August 07, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    साहू समाज का सामूहिक विवाह कार्यक्रम सामाजिक उत्थान की मिसाल — मुख्यमंत्री साय
    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भक्त माता राजिम जयंती महोत्सव में हुए शामिल

    रायपुर / शौर्यपथ / राजिम भक्तिन माता एवं माता कर्मा के बताए संदेश मानव समाज के लिए कल्याणकारी है, हमें उनके संदेशों का अनुसरण करना चाहिए। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने आज राजिम के त्रिवेणी संगम में आयोजित भक्त माता राजिम जयंती महोत्सव को सम्बोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने भगवान श्री राजीव लोचन एवं भक्त माता राजिम की पूजा अर्चना कर प्रदेश और समाज की सुख समृद्धि और खुशहाली की कामना की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने साहू सृजन पत्रिका का विमोचन किया। साहू समाज द्वारा मुख्यमंत्री का गजमाला पहनाकर स्वागत किया।
    मुख्यमंत्री श्री साय ने राजिम माता भक्ति जयंती की बधाई देते हुए कहा कि साहू समाज समृद्ध और शिक्षित समाज है जो हर दृष्टिकोण से समृद्ध रहा है। साहू समाज का इतिहास भी समृद्ध रहा है। हम सबको दानवीर भामाशाह,बाबा सत्यनारायण जी का आशीर्वाद मिल रहा है। यह समाज निरंतर विकास करें। यही कामना है। जब समाज एक जुट होगा तो केवल समाज ही नहीं प्रदेश और देश भी शक्तिशाली और समृद्ध बनता है।
    मुख्यमंत्री श्री साय ने साहू समाज के सामूहिक विवाह को अनुकरणीय पहल बताते हुए कहा कि राजिम माता ने जिस साहू समाज को अपनी मेहनत और त्याग से संगठित किया, आज वह समाज शिक्षा, कृषि व व्यवसाय सहित सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है।
    मुख्यमंत्री ने कहा कि हम राजिम माता के आशीर्वाद से हर गारंटी को पूरा कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ खनिज, वन, उर्वरा से भरपूर है। अब नक्सलवाद से जवान पूरी ताकत से लड़ रहे हैं। हम सबका संकल्प है कि 31 मार्च तक बस्तर को नक्सल मुक्त कर देंगे। राज्य के विकास में बाधक नक्सलवाद अब खत्मा की ओर है। राज्य को हम सब समृद्धि की दिशा में लेकर जाएंगे।
    मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि आज सिरकट्टी आश्रम में भव्य राम जानकी मंदिर में धर्म ध्वजा की स्थापना की गई। इस पुण्य अवसर पर हमें शामिल होने का सौभाग्य मिला। जैसे अयोध्या धाम में धर्म ध्वजा स्थापना किए हैं, उसी तर्ज पर यहां कुटेना में भी धर्म ध्वजा स्थापित किया गया है। मेरा सौभाग्य है कि एक साल पहले भी इस अवसर पर शामिल होने का अवसर मिला था।
    उप मुख्यमंत्री श्री अरूण साव ने कहा कि साहू समाज एक संगठित समाज के रूप में जाना जाता है। आज हम सभी राजिम माता की जयंती मनाने आये हैं। उन्होंने कहा कि त्रिवेणी संगम के इस पावन धरती से प्रेरणा लेकर जाएंगे और मिलकर समाज के विकास के लिए काम करेंगे। केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू ने कहा कि माता राजिम भक्तीन की महिमा का बखान करते हुए कहा कि राजिम त्याग, भूमि तपस्या, साधना और श्रम की भूमि है। भगवान को खिचड़ी खिलाने वाले समाज से हमारा समाज का नाता है। हम अपने पुरखों के योगदान को याद करके समाज को आगे ले जा सकते हैं। शिक्षा और संस्कार भी जरूरी है।
    इस अवसर पर साहू समाज के प्रतिनिधिगण सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

    अपार आईडी के माध्यम से विद्यार्थियों को मिल रही स्थायी डिजिटल शैक्षणिक पहचान

    रायपुर / shouryapath / भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत विद्यार्थियों की शैक्षणिक पहचान को सुदृढ़ करने हेतु लागू की गई APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) व्यवस्था के अंतर्गत राज्य में अपार-आईडी निर्माण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है।
    दिनांक 7 जनवरी 2026 तक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, राज्य के 57,045 विद्यालयों में अध्ययनरत 57,10,207 विद्यार्थियों में से 50,60,941 विद्यार्थियों की अपार-आईडी सफलतापूर्वक जनरेट की जा चुकी है, जो कि 88.63 प्रतिशत है तथा बड़े राज्यों में प्रतिशत के आधार पर सर्वाधिक है। यह डिजिटल शैक्षणिक संरचना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
    छत्तीसगढ़ में बेमेतरा (96.40 प्रतिशत) तथा राजनांदगांव (96.38 प्रतिशत) जिले में सर्वाधिक विद्यार्थियों के अपार-आईडी तैयार किए गए हैं, जबकि रायगढ़, कोरिया, रायपुर, कोरबा, धमतरी, दुर्ग तथा बलौदाबाजार जिलों में 93 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों के अपार-आईडी तैयार किए जा चुके हैं। 5 जिले—नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा, बलरामपुर तथा दंतेवाड़ा—को छोड़कर शेष जिलों में 80 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों के अपार-आईडी तैयार किए जा चुके हैं। सभी जिलों में शेष विद्यार्थियों के अपार-आईडी निर्माण का कार्य प्रगति पर है।
    भारत सरकार ने 31 जनवरी 2026 तक सभी विद्यार्थियों के अपार-आईडी तैयार करने के लिए निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि अपार-आईडी प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक विद्यार्थी को एक स्थायी डिजिटल शैक्षणिक पहचान प्रदान की जा रही है, जिससे उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों, प्रमाण-पत्रों एवं क्रेडिट्स का सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा। यह व्यवस्था विद्यार्थियों की शैक्षणिक निरंतरता, पारदर्शिता तथा राष्ट्रीय स्तर पर मोबिलिटी को सशक्त बनाएगी। राज्य शासन के निर्देश पर शिक्षकों के द्वारा शेष विद्यार्थियों की अपार-आईडी निर्माण हेतु निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि सभी छात्रों को इस राष्ट्रीय डिजिटल शैक्षणिक पहल का लाभ मिल सके।

      रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय आज पूरे दिन प्रशासनिक, जनसंपर्क एवं आधिकारिक कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे। उनका दिन सुबह रायपुर में शासकीय कार्यक्रमों से शुरू होकर शाम को गोवा प्रवास के साथ संपन्न होगा।

    मुख्यमंत्री श्री साय सुबह 8.45 बजे मुख्यमंत्री निवास, सिविल लाइन रायपुर से प्रस्थान करेंगे। इसके पश्चात वे पुलिस ग्राउंड हेलीपैड रायपुर पहुंचेंगे और विभिन्न शासकीय व प्रशिक्षण संबंधी कार्यक्रमों में शामिल होंगे। सुबह के दौरान वे पी.टी.एस. ग्राउंड जोरा तथा एफ.टी.एस. प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करेंगे।

    इसके बाद मुख्यमंत्री अम्बिकापुर प्रवास पर रहेंगे, जहां पुलिस एवं प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने के उपरांत वे पुनः रायपुर लौटेंगे। पूर्वाह्न 11.45 बजे मुख्यमंत्री निवास पहुंचने के बाद उनका दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक जनदर्शन कार्यक्रम निर्धारित है, जिसमें वे आम नागरिकों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनेंगे।

    शाम को मुख्यमंत्री श्री साय रायपुर से गोवा के लिए रवाना होंगे। वे स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रायपुर से इंडिगो की उड़ान द्वारा प्रस्थान कर डाबोलिम अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, दक्षिण गोवा पहुंचेंगे। वहां से वे होटल द ललित रिजॉर्ट, राज बागा, पलोलेम (कनाकाना) के लिए प्रस्थान करेंगे, जहां उनका रात्रि विश्राम रहेगा।

    उल्लेखनीय है कि 9 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय गोवा के कनाकाना क्षेत्र में आयोजित “आदि लोकोत्सव 2025” कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। मुख्यमंत्री का यह दौरा प्रशासनिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दुर्ग / शौर्यपथ समाचार
    नगर पालिका निगम दुर्ग के अधीन संचालित एक शासकीय विद्यालय परिसर में बिना अनुमति अवैध रूप से चल रही शासकीय राशन दुकान अब केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मासूम बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बन चुकी है। इसके बावजूद नगर निगम प्रशासन की चुप्पी और निष्क्रियता ने निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
    मामला वार्ड क्रमांक 35, दुर्ग नगर क्षेत्र का है, जहां नगर पालिका निगम दुर्ग के अधीन संचालित बाल मंदिर स्कूल के परिसर में लगभग 40 छोटे बच्चे प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसी स्कूल परिसर के भीतर शासकीय राशन दुकान का अवैध संचालन लंबे समय से जारी है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यह सब निगम आयुक्त की जानकारी में होने और स्थानीय पार्षद द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने के बावजूद हो रहा है।

    पार्षद की शिकायतें, पर कार्रवाई शून्य
            वार्ड के पार्षद प्रतिनिधि सुरेश गुप्ता का कहना है कि उन्होंने इस अवैध रूप से बिना अनुमति के संचालित राशन दुकान को लेकर कई बार महापौर और निगम आयुक्त कार्यालय में शिकायतें की हैं। हर बार केवल आश्वासन मिला कि “कार्यवाही की जाएगी”, लेकिन आज तक ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
       यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब यह स्कूल उसी विधानसभा क्षेत्र में स्थित है, जहां से प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री एवं स्थानीय विधायक गजेंद्र यादव आते हैं। मंत्री कार्यालय से महज़ 100–200 मीटर की दूरी पर स्थित स्कूल परिसर में इस तरह की लापरवाही न केवल निगम प्रशासन, बल्कि सरकार के ‘स्कूल सुरक्षा’ के दावों पर भी सवाल खड़े करती है।

    छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े मामलों पर चुप्पी?
              निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यशैली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि एक ओर वे निगम कार्यालय में एक कमरे से दूसरे कमरे में बिना अनुमति कंप्यूटर या सामग्री ले जाने जैसे मामलों में कर्मचारियों को नोटिस थमाने, प्लेसमेंट कर्मचारियों को निलंबित करने जैसी कड़ी कार्रवाई करते नज़र आते हैं, वहीं दूसरी ओर निगम के अधीन चल रहे स्कूल परिसर में खुलेआम अवैध गतिविधि पर कार्रवाई करने से बचते दिख रहे हैं।
              यह दोहरा रवैया यह संकेत देता है कि दिखावटी प्रशासनिक सख्ती तो मौजूद है, लेकिन संवेदनशील और जिम्मेदारी वाले मामलों में निर्णय लेने का साहस कहीं न कहीं गायब है।

    बच्चों की सुरक्षा या प्रशासनिक उदासीनता?
                प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि स्कूलों की सुरक्षा, बच्चों की संरक्षा और शैक्षणिक वातावरण को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। बावजूद इसके, स्कूल परिसर में राशन दुकान जैसी भीड़भाड़ वाली और असुरक्षित गतिविधि का संचालन अपने आप में गंभीर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
    देश और प्रदेश में स्कूल परिसरों में घट चुकी कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बाद भी यदि निगम प्रशासन इस तरह के मामलों को हल्के में ले रहा है, तो यह भविष्य की किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता देने जैसा है।

    सबसे बड़ा सवाल — जिम्मेदारी कौन लेगा?
    अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि:क्या निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल मासूम बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए तत्काल ठोस कार्रवाई करेंगे? या फिर किसी अप्रिय घटना, स्कूल परिसर में तालाबंदी या दुर्घटना के बाद ही प्रशासन जागेगा? और यदि कोई घटना घटती है, तो उसकी नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी कौन लेगा?
    यह मामला केवल एक अवैध राशन दुकान का नहीं, बल्कि निगम प्रशासन की प्राथमिकताओं, जवाबदेही और संवेदनशीलता की कसौटी है।शहर की जनता और अभिभावक अब जवाब चाहते हैं, आश्वासन नहीं।

    शौर्यपथ लेख।

    प्यार को अक्सर उम्र के तराजू पर तौला जाता है—जैसे भावनाएँ केवल जवानी की जागीर हों। लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा गहरा है। बड़ी उम्र की औरत का प्यार कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि अनुभव, समझ और आत्मिक स्थिरता से उपजा हुआ भाव होता है। यह प्यार दिखावे से दूर, भीतर तक उतरने वाला होता है—जो न सिर्फ़ रिश्ते को, बल्कि इंसान को भी संवार देता है।

    अनुभव से उपजा भरोसा

    ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देख चुकी औरत जानती है कि रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से टिकते हैं। वह जल्दबाज़ी नहीं करती, न ही हर बात पर शक का बोझ डालती है। उसका भरोसा आँख मूँदकर नहीं, बल्कि समझदारी से दिया गया होता है—और इसी वजह से वह भरोसा मज़बूत भी होता है।

    देखभाल जो दिखती नहीं, महसूस होती है

    उसका प्यार बड़े-बड़े वादों में नहीं, रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में दिखता है—समय पर पूछा गया हाल, थकान में दिया गया सुकून, और मुश्किल वक्त में बिना शोर किए खड़ा रहना। वह जानती है कि साथ निभाना क्या होता है, इसलिए उसका सहारा दिखावे का नहीं, स्थायी होता है।

    भावनात्मक समझ की गहराई

    बड़ी उम्र की औरत को हर बात कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह आँखों की भाषा, खामोशी की आवाज़ और व्यवहार के उतार-चढ़ाव को पढ़ लेती है। बिना टोके, बिना जज किए—सिर्फ़ समझना और साथ देना—यही उसकी सबसे बड़ी खूबी है।

    सम्मान और स्वीकृति

    वह सामने वाले को बदलने की कोशिश नहीं करती। न उसे अपने साँचे में ढालना चाहती है, न ही तुलना के बोझ तले दबाती है। जैसा है, वैसा स्वीकार करना—यह उसकी परिपक्वता का सबसे सुंदर रूप है। ऐसे रिश्ते में इंसान को खुद होने की आज़ादी मिलती है।

    स्थिरता जो समय के साथ बढ़ती है

    उसका प्यार तेज़ हवा का झोंका नहीं, बल्कि धीमी बहती नदी की तरह होता है—जो समय के साथ और गहरी, और शांत होती जाती है। उसमें ड्रामा नहीं, भरोसा होता है; दिखावा नहीं, अपनापन होता है; और डर नहीं, सुरक्षा होती है।

    कुल मिलाकर, बड़ी उम्र की औरत का प्यार शोरगुल वाला नहीं होता—वह सुकून देता है। यह ऐसा प्यार है जो रिश्ते को नहीं, इंसान को मज़बूत बनाता है। जो समय के साथ कम नहीं, बल्कि और निखरता जाता है।

    ऐसा प्यार मिल जाए, तो उम्र मायने नहीं रखती—क्योंकि वहाँ दिल पूरी ईमानदारी से जुड़ता है।

    बिलासपुर नगर निगम एवं आसपास के क्षेत्रों के विकास को लेकर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित
    न्यायधानी बिलासपुर के समग्र विकास और मूलभूत सुविधाओं के विस्तार को लेकर हुई व्यापक चर्चा

    रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज मंत्रालय महानदी भवन में बिलासपुर नगर निगम एवं आसपास के क्षेत्रों के विकास को लेकर एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक में बिलासपुर शहर तथा बाह्य क्षेत्रों में संचालित एवं प्रस्तावित विकास कार्यों, मूलभूत सुविधाओं के विस्तार और निर्माणाधीन परियोजनाओं की प्रगति पर विस्तृत चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि न्यायधानी बिलासपुर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और बढ़ते शहरीकरण को ध्यान में रखते हुए यहां संतुलित, समावेशी और योजनाबद्ध विकास आवश्यक है।
    मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ तेजी से विकास की ओर अग्रसर है और इसी के अनुरूप शहरी अधोसंरचना को मजबूत किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सभी प्रगतिरत योजनाओं को तय समय-सीमा में गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूर्ण किया जाए। उन्होंने विशेष रूप से स्वच्छ एवं नियमित पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने और इससे जुड़ी परियोजनाओं पर गंभीरता से कार्य करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बिलासपुर को उद्योग एवं पर्यटन की दृष्टि से प्राथमिकता में रखते हुए विकास की योजनाएं तैयार की जाएं। श्री साय ने बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार द्वारा निरंतर नए विकास कार्यों को स्वीकृति दी गई है। साथ ही आने वाला बजट भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा और इसके माध्यम से “विकसित छत्तीसगढ़” की संकल्पना भी साकार होगी। उन्होंने कहा कि विभागों के आपसी समन्वय से ही बेहतर परिणाम सामने आएंगे और गांवों के साथ-साथ शहरों के विकास में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी जाएगी।
    बैठक में सड़क, पुल-पुलिया, पेयजल, ड्रेनेज, प्रदूषण मुक्त शहर, यातायात व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल एवं युवा कल्याण, आवास, ई-बस सेवा, हवाई यातायात, ट्रांसपोर्ट नगर, उद्योग एवं व्यापार, पर्यटन तथा अरपा विशेष क्षेत्र विकास परियोजना (अरपा साडा) से जुड़े विषयों पर बिंदुवार मंथन किया गया और विभिन्न विषयों पर सहमति भी बनी। इसमें सिम्स के नए अस्पताल भवन के लिए एएस जारी करने की प्रक्रिया में तेजी लाने तथा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को पीपीपी मोड पर संचालित करने का निर्णय लिया गया। बिलासपुर एयरपोर्ट के विस्तार हेतु डिफेंस को राशि हस्तांतरित किए जाने की जानकारी दी गई, जिस पर जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। साथ ही एयरपोर्ट के अन्य विकास कार्यों एवं नाइट लैंडिंग सुविधा को शीघ्र शुरू करने के निर्देश दिए गए। ट्रांसपोर्ट नगर सिलपहरी के विकास का कार्य सीएसआईडीसी द्वारा किए जाने तथा भूमि हेतु आवेदन प्रस्तुत करने पर सहमति बनी। उसलापुर रेलवे ओवरब्रिज के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में तेजी लाने और इसे आगामी बजट में शामिल करने का निर्णय लिया गया।
    इसके अतिरिक्त बिलासपुर के राजीव गांधी चौक, नेहरू चौक, महामाया चौक (वाय आकार) - रतनपुर मार्ग तक 305 करोड़ की लागत से फ्लाई ओवर ब्रिज निर्माण, पुराना बस स्टैंड चौक पर सीएमडी चौक-इमलीपारा रोड-टैगोर चौक-जगमल चौक तक 115 करोड़ की लागत से फ्लाई ओवर का निर्माण, एफसीआई गोडाउन व्यापार विहार क्षेत्र को सिरगिट्टी-महमंद बायपास से जोड़ने हेतु 320 करोड़ की लागत से तारबहार फोरलेन रेलवे ओवरब्रिज निर्माण के डीपीआर तैयार करने के निर्देश दिए गए। इसी प्रकार शहर के यातायात दबाव को कम करने हेतु 950 करोड़ की लागत से फोरलेन बिलासपुर रिंग रोड निर्माण के लिए एनएचएआई की सहमति के आधार पर लोक निर्माण विभाग द्वारा प्रस्ताव भेजने पर सहमति बनी। खारंग जलाशय में पाराघाट व्यपवर्तन योजना के लिए 328 करोड़ रुपये, नगर निगम क्षेत्र में अरपा नदी के एसटीपी एवं ड्रेनेज कार्यों के लिए 252 करोड़ रुपये तथा बिलासपुर शहर की जलभराव समस्या के समाधान हेतु आपदा प्रबंधन निधि से 150 करोड़ रुपये दिए जाने की सहमति बनी। बिलासपुर में कैंसर अस्पताल के लिए टाटा मेमोरियल अस्पताल से चर्चा करने, कानन पेंडारी के सामने अंडरपास निर्माण, कोनी से बिरकोना–खमतराई–बहतराई मार्ग के निर्माण, 24×7 जल आपूर्ति योजना हेतु डीपीआर तैयार करने तथा अरपा साडा क्षेत्र के विकास के लिए टीएनसीपी एवं जिला अधिकारियों की बैठक कर पूर्व योजनाओं पर चर्चा तथा इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
    बैठक में केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री अरुण साव, वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी, विधायक अमर अग्रवाल, विधायक सुशांत शुक्ला, विधायक धरमलाल कौशिक, महापौर श्रीमती पूजा विधानी, मुख्य सचिव विकास शील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह तथा विभिन्न विभागों के सचिव एवं वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित थे।

      नई दिल्ली / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंगलवार को कई अहम गतिविधियाँ और बयान चर्चा में रहे। उन्होंने आंध्र प्रदेश स्थित हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) की विशाख रिफाइनरी में ‘रेसिड्यू अपग्रेडेशन फैसिलिटी’ (RUF) के सफल कमीशनिंग की सराहना करते हुए इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी आधुनिक परियोजनाएँ देश की ईंधन जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ आयात पर निर्भरता कम करने में सहायक होंगी।
    इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक जीवन में संवाद की मर्यादा पर बल देते हुए एक सुभाषितम साझा किया और ‘मधुर वाणी’ यानी सौम्य एवं संयमित भाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने संकेत दिया कि सकारात्मक और शालीन संवाद न केवल व्यक्तिगत संबंधों को सुदृढ़ करता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी मजबूती प्रदान करता है।
    इस बीच सरकारी गलियारों में आठवें वेतन आयोग के गठन को लेकर भी हलचल तेज रही। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे संबंधित फाइलों पर चर्चा आगे बढ़ी है, जिससे केंद्र सरकार के एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को भविष्य में लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
    प्रधानमंत्री के आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी तैयारियाँ शुरू हो गई हैं। जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री जनवरी के अंत में पश्चिम बंगाल का दौरा कर सकते हैं, वहीं इसी माह असम में काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर की आधारशिला रखने का कार्यक्रम भी प्रस्तावित है, जिसे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

       रायपुर / शौर्यपथ / राज्य शासन ने वित्तीय वर्ष 2026–27 के बजट निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। इसी क्रम में सोमवार को मंत्रालय में गृह विभाग के बजट निर्माण को लेकर उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री श्री विजय शर्मा की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें गृह विभाग से संबद्ध सभी प्रमुख इकाइयों के बजट प्रस्तावों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
    बैठक में पुलिस, पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन, नगर सेना एवं एसडीआरएफ, जेल एवं सुधारात्मक सेवाएँ, लोक अभियोजन, राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला, सैनिक कल्याण, संपदा संचालनालय, छत्तीसगढ़ स्टेट गैरेज, मेडिको-लीगल संस्थान तथा छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस जवाबदेही प्राधिकार सहित विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष उपस्थित रहे। सभी इकाइयों द्वारा प्रस्तुत अनुदान प्रस्तावों पर बिंदुवार समीक्षा करते हुए आवश्यक सुझाव दिए गए।
    उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि बजट निर्माण में मितव्ययता के साथ-साथ प्राथमिकताओं का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने निर्देश दिए कि अनावश्यक व्ययों पर नियंत्रण रखते हुए कानून-व्यवस्था को मजबूत करने, पुलिस बल की क्षमता वृद्धि, आवास एवं आधारभूत संरचना विकास, आपदा प्रबंधन, फॉरेंसिक सुविधाओं के आधुनिकीकरण, जेल सुधार तथा अभियोजन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त और समयोचित प्रावधान सुनिश्चित किए जाएँ।
    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गृह विभाग के बजट प्रस्ताव पूरी तरह परिणामोन्मुखी होने चाहिए, ताकि उनसे जनसुरक्षा, त्वरित न्याय और सेवा-प्रदाय की गुणवत्ता में प्रत्यक्ष सुधार दिखाई दे। आधुनिक तकनीक के उपयोग, प्रशिक्षण, उपकरणों के उन्नयन और मानव संसाधन विकास पर विशेष ध्यान देने के निर्देश देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक विभाग अपने प्रस्तावों में स्पष्ट लक्ष्य, अपेक्षित परिणाम और व्यय-लाभ विश्लेषण को शामिल करे।
    बैठक के दौरान उपमुख्यमंत्री शर्मा ने समन्वय और समयबद्धता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि गृह विभाग का बजट राज्य की कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन क्षमता और न्यायिक प्रणाली को सुदृढ़ करने में अहम भूमिका निभाएगा। सभी संबंधित इकाइयों को निर्देश दिए गए कि वे निर्धारित समय-सीमा के भीतर संशोधित और सुदृढ़ बजट प्रस्ताव प्रस्तुत करें, ताकि बजट को शीघ्र अंतिम रूप दिया जा सके। बैठक में एसीएस मनोज पिंगुआ, डीजीपी अरूण कुमार गौतम, डीजी जेल हिमांशु गुप्ता, सचिव हिमशिखर गुप्ता, सचिव रमेश शर्मा, सचिव सुश्री नेहा चंपावत, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रदीप गुप्ता, उप पुलिस महानिरीक्षक मनीष शर्मा, संचालक अग्निश्मन चन्द्र मोहन सिंह सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

    श्री शैलेश कुमार सिंह

    (लेखक भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग में सचिव हैं)

       शौर्यपथ लेख /  लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है। आजीविकाओं (खास तौर से ग्रामीण परिवारों के लिए) को आकार देने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा की ही जानी चाहिए। लेकिन इस तरह की समीक्षा नए कानून के प्रावधानों के सावधानी पूर्वक अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। यह पिछले फ्रेमवर्क से निकाले गए अनुमानों या नुकसान के भय पर आधारित नहीं होनी चाहिए। मगर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 की ज्यादातर आलोचनाएं इस जाल में फंस जाती हैं। इनमें जल्दबाजी में पिछली नाकामियों का विश्लेषण कर उनका ठीकरा सुधार पर ही फोड़ दिया जाता है।
    दो दशक पहले बनाए गए रोजगार गारंटी कानून ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और संकट के वक्त सुरक्षा प्रदान की। कोविड की वैश्विक महामारी जैसे संकट के समय में इसके योगदान को स्वीकार किया गया है। लेकिन समय के साथ अनुभव से इसकी दीर्घकालिक ढांचागत कमियां भी उजागर हुई हैं। मजदूरी के भुगतान में बार-बार देरी हो रही थी। प्रक्रियात्मक अवरोधों ने बेरोजगारी भत्ते को अप्रभावी बना दिया था। विभिन्न राज्यों में इस योजना तक पहुंच में काफी अंतर था। प्रशासनिक क्षमता असमान थी तथा फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति के रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं के सृजन से बड़े पैमाने पर धन की बर्बादी हुई। ये छोटी नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक खामियां थीं। इसलिए मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि क्या सुधार की जरूरत थी। मुद्दा यह है कि क्या नए फ्रेमवर्क में इन खामियों को सार्थक ढंग से दूर किया गया है।
    आम दावा है कि नए कानून में बुनियादी कमियां तो बनीं रहीं और समूची बहस को संक्षिप्ताक्षरों की होड़ में समेट दिया गया। लेकिन हकीकत में इसका उलट ही सच के ज्यादा करीब है। नया कानून डिलीवरी की उन कमियों को दूर करने पर केंद्रित है जिनकी वजह से पिछले फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा था। कमजोर परंपरागत प्रणालियों की जगह सत्यापित कामगार पंजीकरण ने ले ली है। देरी के लिए स्वतः मुआवजे के प्रावधान के साथ मजदूरी भुगतान की वैधानिक समय सीमाएं तय की गई हैं। अयोग्यता के उन प्रक्रियात्मक प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है जिनकी वजह से बेरोजगारी भत्ता अप्रभावी बन गया था। स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही के साथ शिकायत निवारण को मजबूत किया गया है। ये दिखावटी बदलाव नहीं हैं। ये उन खामियों को दूर करते हैं जिनसे कामगारों का विश्वास टूटता था।
    एक अन्य आलोचना यह है कि रोजगार गारंटी को खत्म कर दिया गया है। इनके अनुसार नई योजना में पुरानी कमजोरियां बनी हुई हैं। इस तरह की आलोचना सही नहीं है। वेतन रोजगार के कानूनी अधिकार को बरकरार और न्यायसंगत रखा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि रोजगार की वैधानिक पात्रता को 100 दिनों से बढ़ाते हुए 125 दिन कर दिया गया है। बदलाव क्रियान्वयन की संरचना में किया गया है। पुराने कानून का मॉडल टुकड़ों में बंटा हुआ और प्रतिक्रियात्मक था। यह अक्सर संकट शुरू हो जाने के बाद ही हरकत में आता था। नए कानून का फ्रेमवर्क योजनाबद्ध और लागू करने योग्य है। इसे पूर्वानुमान के आधार पर कार्य सौंपे जाने के लिए डिजाइन किया गया है। वैधानिक सुधार के जरिए क्रियान्वयन की नाकामियों को दूर किए जाने को दोहराव नहीं, बल्कि संशोधन माना जाना चाहिए।
    बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक गरीब आबादी वाले राज्यों को पहले के फ्रेमवर्क के तहत सबसे कम लाभ मिलने के सम्बन्ध में जो चिंताएं जताई गईं हैं, वे सही हैं लेकिन यह बात सुधार की जरूरत को और मजबूत करती है, न कि उसे कमजोर करती है। इन राज्यों में मनरेगा का लाभ कम पहुंचा यह योजना की एक बड़ी विफलता थी। बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ मांग के आधार पर चलने वाला मॉडल उन राज्यों के पक्ष में रहा जिनकी प्रशासनिक क्षमता बेहतर थी, जबकि अधिक जरूरत और पलायन वाले राज्य पिछड़ गए। नया फ्रेमवर्क सीधे तौर पर इस असंतुलन को दूर करता है, यह रोजगार पैदा करने के काम को 'विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं' से जोड़ता है, जहाँ स्थानीय मांग और कामों की पहले से मंजूरी को सुनिश्चित फंडिंग के साथ मिलाया जाता है। असमान वितरण ही सुधार की ज़रूरत की असली वजह थी; पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का मतलब केवल मौजूदा असमानताओं को और बढ़ाना होता। इसके अलावा, निष्पक्ष मानकों पर आधारित आवंटन से राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।
    आलोचना का एक पक्ष यह भी है कि 125 दिनों का रोजगार देने का विस्तार केवल दिखावा है, क्योंकि अब राज्यों को भी खर्च का एक हिस्सा उठाना होगा। यह तर्क पहले के उदाहरणों और सुरक्षा उपायों दोनों को नज़रअंदाज़ करता है। केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटने का यह तरीका केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के पुराने नियमों के अनुसार ही रखा गया है। वहीं, उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10 के अनुपात (जहाँ केंद्र 90 और राज्य 10 प्रतिशत खर्च उठाते हैं) को जारी रखा गया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना बनाकर काम करने से पैसों का बेहतर इस्तेमाल होता है, जिससे अनिश्चितता खत्म होती है और योजना को लागू करने में कम रुकावटें आती हैं। अधिकारों का दायरा बढ़ाना और साझा जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल को दर्शाता है, न कि कमज़ोरी को। ग्रामीण सड़कों से लेकर, आवास और पीने के पानी जैसे कई सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम भी इसी तरह की व्यवस्था के तहत काम करते हैं।
    आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्यों को अक्सर नए फ्रेमवर्क का संभावित शिकार बताया जाता है। लेकिन सिर्फ़ आर्थिक कमज़ोरी ही राज्यों के बाहर होने का कारण नहीं है। पिछली व्यवस्था के तहत, राज्यों का इस योजना से बाहर होना अक्सर खराब प्लानिंग, सरकारी मशीनरी की कम क्षमता और काम करने के तरीके में आने वाली रुकावटों की वजह से था। नया कानून पहले से की गई तैयारी, जनता की भागीदारी और प्रौद्योगिकी के जरिये जोखिमों को कम करने की कोशिश करता है। नयी व्यवस्था में एक बार योजना मंजूर होने के बाद, काम देने से मना करने की अधिकारियों की शक्ति को कम किया गया है और पारदर्शिता तथा जवाबदेही को मजबूत किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक खर्च को 6% से बढ़ाकर 9% कर दिया गया है जिससे राज्य अपनी जमीनी क्षमता को कार्यक्रम की विशालता के अनुरूप मजबूत बना सकें। किसी राज्य विशेष की अपनी चुनौतियाँ उस राष्ट्रीय सुधार को गलत साबित नहीं करतीं, इसका उद्देश्य पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को ठीक करना है।
    आलोचक यह भी कहते हैं कि पहले के फ्रेमवर्क के तहत कई ज़रूरतमंद राज्यों में रोज़गार के सबसे कम दिन मिले, और बहुत कम परिवार ही कानूनी सीमा तक पहुँच पाए। यह बात सुधार के तर्क को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और भी मजबूत बनाती है। नया फ्रेमवर्क, दर्ज की गई मांग को मंजूर किए गए कामों, तय समय सीमा में पूरा करने और बेरोजगारी भत्ते को सुनिश्चित करेगा। इसका मकसद सीधा है: कानूनी हक को असल और भरोसेमंद रोज़गार के दिनों में बदलना, खासकर उन इलाकों में जहाँ पहले सुविधाओं की कमी थी।
    पुरानी 'मांग-आधारित' योजना और नई 'आपूर्ति-आधारित' योजना के बीच के अंतर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। व्यवहार में, यह अंतर इतना बड़ा नहीं है। नया फ्रेमवर्क डिमांड को कम नहीं करता; बल्कि यह योजना के माध्यम से इसे एक संस्थागत रूप देता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मांगी गई मांग को पूरा भी किया जा सके। संसाधनों के भरोसे के साथ की गई एक नियोजित मांग, उस सैद्धांतिक अधिकार से कहीं ज्यादा सशक्त है जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता।
    रोजगार गारंटी का अधिकार-आधारित स्वरूप, कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ है। काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करना, मजदूरी भुगतान के लिए कानूनी रूप से लागू समय-सीमा, देरी होने पर अपने-आप मिलने वाला मुआवजा, हक छीनने वाली शर्तों को हटाना, और शिकायत निवारण के लिए अपील की सुविधा—ये सब मिलकर 'काम के अधिकार' की व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं। अधिकार सबसे ज़्यादा तब मायने रखते हैं जब उनका प्रशासनिक बाधाओं के बिना इस्तेमाल किया जा सके।
    यहां तक ​​कि आलोचक भी मानते हैं कि योजना को लागू करने की विफलताएं—जैसे भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं का निर्माण, पुराने फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी कमजोरियां थीं। यह सुधार इन्हीं विफलताओं को दूर करने की कोशिश करता है, जिसके लिए सत्यापित लाभार्थी प्रणाली, मजबूत ऑडिट और अन्य योजनाओं के साथ मिलकर संपदा निर्माण का सहारा लिया गया है। पिछली विफलताओं को स्वीकार करना ही इस सुधार का ठोस आधार है, न कि इसके खिलाफ कोई तर्क।
    योजना को कुछ समय के लिए रोकने को लेकर जो चिंताएं हैं, उन्हें सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह श्रम-बाजार के लिए एक सुरक्षा कवच है जिसे इसलिए बनाया गया है ताकि खेती के सबसे व्यस्त सीजन के दौरान श्रमिकों की कमी न हो और बाजार का संतुलन न बिगड़े। यह प्रावधान 125 दिनों के कानूनी अधिकार को कम नहीं करता है। यह प्रावधान सोची-समझी आर्थिक समझदारी को दिखाता है और उत्पादक कृषि रोज़गार को कमज़ोर किए बिना मजदूरों की आय की रक्षा करता है।
    कुल मिलाकर, ज़्यादातर की जा रही आलोचनाएं पुराने फ्रेमवर्क की कमियों को बताती हैं और फिर उन कमियों का कारण खुद सुधारों को बताती हैं। विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम रोज़गार गारंटी को खत्म नहीं करता है बल्कि यह इसे और मजबूत और व्यापक बनाता है। खासकर उन कमज़ोरियों पर ध्यान देता है जहाँ ज़्यादा ज़रूरत वाले इलाकों और कमज़ोर मज़दूरों के बीच योजना के प्रभाव को सीमित कर दिया था। यहाँ सुधार का अर्थ सामाजिक सुरक्षा से पीछे हटना नहीं है; बल्कि यह काम के वादे को वास्तविक, भरोसेमंद और गरिमापूर्ण बनाने का एक प्रयास है।

      रायपुर / शौर्यपथ / सिंगल यूज प्लास्टिक के दुष्प्रभावों पर प्रभावी नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को मजबूती देने के उद्देश्य से नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अंतर्गत राज्य शहरी विकास अभिकरण (SUDA) ने राज्य के सभी नगरीय निकायों को सख्त परिपत्र जारी किया है। परिपत्र में केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही सभी नगरीय निकायों को सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक लगाने को लेकर की गई कार्यवाहियों की मासिक प्रगति रिपोर्ट स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) 2.0 के मिशन संचालक को अनिवार्य रूप से भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।

    सुडा द्वारा नगर निगमों के आयुक्तों तथा नगर पालिकाओं एवं नगर पंचायतों के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को भेजे गए परिपत्र में कहा गया है कि स्वच्छता दीदियों के माध्यम से डोर-टू-डोर अभियान चलाकर नागरिकों को सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्पों के प्रति जागरूक किया जाए। इसके साथ ही व्यावसायिक क्षेत्रों, साप्ताहिक बाजारों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर व्यापक जन-जागरूकता अभियान संचालित करने और प्रतिबंध का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक दंड की व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

    परिपत्र में यह भी कहा गया है कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), रहवासी कल्याण संघों (RWAs) एवं स्वसहायता समूहों की सहभागिता से घर-घर जागरूकता अभियान चलाया जाए। इसके अलावा शासकीय एवं अर्धशासकीय कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को जोड़ते हुए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    सुडा ने शहरों के तीर्थ स्थलों, पर्यटन स्थलों, प्रमुख चौक-चौराहों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, निस्तारी एवं गैर-निस्तारी तालाबों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर विशेष अभियान चलाने पर भी जोर दिया है। इन अभियानों में जन-प्रतिनिधियों, धार्मिक गुरुओं, गणमान्य नागरिकों, स्वच्छताग्राहियों, ब्रांड एम्बेसडर्स, एन.जी.ओ. और स्वसहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    परिपत्र के माध्यम से नगरीय निकायों को यह भी निर्देशित किया गया है कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध को लेकर आयोजित सभी कार्यक्रमों और अभियानों का लोकल एवं क्षेत्रीय मीडिया तथा नगरीय निकायों के सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। साथ ही विद्यालय स्तर पर चित्रकला प्रतियोगिता, नुक्कड़ नाटक और वेस्ट-टू-आर्ट प्रतियोगिताओं के आयोजन के जरिए बच्चों और युवाओं को भी इस अभियान से जोड़ा जाए।

    नगरीय प्रशासन विभाग का यह कदम न केवल सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रभावी रोक लगाने की दिशा में अहम माना जा रहा है, बल्कि इससे स्वच्छ, हरित और पर्यावरण-संवेदनशील शहरों के निर्माण को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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