September 28, 2026
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    ई-पॉस का ‘किराए का खेल’: 35 करोड़ की मशीनों पर 140 करोड़ से ज्यादा खर्च! Featured

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    5 साल में सरकारी खजाने से करोड़ों बाहर, 84 हजार से ज्यादा शिकायतें फिर भी सिर्फ ₹27,218 की पेनाल्टी—अब अनुबंध खत्म होने पर खरीद की तैयारी

    रायपुर/दुर्ग। छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इस्तेमाल हो रही ई-पॉस मशीनों का रेंटल मॉडल अब सरकारी खर्च, तकनीकी व्यवस्था और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवालों के केंद्र में है। उपलब्ध आंकड़ों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, करीब 14,085 राशन दुकानों में उपयोग की जा रही मशीनों के लिए पांच वर्ष में ₹140 करोड़ से अधिक भुगतान का अनुमान है। वहीं, मशीनों की सीधी खरीद और डेटा सुविधा सहित कुल लागत करीब ₹35 करोड़ आंकी गई थी। इस अंतर को लेकर लगभग ₹105 करोड़ के अतिरिक्त वित्तीय भार का सवाल उठ रहा है।

    यानी सवाल सिर्फ मशीनों के खराब होने का नहीं, बल्कि यह है कि सरकारी धन से खरीदी जा सकने वाली व्यवस्था को इतने वर्षों तक किराए पर चलाने का आर्थिक औचित्य क्या था?

    ₹1,214 प्रतिमाह प्रति मशीन—किराया चलता रहा, सवाल बढ़ते रहे

    रिपोर्टों के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य नागरिक आपूर्ति निगम ने हैदराबाद की लिंकवेल टेलीसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ पांच वर्ष का अनुबंध किया था। अनुबंध में ई-पॉस मशीन के साथ सॉफ्टवेयर, 4G कनेक्टिविटी और तकनीकी रखरखाव जैसी सेवाएं शामिल थीं।

    प्रारंभिक व्यवस्था में प्रति मशीन ₹1,214 प्रतिमाह किराया निर्धारित होने की बात सामने आई। लगभग 14,085 मशीनों के हिसाब से पांच साल में किराए की रकम करोड़ों में पहुंचना स्वाभाविक था। उपलब्ध गणना के अनुसार चार वर्षों में ही लगभग ₹91.78 करोड़ का भुगतान किया जा चुका था।

    मशीन खराब, सर्वर डाउन और राशन लेने कतार में जनता

    ई-पॉस व्यवस्था का उद्देश्य राशन वितरण को सरल, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाना था। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2022 से अब तक 84 हजार से अधिक शिकायतें दर्ज हुई हैं।

    शिकायतों में मशीन बंद होने, सर्वर डाउन रहने, बायोमीट्रिक अथवा आइरिस स्कैनर काम नहीं करने जैसी समस्याएं शामिल बताई गई हैं।

    सबसे ज्यादा परेशानी उस समय सामने आती है जब तकनीकी खराबी के कारण राशन वितरण प्रभावित होता है। रोज कमाने-खाने वाले मजदूर, बुजुर्ग और जरूरतमंद उपभोक्ता तकनीकी व्यवस्था की समस्या के कारण राशन के लिए इंतजार करने को मजबूर होते हैं।

    सवाल यह है कि जिस तकनीक पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, उसका सबसे जरूरी पैमाना—राशन उपभोक्ता को समय पर राशन मिलना—कितना पूरा हो रहा है?

    14 हजार से ज्यादा मशीनों के लिए करीब 80 इंजीनियर

    रखरखाव व्यवस्था का आंकड़ा भी ध्यान खींचता है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक प्रदेश की लगभग 14,085 ई-पॉस मशीनों के लिए करीब 80 इंजीनियर तैनात हैं।

    इस हिसाब से औसतन एक इंजीनियर के हिस्से में लगभग 176 मशीनों की जिम्मेदारी आती है।

    ऐसे में दूरदराज के किसी राशन केंद्र पर मशीन खराब होने के बाद तत्काल तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है—यह भी जांच का विषय है।

    84 हजार शिकायतों के बीच पेनाल्टी सिर्फ ₹27,218

    मामले का सबसे बड़ा सवाल शिकायतों और दंड के बीच दिखाई देने वाले अंतर को लेकर है।

    उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2024 में कंपनी पर लापरवाही के लिए सिर्फ ₹27,218 की पेनाल्टी लगाई गई।

    एक तरफ हजारों शिकायतों का आंकड़ा और दूसरी तरफ इतनी कम दंड राशि—यह अंतर अपने आप में अनुबंध की सर्विस लेवल शर्तों और पेनाल्टी प्रावधानों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।

    अब पांच साल बाद सरकार को ‘खरीद’ क्यों याद आई?

    पांच वर्षीय अनुबंध अब समाप्ति के चरण में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार विभाग ने आगे इसी रेंटल व्यवस्था को जारी रखने के बजाय ई-पॉस मशीनों की सीधी खरीद पर विचार शुरू किया है।

    यहीं सबसे बड़ा वित्तीय सवाल सामने आता है—

    अगर खरीद मॉडल अब व्यवहारिक और बेहतर विकल्प माना जा रहा है, तो पांच वर्ष पहले इसी विकल्प पर विचार क्यों नहीं किया गया?

    क्या उस समय रेंटल मॉडल के पक्ष में कोई विस्तृत लागत-लाभ अध्ययन किया गया था?

    क्या पांच वर्षों के कुल संभावित खर्च की तुलना मशीन खरीदने की लागत से की गई थी?

    क्या अनुबंध में मशीनों की उपलब्धता, सर्वर अपटाइम और शिकायतों के निपटारे के लिए पर्याप्त दंडात्मक प्रावधान थे?

    अब जरूरी है पूरे मॉडल का ऑडिट

    यह मामला किसी एक कंपनी या किसी एक अधिकारी तक सीमित करने के बजाय पूरे निर्णय-प्रक्रिया और अनुबंध व्यवस्था की जांच का विषय है।

    सरकार को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि—

    पांच वर्षों में ई-पॉस व्यवस्था पर कुल कितना भुगतान हुआ?

    अनुबंध की मूल लागत और अब तक हुए भुगतान में कितना अंतर है?

    मशीनों की खरीद बनाम किराए की व्यवस्था का लागत-लाभ आकलन क्या था?

    84 हजार से अधिक शिकायतों में कितनी शिकायतें समयसीमा में हल हुईं?

    कंपनी पर कुल कितनी पेनाल्टी लगाई गई और कितनी वसूली हुई?

    तकनीकी कर्मचारियों की संख्या अनुबंध के अनुसार कितनी निर्धारित थी?

    4G डेटा, सर्वर और रखरखाव के लिए कंपनी की वास्तविक जिम्मेदारी क्या थी?

    और सबसे महत्वपूर्ण—लगभग ₹105 करोड़ के बताए जा रहे अतिरिक्त वित्तीय भार की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है?

    जनता का राशन, जनता का पैसा—जवाबदेही भी जनता के सामने हो

    PDS कोई सामान्य सरकारी सेवा नहीं है। यह प्रदेश के लाखों परिवारों के भोजन और खाद्य सुरक्षा से सीधे जुड़ी व्यवस्था है।

    इसलिए ई-पॉस मशीनों का मामला सिर्फ ‘किराया बनाम खरीद’ का वित्तीय विवाद नहीं है। यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि तकनीक पर खर्च होने वाले सार्वजनिक धन का लाभ जमीन पर राशन लेने वाले व्यक्ति तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है।

    अब जबकि रेंटल मॉडल समाप्ति की ओर है और सीधी खरीद की तैयारी की बात सामने आ रही है, तो नई व्यवस्था शुरू करने से पहले पिछले पांच वर्षों के खर्च, अनुबंध, शिकायतों, तकनीकी प्रदर्शन और पेनाल्टी की स्वतंत्र वित्तीय एवं प्रशासनिक समीक्षा जरूरी दिखाई देती है।

    क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि नई मशीनें कितने में खरीदी जाएंगी—सवाल यह भी है कि पुरानी व्यवस्था में जनता के पैसे का हिसाब आखिर कौन देगा?

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