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नवागढ़ / शौर्यपथ / धनगांव के तिवारी परिवार में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा में व्यास अमर कृष्ण शास्त्री ने कहाँ की भागवत कथा न केवल जीवन बल्कि मौत भी संवारती है। भागवत कथा हमें भवसागर से अमरत्व की ओर ले जाने का मार्ग बतलाती है। मानव जीवन का लक्ष्य प्राप्त करवाती है, इसलिए जब भी जहां भी अवसर मिले, इसे श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे गले में भी कालरूपी मौत का सर्प पड़ा है। मोह माया में हमें दिखाई नहीं देता। भागवत कथा हमें जगाती है। शास्त्री जी ने कहां की श्रीमद् भागवत कथा के श्रवण से प्राणी के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके अंदर लौकिक और आध्यात्मिक विकास होता है। जहां अन्य युगों में धर्म लाभ प्राप्ति के लिए बहुत कठिन प्रयास किए जाते थे।
आचार्य अमर कृष्ण शास्त्री ने छठवें दिवस भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा गमन, कंस वध एवं रूपमणी विवाह की कथा सुनाई। कंस वध के विषय पर कथावाचक शास्त्री ने कहा कि अधर्म का नाश कर धर्म की रक्षा करने के संकल्प के साथ ही भगवान इस धरती पर अवतरित हुए थे। उन्होंने अपने मामा कंस का वध करके बुराई पर अच्छाई का संदेश दिया। कंस मन का प्रतीक है। आज भी वह प्रत्येक मानव को बुराईयों की ओर ले जा रहा है। इसका प्रमाण है, हमारा वर्तमान समाज, आज समाज में बढ़ता हुआ पाप और भ्रष्टाचार मानव मन की देन है। प्रत्येक मानव अपने स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है फिर वो मार्ग पाप का ही क्यों न हो।इसलिए संतों ने कहा है कि मन शिक्षा से नहीं बल्कि दीक्षा से नियंत्रित होता है। दीक्षा जिसका अर्थ है दिखा देना जब तक मनुष्य वास्तविक धर्म से नहीं जुड़ जाता तब तक उसका मन परिवर्तित नहीं हो सकता है। मनुष्य की मन, बुद्घि और सोच के अनुसार धर्म की अनेक परिभाषाएं है, पर ये परिभाषाएं भी मानव मन को बदलने में असमर्थ है। इसलिए आवश्यकता है श्रीकृष्ण जैसे गुरु की शरण में जाने की वहीं इस मथुरा रुपी देह में ईश्वर का प्रगटीकरण करते है और तभी मन रुपी कंस की समाप्ति होगी। जीव परमात्मा का अंश है इसलिए जीव के अंदर अपारशक्ति रहती है यदि कोई कमी रहती है वह मात्र संकल्प की होती है संकल्प एवं कपट रहित होने से प्रभु उसे निश्चित रूप से पूरा करेंगे।
(रुखमणी विवाह की झांकी ने मोहा मन)
रुखमणी विवाह महोत्सव प्रसंग पर उन्होंने कहा कि रुकमणी के भाई रुकमि ने उनका विवाह शिशुपाल के साथ सुनिश्चित किया था लेकिन रुक्मणी ने संकल्प लिया था कि वह शिशुपाल को नहीं केवल गोपाल को पति के रूप में वरण करेंगे उन्होंने कहा शिशुपाल असत्य मार्गी है और द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण सत्य मार्गी है इसलिए वो असत्य को नहीं सत्य को अपनाएगी । अंततः भगवान श्री द्वारकाधीश जी ने रुक्मणी के सत्य संकल्प को पूर्ण किया और उन्हें पत्नी के रूप में वरण करके प्रधान पटरानी का स्थान दिया। रुक्मणी विवाह प्रसंग पर आगे शास्त्री ने कहा कि जो भक्त व प्रेमी इस प्रसंग को श्रद्घा के साथ श्रवण करने एवं कृष्ण रुकमणी विवाह में शामिल होने से कन्याओं को अच्छे घर और वर की प्राप्ति होती है उनकी वैवाहिक समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और दांपत्य जीवन सुखद रहता है। श्रीकृष्ण एवं रुकमणी विवाह की झांकी ने सभी को खूब आनंदित किया। आयोजक परिवार के हरिओम तिवारी ने बताया कि दोपहर 2 बजे से शाम 7 बजे तक कथा का समय है 10 फरवरी को सुदामा परीक्षित मोक्ष एवम 11 फरवरी को तुलसी वर्षा हवन कथा विश्राम दिवस होगा।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
