August 03, 2026
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    “दो बार जिताया, फिर भी खाली हाथ दुर्ग:क्या सांसद सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित रह गए हैं?”

    • rounak group

    मतदान का प्रतिफल या मौन की सजा?
    दुर्ग विधानसभा और सांसद विजय बघेल की राजनीतिक जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल

    शौर्यपथ राजनैतिक / लोकतंत्र में मतदाता की सबसे बड़ी ताकत उसका मत होता है। यही मत किसी व्यक्ति को जनप्रतिनिधि बनाता है और वही मत उससे जवाबदेही की अपेक्षा भी करता है। किंतु जब यह मत विकास के बजाय उपेक्षा में बदल जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के मतदाता आज ठीक ऐसे ही सवालों के बीच खड़े हैं।
    दुर्ग विधानसभा की जनता ने लोकसभा चुनावों में सांसद के रूप में विजय बघेल को न सिर्फ एक बार, बल्कि दो बार अपना बहुमूल्य मत देकर संसद तक पहुंचाया। वर्ष 2019 में रिकॉर्ड मतों से जीत दिलाने में दुर्ग विधानसभा की भूमिका निर्णायक रही। तब यह उम्मीद जगी थी कि दुर्ग शहर और विधानसभा क्षेत्र को एक ऐसा सांसद मिलेगा, जो केंद्र में अपनी मजबूत उपस्थिति के माध्यम से क्षेत्र के विकास को नई दिशा देगा।
    परंतु 2019 से 2024 तक के पूरे कार्यकाल में दुर्ग विधानसभा क्षेत्र में सांसद के रूप में विजय बघेल की कोई ठोस, दूरगामी या पहचान बनाने वाली पहल सामने नहीं आई। कुछ सीमित व्यक्तिगत या चुनिंदा लाभार्थियों तक सिमटे कार्यों को छोड़ दें, तो दुर्ग विधानसभा के लिए ऐसा कोई विकास कार्य नहीं दिखता जिसे सांसद की उपलब्धि के रूप में गिनाया जा सके।
    इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में दुर्ग की जनता ने एक बार फिर विजय बघेल को मौका दिया। यह निर्णय सांसद के व्यक्तिगत कार्यों से अधिक केंद्र में नरेंद्र मोदी को पुनः प्रधानमंत्री बनाने की भावना से प्रेरित माना गया। छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से केवल दो—दुर्ग और राजनांदगांव—में ही पुराने सांसद दोबारा चुने गए। राजनांदगांव में सांसद संतोष पांडे के कार्यों की चर्चा होती है, लेकिन दुर्ग में विजय बघेल के दूसरे कार्यकाल के डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद भी दुर्ग विधानसभा की ओर कोई उल्लेखनीय विकास पहल दिखाई नहीं देती।
    आज दुर्ग शहर में यह चर्चा आम हो चली है कि जनता ने सांसद को नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर वोट दिया। यह चर्चा केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत का प्रतिबिंब बनती जा रही है। यदि सांसद के छह-साढ़े छह वर्षों के कार्यकाल को देखा जाए, तो ऐसा कोई “मील का पत्थर” नजर नहीं आता जो दुर्ग शहर के विकास की दिशा और दशा बदलने वाला हो।
    ऐसे में एक बड़ा और गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—क्या आज सांसदों का अस्तित्व केवल प्रधानमंत्री के नाम तक सीमित रह गया है? क्या क्षेत्रीय विकास, स्थानीय समस्याएं और जनता की अपेक्षाएं केवल चुनावी घोषणाओं तक सिमट कर रह गई हैं?
    दुर्ग विधानसभा की जनता अब यह महसूस करने लगी है कि उनका मत विकास का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने का साधन भर बन गया है। चुनाव के समय किए गए वादे, चुनाव परिणाम के बाद स्मृति से ओझल होते दिख रहे हैं। यही कारण है कि “मतदान की सजा” जैसी भावना आज दुर्ग विधानसभा के मतदाताओं के बीच जन्म ले रही है।
    लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन भावनाओं से नहीं, कार्यों से होता है। दुर्ग विधानसभा क्षेत्र आज सांसद विजय बघेल से सवाल पूछ रहा है—क्या दो बार दिया गया जनादेश केवल चुनाव जीतने के लिए था, या क्षेत्र के समग्र विकास के लिए भी?
    यदि इन सवालों के उत्तर समय रहते नहीं मिले, तो यह असंतोष आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श की दिशा ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की परिभाषा भी तय करेगा। दुर्ग विधानसभा की जनता अब मौन नहीं, बल्कि उत्तर चाहती है।

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