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चार दशकों की साहित्यिक साधना का मिला सम्मान, छत्तीसगढ़ी भाषा और लोक-संस्कृति को समृद्ध करने में रहा महत्वपूर्ण योगदान
एम.ए. छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम के प्रवर्तन में निभाई अहम भूमिका, उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल
भिलाई। छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और लोक-संस्कृति को समृद्ध करने में चार दशकों से अधिक समय तक उल्लेखनीय योगदान देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर प्रतिष्ठित ‘लाला जगदलपुरी साहित्य सम्मान’ (राज्य अलंकरण) से सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। भिलाई इस्पात संयंत्र की प्लेट मिल से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले तथा रिसाली के आशीष नगर निवासी श्री पारकर की साहित्यिक एवं अकादमिक उपलब्धियों को इस सम्मान के माध्यम से विशेष पहचान मिली है।
उच्च शिक्षा में छत्तीसगढ़ी भाषा को स्थापित करने में अहम भूमिका
दुर्गा प्रसाद पारकर ने छत्तीसगढ़ी भाषा को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में स्थान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एम.ए. छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम की शुरुआत के प्रयासों में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद वर्ष 2013 में इसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।
उनका चर्चित उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ साहित्यिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण पहचान रखता है। यह उपन्यास हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग तथा शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर के एम.ए. हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल है।
साहित्य की अनेक विधाओं में किया सृजन
श्री पारकर ने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, व्यंग्य और शोध सहित साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन किया है। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘चिन्हारी’, ‘लोक-संस्कृति’, ‘जस-जंवारा’, ‘मया पीरा के संगवारी’, ‘सुवा’, ‘शिवनाथ’, ‘सुकवा’ और ‘केंवट कुंदरा’ शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यिक विस्तार के लिए उन्होंने हिंदी की चर्चित कृतियों ‘निर्मला’, ‘प्रतिज्ञा’ और ‘लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक’ का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद भी किया है। उनके उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद होने से उनकी रचनाओं को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच मिली है।
पत्रकारिता, शोध और साहित्यिक योगदान को मिली व्यापक पहचान
साहित्यिक लेखन के साथ-साथ उन्होंने ‘लोक मंजरी’ और ‘छत्तीस लोक’ जैसी पत्रिकाओं के संपादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार पत्रों में ‘चिन्हारी’ जैसे नियमित स्तंभों के माध्यम से भी उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकजीवन से जुड़े विषयों को अभिव्यक्ति दी।
उनके साहित्यिक योगदान पर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी किए जा रहे हैं। उन्हें भारत सरकार के ‘राष्ट्रीय साहित्य पुरोधा सम्मान’, संस्कार भारती के कला गुरु सम्मान तथा अमेरिका की संस्था ‘नाचा’ की ओर से भी सम्मानित किया जा चुका है।
दुर्गा प्रसाद पारकर को मिला ‘लाला जगदलपुरी साहित्य सम्मान’ उनकी दीर्घकालीन साहित्यिक साधना और छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति समर्पण की महत्वपूर्ण पहचान है। यह सम्मान छत्तीसगढ़ की भाषा, साहित्य और लोक-सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके योगदान को भी रेखांकित करता है।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
