August 05, 2026
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    धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
    क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

    बिजली बिल देखकर हर परिवार हैरान व परेशान

    भिलाई/शौर्यपथ / एआईसीसी के राष्ट्रीय सचिव व भिलाई नगर विधायक देवेन्द्र यादव ने बिजली बिल में  बढ़ोत्तरी को लेकर प्रदेश सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि, छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव की सरकार का स्मार्ट मीटर,जनता की जेब से अप्रत्याशित टैक्स लेने का पर्याय बन चुकी है। सत्ता में आते ही साय के मंत्रियों ने बड़े जोर शोर के साथ दावा किया था कि, स्मार्ट मीटर से एक्यूरेट बिल आएगा और लोगों को सस्ती बिजली मिलेगी। इससे उपभोक्ताओं को कोई दिक्कत नहीं होगी। उपभोक्ता घर बैठे बिजली बिल का भुगतान आसानी कर पाएंगे, लेकिन लोगों को साय साय सरकार का स्मार्ट मीटर के नाम पर टैरिफ में बढ़ोत्तरी का यह निर्णय, बिल के रूप में ऐसा झटका देगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। बिजली बिल को देखकर आज हर परिवार, हैरान व परेशान है।
      विधायक यादव ने कहा कि, साय सरकार ने चुनाव से पहले लोगों सस्ती बिजली मुहैया कराने के बड़े-बड़े  दावे किए थे और दावे के मुताबिक स्मार्ट मीटर लगाने का कार्य शुरू हुआ और स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली की खपत कम होना चाहिए था; परंतु स्मार्ट मीटर लगने के बाद अधिकतर लोगों के घरों का बिजली बिल हजार रूपये से अधिक आया है। बिजली बिल में तीन से चार गुणा तक वृद्धि हुई है। जुलाई तक जिन घरों का बिजली बिल 200-250 तक आती थी, उन घरों का इस माह 600 रूपये से अधिक बिल आया है। है।इससे लोगों का बजट गड़बड़ा गया है। 200-300 की रोजी मजदूरी करने वाले मेहनतकश लोगों की पूरी कमाई का आधा से अधिक हिस्सा, बिजली बिल भरने में व्यय हो गया है।
       विधायक ने कहा कि, जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, तब हाफ बिजली बिल योजना के तहत 400 यूनिट पर 50फीसदी तक छूट मिलती थी यानी उपभोक्ताओं को केवल 200 यूनिट का बिजली खपत का भुगतान करना पड़ता था। जिसे अब कटौती कर केवल 100यूनिट खपत पर ही छूट दी जा रही है।100 से एक यूनिट भी अधिक खपत हो गई, तो हाफ बिजली बिल योजना का लाभ नहीं मिलेगा। क्या यही साय सरकार का सुशासन है।

    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व का एक महत्वपूर्ण काछनगादी पूजा विधान रविवार को सम्पन्न हुई। जिसमें स्थानीय मिरगान समाज की कुंवारी कन्या काछनदेवी कांटे की झूले पर सवार होकर बस्तर दशहरा पर्व को निर्विघ्न सम्पन्न होने के साथ अपनी अनुमति प्रदान करती हैं। 

    काछनदेवी ने कांटों के झूले में झूलकर दी निर्विघ्न आयोजन की अनुमति

            विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व का प्रमुख विधान काछनगादी रस्म में काछनदेवी ने मिरगान समाज की एक कुमारी कन्या पर सवार होकर, बेल के कांटों से बने झूले में झूलकर दशहरे के निर्विघ्न आयोजन की अनुमति और आशीर्वाद प्रदान किया। काछनदेवी से बस्तर के माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने बस्तर दशहरा के निर्विघ्न आयोजन की अनुमति मांगी। इस अवसर पर वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद एवं अध्यक्ष बस्तर दशहरा समिति महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण देव, महापौर संजय पांडे, अन्य जनप्रतिनिधियों सहित बस्तर दशहरा पर्व के परम्परागत सदस्य मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, मेंबर-मेंबरिन सहित कलेक्टर हरिस एस, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा, अपर कलेक्टर सीपी बघेल और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

    काछनगादी रस्म का महत्व

    ​बस्तर दशहरे में यह रस्म अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बिना बस्तर दशहरे की शुरुआत नहीं होती। मान्यता है किरण की देवी काछनदेवी, आश्विन अमावस्या के दिन पनका जाति की एक कुंवारी कन्या के शरीर में प्रवेश करती हैं। यह कन्या, जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है, भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में बेल के कांटों से बने एक विशेष झूले पर लेटकर दशहरे के सफल आयोजन की अनुमति देती है। इस वर्ष भी, 10 साल की बच्ची पीहू दास पर सवार देवी ने यह आशीर्वाद दिया। ज्ञात हो कि बस्तर दशहरा पर्व यहां पर सामाजिक समरसता का एक अनुपम उदाहरण है और बस्तर के स्थानीय विभिन्न समाजों के लिए बस्तर दशहरा पर्व में पृथक-पृथक दायित्व बंटे हुए हैं जिसे सभी समाजों के सदस्यों द्वारा पूरी तरह से सहकार की भावना के साथ निर्वहन किया जाता है।

    परंपराओं का पालन

               काछनगादी पूजा विधान के लिए रविवार को सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। काछनगुड़ी को फूलों और रोशनी से सजाया गया था। पुजारी और राज परिवार के सदस्य परंपरानुसार देवी से अनुमति लेने पहुंचे। जैसे ही काछनदेवी ने झूले पर लेटकर अनुमति दी, पूरा क्षेत्र बस्तर की आराध्य देवी मां दन्तेश्वरी के जयकारों और आतिशबाजी से गूंज उठा। इस दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालुगण इस अद्भुत दृश्य के साक्षी बने।

    गोल बाजार में की गई रैला देवी की पूजा

            काछनगादी पूजा विधान के पश्चात रविवार शाम जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पारंपरिक पूजा विधिवत संपन्न हुई। जिसमें स्थानीय जनप्रतिनिधियों सहित बस्तर दशहरा पर्व के परम्परागत सदस्य मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, मेंबर-मेंबरिन सहित जिला प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी, गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

       रायपुर / शौर्यपथ / हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (HNLU), रायपुर ने “उभरती हुई कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का न्यायशास्त्रीय प्रभाव: सामाजिक और कानूनी पहलू” विषय पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सम्मेलन का सफल आयोजन किया। इस सम्मेलन में न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, प्रैक्टिशनरों और छात्रों ने एआई से संबंधित नैतिक, कानूनी और सामाजिक चुनौतियों पर विमर्श किया।

    उद्घाटन सत्र
       पूर्व मुख्य न्यायाधीश, उड़ीसा उच्च न्यायालय न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने कहा कि “राज्य और निजी संस्थाएँ अक्सर कानूनी दायरे से परे डेटा एकत्र करती हैं, जिससे ‘डेटा गोपनीयता’ अब मिथक बन चुकी है।” उन्होंने व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा पर जोर देते हुए इसे हथियार की तरह उपयोग करने के अंतरराष्ट्रीय उदाहरण साझा किए।
      एचएनएलयू के कुलपति प्रो. वी.सी. विवेकानंदन ने ‘नियामक शून्यता’, ‘सीमाहीन संचालन’ और ‘रोग तकनीकें’ जैसी चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया और कहा कि ये लोकतंत्र व न्याय प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकती हैं।

    पैनल चर्चा – “अनियंत्रित को नियंत्रित करना”
      इस पैनल में विशेषज्ञों ने सुरक्षित और नैतिक एआई के लिए कानूनी ढाँचे की आवश्यकता पर बल दिया।
     श्री कश्यप कोम्पेला ने AIM-AI ढाँचा प्रस्तुत किया जो एआई जोखिमों की पूर्वानुमान क्षमता रखता है।
     डॉ. ऋषि राज भारद्वाज ने भारत में एआई नियमावली की धीमी प्रगति और मौजूदा आईटी अधिनियम की अपर्याप्तता पर चिंता व्यक्त की।
    डॉ. भावना महादेव ने एआई आधारित सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव के खतरों पर प्रकाश डाला।
    प्रो. होंग शुए ने बौद्धिक संपदा अधिकारों को मानव-केंद्रित बनाए रखने की आवश्यकता बताई।

    तकनीकी सत्र और शोधपत्र
       सम्मेलन में आठ तकनीकी सत्र आयोजित हुए, जिनमें न्यायालय प्रबंधन में एआई, उत्तरदायित्व, नैतिकता और डेटा सुरक्षा जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। कुल 172 शोधपत्रों में से 60 श्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ चयनित की गईं, जिससे छात्रों और शोधकर्ताओं को सार्थक संवाद का अवसर मिला।

    समापन सत्र
      भारत उच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री एन.एस. नप्पिनई ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम की कमियों पर चर्चा की। उन्होंने विशेष रूप से “राइट टू बी फॉरगॉटन” की अनुपस्थिति को उजागर किया और कहा कि “गोपनीयता केवल रहस्य नहीं बल्कि विकल्प का अधिकार है।” नप्पिनई ने यह भी जोड़ा कि मेटावर्स जैसे वर्चुअल अपराधों से निपटने के लिए कानून को लगातार गतिशील होना पड़ेगा।

    आयोजन की रूपरेखा
      इस सम्मेलन का संचालन डॉ. अतुल एस. जायभाये और डॉ. प्रियंका धर ने किया। छात्र समिति ने भी आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई। आयोजन ने न केवल एआई शासन पर विमर्श को दिशा दी बल्कि कानूनी शिक्षा और तकनीकी नैतिकता को भी नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

      रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम पर गंभीर आरोप लगाते हुए सवाल उठाए हैं कि वॉटरमार्क वाले छत्तीसगढ़ी कागज़ से मध्यप्रदेश के लिए लगभग 2 लाख पुस्तकें कैसे छप गईं। उन्होंने इसे बड़ा “कागज़ घोटाला” बताते हुए राज्य सरकार और निगम की जवाबदेही पर प्रश्न चिह्न खड़ा किया।
      धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि इस छपाई हेतु यहाँ करीब 136 टन कागज़ का उपयोग किया गया, जबकि प्रदेश के स्कूलों को 18 लाख नई पुस्तकों की आवश्यकता है — जिनकी छपाई नहीं होने के कारण बच्चों को नवीन पुस्तकें नहीं मिल पाईं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुस्तकें न छपने के कारण शिक्षा विभाग ने 6 लाख पुराने पुस्तकों का वितरण किया है, जिससे बच्चों को उचित अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
      आरोप-प्रत्यारोप की भाषा में धनंजय ने कहा, “भाजपा की सरकार में चोरी आम बात बन चुकी है। अब बच्चों की पुस्तकों के लिए जिस कागज़ पर छत्तीसगढ़ का वॉटरमार्क लगा है, वह कागज़ भी चोरी हो गया। भाजपा का मूल काम कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार बन गया है — प्रदेश के बच्चे पुस्तक के लिए तरस रहे हैं और वही कागज़ मध्यप्रदेश की पुस्तकें छापने में चला गया। क्या यही सुशासन है?”

    कांग्रेस की माँगें और मांगें की विवेचना
      धनंजय सिंह ठाकुर ने तत्काल कदम के रूप में मांग की है कि:
    इस बड़े कागज़ चोरी/छपाई घोटाले की उच्चस्तरीय तथा निष्पक्ष जांच कराई जाए।
    पाठ्य पुस्तक निगम के प्रमुख को तत्काल पद से हटाया जाए।
    प्रदेश के स्कूलों में 18 लाख नई पुस्तकों की तत्काल आपूर्ति सुनिश्चित की जाए और जो भी ज़िम्मेदार हैं उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
    उन्होंने बताया कि यह मामला सिर्फ कागज़ की बर्बादी या गड़बड़ी नहीं, बल्कि बच्चों के शैक्षणिक अधिकार एवं सार्वजनिक निधि के दुरुपयोग का विषय है।
    आगे की स्थिति
      कांग्रेस के इस आरोप के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। मामले की सच्चाई और जिम्मेदारों की पहचान हेतु प्राधिकरण द्वारा त्वरित और पारदर्शी जांच की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

    श्री गंजपारा दुर्गा उत्सव समिति 58वें वर्ष में प्रवेश, नवरात्र पर्व पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम

    दुर्ग / शौर्यपथ / परंपरा का निर्वहन करते हुए श्री गंजपारा दुर्गा उत्सव समिति, पुरानी गंजमंडी गंजपारा दुर्ग इस वर्ष अपना 58वां शारदेय नवरात्र महोत्सव बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मना रही है। विगत 57 वर्षों से लगातार मां जगदम्बा की भव्य प्रतिमा विराजमान कर उत्सव मनाने की परंपरा इस वर्ष भी जारी रहेगी।
      समिति ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए न तो किसी प्रकार का स्टॉल लगाया गया है और न ही किसी को पार्किंग हेतु अधिकृत किया गया है। पार्किंग व्यवस्था पूर्णत: निःशुल्क रहेगी।
    सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला
       इस अवसर पर प्रतिदिन विविध सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होंगे –
    25 सितम्बर (गुरुवार), रात्रि 9:15 बजे से – रायपुर के कलाकार आदित्य सिन्हा नाइट
    26 सितम्बर (शुक्रवार) – सुप्रसिद्ध भजन गायक बंटू भाई सेवक, दिल्ली एवं गौरव दत्त, तिजारा (राजस्थान) द्वारा बाबा खाटूश्याम जी के भजन
    27 सितम्बर (शनिवार), रात्रि 9:15 बजे से – अखिल भारतीय कवि सम्मेलन
      कवि: कुमार मनोज (लखनऊ), अरुण जैमिन (फरीदाबाद), डॉ. अनिल चौबे (बनारस), मोहित शौर्य (गाज़ियाबाद), दीपक दनादन (भोपाल), कृति चौबे (दिल्ली)
    28 सितम्बर (रविवार) – छत्तीसगढ़ी कलाकार कंचन जोशी की विशेष प्रस्तुति
    30 सितम्बर (मंगलवार) – अष्टमी हवन पूजन सुबह 10 बजे से
    2 अक्टूबर (गुरुवार) – माता की महाप्रसादी (भंडारा) सुबह 10:30 बजे से
    3 अक्टूबर (शुक्रवार) – विसर्जन यात्रा सुबह 9:30 बजे से

    आमंत्रण : समिति ने समस्त श्रद्धालुओं एवं नागरिकों से आग्रह किया है कि वे अपने परिवार सहित इन धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में सम्मिलित होकर मां जगदम्बा का आशीर्वाद प्राप्त करें।

    जगदलपुर, शौर्यपथ। धुरवा समाज के नुआखाई मिलन समारोह में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का आत्मीय और वात्सल्यपूर्ण रूप सभी ने देखा। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने धुरवा समाज की नन्हीं बच्ची भूमिका बघेल को स्नेहपूर्वक अपने गोद में बिठाकर दुलार किया और उसे महुआ लड्डू खिलाया।

    जगदलपुर विकासखंड के उलनार निवासी भूमिका बघेल अपने दादा सोनसारी बघेल के साथ कार्यक्रम में पहुंची थी। पारंपरिक पोशाक में सजी-धजी भूमिका ने सभी का मन मोह लिया। मुख्यमंत्री श्री साय ने स्नेहपूर्वक उसका नाम पूछते हुए कहा—"बिटिया, किस कक्षा में पढ़ाई कर रही हो?" मासूम मुस्कान के साथ भूमिका ने उत्तर दिया—"मैं दीप्ति कान्वेंट स्कूल में एलकेजी में पढ़ती हूँ।"

    यह स्नेहिल दृश्य समारोह में उपस्थित सभी लोगों के मन को गहराई तक छू गया। एलकेजी में पढ़ रही भूमिका की निश्छल मुस्कान, पारंपरिक परिधान और मासूम नज़रों की चमक में बस्तर की संस्कृति और उसकी खुशियाँ झलक रही थी।

    मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि यह हर्ष का विषय है कि समाज ने पिछले वर्ष ही अपने बच्चों के लिए कक्षा 12वीं तक की शिक्षा अनिवार्य करने का सराहनीय निर्णय लिया। यही शिक्षा और संस्कार हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य संवारेंगे। उन्होंने कहा कि मैं यही कामना करता हूँ कि भूमिका और छत्तीसगढ़ की हर बेटी खूब पढ़े, आगे बढ़े, उड़ान भरे और अपनी संस्कृति से यूँ ही जुड़ी रहे।

    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जिस आत्मीयता और वात्सल्य से नन्हीं भूमिका बघेल से स्नेहपूर्ण वार्तालाप किया, उसने पूरे समारोह का वातावरण स्नेह और आत्मीयता से परिपूर्ण कर दिया।

    मुख्यमंत्री श्री साय का आत्मीय व्यवहार जनजातीय समाज के साथ उनके गहरे जुड़ाव और बच्चों के प्रति स्नेहपूर्ण हृदय का प्रमाण है। उनकी यह सरलता और अपनापन न केवल लोगों को विश्वास से भरता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि सरकार का नेतृत्व समाज के हर वर्ग और हर बच्चे के सुख-दुख में सहभागी है।

    बस्तर जिला पत्रकार संघ में आयोजित हुआ श्रद्धांजलि सभा का कार्यक्रम

    जगदलपुर, शौर्यपथ । बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार स्व. राजेंद्र बाजपेयी के निधन के उपरांत रविवार को नयापारा स्थित बस्तर जिला पत्रकार संघ भवन में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया।

    कार्यक्रम की शुरुआत स्व. बाजपेयी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इसके पश्चात उपस्थित पत्रकारों ने उनके साथ बिताए संस्मरणों को साझा किया और पत्रकारिता क्षेत्र में उनके योगदान को अनुकरणीय बताया।

    श्रद्धांजलि सभा में अध्यक्ष मनीष गुप्ता, सचिव धर्मेंद्र महापात्र, वरिष्ठ उपाध्यक्ष शिव प्रकाश सीजी, कनिष्ठ उपाध्यक्ष निरंजन दास, कोषाध्यक्ष सुब्बा राव, संयुक्त सचिव बादशाह खान सहित वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कश्यप, गुप्तेश्वर सोनी, अनिल सामंत, संजीव पचौरी, सुनील मिश्रा समेत अनेक पत्रकार शामिल हुए।

    इस अवसर पर अध्यक्ष मनीष गुप्ता ने कहा कि "बस्तर की पत्रकारिता में स्व. राजेंद्र बाजपेयी का योगदान अविस्मरणीय है। संघ इस दुख की घड़ी में बाजपेयी परिवार के साथ खड़ा है।"

    कार्यक्रम के अंत में सचिव धर्मेंद्र महापात्र ने जानकारी दी कि स्व. राजेंद्र बाजपेयी की तेरहवीं एवं शांतिभोज का आयोजन आगामी 1 अक्टूबर को पत्रकार संघ भवन परिसर में किया जाएगा।

    साभार  - श्री शिवराज सिंह चौहान
    शौर्यपथ लेख / भारतीय राजनीति में नरेन्‍द्र मोदी के उदय को विशेषाधिकार के पारंपरिक लेंस से नहीं समझा जा सकता। राजनीतिक वंशों में पले-बढ़े अनेक नेताओं के विपरीत, मोदी और उनकी नेतृत्व शैली ज़मीन से उभरी है, जिसने उनके संघर्ष, वर्षों से ज़मीनी स्तर पर किए गए कार्यों और सरकार के विभिन्न स्तरों पर प्राप्‍त व्‍यवहारिक अनुभवों से आकार लिया है। उनका करियर मात्र एक व्यक्ति के उत्थान को ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि यह भारत में अभिजात वर्ग द्वारा संचालित राजनीति की नींव के लिए एक चुनौती भी है।
      वडनगर के एक साधारण परिवार में जन्मे मोदी का बचपन ज़िम्मेदारी और सादगी से भरपूर रहा। बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए चैरिटी स्टॉल लगाने से लेकर स्कूली छात्र के रूप में जातिगत भेदभाव पर आधारित नाटक लिखने तक, उन्होंने अल्‍पायु में ही संगठनात्मक कौशल और सामाजिक सरोकार का अद्भुत मिश्रण प्रदर्शित किया। उन्होंने वंचित सहपाठियों के लिए पुरानी किताबें और वर्दियाँ इकट्ठा करने के अभियान भी चलाए, जो इस बात का प्रारंभिक संकेत था कि वह नेतृत्व को किसी विशेषाधिकार के रूप में नहीं, बल्कि सेवा के रूप में देखते हैं। इन छोटे-छोटे प्रयासों ने उनके द्वारा सार्वजनिक जीवन में अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण का पूर्वाभास करा दिया।
       उनकी मूलभूत प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में और भी प्रखर हुईं, जहाँ साधारण कार्यकर्ताओं को ग्रामीणों से घुलने-मिलने, उनके जैसा जीवन व्‍यतीत करने और अपने आचरण के जरिए उनका विश्वास अर्जित करने का प्रशिक्षण दिया जाता था। एक युवा प्रचारक के तौर पर मोदी ने बिल्‍कुल वैसा ही किया। अक्सर बस या स्कूटर से गुजरात भर में यात्रा करते हुए, और भोजन व आश्रय के लिए ग्रामीणों पर निर्भर रहते हुए, उन्होंने साझा कठिनाइयों और संघर्षों के माध्यम से सभी वर्गों का विश्वास अर्जित किया। इस अनुशासन ने उन्हें उन लोगों के रोज़मर्रा के सरोकारों से जुड़े रहने में मदद की, जिनकी वे सेवा करना चाहते थे, और इसी ने उन्हें संकटकाल में संगठित, बड़े पैमाने पर कदम उठाने की आवश्‍यकता पड़ने पर प्रभावी ढंग से नेतृत्व करने के लिए भी तैयार किया।
      ऐसा ही एक संकट 1979 में मच्छू बांध के टूटने से आया था, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए थे। 29 वर्षीय मोदी ने तुरंत स्वयंसेवकों को पालियों में संगठित किया, राहत सामग्री का प्रबंध किया, शवों को निकाला और परिवारों को सांत्वना दी। कुछ साल बाद, गुजरात में सूखे के दौरान, उन्होंने सुखड़ी अभियान का नेतृत्व किया, जो पूरे राज्य में फैल गया और लगभग 25 करोड़ रुपये मूल्‍य का भोजन वितरित किया गया। दोनों ही आपदाओं में, उन्होंने बिल्‍कुल आरंभ से ही बड़े पैमाने पर राहत प्रयास शुरू किए, जिससे उनके उद्देश्य की स्पष्टता, उनके सैन्य-शैली के संगठन और उनका इस आग्रह का परिचय मिला कि नेतृत्व का अर्थ केवल प्रतीकात्मकता नहीं, बल्कि सेवा है।
      इन शुरुआती घटनाओं ने जहाँ एक ओर लोगों को संगठित करने की उनकी क्षमता को परखा, वहीं आपातकाल ने दमन के दौर में उनके साहस की परीक्षा ली। मात्र 25 वर्ष की आयु में, एक सिख के वेश में, उन्होंने पुलिस निगरानी से बचने की कोशिश कर रहे कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच संवाद कायम रखा। इस ज़मीनी नेटवर्क ने क्रूर शासन के विरुद्ध प्रतिरोध को जीवित रखा, जिससे उन्हें एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में ख्याति मिली।
      इन्‍हीं कौशलों का उपयोग जल्द ही चुनावी राजनीति में भी किया गया। भाजपा - गुजरात के संगठन मंत्री के रूप में, उन्होंने पार्टी का विस्तार नए समुदायों तक किया, जिनमें राजनीतिक विमर्श में हाशिए पर पड़े लोग भी शामिल थे। उन्होंने विविध पृष्ठभूमियों के नेताओं को तैयार किया, ज़मीनी स्तर पर समर्थन जुटाया और पूरे गुजरात में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ-अयोध्या रथ यात्रा जैसे बड़े आयोजनों की योजना बनाने में मदद की। बाद में, विभिन्न राज्यों के प्रभारी के रूप में उन्होंने बूथ स्तर तक मज़बूत पार्टी तंत्रों का निर्माण किया।
      साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होने पर उन्होंने ये सबक शासन में लागू किए। उदाहरण के लिए, पदभार ग्रहण करने के चंद घंटे बाद ही उन्होंने साबरमती में नर्मदा का जल लाने के विषय में एक बैठक बुलाकर इस बात का संकेत दिया कि निर्णायक कार्रवाई उनके प्रशासन को परिभाषित करेगी। उनका दृष्टिकोण शासन को एक जन आंदोलन बनाना था, जहाँ प्रवेशोत्सव ने स्कूलों में नामांकन को प्रोत्साहित किया, कन्या केलवणी ने बालिकाओं की शिक्षा का समर्थन किया, गरीब कल्याण मेलों ने कल्याण को नागरिकों तक पहुँचाया, और कृषि रथ ने कृषि सहायता को किसानों के खेतों तक पहुँचाया। नौकरशाहों को दफ्तरों से निकालकर कस्बों और गाँवों तक भेजा गया। उनका मानना है कि शासन लोगों तक वहाँ पहुँचे जहाँ वे रहते हैं, न कि केवल मीटिंग कक्षों तक सीमित रहे।
      उनके प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद गुजरात में किए गए प्रयोग राष्ट्रीय आदर्श बन गए। स्वच्छता अभियानों के उनके अनुभव ने स्वच्छ भारत मिशन का रूप लिया, जहाँ उन्होंने प्रतीकात्मकता को सामूहिक कार्रवाई में बदलने के लिए स्वयं झाड़ू उठाई। डिजिटल इंडिया, जन-धन योजना और अन्य पहल शीर्ष से शुरू किए गए कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि जमीनी स्तर पर बिताए उनके वर्षों से प्राप्त सीखों पर आधारित जन-आंदोलन थे। इन्‍होंने जन-भागीदारी के उनके दर्शन को मूर्त रूप दिया, जहाँ शासन तभी कारगर होता है, जब नागरिक निष्क्रिय प्राप्तकर्ता न बने रहकर, स्‍वयं भागीदार बनें। मोदी जैसे नेता और जनता के बीच दशकों से विकसित इसी विश्वास ने आज के भारत में नीति को साझेदारी में बदल दिया है।
      दशकों से, मोदी बैठकों में होने वाली बहसों से नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर जीवंत संपर्क की बदौलत लोगों की ज़रूरतों को समझने और उन्हें पूरा करने के तरीकों को जानने की दुर्लभ सहज प्रवृत्ति प्रदर्शित करते आए हैं। यह प्रवृत्ति कठोर प्रशासनिक अनुभव के साथ मिलकर उनकी राजनीति को परिभाषित करती है।
      मूलभूत रूप से, उनके जीवन और नेतृत्व ने भारतीय राजनीति के केवल अभिजात वर्ग से संबद्ध होने की धारणा को नए सिरे से परिभाषित किया है। वह योग्यता और परिश्रम का प्रतीक बन चुके हैं तथा वह शासन को जनसाधारण के और करीब ले आए हैं। उनकी राजनीतिक शक्ति सत्ता को जनता से जोड़ने में निहित है। ऐसा करके, उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नया रूप दिया है, जो आम नागरिक के संघर्षों और भावनाओं पर आधारित है।

     

    प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना से सपना हुआ साकार

    जिंदगी में आया बदलाव, योजना बनी उम्मीद की नई किरण

    रायपुर / शौर्यपथ /

    प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत भारत का हर घर ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा और इसका फायदा भारत को होगा। इस योजना के वजह से  रोजगार के अवसर भी ज्यादा बढ़ेंगे और इसकी वजह से नई नौकरियां भी निकलेगी। पीएम सूर्य घर योजना के तहत जिस घर में सोलर पैनल लगाए जाएंगे, उस घर की बिजली 24 घंटे रहेगी । इस घर में बिजली की कोई भी कटौती नहीं होगी।  प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना ने रायगढ़ के कृष्णा वाटिका निवासी रामेश्वर सिंह के जीवन में बड़ा बदलाव ला दिया है। जहाँ पहले उन्हें हर माह 3,000 रुपए से अधिक का बिजली बिल चुकाना पड़ता था, वहीं अब उनके घर का बिजली खर्च लगभग शून्य हो गया है। 

    पीएम सूर्य घर योजना के लिए सब्सिडी का प्रावधान
    मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखने वाले रामेश्वर सिंह के लिए बिजली का बढ़ता खर्च हमेशा चिंता का कारण था। गर्मी के दिनों में कूलर और पंखों की अधिक खपत से बिजली बिल 3,000 रुपए से ऊपर पहुँच जाता था, जिससे उनके घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता था। इसी बीच उन्हें प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के बारे में पता चला। इस योजना के तहत शासन छत पर सोलर पैनल लगाने के लिए आकर्षक सब्सिडी दे रही है। उन्होंने बताया कि एक किलोवाट सोलर प्लांट पर 45 हजार, 2 किलोवाट पर 90 हजार और 3 किलोवाट पर एक लाख 8 हजार रुपए की अनुदान राशि दी जा रही है।  यह जानकारी उनके लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आई और उन्होंने तुरंत इस योजना के लिए आवेदन किया।

    बिजली विभाग पर निर्भर नहीं रहकर पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो गया
    आवेदन के बाद टीम ने रामेश्वर सिंह के घर का निरीक्षण किया, बिजली की खपत का आकलन किया और उनकी ज़रूरत के हिसाब से सोलर सिस्टम लगाने की सलाह दी। सरकारी सब्सिडी और आसान प्रक्रिया के कारण कुछ ही हफ्तों में उनके घर की छत पर सोलर पैनल लग गए। यह सोलर पैनल रामेश्वर सिंह के लिए गेम-चेंजर साबित हुआ। जहां पहले हर महीने बिजली का बिल 3,000 रुपए से ज़्यादा आता था, अब यह खर्च लगभग शून्य हो गया है। इस बचत का उपयोग वे अब अपने परिवार की अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर पा रहे हैं। रामेश्वर सिंह अब बिजली विभाग पर निर्भर नहीं हैं और पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो गए हैं। उनके घर की छत पर लगे ये सोलर पैनल न केवल उनकी बिजली की जरूरतें पूरी कर रहे हैं, बल्कि स्वच्छ और अक्षय ऊर्जा का उपयोग करके वे पर्यावरण संरक्षण में भी अपना योगदान दे रहे हैं।

    रामेश्वर सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुक्त बिजली योजना ने हमारे जीवन की सबसे बड़ी चिंता को खत्म कर दिया। अब हम बिना किसी परेशानी के बिजली का उपयोग कर रहे हैं और पर्यावरण की रक्षा में भी सहयोग दे रहे हैं। रामेश्वर सिंह की यह कहानी इस बात का एक और उदाहरण है कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना कैसे लोगों को बिजली के भारी-भरकम बिल से राहत देकर उन्हें आत्मनिर्भर और पर्यावरण-हितैषी बनने में मदद कर रही है। यह योजना कई जिंदगियों में बड़ा बदलाव ला रही है।

     

    रायपुर / शौर्यपथ /

    साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता का सपना था कि वह बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाए और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारें। महिला ग्राम संगठन से जुड़कर उन्हें बैंक लिंकेज, समूह से 50 हजार रुपए और पीएम मुद्रा लोन से 1 लाख रुपए का सहयोग मिला। इस राशि से बकरी पालन शुरू करते हुए उन्होंने आर्थिक मजबूती की नई राह पकड़ी।

        सरकार की योजनाओं ने महिलाओं की जिंदगी बदलने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई है। जशपुर जिले के दुलदुला ब्लॉक के ग्राम छेड़डाड़ की श्रीमती सविता रजक इसकी उत्कृष्ट मिसाल हैं। बिहान योजना और पीएम मुद्रा लोन के सहारे उन्होंने बकरी पालन का व्यवसाय शुरू किया और आज अपने पैरों पर खड़ी होकर आत्मनिर्भर बनकर गांव की अन्य महिलाओं का हौसला बढ़ा रही हैं।

        वर्तमान में सविता को बकरी पालन से हर माह लगभग 10 हजार रुपए की आय हो रही है। वह इस आय से बच्चों की पढ़ाई और घर-परिवार की जरूरतें पूरी कर रही हैं। साथ ही, व्यवसाय को आगे बढ़ाने के प्रयास भी कर रही हैं। सविता को अन्य योजनाओं का भी लाभ मिला है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से रसोई गैस, प्रधानमंत्री आवास योजना से पक्का घर और महतारी वंदन योजना के तहत प्रतिमाह 1,000 रुपए की आर्थिक मदद उनके जीवन स्तर में सुधार लाई है। आज सविता का परिवार खुशहाल है। बच्चों की पढ़ाई निर्बाध चल रही है। रसोई में गैस चुल्हे के माध्यम से खाना बनाना आसान हो गया है, और लकड़ी के झंझट से मुक्ति मिली है। प्रधानमंत्री आवास योजना से पक्के घर की सुरक्षा है और महीने की एकमुश्त सहायता उनके आत्मविश्वास को मजबूती देती है। उनका कहना है कि बिहान योजना और पीएम मुद्रा लोन से मिला सहयोग उनके जीवन को नई दिशा देने वाला साबित हुआ। महिलाएँ सिर्फ घर तक सीमित रहने वाली नहीं, वे अपने परिवार और समाज की अर्थव्यवस्था बदल सकती हैं।

        मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्य सरकार के प्रति आभार जताते हुए उन्होंने कहा कि इन योजनाओं ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया। आज सविता रजक न केवल अपने परिवार की जिम्मेदारी मजबूती से निभा रही हैं, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणास्त्रोत बन गई हैं।

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