August 03, 2026
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    “वादे गटर में, व्यंजन प्लेट में — दुर्ग की जनता पूछ रही: यही था सुशासन?” Featured

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    दुर्ग | शौर्यपथ

    दुर्ग नगर पालिक निगम क्षेत्र इन दिनों किसी विकासशील शहर जैसा नहीं, बल्कि “उपेक्षित नगर” की प्रयोगशाला जैसा प्रतीत हो रहा है। बदबूदार पानी, अवैध अतिक्रमण, शासकीय भूमि पर कब्जा, आवारा जानवरों का आतंक, अंधेरे रास्ते और ठप पड़े विकास कार्य—ये सब आज दुर्ग की पहचान बनते जा रहे हैं। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, इन समस्याओं के बीच महापौर मैडम अलका बाघमार पूरी तरह “पार्टी मोड” में नजर आ रही हैं।

    भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में दुर्ग नगर निगम का इतिहास अगर पलटकर देखा जाए, तो वर्तमान कार्यकाल को “आयोजन प्रधान, विकास विहीन” कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। कांग्रेस पार्षद तो छोड़िए, अब भाजपा पार्षद भी अपने-अपने वार्डों में जनता को जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। वार्डवासी बदबूदार पानी पीने को मजबूर हैं, लेकिन नगर सरकार के मुखिया को शहर की बदहाली नहीं, बल्कि आयोजन की सजावट ज्यादा आकर्षित कर रही है।

    चुनाव के समय विकास के जो सुनहरे सपने दिखाए गए थे, वे अब प्रेस विज्ञप्तियों तक सिमट कर रह गए हैं। एमआईसी बैठकों में कागजों पर सैकड़ों करोड़ की योजनाएं जरूर पास हो गईं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि प्रदेश सरकार से फंड लाने के मामले में दुर्ग नगर निगम प्रदेश में सबसे पीछे खड़ा नजर आता है।

    वहीं दूसरी ओर, भोज और पार्टी आयोजन अब महापौर की दिनचर्या का हिस्सा बनते जा रहे हैं। हाल ही में 15 जनवरी को हुए एक आयोजन ने न सिर्फ भाजपा कार्यकर्ताओं बल्कि शहर के पत्रकारों को भी असमंजस में डाल दिया—आयोजन का उद्देश्य क्या था, यह किसी को समझ नहीं आया। हां, इतना जरूर स्पष्ट था कि जब भोजन अच्छा हो और मुफ्त हो, तो भीड़ अपने आप जुट जाती है। अनुमान है कि इस एक आयोजन में लाखों रुपये भोजन पर खर्च हुए होंगे, लेकिन उसी शहर में लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।

    शहर की बदहाल व्यवस्था को आयोजनों के शोर में दबाने की यह कोशिश अगर छवि सुधार का माध्यम है, तो महापौर को यह भी समझना होगा कि जनता अब सवाल पूछने लगी है—हमने आखिर किन वादों पर भरोसा किया था? आज हालात यह हैं कि पार्षद अपने ही वार्ड के विकास कार्यों के लिए दर-दर भटक रहे हैं और नगर सरकार उत्सव मनाने में व्यस्त है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही, तो इसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा प्रत्याशी को भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि शहर की जनता अब भोज से नहीं, बुनियादी सुविधाओं से संतुष्ट होना चाहती है।

    फिलहाल दुर्ग की तस्वीर साफ है—

    शहर बदहाली में है, और महापौर मैडम पार्टी में मस्त।

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