August 05, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    धर्म संसार / शौर्यपथ / निर्जला एकादशी के बाद और देवशयनी एकादशी से पहले आषाढ़ माह में कृष्ण पक्ष के दौरान योगिनी एकादशी आती है। इस एकादशी पर भगवान श्री हरि की श्रद्धापूर्वक आराधना करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। इस एकादशी के व्रत का उतना ही महत्व है जितना 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने का होता है। इस व्रत के प्रभाव से किसी के दिए हुए श्राप का निवारण हो जाता है। यह एकादशी रोगों को दूर कर सुंदर रूप, गुण और यश प्रदान करती है।

    यह एकादशी प्रायश्चित के लिए विशेष मानी जाती है। इस दिन श्री हरि का ध्यान करें। प्रातः काल स्नान कर सूर्य देवता को जल अर्पित करें। भगवान विष्णु को पीले फूल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करें। इस व्रत में जौ, गेहूं और मूंग की दाल से बना भोजन ग्रहण न करें। नमक युक्त भोजन न करें। दशमी तिथि की रात्रि में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। यह व्रत दशमी तिथि की रात्रि से शुरू होकर द्वादशी तिथि में प्रात: काल में दान कर्म के बाद संपन्न होता है। इस व्रत में रात्रि में जागरण अवश्य करना चाहिए। योगिनी एकादशी का व्रत करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत में पीपल के वृक्ष की पूजा अवश्य करें।

     

    खेल /शौर्यपथ / ''मेरे क्रिकेट करियर में सौरव गांगुली की भूमिका सबसे बड़ी थी। एक समय में मैं ऐसे मोड़ पर था, जब मुझे समझ नहीं आता था कि कौन मेरे साथ है, क्योंकि लोग मेरे सामने कुछ कहते थे और पीछे कुछ।''

    हरभजन सिंह अपने करियर में कई कप्तानों के साथ खेले हैं। दिग्गज ऑफ स्पिनर हरभजन ने मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी में डेब्यू किया। वह सौरव गांगुली के नेतृत्व में टीम के नियमित सदस्य बने। हरभजन 2007 के टी-20 वर्ल्ड कप और 2011 के विश्व कप में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में सदस्य रहे। 2007 के वनडे विश्व कप में राहुल द्रविड़ की कप्तानी में टीम इंडिया पहले ही चरण में बाहर हो गई थी। कई कप्तानों के साथ खेलने वाले हरभजन सिंह का कहना है कु उनके करियर में सबसे ज्यादा प्रभाव सौरव गांगुली का रहा है। उन्होंने ही मुझे गेंदबाजी की छूट दी और निडर स्पिनर बनाया।

    हरभजन सिंह इंडियन प्रीमियर लीग में अनिल कुंबले, विराट कोहली और रोहित शर्मा की कप्तानी में भी खेले। हरभजन पर किस कप्तान का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा? जब उनसे यह पूछा गया तो 39 साल के भज्जी ने सौरव गांगुली का नाम लिया।

    भज्जी ने आकाश चोपड़ा के साथ एक यूट्यूब चैनल पर कहा, ''मेरे क्रिकेट करियर में सौरव गांगुली की भूमिका सबसे बड़ी थी। एक समय में मैं ऐसे मोड़ पर था, जब मुझे समझ नहीं आता था कि कौन मेरे साथ है, क्योंकि लोग मेरे सामने कुछ कहते थे और पीछे कुछ।''

    उन्होंने आगे कहा, ''लेकिन सौरव गांगुली ने उस वक्त मेरा समर्थन किया, जब मेरे पास किसी का समर्थन नहीं था।'' हरभजन ने आकाश चोपड़ा के आकाशवाणी प्रोग्राम में बातचीत के दौरान कहा, ''चयनकर्ता मेरे खिलाफ थे। उन्होंने बहुत-सी बातें मेरे सामने कीं, जिन्हें मैं नहीं बता सकता। मेरे लिए गांगुली की तारीफ के लिए शब्द नहीं हैं। यदि वह कप्तान न होते तो मैं कह नहीं सकता कि दूसरा कप्तान मुझे सपोर्ट करता या नहीं।''

    हरभजन ने कहा, ''अगर सौरव गांगुली नहीं होते तो मैं कभी 100 टेस्ट नहीं खेल पाता।'' हरभजन ने कहा, ''गांगुली हमेशा गेंदबाजों के साथ खड़े रहे। वह गेंदबाजों को मर्जी से गेंदबाजी की छूट देती थे।'' उन्होंने कहा, ''यदि आप कैच पकड़ने के लिए 4-5 फील्डर सामने चाहते हैं तो गांगुली वही करते थे। कभी-कभी वह वनडे में 6-7 ओवर फिंकवाते। मैं उनका शुक्रिया अदा करते। उन्होंने मुझे एक अच्छे गेंदबाज के रूप में तैयार किया। उनकी वजह से ही मैं साहसी और भरोसे का निडर स्पिनर बन पाया।''

     

    मनोरंजन /शौर्यपथ / सुशांत स‍िंह राजपूत की आत्‍महत्‍या के बाद बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जहां एक तरफ सुशांत ने सुसाइड से बॉलीवुड सदमे में वहीं नेपोटिज्म को लेकर करण जौहर और खान परिवार को सोशल मीडिया पर टारगेट किया जा रहा है। हाल ही में सुशांत के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए फिल्म निर्देशक अभिनव कश्यप ने सलमान खान के भाई अरबाज खान ,सोहेल खान सहित उनके परिवार पर कई संगीन आरोप लगाए थे। कश्यप ने अपने आरोप में कहा था कि खान परिवार ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दिया है। अब इस मामले पर एक्टर अरबाज खान का रिएक्शन आया है और उन्होंने अपने बयान में अभिनव कश्यप पर लीगल कार्यवाई करने की बात कही है। वहीं

    बॉम्बे टाइम्स से बात करते हुए अरबाज ने कहा कि 'हम उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।' अपनी बात रखते हुए अरबाज ने कहा कि जब से हमने 'दबंग 2' पर काम शुरू किया हमारी अभिनव से कोई बातचीत नहीं हुई है और मैं नहीं जानता ये सब कहां से आ रहा है। इस वजह से अब हम उनके आरोपों का सामना कानूनी रूप से करेंगे।

    जानिए क्या अभिनव ने लिखा था फेसबुक पर

    फेसबुक पोस्ट में अभिनव ने सलमान खान , सोहेल, अरबाज और सलीम खान पर आरोप लगाते हुए लिखा कि 'दबंग' को डायरेक्ट करने के बाद उन्होंने इसलिए 'दबंग 2' का निर्देशन नहीं किया क्योंकि अरबाज और सोहेल खान अपने परिवार के साथ मिलकर मुझे तंग करने लगे थे। श्री अष्टविनायक फिल्म्स के साथ मेरे दूसरे प्रोजेक्ट को भी बर्बाद कर दिया गया। अरबाज ने प्रोडक्शन कंपनी के हेड राज मेहता को फोन करके धमकी दी कि अगर मेरे साथ फिल्म करने की उन्हें सजा भुगतनी पड़ सकती है। मुझे साइनिंग अमाउंट भी लौटाना पड़ा मैंने वेकॉम पिक्चर्स की ओर चल पड़ा। इस बार सोहेल खान ने बीच में तांड अड़ा दिया और वायकॉम के सीईओ विक्रम मल्होत्रा को फोन कर दिया। इसके बाद रिलायंस एंटरटेनमेंट ने ही मेरी मदद की और हमने मिलकर 'बेशरम' को रिलीज किया।

    अभिनव आगे लिखते हैं कि मुझे मेरे दुश्मन ठीक से पता है जो हैं सलीम खान, सलमान खान, अरबाज खान और सोहेल खान, लेकिन इन सब में सलमान सबसे जहरीला है. ये सब अपने पैसे, राजनीतिक पॉवर और अंडरवर्ल्ड कनेक्शन की मदद से लोगों को धमकाते आए हैं। अभिनव अपनी बात को अंत पहुंचाते हुए बताते हैं कि "सुशांत सिंह राजपूत अब आगे बढ़ चुके हैं और जहां भी हैं खुश हैं, लेकिन मैं इस बात का ख्याल रखूंगा कि कोई और मासूम काम की कमी और बॉलीवुड में सम्मान की कमी के कारण इस तरह से खुद की जान न ले।

    अभिनव का दूसरा पोस्ट

    एक दूसरे पोस्ट में अभिनव लिखते हैं कि किसी ने अभी-अभी मेरे ईमेल अकाउंट में लॉग इन करने की कोशिश की । अब यह दिलचस्प हो रहा है... खान इतने परेशान क्यों हो रहे हैं...?? वे क्या छुपा रहे हैं..?? वे मुझे चुप करने के लिए बेताब क्यों हैं..??

     

    मनोरंजन / शौर्यपथ / 'कुमकुम भाग्य' की एक्ट्रेस शिखा सिंह मां बन गई हैं। शिखा ने 16 जून को बेटी को जन्म दिया है। इस खुशखबरी के मिलने के बाद से फैन्स उन्हें बधाई दे रहे हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान शिखा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रही हैं। वह बेबी बंप के साथ अपनी फोटोज शेयर करती थीं। उनके पोस्ट से साफ पता लगता था कि वह मां बनने को लेकर काफी एक्साइटेड हैं।

    बता दें कि टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ इंटरव्यू में शिखा सिंह ने बताया था कि जून में डिलिवरी होनी ड्यू है। उन्होंने कहा था, 'मैं और करण दोनों ही प्लान कर रहे थे कि परिवार को हम लोग यहां मुंबई बुला लेंगे। लेकिन नहीं पता था कि कोरोना वायरस जैसी समस्या सामने आ खड़ी होगी। मैंने प्रोडक्शन हाउस को बता दिया था कि मैं प्रेग्नेंसी के चलते अप्रैल के अंत तक ब्रेक ले लूंगी। प्रोडक्शन हाउस ने भी हामी भर दी थी। लेकिन अब कोविड-19 की वजह से मैं मार्च से ही ब्रेक पर हूं। मेरे पति पायलट हैं और लॉकडाउन की वजह से वह घर पर ही हैं। वरना तो वह ट्रैवल कर रहे होते'।

    शिखा सिंह ने यह भी कहा था कि बेबी होने के बाद वह कुछ महीने सेल्फ-आइसोलेशन में रहेंगी। शिखा कहती हैं कि बेबी के आने के बाद हम लोगों के लिए पूरी तरह से सेल्फ-आइसोलेशन होने वाला है। काम पर वापस जाने से पहले मैं क्वारंटाइन होने वाली हूं। बेबी के साथ मैं बाहर जाने का सोच भी नहीं सकती हूं।

    बता दें कि शिखा ने अपने करियर की शुरुआत ‘लेफ्ट राइट लेफ्ट’ सीरियल से की थी। इसके बाद इन्हें ‘न आना इस देस लाडो’, ‘ससुराल सिमर का’ और ‘लाल इश्क’ में देखा गया था।

     

    नजरिया /शौर्यपथ /भारत-चीन सीमा पर जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। तनाव पचास के दशक में ही शुरू हो गया था। जब पंचशील की बात पंडित नेहरू ने शुरू की थी, तब भी विवाद थे। तभी चीन ने 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन हथिया ली थी। तभी से तनातनी है। यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं कि यह हमारी कूटनीति और राजनीतिक विफलता है, जिसका नतीजा हम भुगत रहे हैं। जब 1950 के दशक में चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई आए थे, उनका भारत में सम्मान किया गया था। उन्होंने तब कहा था, सीमा विवाद सुलझा लेते हैं, लेकिन इस दिशा में भारत की ओर से कार्रवाई नहीं हुई। चाउ एन लाई निराश लौट गए। दोनों देशों के बीच केवल तनाव ही नहीं रहा है, 1962 में युद्ध भी हो चुका है। हम उस लड़ाई के लिए तैयार नहीं थे। उसके बाद चीन ज्यादा आक्रामक हुआ। उसके बाद से ही उसकी नीति भारत को दबाकर रखने की रही। उसने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में भी अपनी जमीन होने का दावा किया है।
    हम चीन के साथ अपनी सीमा को सुलझाने में कामयाब नहीं हो रहे हैं। जहां अभी विवाद हुआ है, वहां चीन के साथ हमारी अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर अपने-अपने दावे हैं, इसलिए आपस में तनाव घटता-बढ़ता रहता है। ताजा हिंसा पीछे हटते और कब्जा लेते हुए हुई है। चीनी सैनिक किसी जगह पर अड़ गए होंगे, उसके बाद ही तनाव बढ़ा और हिंसा हुई है। ऐसा नहीं है कि उसके बाद दोनों ओर से फार्यंरग शुरू हो गई हो। अभी धुंध है। इसे ‘फॉग ऑफ वार’ या लड़ाई का कोहरा कहते हैं। मेरा मानना है कि चीन के छह से आठ जवान मारे गए होंगे, लेकिन वह मानेगा नहीं। बहुत संभव है, दोनों ओर, कुछ मीसिंग भी हुई हो, जिसका पता कुछ समय बाद ही चलेगा। अब जिस स्तर पर तनाव चला गया है, वह जल्दी नीचे नहीं आएगा। दोनों देशों को उच्च स्तर पर रणनीतिक बातचीत बढ़ाने की पहल करनी पड़ सकती है। समाधान राजनीतिक व कूटनीतिक स्तर पर ही होगा।
    चीन जो कर रहा है, उसका सीधा संबंध शी जिनपिंग से है। इससे पाकिस्तान का भी संबंध है। नेपाल ने पिछले दिनों जो किया है, उससे भी चीन का संबंध है। भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान के लिए देर-सबेर वार्ता की मेज पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भी लाना पडे़गा। जहां तक युद्ध की बात है, तो यह चीन भी नहीं चाहेगा। दोनों देशों के बीच 100 अरब डॉलर का व्यापार है। युद्ध किसी के हित में नहीं है। परस्पर व्यवसाय तभी संभव है, जब तनाव सीमित रहेंगे।
    अभी भारतीय सेना के मनोबल की बात करें, तो वह बहुत मजबूत है। भारतीय सैनिक 18,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर भी लड़ने में सक्षम हैं। इतनी ऊंचाई पर मुकाबला करने की क्षमता किसी और देश के सैनिकों में नहीं है। चीन भी समझता है, इस तरह की लड़ाई में अब वह भारत से पार नहीं पा सकता। भारतीय सेना बहु-प्रशिक्षित है। इसके अलावा, चीन की पीपुल लिबरेशन आर्मी को लड़ने का अनुभव नहीं है, जबकि भारत को लगातार ही लड़ना पड़ रहा है। चीन से भयभीत होने की जरूरत नहीं है। हमारी सेनाओं का मनोबल टॉप पर है। अब समय आ गया है, सैन्य बजट कम से कम पांच प्रतिशत होना चाहिए। अभी यह तीन प्रतिशत है। सेना का आधुनिकीकरण तेज कर देना चाहिए।
    हमें लगता है कि चीन हमें घेर रहा है, लेकिन वास्तव में हमने उसे घेर रखा है, जिससे वह बौखलाया हुआ है। वह सोचता है कि हम अमेरिका से गठबंधन कर चुके हैं, चीन की कंपनियों को निकालना चाहते हैं। हमने ऑस्ट्रेलिया से समझौता किया है, उसके जहाजों को हम पेट्रोल देंगे। चीन को लगता है, हम उसे दक्षिणी चीनी सागर में भी घेर रहे हैं। भारतीय संसद में जब अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला लिया गया था, तब कहा गया था कि हम पीओके और कश्मीर के अपने पूरे हिस्से को हर हाल में वापस लेंगे। अब चीन को लग रहा है कि उसने अपने कब्जे वाले इलाके में जो सड़क बनाई है, वही सड़क घूमकर पाकिस्तान जा रही है, उसका क्या होगा? वह परेशान है, लेकिन पूरे तनाव के बीच हमें अपने पक्ष में समाधान निकालना होगा। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) मोहन भंडारी, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत-चीन सीमा पर सैनिकों का शहीद होना जितना दुखद है, उतना ही चिंताजनक है। जिसकी आशंका पिछले दिनों से लगातार बन रही थी, वही हुआ। अब दोनों ही देशों को ऐसे विवाद से बचने और तनाव को आगे बढ़ने से रोकने के हरसंभव प्रयास करने चाहिए। जो भी सैनिक इस टकराव में मारे गए हैं, उनके शव गिनने की बजाय दोनों ही देशों को अपनी उन विफलताओं को गिनना चाहिए, जिनकी वजह से सीमा पर तनाव बढ़ता जा रहा है। सन 1975 के बाद पहली बार भारत-चीन सीमा पर झड़प की वजह से सैनिक शहीद हुए हैं। 45 साल से जो सामरिक समझदारी दोनों देशों के बीच बनी हुई थी, उसे घुटने टेकते देखना कुछ ही समय की बात या एक हादसा भर होना चाहिए।
    जब दोनों देश गलवान घाटी में पीछे हटने पर सहमत थे, तब ऐसा क्यों हुआ? इसकी ईमानदार पड़ताल सेना और विदेश मंत्रालय के उच्चाधिकारियों को करनी चाहिए। उच्च स्तर पर अगर पहले ही पहल होती, तो शायद सीमा विवाद इस ऐतिहासिक दाग तक नहीं पहुंचता। दोनों देश 1962 की बड़ी लड़ाई के बाद 1967 और 1975 में भी सीमित झड़पें देख चुके हैं। झड़प के उस दौर में नहीं लौटना ही समझदारी है। जाहिर है, विदेश मंत्री की जिम्मेदारी सर्वाधिक बढ़ी है। काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन का रवैया कैसा रहता है? चीन में ऐसे तत्व होंगे, जो 45 साल बाद हुई हिंसा पर भड़केंगे। भारत के प्रति उनका लहजा बिगडे़गा। संभव है कि भारत की ओर से भी बयानबाजी हो, लेकिन कुल मिलाकर, दोनों की समझदारी इसी में है कि आधिकारिक स्तर पर दोनों देश संयम से काम लें। भारत सरकार की आधिकारिक नीति रही है कि हमें किसी से जमीन नहीं चाहिए, हम भलमनसाहत में जमीन छोड़ने के लिए जाने जाते हैं, जमीन हड़पने के लिए नहीं। जबकि हमारे कुछ पड़ोसियों की नीति हमसे उलट है। उनकी रणनीति भी रहती है कि भारत को उलझाए रखा जाए, निश्चिंत न होने दिया जाए। भारत में अगर पूरी शांति हो जाएगी, तो यहां संपन्नता निखर उठेगी। कभी चीन की जमीन पर भारत ने दावा नहीं किया और न चीन के मामलों में कभी पड़ा है। यह बात बेशक चुभती है कि चीन के विकास में भारत की जो परोक्ष भूमिका है, उसे चीन ने कभी नहीं माना है। अब समय आ गया है कि भारत बार-बार अपनी भूमिका का एहसास कराए।
    हमें सीमा पर तनाव की जड़ों को उखाड़ फेंकने की ओर बढ़ना होगा। चीन ने लगभग हरेक पड़ोसी के साथ अपने सीमा विवाद सुलझा लिए हैं, जबकि भारत के साथ लगती विशाल सीमा को वह बिजली के तार की तरह खुली रखना चाहता है। सीमा विवाद को सुलझा लेने में उसे अपना कोई हित नहीं दिखता है। यह भारत की जिम्मेदारी है कि वह चीन को बार-बार एहसास कराए। भारत एक उदार देश है। अपनी मर्जी थोपने की बीजिंग की कोशिश 1962 में भले चल गई थी, लेकिन अब नहीं चलेगी। भारत की ताकत को लगभग पूरी दुनिया मान रही है, तो चीन को भी विचार करना चाहिए। भारत का अपना विशाल आर्थिक वजूद है, जिससे चीन विशेष रूप से लाभान्वित होता रहा है। साथ ही, चीनियों को भारत में अपनी बिगड़ती छवि की भी चिंता करनी चाहिए। गलवान घाटी की झड़प से सबक लेते हुए हमें संवाद के रास्ते सहज संबंधों की ओर बढ़ना होगा।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / पड़ोसी देश नेपाल जिस तरह से चीन की जुबान बोल रहा है, उससे लगता है कि चीन कोई राजनीतिक चाल चलने की तैयारी कर चुका है। भारत की चेतावनी के बाद भी नेपाल ने लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा इलाके को अपने नए नक्शे में शामिल कर लिया और उस पर राजनीतिक मुहर लगा दी। इससे लगता है कि वह पूरी तरह से भारत के साथ अपने रिश्तों को भूल चुका है। सीमा पर बेवजह का विवाद खड़ा करके वह चीन के हाथों की कठपुतली बन गया है। इस विवाद से निरंतर नेपाल और भारत के संबंध बिगड़ रहे हैं। अच्छी बात है कि भारत ने अब भी बातचीत करके मसले को सुलझाने का भरोसा दिया है। इससे नेपाल को भारत की भलमनसाहत का एहसास हो जाना चाहिए।
    तनुज कुमार, मेरठ

    अफवाहों को रोकें
    जब हमारा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है और सरकार-प्रशासन समेत सभी संवेदनशील नागरिक अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं, तब कुछ लोग सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप जानकारी साझा कर रहे हैं, जबकि इसके माध्यम से सरकारी अधिकारी भी आम लोगों के लिए दिशा-निर्देश जारी करते रहते हैं। दिक्कत यह है कि जागरूकता के अभाव में कई लोग इन भ्रामक जानकारियों में फंस जाते हैं। इन अराजक तत्वों पर जल्द से जल्द कार्रवाई होनी चाहिए। यह संबंधित विभाग का दायित्व है कि वह स्वत: संज्ञान लेकर उन लोगों पर कार्रवाई करे, जो गलत सूचनाएं साझा करते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं। आज जब देश एक मुश्किल दौर से गुजर रहा है,तब सोशल मीडिया के माध्यम से हम कई अच्छे काम कर सकते हैं। एकांतवास के इस दौर में आभासी तौर पर लोगों को जोड़ना वक्त की मांग है। रिश्तों को तोड़ने की कोशिश करना अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिए।
    अभिनव त्रिपाठी
    बेल्थरा रोड, बलिया

    चिंता बढ़ाते हालात
    अनलॉक-1 में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। माना कि अपने यहां रिकवरी रेट, यानी मरीजों के ठीक होने की दर लगातार सुधर रही है, लेकिन संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ना चिंता की बात है। यह स्थिति तब है, जब सरकार अपनी तरफ से हालात संभालने की पूरी कोशिश कर रही है। ऐसे में, नागरिकों को चाहिए कि वे कहीं ज्यादा गंभीर हो जाएं। दो गज की दूरी का हरसंभव पालन करें और बेवजह घर से बाहर न निकलें। सरकार सजग है, तो हम भी सतर्क रहें। ऐसा करने पर ही हम कोरोना-मुक्त देश बन सकते हैं।
    महेश नेनावा
    इंदौर, मध्य प्रदेश

    खुदकुशी उपाय नहीं
    बिहार के छोटे से कस्बे से ताल्लुक रखने वाले एक आम इंसान ने चांद को छू लेने जैसे सपने देखे और उसे पूरा करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। इंजीनिर्यंरग की पढ़ाई करके भारतीय फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाना और कामयाबी की बुलंदियों की ओर बढ़ना सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत की कठिन परिश्रम का नतीजा था। अचानक उनकी खुदकुशी ने सभी को चकित कर दिया। आत्महत्या की यह खबर तथाकथित विकसित समाज की त्रासद तस्वीर को उजागर करती है। आज तमाम ऐशो-आराम होने के बाद भी मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं विराट हैं। यही कारण है कि आत्महत्या की खबरें अब रोजाना आने लगी हैं। मगर यह याद रखना चाहिए कि सभी के जीवन में संघर्ष का एक दौर आता है। यह कभी लंबा होता है, तो कभी छोटा। लेकिन संघर्ष के बाद ही हमें सफलता मिलती है, इसलिए जीवन के इस बदलते परिवेश में खुद को ढालना चाहिए और जीवन के हर एक पल को जीना चाहिए। यह समझना चाहिए कि हार के बाद ही जीत है।
    अभिषेक सिंह, जौनपुर

     

      शौर्यपथ / यह बेहद अफसोस की बात है कि लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (चीन की सेना) की शर्मनाक हरकत में कमांडिंग अफसर सहित हमारे तीन जवान शहीद हो गए। दशकों बाद एलएसी पर ऐसी जानलेवा झड़प हुई है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के फौजी सीमा पर धक्का-मुक्की या मारपीट ही करते रहे हैं, क्योंकि उन्हें हथियार न चलाने के निर्देश मिले हुए हैं। भारत और चीन के द्विपक्षीय समझौतों के प्रावधान भी यही हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रहेगा और हिंसक घटनाओं पर लगाम लगाई जाएगी। मगर पिछले कुछ दिनों से लद्दाख में चीनी सेना की तरफ से हिंसक घटनाओं में तेजी आ रही थी। सोमवार-मंगलवार रात की यह घटना उसी हिंसा की अगली कड़ी है।
    सवाल यह है कि हमें चीन के सैनिकों के अतिक्रमण से पीछे हटने और सीमा पर झड़प खत्म होने की गलतफहमी कैसे हो गई? साफ है, ताजा झड़पों को संभालने के निर्देश सैनिकों को अभी तक नहीं मिले हैं। पहले चीन के सैनिक कुछ मीटर तक घुसपैठ किया करते थे, लेकिन अब वे कुछ किलोमीटर तक ऐसा करने लगे हैं। इसकी बड़ी वजह यही है कि मैकमोहन रेखा पर दोनों देशों की अब तक सहमति नहीं बन सकी है। तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के बीच बीजिंग इसे नहीं मानता, जबकि अक्साई चिन को हम अपना हिस्सा मानते हैं। फिर भी, द्विपक्षीय समझौतों के तहत सैनिक सीमा पर हर हाल में शांति बनाकर रखते रहे हैं। भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व यह मानते हैं कि एशिया में दोनों देशों के उभरने की पूरी संभावना है, इसलिए तनातनी से बेहतर है, आपसी रिश्तों को मधुर बनाना। लिहाजा इस जानलेवा टकराव पर चिंता करने के साथ-साथ हमें चिंतन भी करना चाहिए।
    चीन की इस नई रणनीति के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सभी के तार कहीं न कहीं कोरोना वायरस से जुड़े दिखते हैं। दरअसल, महामारी ने चीन की प्रतिष्ठा को काफी चोट पहुंचाई है। एक तरफ पश्चिमी देश कोरोना को ‘वुहान वायरस’ कहने लगे हैं, तो दूसरी तरफ उन राष्ट्रों ने चीन से राहत-पैकेज की मांग की है, जहां ‘बेल्ट रोड इनीशिएटिव’ के तहत विभिन्न परियोजनाओं पर काम चल रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन देशों में कोरोना संक्रमण से जान-माल का अपेक्षाकृत अधिक नुकसान हुआ है। नतीजतन, उन देशों पर चीन का कर्ज बढ़ता चला गया है, और अब वे मुआवजे के लिए चीन पर दबाव बना रहे हैं। चूंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड (जिसके मुखिया भारत के स्वास्थ्य मंत्री हैं) ने कोरोना वायरस के जन्म का सच जानने के लिए स्वतंत्र जांच कमेटी बनाई है, इसलिए चीन सीमा-विवाद को हवा देकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इसी रणनीति के तहत उसने पाकिस्तान को लगातार उकसाने का काम किया है और इन दिनों नेपाल के नेताओं को अपनी तरफ मिलाने की जुगत में है।
    सवाल यह है कि अब हम क्या करें? 1962 की गलतियों का एक सबक यह है कि हम चीन को उसी की भाषा में जवाब दें। हमारे सैनिकों ने लद्दाख की घटना के बाद ऐसा किया भी है। खबर है कि चीन के पांच सैनिक इस झड़प में मारे गए हैं। लेकिन अभी सैन्य टकराव की ओर बढ़ना किसी के लिए भी सुखद नहीं है। अपनी-अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिशें सभी राष्ट्रों की रणनीति का हिस्सा होती हैं। भारत और चीन भी ऐसा करते रहे हैं। भारत की बढ़ती हैसियत के कारण ही चीन ने हमसे कई तरह के तार जोडे़ हैं। फिर चाहे वह रूस के साथ मिलकर त्रिपक्षीय गुट आरआईसी (रूस, भारत और चीन) बनाना हो, या शंघाई सहयोग संगठन में भारत को शामिल करना, या फिर ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का संगठन) को मूर्त रूप देना। इसलिए अभी भी हमें अपनी क्षमता बढ़ाने पर ही ध्यान देना चाहिए। वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास बुनियादी ढांचे का जो निर्माण-कार्य चल रहा है, उसे जारी रखना होगा। जरूरत अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की भी है।
    चीन इसलिए भी नाराज है, क्योंकि भारत और अमेरिका हाल के वर्षों में काफी करीब आए हैं। बीजिंग को लगता है कि उसके आंतरिक उथल-पुथल और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों का भारत फायदा उठाना चाहता है। हमें उसका यह भ्रम दूर करना होगा। उसे यह एहसास दिलाना होगा कि अमेरिका या अन्य देशों से बेहतर संबंध हमारी जरूरत हैं। अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल न करना भारत की बुनियादी रणनीति रही है, और आगे भी वह इसी नीति पर अमल करता रहेगा। मगर इसके साथ-साथ हमारी अन्य जरूरतें भी हैं। एशिया में आतंकवाद का अंत भी ऐसा ही एक काम है। चीन ने कभी मध्य-पूर्व और अफगानिस्तान के आतंकी गुटों से हाथ मिलाकर एशियाई देशों को अस्थिर करने की कोशिश की थी। आज भी वह पाकिस्तान को शह देता रहता है। इसलिए यह लाजिमी है कि हम अपनी ताकत इतनी बढ़ा लें कि चीन की ऐसी हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दे सकें या फिर वह ऐसा कोई कदम उठाने की सोच भी न सके।
    श्याम सरन कमेटी ने बताया था कि चीन कई सौ किलोमीटर तक हमारी सीमा में दाखिल हो चुका है। साफ है, शांतिप्रियता को उसने हमारी कमजोरी समझा है, जिसका एक परिणाम 1962 का युद्ध भी है। लेकिन आज का भारत उस दौर से काफी आगे निकल चुका है। हिंसक झड़प होने के बाद भी हमारी मंशा उन समझौतों पर कायम रहने की है, जो द्विपक्षीय या बहुपक्षीय हुए हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक तरीके से ही हम ऐसा कर सकेंगे। चीन को यह समझाना होगा कि सीमा पर शांति दोनों देशों के हित में है। भारत और चीन एशिया की दो बड़ी ताकतें हैं, इसलिए अगर वे आपस में उलझेंगी, तो इससे पूरे महाद्वीप में अस्थिरता फैलेगी और इसका नुकसान जाहिर तौर पर दोनों देशों को होगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) शशांक, पूर्व विदेश सचिव

     

    दुर्ग / शौर्यपथ / माननीय कार्यपालक अध्यक्ष छ.ग. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बिलासपुर के निर्देश एवं माननीय रामजीवन देवांगन कार्यवाहक जिला न्यायाधीश/अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के मार्गदर्शन पर जिला कोर्ट में सुनवाई के दौरान सोशल डिस्टेसिं को दृष्टिगत रखते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण न्याय सदन दुर्ग में ई-फाईलिंग संपर्क कांति सहायता केन्द्र का शुभारंभ किया गया है। इस सहायता केन्द्र के माध्यम से अधिवक्ता प्रकरण के सभी दस्तावेज ऑनलाईन जमा कर सकते है। दस्तावेज संबंधित कोर्ट को उपलब्ध हो जाएगा। इसके अतिरिक्त विडियों कांफ्रेसिंग के माध्यम से प्रकरण में जिरह कर सकेंगे।
    कोविड-19 के संक्रमण से बचाव के लिए अधिवक्ताओं को न्यायालयीन कार्यवाही में सहयोग के तौर पर ई-फाईलिंग संपर्क क्रांति सहायता केन्द्र की शुरूवात की गई। ऐसे अधिवक्ता जिनके द्वारा एंड्राईड मोबाईल, कम्प्यूटर, स्केनर की सुविधा उपलब्ध नही है या वे उपयोग में नही लाते होगें। उनके सुविधा के लिए यह व्यवस्था की गई है। सहायता केन्द्र में तृतीय क्षेणी कर्मचारी प्रशांत दिल्लेवार, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अशोक यादव तथा पैरालीगल वॉलिटियर डुलेश्वर मटियारा को नामित किया गया है।
    ई-फाईलिंग संपर्क क्रांति सहायता केन्द्र के संबंध में प्रस्तुत किये जाने वाले प्रकरण, उनकी कार्यवधि के संबंध में जानकारी हरीश अवस्थी, विशेष न्यायाधीश दुर्ग के द्वारा उपस्थित अधिवक्ताओं को बताया कि ई कमेटी द्वारा मोबाईल एप तैयार किए गए जिनके माध्यम से भी जानकारी सुलभ है इस एप के इंस्टालेशन की जानकारी न होने या किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता होने पर उसके संबंध में भी सहायता ई सेवा केन्द्र से प्राप्त की जा सकती है एवं उपलब्ध स्टाफ आपको एप इंस्टालेशन में मदद करेंगे। अधिवक्ता द्गद्घद्बद्यद्बठ्ठद्द.द्गष्शह्वह्म्ह्लह्य.द्दश1.द्बठ्ठ/ष्द्द में जाकर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं, प्रक्रिया एक बार की होगी इसके पश्चात् अधिवक्ता 24&7 अपने घर बैठे प्रकरण दावा जवाब दावा आवेदन दस्तावेज इत्यादि प्रस्तुत कर सकते है दावा जवाब दावा आवेदन पत्र तथा दस्तावेज पीडीएफ फॉर्मेट में ए4 साईज के होने आवश्यक होंगे रजिस्टेशन उपरांत अधिवक्ता को अपनी यूजर आईडी तथा पासवर्ड प्राप्त हो जाता है तथा लॉर्ड मेक ए स्पेस भी प्राप्त हो जाता है जहां वह अपने दस्तावेज तैयार कर सकते हैं सहेज के रख सकते हैं तथा पश्चात में भी प्रस्तुत कर सकते है साथ ही साथ प्रकरण से होने वाली तमाम जानकारियां स्वयं उनके इस क्लाउड स्पेस में उपलब्ध होती रहती है।
    शुभारंभ में दुर्ग मे ंपदस्थ न्यायाधीश श्रीमती शुभ्रा पचोरी, श्रीमती गरिमा शर्मा, अजीत कुमार राजभानु, श्रीमती पी.पॉल, मोहन सिंह कोर्राम, परिवार न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वासनिकर, गुलाब सिंह पटेल अध्यक्ष जिला अधिवक्ता संघ दुर्ग, एवं राहूल शर्मा सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग, कर्मचारीगण, पैरालीगल वॉलिटियर उपस्थित रहे। शुभारंभ के समय सभी उपस्थिति लोगो के द्वारा सोशल डिस्टेसिंग का पालन किया।

    दुर्ग / शौर्यपथ / माननीय कार्यपालक अध्यक्ष छ.ग. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बिलासपुर के निर्देश एवं माननीय रामजीवन देवांगन कार्यवाहक जिला न्यायाधीश/अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के मार्गदर्शन पर जिला कोर्ट में सुनवाई के दौरान सोशल डिस्टेसिं को दृष्टिगत रखते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण न्याय सदन दुर्ग में ई-फाईलिंग संपर्क कांति सहायता केन्द्र का शुभारंभ किया गया है। इस सहायता केन्द्र के माध्यम से अधिवक्ता प्रकरण के सभी दस्तावेज ऑनलाईन जमा कर सकते है। दस्तावेज संबंधित कोर्ट को उपलब्ध हो जाएगा। इसके अतिरिक्त विडियों कांफ्रेसिंग के माध्यम से प्रकरण में जिरह कर सकेंगे।
    कोविड-19 के संक्रमण से बचाव के लिए अधिवक्ताओं को न्यायालयीन कार्यवाही में सहयोग के तौर पर ई-फाईलिंग संपर्क क्रांति सहायता केन्द्र की शुरूवात की गई। ऐसे अधिवक्ता जिनके द्वारा एंड्राईड मोबाईल, कम्प्यूटर, स्केनर की सुविधा उपलब्ध नही है या वे उपयोग में नही लाते होगें। उनके सुविधा के लिए यह व्यवस्था की गई है। सहायता केन्द्र में तृतीय क्षेणी कर्मचारी प्रशांत दिल्लेवार, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अशोक यादव तथा पैरालीगल वॉलिटियर डुलेश्वर मटियारा को नामित किया गया है।
    ई-फाईलिंग संपर्क क्रांति सहायता केन्द्र के संबंध में प्रस्तुत किये जाने वाले प्रकरण, उनकी कार्यवधि के संबंध में जानकारी हरीश अवस्थी, विशेष न्यायाधीश दुर्ग के द्वारा उपस्थित अधिवक्ताओं को बताया कि ई कमेटी द्वारा मोबाईल एप तैयार किए गए जिनके माध्यम से भी जानकारी सुलभ है इस एप के इंस्टालेशन की जानकारी न होने या किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता होने पर उसके संबंध में भी सहायता ई सेवा केन्द्र से प्राप्त की जा सकती है एवं उपलब्ध स्टाफ आपको एप इंस्टालेशन में मदद करेंगे। अधिवक्ता द्गद्घद्बद्यद्बठ्ठद्द.द्गष्शह्वह्म्ह्लह्य.द्दश1.द्बठ्ठ/ष्द्द में जाकर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं, प्रक्रिया एक बार की होगी इसके पश्चात् अधिवक्ता 24&7 अपने घर बैठे प्रकरण दावा जवाब दावा आवेदन दस्तावेज इत्यादि प्रस्तुत कर सकते है दावा जवाब दावा आवेदन पत्र तथा दस्तावेज पीडीएफ फॉर्मेट में ए4 साईज के होने आवश्यक होंगे रजिस्टेशन उपरांत अधिवक्ता को अपनी यूजर आईडी तथा पासवर्ड प्राप्त हो जाता है तथा लॉर्ड मेक ए स्पेस भी प्राप्त हो जाता है जहां वह अपने दस्तावेज तैयार कर सकते हैं सहेज के रख सकते हैं तथा पश्चात में भी प्रस्तुत कर सकते है साथ ही साथ प्रकरण से होने वाली तमाम जानकारियां स्वयं उनके इस क्लाउड स्पेस में उपलब्ध होती रहती है।
    शुभारंभ में दुर्ग मे ंपदस्थ न्यायाधीश श्रीमती शुभ्रा पचोरी, श्रीमती गरिमा शर्मा, अजीत कुमार राजभानु, श्रीमती पी.पॉल, मोहन सिंह कोर्राम, परिवार न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वासनिकर, गुलाब सिंह पटेल अध्यक्ष जिला अधिवक्ता संघ दुर्ग, एवं राहूल शर्मा सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग, कर्मचारीगण, पैरालीगल वॉलिटियर उपस्थित रहे। शुभारंभ के समय सभी उपस्थिति लोगो के द्वारा सोशल डिस्टेसिंग का पालन किया।

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