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May 23, 2026
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विशेष आलेख : "मांगूंगी तो माँ नहीं रहूंगी?"

  • rounak group

शौर्यपथ लेख /

माँ... मैं एक माँ हूँ। कैसे कह सकती हूँ कि मुझे कुछ चाहिए?
क्यों मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए होता... सिर्फ बच्चों की खुशी के अलावा?

दर्द, भूख, प्यास मुझे भी तो लगती है। स्त्री घर की धुरी है, तो उसकी महत्ता अपेक्षित क्यों? मुझे कहते हुए डर क्यों लगता है कि माँ को भी कभी कुछ चाहिए होता है? ये कहते ही अपराधबोध और हीनता मुझमें कहाँ से आई? ये डर किसने और कब भरा मुझमें?

क्या सच में माँ को कुछ नहीं चाहिए होता?
प्रकृति जन्म देती है, तो स्त्री भी जन्म देती है। पर प्रकृति तो छीन भी लेती है... और माँ से माँगने तक का अधिकार छीन लिया गया। उसे समर्पण, त्याग की मूरत बनाकर देवी बना दिया गया। फिर देवी कुछ माँग कैसे सकती है? वो इंसान जो बन जाएगी।

इस डर को 'गिल्ट' बनाकर समाज ने स्त्री के जेहन में गहराई से भर दिया।
माँ अपना अस्तित्व भूल गई और सिर्फ 'माँ' बनकर रह गई। उसे समझा दिया गया कि जिस दिन वह अपने लिए सोचेगी, उस दिन स्वार्थी कहलाएगी। माँ को इतने ऊँचे पद पर बैठा दिया गया जहाँ से वह खुद को देख ही नहीं पाती।

माँ एक जिम्मेदारी है... इस संसार को सही सोच देने की। माँ सिर्फ एक शब्द नहीं... सोच है। माँ के कर्तव्य के साथ अधिकार होते हैं, ये सिखाने की जिम्मेदारी भी तो माँ की ही है। फिर 'अधिकार' कहते ही गिल्ट क्यों?

त्याग, समर्पण, ममता, स्त्रीत्व से सीमित नहीं... उसकी एक असीमित दुनिया होती है। उसकी असीमितता का बोध किसने छीन लिया उससे? इन बातों का कभी उत्तर ही नहीं मिला।

खुद को लुटाते-लुटाते वो ममता से खाली नहीं होती, पर तड़पती रहती है प्यार और अपनेपन के लिए। उसके पास इतना खजाना कहाँ से आता है जो कभी खत्म ही नहीं होता? और ना कभी थकती है वो... लुटाते-लुटाते।

माँ ऐसी क्यों होती है... पूरी दुनिया से अलग?
क्योंकि ममता साँस होती है, और साँस लेने से कोई थकता नहीं। दुनिया से अलग इसलिए है क्योंकि दुनिया हिसाब माँगती है... और माँ बेहिसाब है। क्योंकि जिस दिन वो माँ बनती है, उस दिन से वो सिर्फ 'माँ' ही बचती है।

माँ के प्यार पर कभी जिरह नहीं होती... क्योंकि माँ हर स्पंदन का सबूत होती है। माँ पर बुरा लिखना... किसी कलम के बस की बात नहीं।

माँ इंसान है... तो उसमें इतनी हिम्मत कहाँ से आती है?
और भगवान है... तो वो रोती क्यों है?
वो क्यों कभी खुद के लिए जीना नहीं चाहती? क्यों अपनी खुशियों को त्यागती रहती है? एक माँ में हीन भावना किसने भरी? किस कूटनीति के तहत भरी? हर व्यक्ति का दिल इसका गवाह और उत्तर दोनों है। और फिर माँ को किसी के साक्ष्य की जरूरत क्या?

समाज ने बेटी को परिस्थिति के साथ चलना सिखाया, बहू को घर जोड़ने की सलाह दी, और माँ को ममता की मूरत बनाकर कहा... "तेरे पास तो खजाना है, तुझे क्या चाहिए? तेरी खुशी तो बच्चों की खुशी में है।" और उससे माँगने का हक छीन लिया।

माँ ने भी अपने सपने बुनना छोड़ दिया। ख्वाब दफन कर, ममता ही लुटाती रह गई। माँ से कहा... "तू भगवान है... तू रोटी देगी।" उसकी पूजा करने लगे... वो रोटी खिलाने लगी और उसने खुद को इंसान समझना छोड़ दिया।

माँ की आजादी को छीन, एक सोने के पिंजरे में कैद कर दिया।
देवी बनाकर कहा... "देखो माँ कितनी महान होती है, कभी कुछ नहीं माँगती।" किसी का ध्यान नहीं गया कि माँ इंसान है... और इंसान थकता है, उसकी जरूरतें होती हैं।

समाज ने एक जाल बिछाया है अपने बोनेपन का। माँ को इतना ऊँचा बिठाया कि वो नीचे उतर कर अपना हक ही ना माँग ले। माँ चुप हो गई... क्योंकि उसे लगा कि उसने कुछ माँगा तो वह देवी से गिरकर 'औरत' हो जाएगी।

माँ होना मतलब... गंगा होना। माँ होना मतलब... सिर्फ देना।
दुनिया ने उसकी थकान का हिसाब रखना बंद कर दिया, क्योंकि माँ तो... बेहिसाब है ना! फिर माँ ने माँगना छोड़ दिया। उसे लगा कि यदि वह एक पल अपने लिए निकाल लेगी, या कहीं किसी से कुछ माँग लेगी, तो उसकी ममता पर उँगलियाँ उठ जाएँगी।

माँ को वही चाहिए होता है, जिसे हम माँ से छीन लेते हैं।

बीबीमैं एक माँ हूँ, इसलिए कह सकती हूँ कि... माँ को भी भूख लगती है, थकान होती है, नींद आती है। उसके भी सपने होते हैं, जो बच्चे होने के बाद दफन हो जाते हैं। माँ का ध्यान सिर्फ बच्चे पर रहता है, क्योंकि उसे सिखाया गया है कि वो भगवान है, इंसान नहीं।
पर माँ इंसान है... भगवान नहीं।
मैं उसे इंसान का दर्जा वापस दिलाना चाहती हूँ, जो उससे छीन लिया गया है। इंसान कहलाना माँ का अपमान नहीं... उसका सम्मान है। माँ को महान नहीं... माँ को इंसान कहो।

आज जब मेरी बेटियाँ माँ बनने वाली हैं, तो मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटियाँ खुद को भूलें। वो कर्तव्य के साथ माँगने का अधिकार रखें, और माँगते समय खुद को स्वार्थी ना समझें। क्योंकि जो माँ खुद से प्यार करती है, वह अपने बच्चों को प्यार करना भी सिखाती है।

वो सिखाएगी कि... "माँगूंगी तो माँ नहीं रहूंगी"... इस तरह से उसे जज ना किया जाए। उसे महसूस किया जाए, उसके जज्बात का ख्याल रखा जाए। ऐसा करते समय वो 'माँ' ही रहेगी, ये भरोसा दिलाया जाए।

मैं एक माँ हूँ और माँ के लिए आवाज़ उठा रही हूँ। 'माँ को कुछ नहीं चाहिए'... ये अंतःकरण में बैठा दिया गया है, उसे शुद्ध करने की जरूरत है। ये माँ को बताने की जरूरत है कि कुछ न माँगना उसका नेचर नहीं, एक साजिश है।

;;जो कई हाथों से अपनी गृहस्थी संभाल लेती है, एक जीवन को जन्म दे सकती है, वो इतनी कमजोर नहीं हो सकती कि अपने लिए जीने से अपराधबोध में चली जाए। ये उसका नहीं... समाज द्वारा माँ के मन में भरा गया गिल्ट है।

माँ से सिर्फ 'देना' मत सीखो, माँ को 'देना' भी सीखो।
माँ से उससे माँगने का डर छीन लो। उसे बताओ कि तू माँगेगी, तब भी सबसे पवित्र रहेगी। उसे बताओ कि माँगना इंसान होने का सबूत है, कमजोर होने का नहीं।

माँ अपने बच्चों के लिए पूरा आसमान होती है और पूरी ज़मीन भी। उसका किरदार बहुत वृहद है। बात एक माँ की छवि से आजादी की नहीं... माँ को आजाद करने की है, उस गिल्ट से जो उसे कुछ माँगने से रोकता है।

रोटी ना बनाए तो उसकी इज्जत कम नहीं होगी। उसे इतना अपनापन मिले कि उससे कह सकें... "सिर्फ खाना बनाना ही आपका काम नहीं।" और उसे अपने सपने दफन करने की जरूरत नहीं।
हाँ, तू भी थकती है... ये हम जानते हैं। बस इतनी सी परवाह... कि माँ बेपरवाह नहीं होती। क्योंकि माँ के हिसाब और प्रवाह का कोई समकक्ष नहीं।
लेखिका.. डॉक्टर अनुराधा बक्शी "अनु" अधिवक्ता
पोलसाय पारा गली नंबर 1
दुर्ग छत्तीसगढ़
491 001
मो. नं. 91792 80257

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