August 04, 2026
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    चाय का कप, सत्ता की चुस्की और प्रशासन का स्वाद

    • rounak group

    व्यंगात्मक लेख

    दुर्ग। नगर पालिका निगम में इन दिनों विकास, स्वच्छता या जनसमस्याओं की नहीं, बल्कि "चाय पहले क्यों नहीं आई" जैसे गूढ़ प्रशासनिक मुद्दे की चर्चा जोरों पर है। बताया जा रहा है कि मात्र चाय समय पर न पहुँचने की ‘गंभीर चूक’ पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को निलंबन और ट्रांसफर की धमकी दे दी गई। कर्मचारी भले निलंबित न हुआ हो, पर उसकी कुर्सी ज़रूर खिसका दी गई—और यही साबित करता है कि चाय हल्की हो सकती है, पर सत्ता की चुस्की भारी होती है।

    नगर निगम में यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल ही में आयुक्त द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों से घरेलू कार्य कराए जाने का मामला जब अदालत की दहलीज़ तक पहुँचा, तब प्रदेश भर में बहस छिड़ी। अब उसी बहस की आँच में यह पुराना किस्सा फिर से उबल पड़ा है—इस बार चाय के उबाल के साथ।

    व्यंग्य यह है कि पाँच साल के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि यदि चाय के कप से ही प्रशासनिक ताकत का प्रदर्शन करने लगें, तो शहर की दशा-दिशा का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं। सवाल यह नहीं कि चाय पहले क्यों नहीं आई, सवाल यह है कि अहंकार पहले क्यों आ गया?

    नैतिकता की किताब में शायद यह अध्याय नहीं मिलता कि किसी चपरासी को ‘मेरी चाय’ के नाम पर धमकाया जाए। पर निगम की अनकही पाठ्यक्रम में यह अध्याय पढ़ाया जा रहा है—जहाँ हँसी-मज़ाक में कहा जाता है, “काम कर दे, नहीं तो नौकरी से निकलवा दूँगा।” मज़ाक की आड़ में यह वाक्य, कर्मचारियों के लिए डर का स्थायी पोस्टर बन जाता है।

    चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी वैसे ही सत्ता के गलियारों में सहमे रहते हैं। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि अपने कार्यकाल को चाय-ट्रांसफर मॉडल से चलाएँ, तो प्रशासनिक अनुशासन नहीं, तानाशाही की सुगंध आती है—भले ही कप में इलायची पड़ी हो।

    जिस कर्मचारी का ट्रांसफर हुआ, उसने प्रतिरोध नहीं किया। चुपचाप नई जगह काम संभाल लिया। शायद इसलिए कि उसे मालूम था—यह शहर है, यहाँ चाय ठंडी हो सकती है, पर सत्ता का मिज़ाज नहीं।

    आज जब निगम और कर्मचारी के बीच के मामले अदालत तक पहुँच चुके हैं, तब यह किस्सा फिर से हँसी-मज़ाक में उछाला जा रहा है। पर हँसी के पीछे जो कड़वाहट है, वह यह सवाल छोड़ जाती है—

    अगर चाय के लिए धमकी है, तो शहर के लिए क्या?

    व्यंग्य यहीं खत्म होता है, जवाब शहर को देना है।

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