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दुर्ग / शौर्यपथ / 6 महीने की जेल यात्रा के बाद भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव को उच्चतम न्यायालय से बेल मिल गई पिछले साल अगस्त महीने में विधायक देवेंद्र यादव को बलौदा बाजार पुलिस ने हिंसा,अग्निकाण्ड सहित अन्य आरोपो के आधार पर हिरासत में लिया था पिछले 6 महीने से देवेंद्र यादव की उच्च न्यायालय में बैल एप्लीकेशन लगातार खारिज होती रही और 20 फरवरी को उच्चतम न्यायालय द्वारा देवेंद्र यादव को बेल मिला .देवेंद्र यादव के जमानत मिलने की खबर के बाद विधायक देवेंद्र यादव के समर्थकों में जहां उत्साह देखने को मिला वही आरोप प्रत्यारोपों का दौर भी आरंभ हो गया सोशल मीडिया में यह ज्ञान सामने आने लगा कि देवेंद्र यादव को बेल मिला है और वह दोष मुक्त नहीं हुए तो फिर जश्न कैसा और यह सही भी है कि बलौदा बाजार पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपो के बाद माननीय न्यायालय द्वारा भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव को अभी दोष मुक्त नहीं किया गया वहीं उच्चतम न्यायालय द्वारा विधायक देवेंद्र यादव को सिर्फ जमानत मिला है तो फिर जश्न कैसा यह सवाल सोशल मीडिया पर लगातार घूम रहा है वहीं इसका दूसरा पहलू यह भी है कि देवेंद्र यादव दोष मुक्त नहीं हुए सिर्फ जमानत मिली परंतु वह दोषी भी सिद्ध नहीं हुए मामला अभी माननीय न्यायालय में विचाराधीन है विचाराधीन मामले पर दोषी करार किया जाना भी कहीं ना कहीं न्यायपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप जैसा ही है ऐसे कई मामले पूर्व में सामने आ चुके हैं जिसमें सालों बाद हुए फैसले में कई आरोपी दोष मुक्त हुए हैं तो कई आरोपी दोषी सिद्ध हुए .
भारतीय संविधान में न्यायपालिका की व्यवस्था है जिसमें आरोपी तब तक मुजरिम नहीं कहलाता जब तक माननीय न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी करार नहीं दिया जाता और ना ही उन्हें दोष मुक्त कहा जाता जब तक माननीय न्यायालय में मामला विचाराधीन होता है दोष मुक्त और दोषी दो शब्दों में जमीन आसमान का फर्क है किसी व्यक्ति के ऊपर कोई मामला विचाराधीन है ना उसे दोष मुक्त कहा जा सकता और ना ही दोषी कहा जा सकता है माननीय न्यायालय के फैसले के बाद ही यह सिद्ध होता है कि मुलजिम निर्दोष है या फिर मुजरिम है शब्दों के इस खेल में अब जब की भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव को जमानत मिल गई है ऐसे में विधायक यादव के समर्थकों में उत्साह है और जय संविधान के नारे लगाए जा रहे हैं वहीं विपक्ष इस जश्न को दिखावा बता रहा है और फिर से जेल जाने की बात कही जा रही मतलब कि खूब राजनितिक होना भी एक अहम् हिस्सा होता जा रहा है .
माननीय न्यायालय के विचाराधीन मामले में टिप्पणी किया जा रहा है जमानत पर छूटा व्यक्ति तब तक मुक्त नहीं हो सकता जब तक माननीय न्यायालय से उसे दोष मुक्त सिद्ध ना करे . दोष मुक्त और दोषी ,मुजरिम और मुलजिम ,विचाराधीन ,जमानत इन कानूनी शब्दों का संविधान में और न्यायपालिका में महत्वपूर्ण स्थान है परंतु वर्तमान समय में सोशल मीडिया में महा ज्ञानियों की कहीं कमी नहीं ऐसे में एक पक्ष जमानत पर ऐसी खुशियां मना रहा जैसे कि माननीय न्यायालय ने जमानत ना देकर दोष मुक्त कर दिया हो वही दूसरा पक्ष जमानत के बाद खुशियों को बेमानी बताकर ऐसी टिप्पणियों की भरमार कर दी जैसे मुलजिम ना होकर मुजरिम हो .
यह सत्य है कि भारत के लंबे इतिहास में प्रशासनिक कार्यालय (जिलाधीश कार्यालय) पर कभी आगजनी का मामला सामने नहीं आया यह पहली ऐसी घटना है जब किसी कलेक्टर कार्यालय पर आगजनी हुई हो . मामला बेहद गंभीर है और आगजनी में शामिल व्यक्तियों को माननीय न्यायालय द्वारा ऐसी सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए जो कि एक ऐसी मिसाल बने की भविष्य में कभी कोई शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की ना सोच सके भारतीय न्यायपालिका को सुस्त कहा जाता है परंतु इसका दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत का नागरिक (गरीब से लेकर आमिर ) आज भी न्याय के लिए इस न्याय के मंदिर पर ही भरोसा करता है और न्याय की उम्मीद में आज भी लाखों करोड़ों लोग न्यायालय की तरफ रुख करते हैं ताकि उन्हें इंसाफ मिल सके देर से ही सही किंतु न्यायपालिका के मंदिर से न्याय जरूर मिलता है और दोषी को सजा . बलोदा बाजार हिंसा मामले में भी आने वाले समय में यही देखने को मिलेगा की न्यायपालिका ने दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी और निर्दोषों को दोष मुक्त किया जिसका इंतजार प्रशासन ,राजनीति के लोगों सहित प्रदेश एवं देश की आम जनता को भी है और यह इंतजार भविष्य में फैसले के साथ ही पूर्ण होगी .क्योंकि न्याय के मंदिर से सिर्फ न्याय ही मिलता है जिनका विश्वास सभी को है और इसके फैसले सभी को मंजूर होते हैं
क्या है बलौदाबाजार हिंसा: बलौदाबाजार जिले के महकोनी गांव में 15 और 16 मई की दरमियानी रात अमर गुफा में धार्मिक चिन्ह को नुकसान पहुंचाने के बाद समुदाय विशेष का गुस्सा फूट गया. इस मामले में पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया. लेकिन समाज के लोग इससे संतुष्ट नहीं हुए और सीबीआई जांच की मांग की. इसी घटना को लेकर 10 जून को बलौदाबाजार के दशहरा मैदान में सभा की गई. जिसमें प्रदेशभर के समाज के लोग पहुंचे. सभा के बाद आक्रामक भीड़ ने बलौदाबाजार एसपी और कलेक्ट्रेट कार्यालय में आग लगा दी. कई गाडिय़ां फूंक दी गई. इस सभा में भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव भी पहुंचे थे. जिससे उन पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगा.
17 अगस्त को हुई थी देवेंद्र यादव की गिरफ्तारी: कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव की 17 अगस्त को गिरफ्तारी हुई थी. उन्हें भिलाई में उनके घर से गिरफ्तार किया गया था. उसके बाद 17 अगस्त की रात को ही बलौदाबाजार कोर्ट में पेशी हुई. देवेंद्र यादव की दूसरी पेशी 20 अगस्त को हुई. उसके बाद बलौदाबाजार कोर्ट में तीसरी पेशी 27 अगस्त को हुई. 3 सितंबर को चौथी पेशी हुई. 9 सितंबर को पांचवीं पेशी हुई. 17 सितंबर को उनकी छठवीं पेशी बलौदाबाजार कोर्ट में हुई. इसके बाद कई पेशी होने के बाद विधायक देवेंद्र यादव जमानत याचिका के लिए अपील की. लेकिन बलौदाबाजार सीजेएम कोर्ट, जिला सत्र न्यायालय बलौदाबाजार और हाईकोर्ट बिलासपुर से उनकी जमानत याचिका खारिज हो गई. जिसके बाद विधायक ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका लगाई. जिस पर कोर्ट ने 20 फरवरी की तारीख सुनवाई के लिए तय की . 20 फरवरी को भिलाई नगर विधायक देवेन्द्र यादव को जमानत मिली .
न्यायपालिका पर विश्वास : जमानत मिलने के बाद विधायक देवेन्द्र यादव ने कहा कि उन्हें न्याय पालिका पर पूरा विश्वास है और उन्हें न्याय जरुर मिलेगा जिसका सीधा अर्थ है कि न्याय पालिका के फैसले चाहे जो भी हो उन्हें स्वीकार्य है . ऐसे में वर्तमान समय में दोषी /दोषमुक्त जैसे शब्द के कोई मायने नहीं होते . न्यायालय के आदेश ही सर्वोपरि है और न्याय के लिए जंग पक्ष और विपक्ष कर रहे है जो फैसला होगा वह सभी को मान्य होगा .
निजी विचार - लेख (शरद पंसारी संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
