18 महीने के कार्यकाल से छत्तीसगढ़ के किसान मजदूर महिलाएं छात्र युवा व्यापारी आदिवासी वर्ग पिछड़ा वर्ग सहित सर्वहारा वर्ग खुशहाल हो रहा है।मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान, मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक मुख्यमंत्री शहरी स्लम क्लीनिक नरवा गरवा घुरवा बारी,राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना, किसानों के कर्ज माफी बिजली बिल हाफ सिंचाई कर माफ़ धान की कीमत 2500,तेंदूपत्ता का मानक दर 2500 से बढ़ाकर 4000 रुपया प्रति बोरा,आदिवासियों की जमीन लौट आना शिक्षाकर्मियों का संविलियन जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों को जेल से बाहर निकालना छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री सहित अनेक जनकल्याणकारी निर्णयों योजनाओं को मिल रहे व्यापक जनसमर्थन के सामने भाजपा मुद्दा विहीन हो चुकी है मुद्दों के दिवालियापन के दौर से गुजर रही है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / क्या आपने कभी ऐसे लोगों को देखा है, जो हमेशा कुछ न कुछ खाते रहते हैं? हर समय कुछ न कुछ खाते रहना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।यह आदत धीरे-धीरे ईटिंग डिसऑर्डर तक जाती है। ईटिंग डिसॉर्डर खानपान की आदतों से संबंधित एक गंभीर स्थिति है, जो नकारात्मक रूप से आपके स्वास्थ्य, भावनाओं और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है। इस समस्या से ग्रस्त लोगों में खानपान की आदतें सामान्य नहीं रहतीं। कुछ लोग अपने शरीर की आवश्यकता से अधिक खाते हैं, तो कई लोग उससे बहुत कम खाते हैं।
ईटिंग डिसॉर्डर के प्रकार
एनारेक्सिया नवरेसा, बुलिमिया नवरेसा और बिंज ईटिंग डिसॉर्डर सबसे सामान्य प्रकार के डिसॉर्डर हैं। इसके अलावा कुछ और ईटिंग डिसॉर्डर हैं, जिनमें पिका, रूमिनेशन डिसॉर्डर और अवाइडेंट/रिस्ट्रक्टिव फूड इनटेक डिसॉर्डर प्रमुख हैं।
एनारेक्सिया नवरेसा
एनारेक्सिया नवरेसा को आम भाषा में एनारेक्सिया कहा जाता है। यह एक घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इसमें शरीर का वजन कम हो जाता है, क्योंकि जो लोग एनारेक्सिया से पीड़ित होते हैं, वे अपने भार और शरीर के आकार को नियंत्रित करने का अत्यधिक प्रयास करते हैं। एनारेक्सिया से पीड़ित लोग कैलरी का सेवन अत्यधिक कम कर देते हैं या वजन कम करने के लिए दूसरे उपायों को अपनाते हैं। इसमें अत्यधिक व्यायाम करना, पेट साफ रखने के लिए लैक्जेटिव का सेवन या खाने के बाद उल्टी कर देना जैसी चीजें शामिल होती हैं। वजन कम करने के ये प्रयास तब भी जारी रहते हैं, जब वजन अत्यधिक कम हो जाता है। कभी-कभी इससे पीड़ित लोग खुद को इतना भूखा मारते हैं कि यह स्थिति उनके लिए घातक हो जाती है।
बुलिमिया नवरेसा
बुलिमिया घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इससे पीड़ित व्यक्ति का खानपान पर नियंत्रण नहीं रहता। ऐसे लोग थोड़े समय में ही अधिक मात्रा में खा लेते हैं और अस्वस्थ तरीके से उस अतिरिक्त कैलोरी को कम करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अधिक खाने के बाद ऐसे लोग शर्म और अत्यधिक भय से भर जाते हैं। वजन बढ़ने के डर से वे उल्टी करने का प्रयास करते हैं, अत्यधिक व्यायाम करते हैं या लैक्जेटिव का उपयोग करते हैं, ताकि अतिरिक्त कैलरी मल द्वारा निकल जाए।
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर से पीड़ित लोग नियमित रूप से अत्यधिक भोजन खाते हैं। ऐसे लोगों को इस बात का पूरा एहसास रहता है कि उनका अपने खानपान पर नियंत्रण नहीं रहा। बिंज के बाद भी लोग अपने व्यवहार के कारण आत्मग्लानि, गुस्से या शर्म से भर जाते हैं, लेकिन बुलिमिया की तरह वे इस अतिरिक्त कैलरी इनटेक को व्यायाम या दूसरे तरीकों से बाहर निकालने का प्रयास नहीं करते।
अन्य ईटिंग डिसॉर्डर
पिका : पिका एक ऐसा ईटिंग डिसॉर्डर है, जिसमें व्यक्ति को नॉनफूड आइटम खाने का मन करता है, जैसे साबुन, कपड़ा, टैलकम पाउडर, धूल, चॉक आदि। यह समस्या महीने में कम से कम एक बार तो होती ही है। पिका न स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और न ही सामाजिक रूप से। लगातार इन चीजों के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैं, जैसे पॉयजनिंग, पाचन मार्ग संबंधी समस्या या संक्रमण। पिका अकसर दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ होता है, जैसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर।
खाना खजाना / शौर्यपथ / बटाटा गोलगप्पे चाट वीकेंड के लिए सबसे खास रेसिपी है। यह रेसिपी बच्चों को भी बहुत पसंद आएगी। आइए, जानते हैं रेसिपी-
सामग्री :
गोलगप्पे- आवश्यकतानुसार
उबले आलू- 2
चाट मसाला पाउडर- 1 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
बारीक कटा प्याज- 2
दही के लिए सामग्री :
दही- 1/2 कप
काला नमक- स्वादानुसार
चीनी- 1 चम्मच
गार्निशिंग के लिए:
लाल मिर्च पाउडर- आवश्यकतानुसार
चाट मसाला पाउडर-आवश्यकतानुसार
हरी चटनी- 1/2 कप
मीठी चटनी- 1/2 कप
सेव- 1 कप
विधि :
एक बाउल में आलू का छिलका छीलकर मैश करें। उसमें चाट मसाला और नीबू का रस डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। एक दूसरे बाउल में दही, काला नमक और चीनी डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। सर्विंग प्लेट में पानी पूरी रखें और एक-एक करके सारी पानी पूरी के बीच में छेद करें। उसमें थोड़ा-थोड़ा आलू वाला मिश्रण डालें। ऊपर से थोड़ा-थोड़ा प्याज, दही, दोनों चटनियां, सेव, चाट मसाला, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पत्ती डालें। तुरंत सर्व करें।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
