August 05, 2026
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    विशेष : 19 वर्ष की अल्प आयु में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद हेमू कालाणी

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      दुर्ग / शौर्यपथ / देश की आजादी के लिए अनगिनत वीरो ने अपने प्राणों की आहुति दी देश की स्वतंत्रता के वीरो की अगर तुलना की जाए तो ये अतिश्योक्ति ही होगी . वीरो की इस पावन भूमि में शहीदों ने स्वतंत्र भारत के लिए हस्ते हस्ते फांसी के फंदे को भी गले लगा लिया ऐसे ही वीरो में शहीद हेमू कालाणी का भी नाम इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है . दुर्ग शर के मुख्य मार्ग पर शासकीय पोलिटेक्निक कालेज के समीप आज शहीद हेमू कालाणी की प्रतिमा का लोकार्पण शहर विधायक गजेन्द्र यादव ने किया .

     जीवन सारांश : भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को बाम्बे प्रेसीडेंट के सिंध डिवीजन के सुक्कूर में एक सिंधी जैन परिवार में हुआ था। सुक्कूर अब पाकिस्तान में है। वे देश के लिए शहीद होने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में से एक थे। उनके 20 वें जन्मदिन से दो महीने पहले केवल 19 वर्ष की आयु में उन्हे अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर फांसी दी गई थी। हेमू कालाणी को सिंध का भगत सिंह भी कहा जाता है। हेमू बचपन से साहसी थे और विद्यार्थी  जीवन से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे। हेमू जब मात्र 7 वर्ष के थे, तब वह तिरंगा  लेकर अंग्रेजो की बस्ती में अपने दोस्तों के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्व करते थे। 1942 में 19 वर्षीय किशोर क्रांतिकारी ने अंग्रेज भारत छोड़ो नारे के साथ अपनी टोली के साथ सिंध प्रदेश में तहलका मचा दियाा था। हेमू समस्त विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए लोगों से अनुरोध किया करते थे। अत्यचारी फिरंगी सरकार के खिलाफ छापामार गतिविधियों और उनके वाहनों को जलाने में हेमू कालाणी सदा अपने साथियों का नेतृत्व करते थे। अंग्रेजो की एक ट्रेन जिसमें क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए हथियार और अंग्रेजी अफसरों का खूखार दस्ता था, उसे हेमू सक्खर पुल में पटरी की फिश प्लेट खोलकर गिराने का प्रयास कर रहे थे। पुलिस ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट में हेमू को फांसी की सजा सुनाई।  हेमू को जेल में अपने साथियों का नाम बताने पर फांसी की सजा न देने का प्रलोभन दिया गया। लेकिने उन्होने किसी का नाम नही बताया। 21 जनवरी 1943 को उन्हे फांसी की सजा दी गई। जब फांसी से पहले उनसे आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होने भारतवर्ष में फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। इकलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए वे फांसी के फंदे पर झूल गए।

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