August 03, 2026
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    बस्तर में सड़कें अब IED से नहीं… भ्रष्टाचार के धमाकों से उड़ रही हैं क्या?

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    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर में सालों तक सड़कें तब टूटती थीं जब नक्सली IED फोड़ते थे। पुल-पुलिया उड़ जाते थे, रास्ते गायब हो जाते थे, और लोग समझते थे यह यहां की मजबूरी है, हालात हैं। लेकिन आज दिल को जो चीर देने वाली तस्वीर सामने है, वह किसी विस्फोट की नहीं… यह भ्रष्टाचार के फटने की तस्वीर है। और यही डर भी है कि कहीं यह बस्तर में आने वाले समय की “नई सामान्य घटना” न बन जाए।

    तोकापाल ब्लॉक की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना वाली Nh -16 KM 476.60 से पटेलपारा लम्बाई 5.20 किलोमीटर लगभग 72 लाख रुपए की सड़क, जो गांव की एकमात्र जीवन-रेखा थी, आज मौत के गड्ढे में बदल चुकी है। जहां कभी रास्ता था, वहां अब सड़क हवा में झूलती और नीचे मिट्टी पूरी तरह धंसी हुई दिखती है। गांव वाले रोज़ इसी टूटे हुए खड्डे के किनारे से गुजरने को मजबूर हैं। कई बार बड़ा हादसा टल चुका है, लेकिन जिम्मेदारों की तरफ से अब तक ना चेतावनी बोर्ड, ना मरम्मत, ना निरीक्षण, सिर्फ खामोशी।

     

    यह हाल देखकर यही लगता है—

    यहां डामर नहीं बहा… जिम्मेदारी बह गई।

    यहां मिट्टी नहीं धंसी… ईमानदारी धंस गई।

    यहां सड़क नहीं टूटी… सिस्टम की आत्मा टूट गई।

     

    और सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह कि

    जनप्रतिनिधि-विशेषकर विधायक साहब—इस खाई के सामने भी खामोश बैठे हैं। मंचों से विकास की गूंज, पोस्टरों में चमकते वादे, फोटोशूट में मुस्कान… पर इस सड़क पर विकास का चेहरा घावों से भरा दिखाई देता है।

     

    विधायक क्षेत्र के इस हालत पर लोगों ने यह भी कहा कि

    “अगर यह सड़क विधायक के घर तक जाती, तो क्या इतने दिन चुप्पी रहती?” यह सवाल किसी की भावना नहीं, बल्कि असल दर्द है।

    विभागीय अधिकारी और कर्मचारी भी जनता के निशाने पर हैं।

    जिन्हें निर्माण की गुणवत्ता देखनी थी, निरीक्षण करना था, उसी सड़क की हालत आज उनके हस्ताक्षरों और स्वीकृति पर सबसे भीषण सवाल खड़ा कर रही है।

    गांव में चर्चा साफ-साफ है—

    “सड़क नहीं टूटी… अधिकारियों की नीयत टूटी है।” 72 लाख की सड़क पहली बरसात भी नहीं झेल पाई।अगर यह भ्रष्टाचार नहीं, तो फिर क्या है? अगर यह लापरवाही नहीं, तो फिर किसे कहेंगे? और कार्रवाई के इंतजार में जनता पूछ रही है—क्या किसी की मौत का इंतज़ार किया जा रहा है, साहब?

    ग्रामीणों की मांग है कि इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच, घटिया निर्माण की जिम्मेदारी, और ठेकेदार से लेकर फाइल पास करने वाले अधिकारी तक हर स्तर पर कार्रवाई की जाए। क्योंकि जनता का सब्र अब अंतिम सीमा पर है, और गांव की आवाज़ पहले से कहीं ज्यादा तीखी— “सड़क कट गई तो क्या हुआ… अब जिम्मेदारों की कुर्सी कटनी चाहिए, साहब!”

     

    छत्तीसगढ़ ग्राम सड़क विकास अभिकरण विभाग के SDO धनंजय देवांगन ने इस मामले पर कुछ भी कहने से साफ मना कर दिया।

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