August 03, 2026
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    भूमिअधिग्रहण के कानून पर छत्तीसगढ़ में कब चलेगा जन जागरण अभियान , जो करेगा लीड वही होगा राज्य का असल नेता

    • rounak group

    बिलासपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ राज्य की कुल वर्ग किमी क्षेत्र पर में से बड़े क्षेत्र में कोयले को भंडार है, पानी है और जंगल है, इसलिए छत्तीसगढ़ में पिछले चार दशकों से कोयला खनन की गतिविधियां सतत जारी है। साथ ही विधुत उत्पादन कंपनियों ने भी अपनी इकाइयां स्थापित की। इनमें अब तक केंद्र एवं राज्य सरकार की मुख्य थी। किन्तु अब बदले हुए नियम के कारण कोल सेक्टर का पूर्णतः निजीकरण हो जाएगा। एसे में छत्तीसगढ़ के जंगल और किसान दोनों सीधे प्रभावित होंगे। किन्तु उदासीन जनप्रतिनिधित्व और जागरूकता की कमी के कारण छत्तीसगढ़ में प्रकृतिक संसाधनों की लूट खसोट को रोकना कठिन होगा और बड़ी शक्तिशाली निजी कंपनियों के सामने जनता लूटने के लिए मजबूर होगी। इस सब के बावजूद राज्य के भीतर राजनैतिक दल अथवा श्रमिक संगठन में से कोई भी आज आवाज उठाने तैयार नही है। भारत मे कुल सेक्टर ने निजीकरण भी देखा राष्ट्रीकरण भी देखा और फिर से निजीकरण को भी देखेगा। 2013 में यूपीए जिसका नेतृत्व कांग्रेस के पास था ने पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 पारित हुआ । यह एक ऐसा कानून है जो किसान के पक्ष में है और पंचायत को मजबूत करता है। इसके अतिरिक्त देश में भूमि अधिग्रहण के 13 और कानून है जो सड़क, नहर, रेल, टावर, टावर लाइन लगाने के लिए उपयोग में लाये जाते है। इन सबके के साथ 1957 के कानून कोल बियरिंग एरिया अधिग्रहण एयर विकास अधिनियम पर चर्चा जरूरी है जो कि छत्तीसगढ़ में कोई नही करता। विकास अधोसंरचना निर्माण जरूरी है, पर सहभागिता और पारदर्शिता के साथ। साथ मे मानवतावाद जिसमे मानववाद के साथ जिसमे पशुपक्षी जल चर भी जुड़े। तभी सच्चे अर्थों में जल, जंगल और जमीन का सही उपयोग होगा। 2013 का कानून 1957 के कानून को समाप्त नही करता अब सवाल यह है कि 1957 का कानून केंद्र सरकार की कंपनी के हित में भूमि अधिग्रहण के लिए था अब इसी कानून से निजी कंपनियों के लिए जमीन का अधिग्रहण होगा। जानकारी यह कहती है कि छत्तीसगढ़ में 40 कोल ब्लॉक के लिए 60000 हेक्टर अथवा एक लाख 50 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण होगा, और छत्तीसगढ़ के 150 आदिवासी बाहुल्य गांव सीधे प्रभावित होंगे। इतनी बड़ी विप्पलवपारी योजना के लागू होने के बाद छत्तीसगढ़ का गठन का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।

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