August 02, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

       दुर्ग। शौर्यपथ । दुर्ग नगर पालिक निगम के इतिहास में 'शहर सरकार' का ऐसा रंग-ढंग शायद ही कभी देखा गया हो। जिस कुर्सी पर कभी समन्वय और विकास की राजनीति हुआ करती थी, आज वहां केवल विवादों का 'हाई-वोल्टेज ड्रामा' चल रहा है। निगम गलियारों से लेकर चाय के ठेलों तक अब बस एक ही सुगबुगाहट है—क्या महापौर अलका बाघमार के खिलाफ 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' आएगा?
    नाराजगी सिर्फ विपक्ष (कांग्रेस) को नहीं है; सत्ता पक्ष के अपने ही पार्षद सामान्य सभा में भेदभाव और वार्डों की उपेक्षा का आरोप लगाकर अपनी ही मुखिया को आईना दिखा चुके हैं। लेकिन हाल ही में जो वाकया हुआ, उसने तो नगर निगम को किसी 'थ्रिलर फिल्म' का सेट बना दिया।

    जब बिना किसी विरोध-प्रदर्शन के निगम पहुंच गई 'पुलिस की फौज'
    निगम परिसर में उस वक्त हड़कंप मच गया जब बिना किसी धरने, प्रदर्शन या हंगामे के अचानक दो थानों के प्रभारी और सीएसपी दुर्ग लाव-लश्कर के साथ धमक पड़े। चर्चा है कि महापौर ने अन्य विभागों के कार्यपालन अभियंताओं को प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाने के लिए अपने केबिन में बुलाया था।
    अधिकारी शांति से चर्चा कर ही रहे थे कि पुलिस की इस 'सरप्राइज एंट्री' ने कई सवाल खड़े कर दिए:
    आखिर बिना किसी विवाद के पुलिस प्रशासन को किसने और क्यों फोन घुमाया?
    क्या अब शहर सरकार को अपने ही अधिकारियों से संवाद करने के लिए 'खाकी' के साए की जरूरत पड़ रही है?या फिर अधिकारियो को महापौर के व्यवहार पर विश्वास नहीं है ?
    सोशल मीडिया पर महापौर का एक वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह भरे मंच से अधिकारियों को तल्ख अंदाज में 'प्रोटोकॉल' की नसीहत देती नजर आ रही हैं। राजनीति के जानकार चुटकी ले रहे हैं कि जनता के बुनियादी मुद्दों पर इतनी सख्ती दिखाई जाती, तो आज शहर की सूरत कुछ और होती।

    विकास का 'वन-मैन शो': मंत्री गजेंद्र यादव की सक्रियता से बढ़ीं दूरियां?
    एक तरफ जहां महापौर अपनी घटती लोकप्रियता और अंतर्कलह से जूझ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के शिक्षा मंत्री और दुर्ग शहर के विधायक गजेंद्र यादव के जमीनी प्रयासों ने विकास कार्यों की झड़ी लगा दी है। शहर में जो भी बड़े और ऐतिहासिक काम दिख रहे हैं, वे सीधे मंत्री जी के खाते में जा रहे हैं:

    स्टेडियम परिसर                               भव्य बैडमिंटन कोर्ट का निर्माण
    पॉलिटेक्निक कॉलेज परिसर                अत्याधुनिक स्विमिंग पूल की सौगात
    शहरी कनेक्टिविटी केनाल रोड का निर्माण और जेल चौक से पुलगांव चौक तक फोर लेन सड़क की शुरुआत
    सौंदर्यीकरण एवं जन-सुविधा राजेंद्र पार्क चौक का कायाकल्प,

    गया नगर में सांस्कृतिक भवन, और समृद्धि बाजार में सब्जी मंडी का संधारण

    इन सभी बड़े प्रोजेक्ट्स का क्रेडिट (श्रेय) सीधे मंत्री गजेंद्र यादव और उनके समर्थकों को मिल रहा है। इस 'क्रेडिट वॉर' ने महापौर की बेचैनी को और बढ़ा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि जनता महापौर को क्रेडिट दे भी तो क्यों?
    बदहाली का शिकार दुर्ग: बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती जनता
    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सुशासन के संकल्प और उपमुख्यमंत्री व नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव द्वारा राशि की कोई कमी न रखने के बावजूद, दुर्ग नगर निगम बदहाली के नए कीर्तिमान गढ़ रहा है।

    निगम की नाकामियों की लंबी फेहरिस्त:
    इंदिरा मार्केट की दुर्दशा: व्यापार का मुख्य केंद्र आज पूरी तरह बदहाल है।
    सुराना कॉलेज के सामने नरक: गंदगी और बदबूदार वातावरण से छात्र और राहगीर हलाकान हैं।
    गुमठी आवंटन में भ्रष्टाचार: आरोप हैं कि इस पूरे खेल में शहरी सरकार की मौन सहमति है।
    अवैध कब्जों को संरक्षण: चतुर्भुज राठी जैसे अवैध कब्जाधारियों के साथ मंच साझा करने से भाजपा के 'जीरो टॉलरेंस' के दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
    सड़क पर अवैध बाजार: शनिवार को चर्चगेट पर लगने वाला अवैध बाजार यातायात और व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहा है।

    क्या 'साय सरकार' के सुशासन को आईना दिखा रही हैं महापौर?
    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां एक ओर प्रदेश को पारदर्शिता और विकास की पटरी पर दौड़ा रहे हैं, वहीं दुर्ग निगम की यह कार्यप्रणाली सरकार की छवि को बट्टा लगा रही है। हालात ये हैं कि अपनी ही पार्टी के पार्षद अब वार्डों में जनता का सामना करने से कतराने लगे हैं।
    राजनीतिक गलियारों में यह तीखा कटाक्ष भी चल रहा है कि महापौर अलका बाघमार के ऐसे आचरण को देखकर लगता है मानो वह खुद कांग्रेस के साथ मिलकर आगामी चुनावों में भाजपा प्रत्याशी की विदाई की स्क्रिप्ट लिख रही हों।
    निगम के भीतर कल हुई 'पुलिसिया ड्रामे' की गूंज अब दुर्ग से निकलकर रायपुर में संगठन के बड़े नेताओं के कानों तक पहुंच चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि सुशासन का दम भरने वाला भाजपा संगठन इस 'स्वघोषित प्रोटोकॉल सरकार' पर कब और क्या एक्शन लेता है, या फिर पार्षदों का बढ़ता असंतोष सीधे 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' का रास्ता साफ करेगा!
    दुर्ग निगम की इस प्रशासनिक खींचतान और संगठन के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि समन्वय की कमी विकास कार्यों को पूरी तरह प्रभावित कर रही है?

    भिलाई। जमीन फर्जीवाड़ा मामले में न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने उद्योगपति दंपति के खिलाफ अपराध दर्ज होने के बाद सिमप्लेक्स कास्टिंग लिमिटेड की डायरेक्टर ए 5 सूर्यविहार कालोनी जुनवानी भिलाई निवासी संगीता केतन शाह ने कहा कि ग्राम कोहका में पटवारी हल्का नंबर 14/19 खसरा को होटल को किराए पर दिया गया था। एग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी किराएदार उसे खाली नहीं कर रहा था। इस दौरान हुडको निवासी सुनील कुमार सोमन ने संगीता शाह को होटल खाली कराकर देने के लिए एग्रीमेंट करने को कहा था। तब उसके साथ 10 लाख रुपए का एग्रीमेंट किया गया। लेकिन साल भर होने के बाद सुनील सोमन ने होटल को खाली नहीं कराया। उसके रकम को भी वापस लौटा दिया गया था। उसके बाद सुनील सोमन ने षडयंत्र और साजिश करके पुराने एग्रीमेंट का फायदा उठाकर मुझे कहा आपने मेरे साथ जमीन बेचने का सौदा किया है। बचे हुए चालीस लाख रुपए लेकर इस जमीन का रजिस्ट्री करिए। तब संगीता शाह ने कहा करोड़ों की जमीन को पचास लाख में कैसे दु। ये एग्रीमेंट आपने मुझसे जमीन खाली कराने के लिए बनाया था। संगीता शाह ने कहा कि उक्त जमीन करोड़ो रुपए की है उसे कैसे औने-पौने दाम पर बेच सकती हूं। सुनील सोमन पूरी तरह से प्लान तैयार कर सिमप्लेक्स कास्टिंग लिमिटेड और हम पति-पत्नी को बदनाम करने के लिए ऐसा षड्यंत्र रचा गया है। षड्यंत्र कर न्यायालय के माध्यम से अपराध दर्ज करवा दिया। मै तीस वर्षो से कंपनी को संभाल रही हूं भिलाई-दुर्ग के लोग सभी जानते पहचाने है। कभी इस तरह की कोई बात सामने नहीं आई लेकिन सुनील सोमन ने साजिश कर शाह परिवार के ऊपर गलत आरोप लगाकर बदनाम करने का साजिश रचा है। सुनील सोमन ने भरोसे को तोड़कर इस तरह से प्लान तैयार कर हम लोगों को फंसाया है। सुपेला पुलिस से सांठगांठ कर इस तरह का साजिश रचकर बदनाम किया। 

    करोड़ो की जमीन को लाखों में कैसे बेचू

    सिमप्लेक्स कास्टिंग लिमिटेड डॉयरेक्टर संगीता केतन शाह ने जारी विज्ञप्ति में बताया है कि स्मृति नगर कोहका की मेरी कंपनी जमीन करोड़ो रुपए की है कैसे उसे लाखों में बेच देती। कभी भी सुनील सोमन के साथ जमीन बेचने का कोई भी एग्रीमेंट नहीं हुआ था। जबकी होटल को खाली कराने के लिए यह किया गया था। खाली नहीं कराने की स्थिति में सुनील सोमन सारा रकम भी उसे डबल दिया गया है। मेरी छवि को जिस तरह से धूमिल किया गया है। जल्द उनके चेहरों को भी बेनकाब करुंगी। इस फर्जीवाड़े में कोई सच्चाई नहीं है। इसमें दोनों पति और पत्नी का कोई रोल नहीं है। सिर्फ बदनाम करने के लिए इस तरह का सोमन ने साजिश रचा है। इसकी निषष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

     

    नई दिल्ली/शौर्यपथ।
    देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 14 मई 2026 को केंद्र सरकार से बेहद कड़े सवाल पूछे। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने चयन समिति की वर्तमान संरचना पर गंभीर चिंता जताई।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने साफ कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जनता के सामने उसका स्वतंत्र दिखना भी उतना ही आवश्यक है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री शामिल हैं, तब विपक्ष के नेता की मौजूदगी केवल “औपचारिकता” बनकर क्यों रह जाती है?


    “स्वतंत्रता का दिखावा क्यों?”

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तीन सदस्यीय चयन समिति में दो सदस्य सीधे कार्यपालिका से जुड़े हैं। ऐसे में हर निर्णय 2:1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में जाने की संभावना बनी रहती है।

    पीठ ने टिप्पणी की कि कोई भी कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के निर्णय के खिलाफ जाने की स्थिति में शायद ही दिखाई देगा। अदालत ने पूछा कि फिर विपक्ष के नेता को शामिल कर “स्वतंत्रता का दिखावा” क्यों किया जा रहा है?


    “समिति में एक भी निष्पक्ष सदस्य क्यों नहीं?”

    अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से सवाल किया कि इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक नियुक्ति प्रक्रिया में एक भी पूर्णतः निष्पक्ष या न्यूट्रल सदस्य क्यों नहीं रखा गया।

    सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वहां चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया जा सकता है, तो चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में उन्हें बाहर क्यों रखा गया?


    “कार्यपालिका का वर्चस्व लोकतंत्र के लिए चिंता”

    पीठ ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में “Executive Veto” यानी कार्यपालिका का स्पष्ट वर्चस्व दिखाई देता है। इससे विपक्ष के नेता की भूमिका केवल सजावटी (Ornamental) बनकर रह जाती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के Basic Structure यानी मूल ढांचे का हिस्सा हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर जनता का भरोसा सर्वोच्च महत्व रखता है।


    केंद्र सरकार की दलील पर कोर्ट असंतुष्ट

    केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने दलील दी कि किसी चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता को उसकी नियुक्ति प्रक्रिया से नहीं, बल्कि पद पर रहते हुए उसके कार्यों और निर्णयों से आंका जाना चाहिए।

    हालांकि कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं दिखा। पीठ ने स्पष्ट कहा कि निष्पक्षता और स्वतंत्रता की शुरुआत नियुक्ति प्रक्रिया से ही होनी चाहिए, क्योंकि वही संस्था की विश्वसनीयता की नींव तय करती है।


    मूल दस्तावेज तलब, 19 मई को अगली सुनवाई

    सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में इसी कानून के तहत हुए ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियों से जुड़े खोज और चयन प्रक्रिया के मूल रिकॉर्ड अदालत में पेश करने के निर्देश दिए हैं।

    मामले की अगली सुनवाई 19 मई 2026 को होगी, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से आगे की दलीलें पेश करेंगे।


    संवैधानिक विशेषज्ञों की नजर में अहम मामला

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है कि क्या संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभाव सीमित होना चाहिए।

    अब देश की निगाहें 19 मई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय हो सकता है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में भविष्य में क्या बदलाव संभव हैं।

    नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी Central Bureau of Investigation (CBI) के निदेशक चयन को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय चयन समिति में नए निदेशक के नाम पर सहमति नहीं बन पाने के बाद केंद्र सरकार ने मौजूदा सीबीआई निदेशक Praveen Sood के कार्यकाल को एक वर्ष और बढ़ाने का फैसला लिया है। यह निर्णय अब राष्ट्रीय राजनीति और प्रशासनिक पारदर्शिता के बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

    चयन समिति की बैठक में टकराव

    मई 2026 में आयोजित चयन समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi शामिल थे। बैठक के दौरान राहुल गांधी ने चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने उम्मीदवारों की “सेल्फ-अप्रेजल” और “360-डिग्री असेसमेंट रिपोर्ट” समिति के सामने प्रस्तुत नहीं की।

    राहुल गांधी ने इस प्रक्रिया को “महज औपचारिकता” और “पक्षपातपूर्ण” बताते हुए असहमति नोट सौंपा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नेता प्रतिपक्ष का पद सरकार के फैसलों पर केवल “रबर स्टैंप” लगाने के लिए नहीं है। नए नामों पर सहमति न बनने के बाद उन्होंने बैठक से खुद को अलग कर लिया।

    सरकार ने क्यों बढ़ाया कार्यकाल?

    चयन प्रक्रिया में गतिरोध के बीच केंद्र सरकार की कैबिनेट नियुक्ति समिति (ACC) ने प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने का हवाला देते हुए प्रवीण सूद को एक और सेवा विस्तार देने का निर्णय लिया।

    1986 बैच के आईपीएस अधिकारी प्रवीण सूद को मई 2023 में पहली बार दो वर्ष के लिए सीबीआई निदेशक नियुक्त किया गया था। मई 2025 में उन्हें पहला विस्तार मिला और अब उनका कार्यकाल मई 2027 तक बढ़ा दिया गया है।

    नए दावेदारों की उम्मीदों पर विराम

    सीबीआई निदेशक पद की दौड़ में शामिल GP Singh और Shatrughan Singh Kapoor जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति फिलहाल टल गई है। राजनीतिक सहमति नहीं बनने के कारण अब यह मामला और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है।

    लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठे सवाल

    विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा है, जबकि सरकार इसे प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम बता रही है। ऐसे में सीबीआई प्रमुख के चयन को लेकर उठा यह विवाद आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

     

    मरीजों की पीड़ा, अव्यवस्था और चिकित्सकीय कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल — स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत ने बढ़ाई चिंता

    दुर्ग/शौर्यपथ विशेष।
    दुर्ग जिला अस्पताल, जिसे जिले का सबसे बड़ा शासकीय स्वास्थ्य संस्थान माना जाता है, इन दिनों गंभीर सवालों और जन असंतोष के केंद्र में आ गया है। करोड़ों रुपये की शासकीय योजनाओं, संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों के बीच मरीजों को राहत मिलने के बजाय लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि सामान्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी उपचार देने के बजाय “हायर सेंटर रेफर” करना एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है।

    सूत्रों और मरीजों से प्राप्त शिकायतों के अनुसार यदि किसी मरीज को आंख, सामान्य सर्जरी अथवा अन्य उपचार की आवश्यकता हो और उसे शुगर या बीपी जैसी सामान्य बीमारी हो, तो कई मामलों में चिकित्सकों द्वारा तत्काल रायपुर रेफर करने की सलाह दी जाती है। जबकि निजी चिकित्सकों का मानना है कि नियंत्रित शुगर और बीपी की स्थिति में ऐसे मरीजों का उपचार जिला स्तर पर संभव है।


    “सिर्फ पर्ची वाले मरीजों का अस्पताल?”

    जनचर्चाओं में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या जिला अस्पताल अब केवल उन्हीं मरीजों के लिए रह गया है जिन्हें बिना जोखिम और जटिलता के आसानी से उपचार दिया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी उम्मीद लेकर आने वाले मरीज पहले कई प्रकार की जांच, मेडिकल फिटनेस और कागजी प्रक्रिया पूरी करते हैं, लेकिन अंततः उन्हें उपचार के बजाय रेफर कर दिया जाता है। इससे मरीज आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से टूटते नजर आ रहे हैं।


    जच्चा-बच्चा केंद्र पर भी सवाल

    विश्वस्त सूत्रों के अनुसार जिला अस्पताल के जच्चा-बच्चा केंद्र में भी बीपी और शुगर का हवाला देकर गर्भवती महिलाओं को बाहर रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मामलों में वही मरीज बाद में निजी नर्सिंग होम में सफलतापूर्वक उपचार प्राप्त कर लेते हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जिम्मेदारी दोनों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।


    अस्पताल परिसर में अव्यवस्था के आरोप

    जिला अस्पताल परिसर की व्यवस्थाओं को लेकर भी कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। मरीजों और परिजनों के अनुसार:

    • अस्पताल परिसर में बाहरी एजेंटों की सक्रियता बढ़ी हुई है
    • मरीजों को निजी नर्सिंग होम की ओर मोड़ने की चर्चाएं होती हैं
    • दवाइयों के लिए मरीजों को बाहर भटकना पड़ता है
    • परिसर में अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं
    • समुचित लिफ्ट सुविधा के अभाव में बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हैं

    इन सभी मुद्दों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता लोगों की नाराजगी का कारण बन रही है।


    बजरंग दल ने खोला मोर्चा, CMO को सौंपा ज्ञापन

    बुधवार को इन सभी अव्यवस्थाओं और शिकायतों को लेकर बजरंग दल ने जिला अस्पताल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दानी से मुलाकात कर अस्पताल में व्याप्त अनियमितताओं, चिकित्सकीय लापरवाही और मरीजों की समस्याओं को लेकर विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

    ज्ञापन में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की अनुपलब्धता, गर्भवती महिलाओं के प्रवेश समय को लेकर नियमों में बदलाव, अस्पताल में बाहरी एजेंटों की सक्रियता, ऑपरेशन थिएटर की तकनीकी समस्याएं, ओपीडी में दवा वितरण की सीमाएं, दिव्यांग प्रमाणपत्र प्रक्रिया में विलंब और कैंसर वैक्सीनेशन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए।

    बजरंग दल के जिला संयोजक रतन यादव ने कहा कि जिन मामलों का संबंध राज्य शासन से है, उन्हें विभागीय मंत्री और शासन स्तर तक पहुंचाकर सुधार की मांग की जाएगी। उन्होंने कहा कि जिला अस्पताल की व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही तय करना अब जनहित का बड़ा मुद्दा बन चुका है।


    स्वास्थ्य अधिकारी ने जांच और कार्रवाई का दिया आश्वासन

    जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दानी ने संगठन को अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार और अनियमितताओं की जांच कर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही राज्य शासन से जुड़े मुद्दों को उच्च स्तर तक पहुंचाने की बात भी कही गई है।


    सबसे बड़ा सवाल — जवाबदेह कौन?

    दुर्ग जिला अस्पताल की मौजूदा स्थिति अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनविश्वास से जुड़ा प्रश्न बनती जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि:

    • क्या जिला अस्पताल उपचार का केंद्र है या केवल रेफरल व्यवस्था का माध्यम?
    • क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जिम्मेदारी से ज्यादा औपचारिकता हावी हो चुकी है?
    • करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मरीजों को भरोसेमंद इलाज क्यों नहीं मिल पा रहा?
    • और क्या अस्पताल प्रशासन एवं जिम्मेदार अधिकारी इस व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?

    स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उठ रहे ये सवाल अब केवल अस्पताल परिसर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरे जिले में चर्चा और चिंता का विषय बन चुके हैं।

    भिलाई-दुर्ग में ‘जन अधिकार आंदोलन’ का ऐलान, उधारकर्ता आयोग गठन सहित कई मांगें होंगी प्रमुख

    भिलाई-दुर्ग/शौर्यपथ।
    देशभर में बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ी कथित प्रताड़ना, आर्थिक उत्पीड़न और नागरिक अधिकारों के हनन के खिलाफ 14 मई 2026 को भिलाई-दुर्ग में व्यापक “जन अधिकार आंदोलन” आयोजित किया जाएगा। दोपहर 12 बजे से शुरू होने वाले इस आंदोलन के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई जाएगी।

    आंदोलन के आयोजकों का कहना है कि वर्तमान समय में अनेक नागरिक बैंक रिकवरी प्रक्रिया, नोटिस प्रताड़ना, मानसिक दबाव और आर्थिक शोषण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई मामलों में लोगों को न्याय और सुनवाई के लिए प्रभावी मंच तक उपलब्ध नहीं हो पाता। इसी मुद्दे को केंद्र में रखते हुए आंदोलन के दौरान “उधारकर्ता आयोग” (Borrower Commission) के गठन की मांग प्रमुखता से उठाई जाएगी, ताकि ऋण लेने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

    कार्यक्रम में भारतीय मुद्रा प्रणाली और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को लेकर भी पारदर्शिता की मांग की जाएगी। आंदोलनकारियों के अनुसार जनता को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि डिजिटल मुद्रा प्रणाली का संचालन किस प्रकार हो रहा है और उससे जुड़ी नीतियां किस संस्था के नियंत्रण में कार्य कर रही हैं।

    आंदोलन के दौरान बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी कथित अवैध वसूली, मानसिक प्रताड़ना, प्रशासनिक निष्क्रियता और वित्तीय अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर भी खुलकर आवाज उठाई जाएगी। आयोजकों ने मांग की है कि संबंधित मामलों में बैंक एवं एनबीएफसी संस्थाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जाए।

    आंदोलनकारियों ने बैंकिंग व्यवस्था के आर्थिक मॉडल पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि देश में प्रचलित मुद्रा की तुलना में कई गुना अधिक ऋण वितरण किया गया है। आंदोलन में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया जाएगा कि जब देश में लगभग 38 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में है, तब केवल सरकारी बैंकों द्वारा ही 107 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण वितरण कैसे किया गया। साथ ही निजी बैंकों और वित्तीय कंपनियों की ऋण व्यवस्था की भी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की जाएगी।

    कार्यक्रम की रूपरेखा

    दोपहर 12 बजे से विभिन्न विषय विशेषज्ञों और वक्ताओं द्वारा पर्यावरण, स्वास्थ्य, बैंकिंग और आर्थिक विषयों पर रिसर्च आधारित जानकारी साझा की जाएगी। इसके बाद दोपहर 2:30 बजे से बैंकिंग व्यवस्था, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आम जनता पर पड़ रहे प्रभावों पर विशेष संबोधन आयोजित होगा। कार्यक्रम के अंतिम चरण में शाम 4 बजे आंदोलनकारी नारेबाजी और पैदल मार्च करते हुए कलेक्टर कार्यालय पहुंचेंगे, जहां ज्ञापन एवं शिकायत पत्र सौंपा जाएगा।

    आंदोलन के संयोजकों ने सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं, युवाओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों से लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से कार्यक्रम में सहभागी बनने की अपील की है।

    आयोजकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी संस्था या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि “आर्थिक अन्याय, बैंकिंग प्रताड़ना और नागरिक अधिकारों की रक्षा” के लिए जनता की लोकतांत्रिक आवाज है।

    “समस्याओं का शीघ्र समाधान करें, अन्यथा होगा उग्र आंदोलन” — भिलाई इस्पात मज़दूर संघ की प्रबंधन को चेतावनी

    भिलाई/शौर्यपथ।
    भिलाई इस्पात संयंत्र की टाउनशिप में व्याप्त अव्यवस्थाओं, भ्रष्टाचार, अवैध कब्जों और मूलभूत सुविधाओं की बदहाल स्थिति को लेकर भिलाई इस्पात मज़दूर संघ यूनियन ने प्रबंधन के खिलाफ तीखा रुख अपनाया है। यूनियन की महत्वपूर्ण बैठक इस्पात भवन स्थित कॉफी हाउस में संघ के महामंत्री चन्ना केशवलू के नेतृत्व में आयोजित हुई, जिसमें टाउनशिप की विभिन्न समस्याओं और लंबे समय से लंबित मांगों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    बैठक में यूनियन पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि नगर सेवाएं विभाग में भ्रष्टाचार और अनियमितताएं लगातार बढ़ रही हैं तथा लंबे समय से जमे अधिकारियों के कारण व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित हो रही है। यूनियन ने प्रबंधन के प्रति गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि यदि समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं किया गया, तो कर्मचारियों और नागरिकों के साथ मिलकर आंदोलन और प्रदर्शन किया जाएगा।

    यूनियन ने प्रबंधन का ध्यान टाउनशिप की गंभीर समस्याओं की ओर आकर्षित करते हुए कहा कि नियमित कर्मचारियों को रिक्त आवास आवंटन की प्रक्रिया सरल और तेज की जाए। पुराने क्वार्टर्स में खराब हो चुकी बिजली वायरिंग और स्विच बोर्डों को सुरक्षा की दृष्टि से तत्काल बदला जाए। आवासीय क्षेत्रों में संचालित अवैध खटालों को हटाकर सड़कों पर घूमने वाले आवारा पशुओं, कुत्तों और सुअरों पर नियंत्रण किया जाए, क्योंकि इनके कारण दुर्घटनाओं की घटनाएं बढ़ रही हैं।

    बैठक में फॉरेस्ट एवेन्यू रोड और गैरेज रोड को बढ़ते यातायात दबाव के मद्देनजर वन-वे घोषित करने, मानसून पूर्व सभी बीएसपी आवासों की छतों पर टारपेल्टिंग कार्य पूर्ण कराने और टाउनशिप में अवैध कब्जों पर सख्त कार्रवाई की मांग भी उठाई गई। यूनियन ने कहा कि अवैध कब्जों के कारण असामाजिक गतिविधियों और अपराधों को बढ़ावा मिल रहा है।

    मार्केट क्षेत्रों में अवैध ठेलों और अतिक्रमण के कारण लगातार जाम की स्थिति निर्मित होने तथा कबाड़ी दुकानों से गंदगी और बदबू फैलने पर भी चिंता जताई गई। भीषण गर्मी को देखते हुए टाउनशिप में दिन में दो बार नियमित पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग रखी गई।

    यूनियन ने मकानों के बैकलेन और नालियों की सफाई, गटर लाइन पर ढक्कन लगाने, झाड़ियों की कटाई और दूषित पेयजल समस्या के समाधान हेतु पाइपलाइन बदलने की मांग भी प्रमुखता से उठाई। कई स्कूलों और सामाजिक भवनों द्वारा मैदानों पर किए गए कथित अवैध कब्जों को हटाने की मांग भी बैठक में की गई।

    इसके अलावा सेक्टर-4 में पेयजल आपूर्ति समय में सुधार, सेक्टर-6 ई मछली मार्केट से एमजीएम तक अवैध अतिक्रमण हटाने, सभी पोलों पर स्ट्रीट लाइट लगाने, लगातार हो रही बिजली कटौती रोकने तथा मुर्गा चौक से खुर्सीपार फाटक तक सड़क मार्ग पर खड़े ट्रकों एवं ट्रेलरों को हटाकर प्रकाश व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की गई।

    यूनियन ने आरोप लगाया कि टाउनशिप में नए महाप्रबंधक इंचार्ज की नियुक्ति के बाद अवैध कब्जों और भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है। साथ ही संयंत्र में कार्यरत कर्मचारियों को मोबाइल फोन एवं सिम कार्ड उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई।

    यूनियन पदाधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि यदि बारिश से पहले इन सभी समस्याओं का निराकरण नहीं किया गया, तो नागरिकों और कर्मचारियों का आक्रोश उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी।

    बैठक में उपाध्यक्ष सुधीर गडेवाल, संयुक्त महामंत्री प्रदीप कुमार पाल, मृगेंद्र कुमार, भूपेंद्र बंजारे, सचिव ए. वेंकट रमैया, अखिलेश उपाध्याय, संजय कुमार साकुरे, पूरन लाल साहू, संतोष सिंह, कोषाध्यक्ष रवि चौधरी, नारायण प्रसाद बाजपेयी सहित यूनियन के अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे।

    भिलाई निगम ने आकाश गंगा एवं सुपेला क्षेत्र में की 3200 रुपये की चालानी कार्रवाई

    भिलाईनगर/शौर्यपथ।
    नगर पालिक निगम भिलाई द्वारा शहर में अवैध रूप से वाहन खड़े कर सड़क और आवागमन बाधित करने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। निगम आयुक्त राजीव कुमार पाण्डेय के निर्देशानुसार जोन-1 नेहरू नगर क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर सुपेला एवं आकाश गंगा परिसर में सड़क बाधा उत्पन्न करने वालों पर चालानी कार्रवाई की गई।

    स्वास्थ्य विभाग की टीम ने वार्ड क्रमांक 17 आकाश गंगा परिसर में प्रतिष्ठानों के सामने अवैध रूप से वाहन खड़े पाए जाने पर संबंधित वाहन चालकों पर जुर्माना लगाया। कार्रवाई के दौरान गौरी शंकर, मनोज कुमार, सौरभ, प्रकाश हालधर, भोले बाबा, देवनाथ, पवन कुमार गुप्ता एवं रमेश गुप्ता सहित विभिन्न लोगों से कुल 1400 रुपये का जुर्माना वसूला गया।

    इसी प्रकार राखी फर्नीचर रोड के सामने अवैध रूप से सब्जी ट्रक पार्किंग कर सड़क एवं यातायात बाधित करने पर संबंधित वाहन संचालकों पर 1800 रुपये की चालानी कार्रवाई की गई।

    निगम प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सड़क पर अवैध पार्किंग, अतिक्रमण एवं आवागमन बाधित करने वालों के खिलाफ आगे भी लगातार अभियान जारी रहेगा। नागरिकों से यातायात व्यवस्था बनाए रखने एवं निर्धारित स्थानों पर ही वाहन पार्क करने की अपील की गई है।

    485 आवेदन प्राप्त, 165 मामलों का मौके पर निराकरण — सैकड़ों हितग्राही योजनाओं से लाभान्वित

    दुर्ग/शौर्यपथ।
    सुशासन तिहार-2026 के अंतर्गत जनपद पंचायत धमधा के ग्राम मलपुरीकला में आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर में ग्रामीणों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली। शासन की योजनाओं को आमजन तक प्रभावी रूप से पहुंचाने और समस्याओं के त्वरित निराकरण के उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में विभिन्न विभागों से संबंधित कुल 485 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 165 आवेदनों का मौके पर ही निराकरण किया गया। शेष प्रकरणों के निराकरण के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई है।

    शिविर में मलपुरीकला, अकोला, कपसदा, ओटेबंद, गोढ़ी, अछोटी, ढौर (हि), बोरसी, खपरी, पंचदेवरी, ढाबा, मुर्रा, सांकरा एवं कंडरका सहित 14 ग्राम पंचायतों के ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में विभिन्न शासकीय योजनाओं के तहत सैकड़ों हितग्राहियों को लाभान्वित किया गया।

    खाद्य विभाग द्वारा 10 हितग्राहियों को नवीन राशन कार्ड वितरित किए गए। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) अंतर्गत व्यक्तिगत शौचालय निर्माण, स्वच्छाग्राही कार्य और बर्तन बैंक संचालन में उत्कृष्ट योगदान देने वाले हितग्राहियों एवं समूहों को सम्मानित किया गया। जनपद पंचायत धमधा द्वारा सामाजिक सहायता पेंशन योजना के तहत वृद्धा एवं मुख्यमंत्री पेंशन स्वीकृति प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

    प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आवास निर्माण पूर्ण करने वाले हितग्राहियों को पीएम आवास की चाबियां सौंपी गईं। मत्स्य विभाग द्वारा विभिन्न मछुआ सहकारी समितियों को आइस बॉक्स एवं जाल वितरित किए गए, वहीं कृषि विभाग ने किसानों को केसीसी कार्ड प्रदान किए।

    स्वास्थ्य विभाग द्वारा एचपीवी वैक्सीन लगवाने वाली बालिकाओं को प्रमाण पत्र देकर प्रोत्साहित किया गया। साथ ही कक्षा 10वीं और 12वीं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने पर समाजसेवी यशवंत वर्मा का भी सम्मान किया गया।

    शिविर में अधिकारियों ने विभिन्न विभागीय योजनाओं की जानकारी ग्रामीणों को विस्तारपूर्वक दी तथा योजनाओं का अधिकाधिक लाभ लेने के लिए प्रेरित किया।

    कार्यक्रम में अनुविभागीय दण्डाधिकारी महेश सिंह राजपूत, जनपद पंचायत धमधा के सीईओ किरण कौशिक, विधायक प्रतिनिधि सतीश साहू, जनपद सदस्य हेमा साहू, सरपंच दशमत साहू सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।

     

    माड़वी नन्दे और सुमड़ी को मिला नया जीवन, सुकमा में स्वास्थ्य कर्मियों की संवेदनशीलता और साहस की मिसाल

    रायपुर/सुकमा/शौर्यपथ।
    बस्तर के दुर्गम जंगलों में, जहाँ आज भी कई गाँव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर हैं, वहाँ मानवता और प्रशासनिक संवेदनशीलता की एक ऐसी मिसाल सामने आई है जिसने “सरकार अंतिम व्यक्ति तक” की परिभाषा को जीवंत कर दिया।

    सुकमा जिले के दूरस्थ और पहुँचविहीन ग्राम दुरभा में ‘मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान’ के तहत पहुँची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दो मासूम बच्चियों — 5 वर्षीय माड़वी नन्दे और 4 वर्षीय माड़वी सुमड़ी — को मौत के मुहाने से वापस खींच लाया।

    मलेरिया, गंभीर कुपोषण और शरीर में मात्र 2 से 3 ग्राम हीमोग्लोबिन जैसी बेहद गंभीर स्थिति में जी रहीं इन बच्चियों के लिए यह अभियान किसी जीवनदायिनी आशा से कम नहीं था।


    जंगलों के बीच मानवता का सबसे कठिन सफर

    कलेक्टर अमित कुमार के मार्गदर्शन में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के “स्वस्थ बस्तर” संकल्प को जमीन पर उतारते हुए अदम्य साहस का परिचय दिया।

    स्वास्थ्य कर्मियों ने घने जंगलों, पथरीले रास्तों और नदी-नालों को पार कर दुरभा गाँव तक पहुँच बनाई। जब टीम ने बच्चियों की गंभीर हालत देखी, तो तत्काल उन्हें अस्पताल पहुँचाने का निर्णय लिया गया।

    मीलों तक पैदल सफर कर बच्चियों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक लाया गया, जहाँ से एम्बुलेंस के जरिए लगभग 96 किलोमीटर दूर जिला चिकित्सालय सुकमा पहुँचाया गया।

    यह सिर्फ एक रेस्क्यू नहीं था, बल्कि प्रशासन और स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनशीलता, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की जीवंत तस्वीर थी।


    जब इलाज बना उम्मीद की नई किरण

    जिला अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने युद्ध स्तर पर उपचार शुरू किया।
    एनीमिया और मलेरिया से जूझ रही बच्चियों को तत्काल रक्त चढ़ाया गया, मलेरिया का संपूर्ण उपचार दिया गया तथा पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में विशेष निगरानी में रखा गया।

    कुछ ही दिनों में बच्चियों का हीमोग्लोबिन स्तर बढ़कर 9 ग्राम से अधिक हो गया और उनके चेहरों पर फिर से मुस्कान लौट आई।

    इलाज के दौरान परिजनों को पोषण, स्वच्छता और बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सके।


    उपचार ही नहीं, योजनाओं से भी जोड़ा गया परिवार

    कलेक्टर अमित कुमार के अनुसार यह मिशन केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं था।
    बच्चियों और उनके परिवार को शासन की अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने हेतु आवश्यक दस्तावेज भी तैयार किए गए।

    इलाज के बाद दोनों बच्चियों को सुरक्षित उनके गाँव वापस पहुँचाया गया, जहाँ अब उनकी खिलखिलाहट पूरे दुरभा गाँव में उम्मीद और विश्वास की नई कहानी लिख रही है।


    ‘मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान’ बना जनजीवन का सहारा

    सुकमा जिले में इस महत्वाकांक्षी अभियान के तहत अब तक स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार किया गया है।

    अभियान की प्रमुख उपलब्धियाँ :

    • कुल लक्ष्य: 2,93,386 लोगों की स्वास्थ्य जांच
    • अब तक जांच एवं उपचार: 1,74,770 लोग
    • रेफर किए गए गंभीर मरीज: 5,240

    इन बीमारियों के मरीजों की पहचान कर उपचार हेतु भेजा गया :

    • मलेरिया
    • टीबी
    • कुष्ठ
    • मोतियाबिंद
    • खून की कमी
    • कुपोषित बच्चे
    • उच्च जोखिम गर्भवती महिलाएँ
    • बीपी एवं शुगर मरीज

    बस्तर के अंतिम छोर तक पहुँची सरकार

    दुरभा गाँव की यह कहानी केवल दो बच्चियों के उपचार की नहीं, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जिसमें प्रशासन, स्वास्थ्य कर्मी और सरकार मिलकर यह संदेश दे रहे हैं कि —

    “बस्तर का कोई भी जीवन अब दूरी और दुर्गमता के कारण असहाय नहीं छोड़ा जाएगा।”

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