August 05, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    नजरिया /शौर्यपथ /भारत सात बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का अस्थाई सदस्य रह चुका है। अब उसके सामने अपने आठवें कार्यकाल को खास बनाने की चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य के रूप में 2012 में अपना सातवां कार्यकाल पूरा करने के तत्काल बाद भारत ने सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए अपना अभियान शुरू कर दिया था। इस दिशा में सार्वजनिक रूप से साल 2013 में पहला ठोस कदम उठाया गया था, जब अफगानिस्तान ने भारत के पक्ष में सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता के लिए अपना दावा करने की योजना से कदम पीछे खींच लिए थे। तब संयुक्त राष्ट्र में एशिया प्रशांत समूह के अन्य 54 सदस्य देशों में से कोई देश भारत को चुनौती देने के लिए आगे नहीं आया था। वह पाकिस्तान भी नहीं, जिसने सुरक्षा परिषद में भारत के चुनाव का स्वागत करने से इनकार कर दिया था।
    इस बार 2019 में भी एशिया-प्रशांत देशों के समूह ने सर्वसम्मति से भारत को अपने उम्मीदवार के रूप में समर्थन दिया, जिसके परिणामस्वरूप पिछले सप्ताह भारत को 192 वोटों में से 184 के साथ जोरदार जीत हासिल हुई। अस्थाई सदस्यता की राह में किसी देश ने भारत का विरोध नहीं किया। यह एक ऐसी मुश्किल जीत है, जो कई सुखद संयोगों से मिली है। 1 जनवरी, 2021 से शुरू होने वाला भारत का दो साल का कार्यकाल अपने अंतिम वर्ष में देश की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ और पहली बार दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी के साथ सामने आएगा। अब सवाल उठता है, सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए प्रचार के साथ इस पूरे कार्य या पैकेज को कैसे अंजाम दिया जाए? क्या भारत इस बार फिर स्थाई सदस्यता के लिए जोर लगाने को ठीक से तैयार है?
    बेशक, भारत ने 2011 से शुरू हुए अपने सातवें कार्यकाल का उपयोग न केवल स्थाई सदस्यता के अपने दावे को चमकाने के लिए, बल्कि इसे मुमकिन बनाने के लिए भी किया था। कुछ भारतीय विशेषज्ञों ने इसे स्थाई सदस्यता के लिए पूर्वाभ्यास भी कहा था। तब भारत ने कोशिश की, हालांकि उसकी कोशिशों का कोई तात्कालिक नतीजा नहीं निकला था, पर भारत इस मामले या मांग को आगे बढ़ाने में जरूर कामयाब हुआ था। सरकारों के बीच वार्ता, जिसे इंटर गवर्नमेंट निगोशिएशन (आईजीएन) भी कहते हैं, आगे बढ़ी थी और साल 2015 में पाठ (या लिखत-पढ़त) आधारित वार्ताओं तक पहुंच गई थी।
    भारत ने 1 जनवरी से अपना आठवां कार्यकाल शुरू करने की योजना बनाई है। इसी इरादे से एक नए व्यापक विचार के तहत बहुपक्षीय तंत्र बनाने को प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है। यह अपनी स्थाई सदस्यता के लिए पूरे पैकेज के तहत फिर कोशिश करने का एक और तरीका है। साथ ही, अन्य प्राथमिकताएं भी हैं, जैसे आतंकवाद के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमोदन व्यवस्था का गैर-राजनीतिकरण करना, लेकिन कुल मिलाकर, भारत के लिए सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा उचित ही शीर्ष पर है। ठीक इसी समय भारत अपनी अस्थाई सदस्यता का उपयोग इस तरह करे, ताकि पता चले कि इसकी क्या सार्थकता है और क्या नहीं है। सुरक्षा परिषद में किसी फैसले पर ‘हां’ या ‘नहीं’ वोट करना एक अनुपस्थित वोट के आत्म-औचित्य की तुलना में कहीं अधिक दम और चरित्र रखता है।
    सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थाई सदस्य के साथ गुट न बनाना एक खूबी हो सकती है। स्थाई सदस्यों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन के साथ गुट नहीं बनाते हुए दशकों तक गुटनिरपेक्षता से बंधे रहना उस वक्त भारत के लिए ठीक रहा था। अब भारत सहज आधार पर अपना एक स्टैंड ले और इसके साथ ही किसी स्थाई सदस्य देश के साथ मुखर-पक्षधरता को आजमाए, तो इसके बड़े रणनीतिक फायदे मुमकिन हैं।
    235 ई, 43वीं स्ट्रीट, न्यूयॉर्क सिटी, इसी इमारत में साल 1993 से भारत का स्थाई आयोग मौजूद है। मैनहट्टन के पड़ोस में यह इमारत सिर्फ इसलिए नहीं खड़ी है, क्योंकि यह सबसे ऊंची है, बल्कि यह दिवंगत आर्किटेक्ट चाल्र्स कोरिया की साहसिक और मुखर वास्तु-कला के अपने चरित्र के कारण भी शोभायमान है। यह समय है, जब हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वैसे ही भाव-स्वभाव के साथ पेश आएं। यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता

     

    दुर्ग / शौर्यपथ / नवदृष्टि फाउंडेशन के आव्हान पर दुर्ग जिला चिकित्सालय ब्लड बैंक में 31 लोगों स्वैच्छिक रक्तदान कर फादर्स डे को यादगार बनाया गया। 51 वर्षीय शत्रुंजय तिवारी मास्टर डोनर रहे, जीवन ताम्रकार, रवि लक्खा, अमित कुमार पण्डे, सुधीर पंडित, खोमेश्वर साहू, गजपाल साहू, डी राज सहित अन्य लोगों ने इस अवसर पर रक्तदान किया।
    नवदृष्टि फाउंडेशन के राज आढ़तिया इस दौरान ब्लड बैंक में मौजूद रहे। उन्होंने रक्तदान करने वालों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने बताया कि सूर्य ग्रहण होने के कारण बहुत से लोग रक्तदान करने नहीं पहुंचे लेकिन 31 लोगों ने रक्तदान कर उदाहरण पेश किया है, जो प्रशंसनीय है। दुर्ग ब्लड बैंक के को ऑर्डिनेटर त्रिपेश शर्मा ब्लड बैंक की ओर से जिज्ञासा, आशा साहू, नेमा चंद्राकर, महेंद्र चंद्राकर, मधुसूदन, कीर्तन ने रक्तदान प्रक्रिया में सहयोग किया।

    दुर्ग / शौर्यपथ / गरीब कल्याण रोजगार अभियान में छत्तीसगढ़ राज्य से एक भी जिले को शामिल न करने पर केंद्र सरकार पर कांग्रेस शासित राज्यों की जनता के साथ अन्याय कर रही है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोरोना संकट से निबटने के लिए ऐतिहासिक निर्णय लेकर कुशल प्रबंधन से सर्वहारा वर्ग के लिए काम किया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की जनता के बीच बढ़ती लोकप्रियता और सरकार के जनहितैषी काम केंद्र को रास नहीं आ रहे हैं। इसी कारण राज्य की जनता के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। उक्त बातें दुर्ग शहर विधायक अरूण वोरा ने कही। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ के निम्न आय वर्ग के लोगों के प्रति पूरी तरह से संवेदनहीन हो चुकी है। केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ राज्य को किसी तरह का आर्थिक पैकेज नहीं दिया।
    जीएसटी से राज्य का हिस्सा समय पर जारी हो रहा है। बीपीएल परिवार पक्के मकानों की आस में अपना मकान तोड़ बैठे हैं। प्रधानमंत्री आवास की राशि भी केंद्र सरकार ने रोक दी है। छत्तीसगढ़ राज्य में कोरोना संकट के दौरान 5 लाख से अधिक प्रवासी मजदूरों की वापसी हुई है,जिनके सामने रोजगार का संकट है। राज्य सरकार अपने स्तर पर मनरेगा व खेती के लिए उत्साह का माहौल पैदा करते हुए लोगों को इस कठिन समय में भी रोजगार उपलब्ध करा रही है।
    अरुण वोरा ने कहा कि रोज कमाने रोज खाने वालों के लिए पर्याप्त मात्रा में रोजगार उपलब्ध कराना तात्कालिक आवश्यकता है। उन्होंने राज्य के भाजपा नेताओं को नसीहत देते हुए कहा कि यह समय दलीय राजनीति करने का समय नहीं है। पूरे प्रदेश के भाजपा नेताओं को प्रधानमंत्री से राज्य के सभी जिलों को गरीब कल्याण योजना में शामिल करने व राज्य को आर्थिक पैकेज देने की मांग करना चाहिए।

    दुर्ग / शौर्यपथ / नगर पालिक निगम भिलाई, क्षेत्र अंतर्गत आने वाले पशुपालकों से रोका-छेका संकल्प अभियान के तहत 513 पशु मालिकों से संकल्प पत्र भराया गया। शासन के निर्देश के परिपालन में निगमायुक्त ऋतुराज रघुवंशी ने निगम के अधिकारी/कर्मचारियों की नियुक्ति इस कार्य के लिए की है, इसके लिए नोडल अधिकारी सहित टीम का गठन किया जा चुका है। रोका-छेका संकल्प अभियान के तहत पशु मालिकों को अपने मवेशी की सुरक्षा स्वंय करने, पालतू मवेशियों को अपने स्थान पर रखकर चारा, पानी की समुचित व्यवस्था करने, शहर की सड़कों में आवारा घूमने के लिए नहीं छोडऩे, आसपास के खेतों में फसलों तथा उद्यानों में पालतू मवेशियों का प्रवेश रोकने स्वयं व्यवस्था करने, सामूहिक व्यवस्था में सहभागिता निभाने, पशुपालन से उत्सर्जित होने वाले अपशिष्ट के लिए कंपोस्टिंग के लिए स्वयं व्यवस्था करने के लिए भिलाई निगम क्षेत्र में संकल्प पत्र भराया जा रहा है।
    सड़क पर घूमने वाले आवारा मवेशियों की हो रही है धरपकड़ निगम क्षेत्र में सड़क किनारे घुमने वाले आवारा पशुओं की धरपकड़ विगत दो-तीन दिनों से की जा रही है निगम का अमला सड़क पर घुमने वालें 32 पशुओं को अब तक पकड़ चुके हैं। जोन 02 के एआरओ संजय वर्मा व जोन 04 के एआरओ बालकृष्ण नायडू ने बताया कि निगम क्षेत्र में आवारा घुमने वाले पशुओं को खुर्सीपार, तेलहा नाला, नेहरू नगर, मॉडल टाउन चैक क्षेत्र में घुमते हुए पाए जाने पर पकड़ा गया है।
    भिलाई की सड़कों पर पालतू मवेशियों के घूमते हुए पाए जाने पर पशु पालकों पर होगी कार्यवाही उपायुक्त अशोक द्विवेदी ने बताया कि सड़कों पर यूं ही घूमने वाले आवारा मवेशी पाए जाने पर पशु मालिकों पर भी नियमानुसार कड़ी कार्यवाही की जाएगी। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा गौधन को सुरक्षित एवं संरक्षित करने के लिए भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। सड़कों पर आवारा घूमने वाले पशु जो यातायात में बाधक बन कर दुर्घटना का कारण बनते हैं जिससे होने वाली दुर्घटना में पशुधन एवं जनधन की हानि होती है। निगम की अपील है कि इससे बचने के लिए पशुपालक अपने पालतू मवेशियों को सड़कों पर आवारा घूमने न दें।
    513 पशु मालिकों से भराया जा चुका है संकल्प पत्र निगम के सभी जोन कार्यालयों की टीम 19 जून से शासन के आदेश के पालन में रोका छेका अभियान के तहत पशु पालकों से संकल्प पत्र भरवा रहे है। संकल्प पत्र अभियान में जोन कं. 01 में 113 पशु मालिक, जोन 02 में 122 पशु मालिक, जोन 03 में 79 पशु मालिक, जोन 04 में 176 पशु मालिक, जोन 05 में 23 पशु मालिक से संकल्प पत्र भरवाया जा चुका है।

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / चीन के साथ सीमा पर विगत 45 वर्षों से जिस उदारता को भारत निभाता चला आ रहा था, उसमें अब बदलाव जितना स्वाभाविक है, उतना ही स्वागतयोग्य भी। सीमा पर जरूरत पड़ने पर हथियार प्रयोग को जो मंजूरी मिली है, वह चीन की ही साजिशों का नतीजा है। आम तौर पर वह परोक्ष रूप से हमें घेरता आ रहा था, लेकिन अब जब उसने प्रत्यक्ष रूप से भारतीय उदारता की भारी कीमत वसूल ली है, तब भारत के रक्षा मंत्री के नेतृत्व में जरूरत पड़ने पर सेना को हथियार प्रयोग की छूट कतई गलत नहीं है। अब जब सीमा पर जरूरत पड़ी, तो बंदूकों का इस्तेमाल करने के लिए सेना को दिल्ली से पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सेना के कमांडर ही तत्काल फैसला ले सकेंगे। सबसे बड़ी बात कि यह फैसला तीनों सेनाओं के प्रमुखों की भागीदारी में हुआ है। सेना में ही नहीं, बल्कि देश में भी यह भावना रही है कि सेना के हाथ न बांधे जाएं, क्योंकि इससे दुश्मनों का मनोबल बढ़ता है।
    हम अपने पड़ोसियों को ऐसे आश्वस्त क्यों करते रहे हैं कि हम उनका अहित नहीं करेंगे? यह नीति अच्छे दिनों के लिए तो ठीक है, जब सीमा विस्तार का इरादा किसी के मन में नहीं हो, लेकिन जब चीन खुलेआम भारतीय जमीन पर दावे करता है, तब ऐसे किसी समझौते या उदार व्यवहार को ताक पर रख देना ही बेहतर है। भारत ने चीन की किसी भूमि पर दावा नहीं किया है। चीन के सीमा विस्तार के खिलाफ भारत में उठने वाली आवाजों को खामोश ही रखा गया है। हम पड़ोसी धर्म निभाते रहे हैं, लेकिन चीन क्या कर रहा है, यह दुनिया को भी पता चलना चाहिए। हमारी सरकार को भी अपनी माटी की रक्षा के लिए साहस का परिचय देना चाहिए। भारत ने अपनी सैन्य-नीति में जो ताजा बदलाव किए हैं, वह कायम रहने चाहिए। जब चीन हमें निश्चिंत नहीं देखना चाहता, तब हम उसे क्यों बैठे-बिठाए आश्वस्त रखें?
    घाटी-दर-घाटी लाठी-डंडों से धकियाते हुए सीमा में बदलाव का मौका उसे अब नहीं देना चाहिए। भारत के पास जो अपना प्रामाणिक कागजी नक्शा है, उसे जमीनी नक्शे से पुख्ता तौर पर मिला लेना चाहिए और देश को भी बताना चाहिए कि हमारी माटी कहां तक है। कम से कम यह तो बताया ही जा सकता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा कहां है? वास्तविक नियंत्रण रेखा का आदर करने के लिए चीन को विवश करना चाहिए और साथ ही, हमेशा के लिए सीमा विवाद को सुलझाने की पहल शुरू हो जानी चाहिए। ध्यान रहे, रूस ने जब कड़ाई का परिचय दिया, तभी चीन ने उसके साथ अपने सीमा विवाद को सुलझाया। चीन-रूस के बीच 4,209 किलोमीटर लंबी सीमा का जब समाधान निकल सकता है, तो चीन-भारत की 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा का निपटारा कैसे नहीं हो सकता? सीमा विवाद का निपटारा हमेशा के लिए इसलिए भी जरूरी है, ताकि छोटे-छोटे घाव या विवाद की गुंजाइश न रहे। चीन अगर भारत के साथ तार्किक सीमा समाधान नहीं चाहता है, तो यह भी भारत-चीन के लोगों के साथ ही दुनिया को भी पता होना चाहिए। किसी की मंशा बुरी है, तो उसे उजागर करने में ही भारत की भलाई है। और एक बार जब मंशा स्पष्ट हो जाए, तो भारत को चीन के प्रति अपनी सामरिक नीति ही नहीं, बल्कि अपनी समग्र नीति का निर्धारण करना चाहिए।

     

    दुर्ग / शौर्यपथ / निगम आयुक्त इंद्रजीत बर्मन द्वारा आज निगम अधिकारियों के साथ शहर का भ्रमण करते हुये बारिश को देखते हुये शंकर नगर नाला अंतर्गत दुर्गा चैक, विजय नगर, संतराबाड़ी, शदाणी नगर, केलाबाड़ी, पोटिया नाला, कसारीडीह नाला क्षेत्र को निरीक्षण किया गया। सभी नालों बारिश का पानी पूरे वेग से प्रवाह हो रहा है नालों के कारण किसी भी क्षेत्र में बारिश का पानी भरने की स्थिति नहीं दिखा । उन्होंने नाला में कार्य को संतोषजनक पाये। निरीक्षण के दौरान स्वास्थ्य अधिकारी दुर्गेश गुप्ता, स्वच्छता निरीक्षक जसवीर सिंह भुवाल, मेनसिंग मंडावी, दरोगा राजू सिंह, सुपरवाईजर व अन्य उपस्थित थे।
    उल्लेखनीय है कि आयुक्त ने बताया बारिश के पूर्व सभी बड़े नालों की सफाई युद्ध स्तर पर कराया गया है। बारिश प्रारंभ होने के बाद आज नालों में बारिश के पानी का निकासी की स्थिति का जायजा लिया गया। जहॉ बारिश का पानी पूरे वेग के साथ निकासी हो रही हैं कहीं भी जलभराव की स्थिति नहीं है फिर भी निगम अधिकारियों को सजग रहने और स्थिति पर नजर रखने कहा गया है। इसके अलावा निगम आयुक्त इंद्रजीत बर्मन द्वारा निगम क्षेत्र में वर्षा ऋतु के दौरान आम नागरिकों को होने वाली समस्याओं का निराकरण करने निगम के समस्त कार्यपालन अभियंताओं, सहायक अभियंताओं, और उपअभियंताओं को सजग रहने निर्देश दिये हैं। उन्होनें आदेश जारी कर कहा है कि सभी अपने प्रभार के वार्डो में गहन निरीक्षण करें और कार्यवाही सुनिश्चित करें।
    उन्होनें कहा बारिश के दौरान वार्डो के नालियों में पानी जाम, सड़क पर पानी भरने, के अलावा नालों में कचरा आकर फंसने और साफ-सफाई की समस्या आम नागरिकों को होती है। उन्होनें अधिकारियों को निर्देशित कर कहा बारिश के कारण एैसे नालियॉ जो क्षतिग्रस्त हो गया है उनका संधारण हेतु प्रस्ताव प्रस्तुत करें। साथ ही बारिश के कारण जाम नालियोंं को संबंधित सफाई दरोगा एवं सुपरवाईजर से संपर्क कर साफ करवाने का कार्य करायें। पोटिया नाला, केलाबाड़ी नाला, गिरधारी नाला, पुलगांव नाला एवं शंकर नाला में मिलने वाली समस्त नालियों जहॉ जाली लगाने का कार्य नहीं हुआ है वहॉ जाली लगाने हेतु संधारण मद से प्रस्ताव प्रस्तुत करें। उन्होनें कहा कार्यपालन अभियंता सहित सभी इंजीनियर अपने प्रभार क्षेत्र का निरंतर भ्रमण कर पेचवर्क कार्य करायें, ताकि शहर का आवागमन बाधित ना हो। उन्होनें कहा वार्ड निरीक्षण के दौरान वे संबंधित वार्ड पार्षद से अवश्य संपर्क कर समस्याओं का नियमानुसार निराकरण करायें।

    मुंगेली / शौर्यपथ / राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा के बैनर तले देश में राष्ट्रीय अध्यक्ष बीपी सिंह रावत व राज्य में प्रदेश संयोजक संजय शर्मा,वीरेंद्र दुबे व सह-संयोजक संजय उपाध्याय के नेतृत्व में प्रदेश के शिक्षकों एवं समस्त विभाग के कर्मचारियों द्वारा 21 जून को पुरानी पेंशन बहाली सहित अन्य मांगों को लेकर देशव्यापी पोस्टर बैनर प्रदर्शन किया गया। लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए कर्मचारियों द्वारा अपने-अपने घरों में प्रदर्शन किया गया। राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा के जिला संयोजक बलराज सिंह ने बताया कि छग सरकार ने अभी तक कर्मचारियों को केंद्रीय वेतनमान नही दिया है। इसके कारण शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों के वेतन में भारी विसंगति व्याप्त है। जिसे दूर करने के लिए कर्मचारी संगठनों द्वारा लगातार मांग किया जाता रहा है।
    इसके अलावा केंद्र सरकार से पुरानी पेंशन बहाली किए जाने की भी मांग भी लंबे अरसे से की जा रही है। लेकिन इस दिशा में सरकार ने अब तक कोई निर्णय नही लिया है। राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा जिला मुंगेली संयोजक दीपक वेंताल ने बताया कि रविवार को हुए देशव्यापी प्रदर्शन में शिक्षकों और कर्मचारियों द्वारा प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के नाम पुरानी पेंशन बहाली, वार्षिक वेतनवृद्धि कटौती आदेश वापसी, वेतन विसंगति दूर करने सहित क्रमोन्नति व पदोन्नति की मांग का पोस्टर, बैनर बनाकर अपने घरों के दीवार में लगाया गया। साथ ही सेल्फी लेकर सोशल मीडिया, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भेज कर अपनी मांग को बुलंद किया।ताकि इसके माध्यम से उनकी आवाज सरकार तक पहुंच सके।
    ब्लाक संयोजक शिव चंद्राकर, व नेमीचंद भास्कर ने बताया कि देश के सभी कर्मचारी एकजुट हैं। सरकार यदि हमारी मांगों पर ध्यान नही देगी तो आने वाले समय में समस्त कर्मचारी बड़ा देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे।

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ /लद्दाख में चीन और भारत के सैनिकों के बीच आपसी टकराव के बाद देश में चीन के बने उत्पादों के बहिष्कार का अभियान चल पड़ा है। मगर इसे अमल में लाना आसान नहीं होगा, क्योंकि भारतीय सामान में भी चीन के कल-पुर्जे लगे होते हैं। आंकड़ों की मानें, तो पिछले साल अप्रैल से इस साल फरवरी तक देश में 7.5 अरब डॉलर के पीसीबी और मोबाइल फोन के पुर्जों का आयात हुआ, जिसमें 45 फीसदी पुर्जे चीन से ही मंगाए गए हैं। भले ही सरकार द्वारा आयात पर निर्भरता खत्म करने का आह्वान किया गया था, लेकिन सच्चाई यही है कि हम इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल उपकरण, दवाई, दूरसंचार उपकरण, उर्वरक, खिलौने, वाहन, सोलर उपकरण आदि क्षेत्रों में काफी हद तक चीन पर निर्भर हैं। जाहिर है, सिर्फ चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बात कह देने से काम नहीं चलेगा। चीनी उत्पादों को हटाकर भारतीय उत्पादों को जगह देने के लिए हमें देश में फैक्टरियां लगानी होंगी और संयंत्रों की उत्पादन-क्षमता बढ़ानी होगी। इससे हालांकि, वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी, मगर चीन पर हमारी निर्भरता भी खत्म होगी। इससे देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
    बलराम साहू, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

    मानसून में सावधानी
    भारत में मानसून दस्तक दे चुका है। यह तब आया है, जब कोरोना महामारी लगातार अपने पांव पसार रही है। चूंकि बारिश अपने साथ कई बीमारियों को भी लेकर आती है, इसलिए इस बार हमें विशेष सावधानी बरतनी होगी। कोरोना के कारण अस्पतालों पर पहले ही काफी बोझ है। ऐसे में, अपने और स्वजनों की सेहत का पूरा ख्याल रखना आवश्यक है। जीवन में स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, इसलिए सतर्क रहकर खुद को और अपने परिवार को बीमारियों से बचाना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। इसके लिए हमें तमाम जरूरी उपाय करने चाहिए।
    सुमित ओझा, बलिया

    जिम्मेदार बनें
    देश में हर दिन कोरोना के रिकॉर्ड मरीज सामने आ रहे हैं। कई तरह की पाबंदियों के बाद भी देश में मरीजों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही। जब लॉकडाउन लगाया गया था, तब यही माना गया था कि लोग जवाबदेह बनेंगे और नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे। मगर एक तरफ लॉकडाउन की समय-सीमा बढ़ती रही, तो दूसरी तरफ देश में संक्रमित मरीजों की संख्या में इजाफा होता रहा। रही-सही कसर अनलॉक-1 ने पूरी कर दी, जब कमोबेश सब कुछ खोल दिया गया। लोगों के आने-जाने में कोई पाबंदी न रहने की वजह से यात्राएं बढ़ गईं और संक्रमण का भी दूरदराज तक प्रसार हो गया। साफ है, अब हमें और सावधान व जिम्मेदार बनना होगा। अगर हम खुद को कोरोना-संक्रमण से बचाना चाहते हैं, तो हमें हर सरकारी और डॉक्टरी निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
    रजत यादव, सुजानपुर, कानपुर

    बेरोजगारी की काट
    हमारे देश में बेरोजगारी पहले भी एक बड़ी समस्या रही है, लेकिन कोरोना ने इसे और गंभीर बना दिया है। सरकार की ओर से घोषित राहत-पैकेज से उम्मीद जगी है, लेकिन ईमानदारी के साथ इसका वितरण तो हो? अगर इस पैकेज का सही इस्तेमाल होता है, तो काफी उद्योग-धंधों का जन्म होगा, जिससे बेरोजगारी काफी हद तक दूर हो सकती है। आवश्यकता इस बात की भी है कि सरकारी मशीनरी में सब काम सिंगल विंडो द्वारा ऑनलाइन माध्यम से हो, ताकि काफी काम सुगमता से हो सकें। इसी के साथ, सरकार की मंशा के परिप्रेक्ष्य में लोकल यानी स्थानीय वस्तु और कार्य पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। यह मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी मांग है। इससे पलायन को भी रोका जा सकता है। बेरोजगारी-दर को यदि कम करना है, तो स्थानीयता को आगे बढ़ना ही होगा।
    तनुज कुमार, मेरठ

     

    ओपिनियान / शौर्यपथ / तमिलनाडु के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह अच्छी तरह से शासित राज्य रहा है। इस सूबे को यह उपलब्धि इसलिए हासिल हुई है, क्योंकि बीते वर्षों में इसने तमाम मुश्किलों का बखूबी सामना किया है। फिर चाहे वह संकट प्राकृतिक हो या सामाजिक विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा अथवा अर्थव्यवस्था से जुड़ा कोई मसला- तमिलनाडु बड़ी आबादी वाले राज्यों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता रहा है। मगर मौजूदा सूबाई सरकार जिस तरह से कोरोना वायरस महामारी से मुकाबिल है, उससे ये तमाम उपलब्धियां तार-तार हो रही हैं। वायरस संक्रमण के मामले में यह देश का तीसरा सबसे बड़ा सूबा बन गया है। यहां मृत्यु-दर भी धीरे-धीरे बढ़ रही है और चेन्नई के अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड कम पड़ने लगे हैं।
    मुख्यमंत्री के पलानीसामी की मन:स्थिति इसी से जाहिर होती है कि पिछले हफ्ते पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था, ‘सिर्फ ईश्वर को पता है कि तमिलनाडु में कोविड-19 का अंत कब होगा’। शुरुआती गलतियों के बाद राज्य ने अपनी नीतियां फिर से बनाई हैं, लेकिन लगता है कि नुकसान हो चुका है। सवाल यह है कि पहले बेहतरीन काम करने वाले इसके प्रशासनिक तंत्र के साथ आखिर हुआ क्या?
    उल्लेखनीय है कि यह राज्य 2004 की सुनामी से जल्द ही उबरने में कामयाब हो गया था, जबकि उस आपदा में इसका बड़ा हिस्सा तबाह हो गया था। 2015 की बाढ़ के समय भी इसने मिला-जुला प्रदर्शन किया था, क्योंकि तब भौतिक संपदा की हानि बेशक हुई, मगर अधिकतर लोगों की जान बचा ली गई थी। कई बड़े चक्रवातों का इसने बखूबी सामना किया है। पिछले वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर केंद्र ने जब ‘गुड गवर्नेंस इंडेक्स’ जारी किया था, तो उसमें भी यह सूबा शीर्ष पर था। कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों, वाणिज्य व उद्योग, मानव संसाधन विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुशासन, सामाजिक कल्याण व विकास, न्यायिक व सार्वजनिक सुरक्षा, पर्यावरण व जन-हितकारी शासन जैसे क्षेत्रों में मूल्यांकन के बाद यह सूची जारी की गई थी। पलानीसामी के लिए यह रैंकिंग नया जीवन लेकर आई, जो स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण मुश्किल में थे। इसी के बाद उनकी कुरसी पर नजर टिकाए नंबर दो नेता पन्नीरसेल्वन को किनारे करके वह अन्नाद्रमुक के सर्वेसर्वा बन गए।
    मगर कोविड-19 के विरुद्ध तमिलनाडु की रणनीति इस बात को साबित करती है कि केंद्र प्रायोजित रैंकिंग क्षेत्रीय सरकार के प्रदर्शन का सही मापक नहीं हो सकती। अतीत में यह राज्य तीन स्तंभों के आधार पर कामयाब माना गया था- कुशल नौकरशाही, सामाजिक रूप से संवेदनशील राजनीतिक नेतृत्व और सजग जनता। अभी इन तीनों ही स्तंभों में दरार दिख रही है।
    सबसे पहले बात नौकरशाही की। यहां के नौकरशाह अपने कुशल कामकाज के लिए जाने जाते हैं। इसी दक्षता के कारण तमिलनाडु अपनी सामाजिक योजनाओं को जनता तक पहुंचाता रहा है। बेहतर प्रशासन की वजह से राज्य में कानून-व्यवस्था भी अच्छी रही है। जाहिर है, यह राजनीतिक नेतृत्व है, जो फिसलता दिख रहा है। शीर्ष पर कोई मजबूत नेता न होने के कारण कमजोरी साफ-साफ दिख रही है। नतीजतन, नेतृत्व को पूजने वाली जनता भी अब बेचैन होने लगी है।
    कोविड-19 के खिलाफ जो रणनीति बनाई गई, उसमें कई गलतियां रहीं। शुरुआत में जब तबलीगी जमात के संक्रमित प्रवासियों के बारे में पता चला, तो संक्रमण थामने के कदम जरूर उठाए गए, लेकिन उनकी धार्मिक पहचान भी बताई जाती रही। हालांकि, जल्द ही राज्य ने अपनी गलती दुरुस्त कर ली और साप्रदायिक उन्माद से बचने के लिए संक्रमितों का नाम लेना बंद कर दिया। इसी तरह, लॉकडाउन और संपर्कों को खोजने की रणनीति ने भी कुछ हद तक काम किया, पर कोयांबदु थोक मार्केट कोरोना का नया हॉटस्पॉट बन गया। यहां से खुदरा व्यापारी अपने-अपने जिलों में संक्रमण ले गए।
    शुरुआत में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सी विजय भास्कर कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई का चेहरा बने। कुछ मौकों पर उन्हें मुख्यमंत्री के साथ देखा गया। पर तबलीगी जमात की वजह से संक्रमण में आया उछाल जैसे ही थमा, मुख्यमंत्री ने अति आत्मविश्वास में यह घोषणा कर दी कि महामारी सिमटने लगी है। हालात विपरीत होते ही उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े। इसके समाधान के लिए उन्होंने मीडिया को जानकारी देने की जिम्मेदारी विजय भास्कर से वापस लेते हुए राज्य के स्वास्थ्य सचिव को दे दी। तब यही अनुमान लगाया गया कि मुख्यमंत्री को यह कदम इसलिए उठाना पड़ा, क्योंकि उनके अन्य कैबिनेट सहयोगी विजय भास्कर के रोजाना मीडिया में आने से असहज हो रहे थे।
    बहरहाल, स्वास्थ्य सचिव भी नाकाम साबित हुईं, क्योंकि संक्रमण फैलता रहा। आरोप उछला कि उन्हें चेन्नई नगर आयुक्त का साथ नहीं मिला, जो इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह इलाका हॉट स्पॉट घोषित था। चेन्नई में संक्रमण बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री 2004 की सुनामी में बेहतर काम करने वाले आईएएस अधिकारी जे राधाकृष्णन को लेकर आए। मगर मुख्यमंत्री इसके बाद भी नहीं रुके। जल्द ही उन्होंने अपने पांच कैबिनेट मंत्रियों को शहर के विभिन्न हिस्सों का प्रभारी बनाया, फिर भी हालात नहीं संभले। मुख्यमंत्री को यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि बहुत सारे रसोइए शोरबे को खराब कर रहे हैं। पलानीसामी ने आत्मघाती गोल 19 जून को किया, जब उन्होंने 12 दिनों के सख्त लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जबकि देश अनलॉक-1 की ओर बढ़ चला था।
    नौकरशाही पर मुख्यमंत्री की कमजोर पकड़ के कारण जिलाधिकारियों ने चेन्नई से आने वाले प्रवासियों को रोकने के लिए अलग-अलग नियम लागू किए। हालांकि, खुद को निष्पक्ष बताने के लिए यहां का प्रशासन दूसरे राज्यों की तुलना में अधिक टेस्ट भी करने लगा है। शनिवार को यहां 35 हजार टेस्ट किए गए, जो पश्चिम बंगाल में पूरे महीने की जांच के बराबर है। जांच का दायरा बढ़ते ही संक्रमितों की संख्या में भी उछाल आने लगा है।
    अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। बेशक जांच ज्यादा होने लगी है, पर संक्रमण-दर पिछले कुछ दिनों से या तो स्थिर है या कम हो रही है। राधाकृष्णन को मोर्चे पर लगाने के बाद जरूर समन्वित प्रयास होते दिख रहे हैं, मगर तमिलनाडु अब भी खतरे से उबरा नहीं है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

     

    दुर्ग ( रिसाली निगम )/ शौर्यपथ / रिसाली नगर निगम वार्डों की सम्पत्ति करदाता अब अपना भवनध्भूमि का टैक्स आन लाईन जमा कर सकते है। इसके लिए करदाताओं को डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट सीजी सूडा डॉट काम में जाकर रिसाली मुन्सिपल कार्पोरेशन में जाकर ऑन लाईन जमा कर सकेंगे। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2020-2021 का टैक्स 30 जून तक जमा करने पर करदाताओं को 6.25 प्रतिशत की छूट दी जा रही है। वहीं जुलाई माह में 5 प्रतिशत की छूट दी जायेगी । इसके अलावा 1 अगस्त से 30 सितम्बर तक 4 प्रतिशत की छूट तथा 1अक्टूबर से 30 नवम्बर तक छूट का लाभ भूस्वामि प्राप्त कर सकेंगे।
    करदाताओं को विशेष सुविधा प्रदान करने हेतु रिसाली निगम की कर वसूली कंपनी स्पैरो सॉप्टेक लिमिटेड द्वारा सभी वार्डों में टैक्स वसूली हेतु कंपनी के कर्मचारी नियुक्त किये गये है। जहां पर करदाताओं को घर बैठे ही टैैक्स जमा प्राप्त कर सकते है।
    करदाताओं को सम्पत्ति कर जमा प्राप्त करने हेतु रिसाली निगम कार्यालय में जिला प्रशासन की गाईड लाईन के तहत मास्क पहनकर व सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना अनिवार्य होगा। अधिक जानकारी हेतु कंपनी के कर्मचारी वेदप्रकाश देशमुख मो. नं. 6260278583 से संपर्क कर सकते है। उक्त जानकारी रिसाली निगम के जनसंपर्क अधिकारी शैलेश साहू द्वारा दी गई है।

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