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आस्था / शौर्यपथ /ध्यानलिंगम् वेलिंगिरि पर्वतमाला की तलहटी में दक्षिण का अनूठा शिव मंदिर इस स्थान पर किसी विशेष विचार, प्रार्थना अथवा पूजा पद्धति का अवलंबन नहीं किया गया है। कोई भी धर्मावलंबी यहां आकर ध्यानलिंग में संचित ऊर्जा को ग्रहण कर सकता है।
उस गहन अंधेरी कंदरा में प्रवेश करते ही सामने एक विशाल शिवलिंग शक्तिपुंज-सा दृष्टिगोचर होता है। नीचे जलराशि में झिलमिलाते दीप एवं खिले कमल मन मंदिर को उल्लास से भर देते हैं। पुष्पों की सुवास से सुरभित पवन, तांबे के स्वर्ण जड़ित पात्र से लिंग पर टप-टप टपकते जल की प्रतिध्वनि एवं दीपों की जल में प्रतिछाया अंतर्मन को असीम शांति प्रदान करती है। इस अलौकिक दृश्य को दर्शनार्थीगण अपलक विस्फारित नेत्रों से ठगे-से देखते रह जाते हैं।
यह वर्णन दक्षिण भारत के मेनचेस्टर कहे जाने वाले नगर कोयम्बटूर से 30 किलोमीटर दूर वेलिंगिरि पर्वतमाला की तलहटी में स्थित एक मंदिर के शिवलिंग का है जिसे 'ध्यानलिंगम्' कहा जाता है। देश में कुछ अत्यंत श्रेष्ठ धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों का निर्माण इन दिनों हुआ है, जो भारत की प्राचीन वास्तुकला के श्रेष्ठ नमूने तो हैं ही, कला की दृष्टि से भी अनुपम हैं।
अहमदाबाद में अक्षरधाम, दिल्ली में लोटस टेम्पल एवं कन्याकुमारी में अरब सागर, बंगाल की खाड़ी एवं हिन्द महासागर के संगम पर निर्मित विवेकानंद स्मारक तो अब सर्वज्ञात हैं ही। ध्यानलिंगम् मंदिर इसी श्रेणी में गिना जा सकता है, जो 1999 में ही लोकार्पित हुआ है।
इस ध्यानलिंगम् के निर्माण की प्रेरणा एक कर्मवीर योगी संत श्री सद्गुरु जग्गी वासुदेव को, जब वे मैसूर स्थित चामुण्डी पहाड़ी की एक शिला पर ध्यानमग्न थे, प्राप्त हुई। इस अनुभूति ने उनके जीवन में हलचल पैदा कर दी और उन्होंने ध्यानलिंग निर्माण करने का संकल्प लिया। ध्यानलिंग के विषय में पुरातन ग्रंथों में गूढ़ विवरण ही था, अतः इस परिकल्पना को साकार करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। परंतु संत ने तो ठान ली थी, सो गहन अध्ययन एवं अंतर्ज्ञान ने उन्हें प्रेरित किया कदम आगे बढ़ाने को और फिर उनके साथ इस स्वप्न को साकार करने के लिए जुटने लगे अनेक शिष्य, वास्तुविद्, अभियंता एवं दानी बंधुगण। वेलिंगिरि पर्वतमाला की तलहटी के घने जंगल में स्थान प्राप्त हो गया।
मंदिर के रूपांकन में शास्त्रों के अनुसार ज्यामितीय आकार, परिक्रमा, गर्भगृह, प्रमुख देवता, अन्य देवतागण एवं उपयोग में आने वाली भवन सामग्री का सांगोपांग ध्यान रखा गया। गर्भगृह, जो विशाल डोम के आकार का बनाना तय हुआ, उसमें सीमेंट, कांक्रीट एवं सरियों का उपयोग न करते हुए परंपरागत ईंट, चूना, मिट्टी, रेती, नौसादर एवं विभिन्न जड़ी-बूटियों से निर्मित घोल का उपयोग किया गया। डोम के आकल्पन में भारतीय वास्तुकला के नियम तथा नवीन कम्प्यूटर तकनीक का प्रयोग किया गया। अठारह महीने में डोम बनकर तैयार हुआ तथा इस संपूर्ण परिसर के निर्माण में तीन वर्ष का समय लगा। 24 जून 1999 को संसार के प्रथम 'ध्यानलिंगम्' की स्थापना हुई और 23 नवंबर 1999 को संपूर्ण परिसर लोकार्पित हुआ।
अब चलें परिसर दर्शन को!
सर्वप्रथम प्रवेश करते ही सत्रह फुट ऊंचा सफेद ग्रेनाइट निर्मित 'सर्वधर्मस्तम्भ' है- जिसमें संसार के प्रमुख धर्मों के चिह्न अंकित हैं, जो प्रदर्शित करता है-'यह मंदिर सभी धर्मानुयायियों का स्वागत करता है।' इस स्तम्भ के पीछे मानव शरीर के सात चक्रों को दर्शित किया गया है। आगे बढ़ने पर मंदिर का प्रवेश द्वार मिलता है, जो प्राचीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है।
प्रवेश करने के लिए तीन अपेक्षाकृत ऊंची सीढ़ियां हैं, जो तम्, रज एवं सत् की प्रतीक हैं। ऊंची इसलिए बनाई गई हैं ताकि सीढ़ियां उतरते समय स्नायुमंडल के भागों पर विशेष जोर पड़े, जिससे तन-मन ध्यानलिंग से प्रसारित ऊर्जा को ग्रहण करने को तैयार हो जाए।
आगे परिक्रमा की ओर बढ़ने पर बायीं ओर योगशास्त्र विज्ञान के पितामह पातंजलि की एवं विशाल शिव कीऊंची, काले ग्रेनाइट की अत्यंत प्रभावशाली प्रतिमा है।
दाहिनी ओर हरे ग्रेनाइट की वनश्री (पीपल वृक्ष) की प्रतिकृति है। देहरी पर सिद्धि अवस्था की प्रतीक छः ध्यानमग्न त्रिकोणाकार प्रतिमाएँ हैं।
अब हम प्रवेश करने को तत्पर हैं उस अद्वितीय कंदरा में जो डोम के आकार की बनी है। इस डोम के निर्माण में अतिविशिष्ट पद्धति अपनाई गई है। इसकी नींव दस फुट गहरी ली गई है। इसकी जमीन से ऊंचाई 33 फुट, व्यास 76 फुट तथा वजन 700 टन है। इस अनुपात से इसकी विशालता का अनुभव किया जा सकता है। इस डोम को छः फुट ऊंची पत्थरों की जुड़ाई पर रखा गया है।
संपूर्ण निर्माण में न सीमेंट का उपयोग हुआ न सरियों का एवं न ही निर्माण हेतु कच्चे ढांचे का। केवल ईंटों एवं ग्रेनाइट पत्थर के शिलाखंडों को विशेष तकनीक से जोड़ा गया है। गर्भगृह में हवा एवं प्रकाश हेतु अट्ठाईस त्रिकोणाकार रोशनदान हैं तथा डोम शीर्ष पर एक स्वर्णपत्र परिवेष्ठित तांबे का लिंगाकार लघु डोम बनाया गया है, जो गर्भगृह के अंदर की गरम हवा को निष्कासित करता है तथा प्रकाश की किरणों का सीधे प्रवेश भी रोकता है। नीचे निर्मित रोशनदान से गर्भगृह में शीतल वायु प्रवेश करती है। अंदर गर्भगृह में दर्शनार्थियों को ध्यान लगाने हेतु 28 आलेनुमा बैठने के स्थान निर्मित किए गए हैं।
अब कन्दरानुमा इस डोम आकार के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं, जहां उपर्युक्त शिवलिंग के दर्शन होते हैं। इस अंधेरी कन्दरा में केवल दीपक का ही प्रकाश है। अंदर केंद्र में तेरह फुट नौ इंच ऊंचाई का विशाल काले ग्रेनाइट का शिवलिंग विशेष रूप से रसायनज्ञों द्वारा बनाए गए पारद के आधार पर टिका हुआ है। शिवलिंग को श्वेत ग्रेनाइट से निर्मित, मुंह खोले विश्राम की मुद्रा में एक महानाग सात फेरे में कुन्डली मारकर सुशोभित करता है।
सबसे नीचे जल का घेरा है। इसमें संपूर्ण शिवलिंग तैरता-सा दिखाई देता है। इस जल में छोटे-छोटे कमल खिले हुए हैं और दीपों का झिलमिलाता प्रकाश संपूर्ण परिसर को आलोकित करता रहता है। शिवलिंग मानव शरीर के सात चक्रों के प्रतीक तांबे के सात चमकदार वर्तुलों से घेरा गया है, जो लिंग की शोभा को अत्यंत आकर्षक बनाता है। लिंग के ऊपर स्थित तांबे के स्वर्ण जड़ित पात्र से सतत् शीतल जल द्वारा अभिषेक होता रहता है। इसी संपूर्ण रचना को 'ध्यानलिंगम्' नाम दिया गया है।
ध्यानलिंग प्राचीन भारतीय वास्तुकला को विज्ञानसम्मत आधार देकर निर्मित किया गया है। उसका आकार, रंग समन्वय, परिवेश इत्यादि ऊर्जा को संचित करके अनवरत प्रकाश किरणों के समान मानवमात्र के तन-मन को प्रभावित करते रहते हैं। अतः इस स्थान पर किसी विशेष विचार, प्रार्थना अथवा पूजा पद्धति का अवलंबन नहीं किया गया है। कोई भी धर्मावलंबी यहां आकर ध्यानलिंग में संचित ऊर्जा को ग्रहण कर सकता है। केवल गुरु-शिष्य का भाव आवश्यक है। ध्यानलिंग को मन में गुरु स्थान पर प्रतिष्ठित कर कुछ क्षण अपलक दर्शन एवं फिर नेत्र बंद कर नियत स्थान पर बैठना यही पर्याप्त है।
इस मंदिर में एक और आश्चर्यजनक विशेषता है- यहां कोई स्तुति, कोई आरती अथवा कर्मकांड नहीं होता है। प्रतिदिन मध्याह्न 11.50 से 12.10 एवं सायंकाल 5.50 से 6.00 बजे तक 20 मिनट के लिए मानवमात्र की भाषा अर्थात् ध्वनि का आलाप होता है, जिसे 'नाद आराधना' कहा जाता है। जल तरंग एवं अन्य वाद्यों द्वारा सुमधुर नाद निकाला जाता है। एक ब्रह्मचारी एवं एक ब्रह्मचारिणी द्वारा अत्यंत मधुर कंठ से निकाला गया आलाप उपस्थितजनों को स्वर्गिक आनंद की अनुभूति कराता है। दर्शनार्थियों को इस 'नाद आराधना' के समय अवश्य उपस्थित रहकर नादब्रह्म को हृदयंगम करना चाहिए। मंदिर परिसर प्रातः 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है।
आस्था / शौर्यपथ /१.भगवान शिव एक योगी हैं, बैरागी है और संन्यासियों को गुरु हैं। वे परिवाज्रक है अर्थात जगह जगह जगह घूमते रहते हैं और जब घूमना बंद होता है तो बस समाधी में लीन रहते हैं।
2. गृहस्थ का योगी होना जरूरी है तभी वह एक सफल दाम्पत्य जीवन का निर्वाह कर सकता है।
3. भगवान शिव के साथ उल्टी गंगा बही। कई लोग ऐसे हैं जो विवाह के बाद उम्र के एक पड़ाव पर जाकर बैरागी बनकर संन्यस्त होकर अपनी पत्नी को छोड़ चले। जैसे गौतम बुद्ध या अन्य कई ऋषि मुनि, परंतु भगवान शिव तो पहले से ही योगी, संन्यासी या कहें कि बैरागी थे।
4. यह तो माता पार्वती का तप ही था जो योगी गृहस्थ बन गए। कहना तो यह चाहिए कि माता पार्वती भी तो जोगन थीं। पत्नी के साथ यदि सात जन्म के फेरे लिए हैं तो फिर कैसे इसी जन्म में संन्यास के लिए छोड़कर चले जाएं? भगवान शंकर ने यह सबसे बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया था।
5. माता सती ने जब दूसरा जन्म हिमवान के यहां पार्वती के रूप में लिया तब उन्होंने पुन: शिव को पाने के लिए घोर तप और व्रत किया। उस दौरान तारकासुर का आतंक था। उसका वध शिवजी का पुत्र ही कर सकता था ऐसा उसे वरदान था। लेकिन शिवजी तो तपस्या में लीन थे। ऐसे में देवताओं ने शिवजी का विवाह पार्वतीजी से करने के लिए एक योजना बनाई। उसके तहत कामदेव को तपस्या भंग करने के लिए भेजा गया। कामदेव ने तपस्या तो भंग कर दी लेकिन वे खुद भस्म हो गए। बाद में शिवजी ने पार्वतीजी से विवाह किया। इस विवाह में शिवजी बरात लेकर पार्वतीजी के यहां पहुंचे। इस कथा का रोचक वर्णन पुराणों में मिलेगा। शिव को विश्वास था कि पार्वती के रूप में सती लौटेंगी तो पार्वती ने भी शिव को पाने के लिए तपस्या के रूप में समर्पण का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया।
धर्म संसार / शौर्यपथ /भगवान शिव के निराकार स्वरूप शिवलिंग पर दूध, घी, शहद, दही, जल आदि क्यों चढ़ाते हैं? इसके दो कारण है पहला कारण तो साइंटिफिक है और दूसरा कारण पौराणिक है। आओ जानते हैं दोनों ही कारणों को संक्षिप्त में।
पौराणिक कारण :
1. पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ तो सबसे पहले उसमें से विष निकला। इस विष से संपूर्ण संसार पर विष का खतरा मंडराने लगा। इस विपत्ति को देखते हुए सभी देवता और दैत्यों ने भगवान शिव से इससे बचाने की प्रार्थना की। क्योंकि केवल भगवान शिव के पास ही इस विष के ताप और असर को सहने की क्षमता थी। तब भगवान शिव ने संसार के कल्याण के लिए बिना किसी देरी के संपूर्ण विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष का तीखापन और ताप इतना ज्यादा था कि भोले बाबा का कंठ नीला हो गया और उनका शरीर ताप से जलने लगा।
जब विष का घातक प्रभाव शिव और शिव की जटा में विराजमान देवी गंगा पर पड़ने लगा तो उन्हें शांत करने के लिए जल की शीतलता कम पड़ने लगी।उस वक्त सभी देवताओं ने भगवान शिव का जलाभिेषेक करने के साथ ही उन्हें दूध ग्रहण करने का आग्रह किया ताकि विष का प्रभाव कम हो सके। सभी के कहने से भगवान शिव ने दूध ग्रहण किया और उनका दूध से अभिषेक भी किया गया।
तभी से ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। कहते हैं कि दूध भोले बाबा का प्रिय है और उन्हें सावन के महीने में दूध से स्नान कराने पर सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
साइंटिफिक कारण :
1. कहते हैं कि शिवलिंग एक विशेष प्रकार का पत्थर होता है। इस पत्थर को क्षरण से बचाने के लिए ही इस पर दूध, घी, शहद जैसे चिकने और ठंडे पादार्थ अर्पित किए जाते हैं।
2. अगर शिवलिंग पर आप कुछ वसायुक्त या तैलीय सामग्री अर्पित नहीं करते हैं तो समय के साथ वे भंगुर होकर टूट सकते हैं, परंतु यदि उन्हें हमेशा गीला रखा जाता है तो वह हजारों वर्षों तक ऐसे के ऐसे ही बने रहते हैं। क्योंकि शिवलिंग का पत्थर उपरोक्त पदार्थों को एब्जॉर्ब कर लेता है जो एक प्रकार से उसका भोजन ही होता है।
3. शिवलिंग पर उचित मात्रा में ही और खास समय पर ही दूध, घी, शहद, दही आदि अर्पित किए जाते हैं और शिवलिंग को हाथों से रगड़ा नहीं जाता है। यदि अत्यधिक मात्रा में अभिषेक होता है या हाथों से रगड़ा जाता है तो भी शिवलिंग का क्षरण हो सकता है। इसीलिए खासकर सोमवार और श्रावण माह में ही अभिषे करने की परंपरा है।
धर्म संसार / शौर्यपथ /सावन मास की अमावस्या और पूर्णिमा तिथि का बहुत महत्व होता है। श्रावण अमावस्या को हरियाली अमावस्या भी कहते हैं। श्रावण अमावस्या 8 अगस्त 2021 रविवार के दिन है। इस दिन व्यातीपात और वरियान योग साथ में पुष्य नक्षत्र रहेगा। आओ श्रावण अमावस्या के 10 सरल उपाय।
1. पितृदोष से मुक्ति का उपाय : इस दिन यदि पितृदोष से मुक्त होना है तो पितरों के निमित्त नदी के तट पर तर्पण आदि कर्म करें। इस दिन पितृसूक्त पाठ, गीता पाठ, गरुड़ पुराण, गजेंद्र मोक्ष पाठ, रुचि कृत पितृ स्तोत्र, पितृ गायत्री पाठ, पितृ कवच का पवित्र पाठ या पितृ देव चालीसा और आरती करें।
2. धन समृद्धि हेतु मछलियों को दाना डालें : इस दिन किसी नदी या तालाब में जाकर मछली को आटे की गोलियां खिलाने से धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
3. आकस्मिक संकट से बचने के लिए : इस दिन घर के आसपास चींटियों को सूखे आटे में चीनी मिलाकर खिलाने से संभी तरह के संकट दूर होते हैं।
4. पौधा रोपण करना शुभ : श्रावणी अमावस्या के दिन पौधा रोपड़ का बहुत महत्व होता है। इस दिन देववृक्ष पीपल, बरगद, केला, नींबू, तुलसी आदि का वृक्षारोपण करना शुभ माना जाता है।
5. बाधाओं से मुक्ति हेतु हनुमान पूजा : इस दिन सभी तरह की अला बला या उपरी बाधाओं से मुक्ति हेतु हनुमान मंदिर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमानजी को सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं।
6. दीपदान करें : इस दिन आटे के दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करने से पितृदेव और माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
7. शनि दोष से मुक्ति हेतु : इस दिन शनिदेवजी के मंदिर में विधि अनुसार दीपक लगाने से वे प्रसन्न होते हैं और शनि पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
8. सुख समृद्धि हेतु : इस अमावस्या की रात्रि में पूजा करते समय पूजा की थाली में स्वास्तिक या ॐ बनाकर और उसपर महालक्ष्मी यंत्र रखें फिर विधिवत पूजा अर्चना करें, ऐसा करने से घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होगा और आपको सुख समृद्धि की प्राप्ति होगी।
9. गीता पाठ करें : इस अमावस्या के दिन श्रीविष्णु के मंत्रों का जाप और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें। इससे जीवन की सभी तरह की समस्याओं के अंत हो जाएगा।
10. मनोकामना पूर्ति हेतु : भगवान शिव को सफेद आंकड़े के फूल, बिल्व पत्र और भांग, धतूरा चढ़ाएं। इस दिन भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से करना चाहिए। शिवजी के आशीर्वाद से सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण होगी।
आस्था / शौर्यपथ /सावन महीने में सोमवार दिन का काफी महत्व है। अधिकतर लोग इसी दिन उपवास रखकर शिव मंदिर जाकर शिवजी की आराधना करते हैं। सावन महीने का पहला सोमवार 26 जुलाई 2021 को था और अब सावन महीने का दूसरा सोमवार 2 अगस्त 2021 को है। आओ जानते हैं इस सोमवार का महत्व।
महत्व : दूसरा सोमवार कृतिका नक्षत्र में प्रारंभ हो रही है और इस दिन नवमी तिथि है। सोमवार के देवता चंद्र, कृत्तिका नक्षत्र का स्वामी सूर्य व राशि शुक्र है और नवमी तिथि की देवी देवी हैं माता दुर्गा। मतलब इस बार का सोमवार शिवजी के साथ माता पार्वती की पूजा के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस दिन सूर्यपूजा का भी महत्व रहेगा। 12:00:12 से 12:54:08 तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा।
सावन सोमवार : उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड के लिए सावन 2021 व्रत की तारीखें।
*25 जुलाई 2021, रविवार: श्रावण प्रारंभ
*26 जुलाई 2021, सोमवार: पहला श्रावण सोमवार व्रत
*2 अगस्त 2021, सोमवार: दूसरा श्रावण सोमवार व्रत
*9 अगस्त 2021, सोमवार: तीसरा श्रावण सोमवार व्रत
*16 अगस्त 2021, सोमवार: चौथा श्रावण सोमवार व्रत
*22 अगस्त 2021, रविवार: श्रवण समाप्त
सावन सोमवार : गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, गोवा और तमिलनाडु के लिए
*9 अगस्त 2021, सोमवार: श्रावण ने शुरू किया पहला श्रावण सोमवार व्रत
*16 अगस्त 2021, सोमवार: दूसरा श्रावण सोमवार व्रत
*23 अगस्त 2021, सोमवार: तीसरा श्रावण सोमवार व्रत
*30 अगस्त 2021, सोमवार: चौथा श्रावण सोमवार व्रत
*6 सितंबर, 2021, सोमवार: पांचवां श्रावण सोमवार व्रत
*7 सितंबर, 2021, मंगलवार: श्रवण समाप्त
सावन सोमवार: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों के लिए
*16 जुलाई 2021, शुक्रवार: श्रावण प्रारंभ
*19 जुलाई 2021, सोमवार: पहला श्रावण सोमवार व्रत
*26 जुलाई 2021, सोमवार: दूसरा श्रावण सोमवार व्रत
*2 अगस्त 2021, सोमवार: तीसरा श्रावण सोमवार व्रत
*9 अगस्त 2021, सोमवार: चौथा श्रावण सोमवार व्रत
*16 अगस्त 2021, सोमवार: श्रावण समाप्त
आस्था / शौर्यपथ /प्रतिवर्ष श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का त्योहार मनाया जाता है। इस बार बुधवार, 11 अगस्त 2021 को हरियाली तीज मनाई जाएगी। इस दिन सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भगवान शंकर और मां पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं। हरियाली तीज पर हरगिज न करें ये 5 काम आओ जानते हैं कि वे कौनसे कार्य हैं।
मान्यता है कि हरियाली तीज पर विधिवत पूजा करने के बाद सुहागिनों को भूलकर भी ये 5 कार्य नहीं करना चाहिए वर्ना अगले जन्म में अजगर, नाग, सांप या वन्य जीवों के रूप में जन्म लेना पड़ता है।
1. क्रोध नहीं करना चाहिए : कहते हैं कि क्रोध करने से व्रत फलविहीन हो जाता है। शांत चित्त रहने के लिए इस दिन महिलाओं को हाथों में मेहंदी लगाना चाहिए।
2. सोना नहीं चाहिए : इस दिन शिवजी और माता पार्वती की रातभर समय समय पर पूजा होती है तो महिलाओं को सोना नहीं चाहिए। मान्यता है कि राज में महिलाएं सो जाती हैं तो अगले जन्म में अजगर बनती हैं।
3. दूध का सेवन ना करें : मान्यता है कि यदि इस दिन महिलाएं दूध पी लेती हैं तो पाप लगता है और अगले जन्म में सर्प के रूप में जन्म लेना पड़ता है।
4. भोजन ना करें : इस दिन यदि व्रत रखा है तो कतई व्रत को ना तोड़ें। यह व्रत निर्जला रहकर किया जाता है। अगर खा-पी लें तो अगले जन्म में वानर रूप में जन्म लेना होता है। हालांकि कोई रोग या तकलीफ हो तो विद्वानों की सलाह पर व्रत को तोड़ा जा सकता है।
5. पति से छल कपट : इस दिन पति से किसी भी प्रकार का छल कपट नहीं करना चाहिए। इसी के साथ लड़ाई झगड़ा करना, झूठ बोलना, गलत व्यवहार करना आदि कार्य भी नहीं करना चाहिए।
इस दिन शिव पार्वती जी के भजन कीर्तन से पति दीर्घायु होता है और पत्नी को मनोवांछित लाभ मिलता है।
हरियाली तीज के शुभ और श्रेष्ठ मुहूर्त, जानिए कैसे मनाएं शुभ पर्व
श्रावण के पवित्र माह में तीज का त्योहार बहुत ही शुभ माना जाता है। प्रतिवर्ष श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भगवान शंकर और मां पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं। इस वर्ष 11 अगस्त 2021 को हरियाली तीज मनाई जाएगी। आइए जानें तीज पूजन के शुभ मुहूर्त और कैसे मनाएं यह पर्व-
हरियाली तीज पूजन के शुभ मुहूर्त-
हरियाली तीज बुधवार, 11 अगस्त 2021
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि मंगलवार, 10 अगस्त को शाम 06.11 मिनट से शुरू होगी और 11 अगस्त 2021, बुधवार को शाम 04.56 मिनट पर समाप्त होगी।
अमृत काल- सुबह 01:52 से 03:26 तक
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:29 से17 तक
विजय मुहूर्त- दोपहर 14 से 03.07 तक
गोधूलि बेला- शाम 23 से 06.47 तक
निशिता काल- रात 14 से 12 अगस्त सुबह 12:25 तक
रवि योग- 12 अगस्त सुबह 09:32 से 05:30 तक।
हरियाली तीज पर महिलाएं व्रत व पूजा करती हैं। हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह घर के काम और स्नान करने के बाद 16 श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा होती है। विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। इस खास त्योहार पर हरे वस्त्र, हरी चुनरी, हरा लहरिया, हरा श्रृंगार, मेहंदी, झूला झूलने का भी रिवाज है।
आइए जानें कैसे मनाएं शुभ पर्व-
* तीज के दिन महिलाएं सुबह से रात तक व्रत रखती हैं। इस व्रत में पूजन रात भर किया जाता है।
* इस उपलक्ष्य में बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है।
* एक चौकी पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सहेली की प्रतिमा बनाई जाती है।
* प्रतिमा बनाते समय भगवान का स्मरण करते रहें और पूजा करते रहें।
* हरियाली तीज के दिन चूडियां, महौर, खोल, सिंदूर, बिछुआ, मेहंदी, सुहाग चूड़ा, कुमकुम, कंघी, आदि श्रृंगार की जरूरी सामग्री लेकर पार्वती जी का श्रृंगार करें।
* श्रीफल, कलश, अबीर, चंदन, तेल और घी, कपूर, दही, चीनी, शहद, दूध और पंचामृत आदि से शिव परिवार का पूजन करें।
* पूजन-पाठ के बाद सुहागिन महिलाएं रात भर भजन-कीर्तन करें।
* हर प्रहर को इनकी पूजा करते हुए बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण करते रहे और आरती करें।
हरियाली तीज पर राहुकाल का समय, बुधवार- दोपहर 12:00 से 1:30 बजे तक रहेगा। अत: इस समय पूजन करने से बचें।
शौर्यपथ / कई लोगों में यह भ्रम है कि भारत को पहले आर्यावर्त कहते थे या भारत देश का एक नाम आर्यावर्त भी है, परंतु यह सच नहीं है। बहुत से लोग भारतवर्ष को ही आर्यावर्त मानते हैं जबकि यह भारत का एक हिस्सा मात्र था। वेदों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है। आर्यावर्त का अर्थ आर्यों का निवास स्थान। आर्यभूमि का विस्तार काबुल की कुंभा नदी से भारत की गंगा नदी तक था।
ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को 'सप्तसिंधु' प्रदेश कहा गया है। ऋग्वेद के नदीसूक्त (10/75) में आर्यनिवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है, जो मुख्य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा। उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे।
वेद और महाभारत को छोड़कर अन्य ग्रंथों में जो आर्यावर्त का वर्णन मिलता है वह भ्रम पैदा करने वाला है, क्योंकि आर्यों का निवास स्थान हर काल में फैलता और सिकुड़ता गया था इसलिए उसकी सीमा क्षेत्र का निर्धारण अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलता है। मूलत: जो प्रारंभ में था वही सत्य है।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद् भगवतोमहापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोन्हि द्वितिय परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे विक्रमनाम संवतरे मासोत्तमे मासे, अमुक मासे अमुक पक्षे, अमुक तिथौ, अमुक वासरे श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फलप्राप्तिकाम: अमुकगोत्रोत्पनोsहममुक नामे, सकलदुरितोपशमनं सर्वापच्छान्ति पूर्वक अमुक मनोरथ सिद्धयर्थ यथासपादित सामिग्रया श्री अमुक देवता पूजनं करिष्यये।।
एक मान्यता के अनुसार इसे आर्यावर्त भी कहा जाता था, परंतु उपरोक्त श्लोक कुछ ओर ही कहता है कि जम्बूद्वीप के भारतखण्ड के अंतर्गत भारतवर्ष और भारतवर्ष के अंतर्गत आयार्वत देश है। इस तरह के कुछ श्लोकों में आर्यावर्त देश के अंतर्गत ब्रह्मावर्तक देश का भी वर्णन मिलता है। यह संकल्प लेने वाले जातक के स्थान को प्रदर्शित करता है। भारतखंड में आर्यावर्त मुख्य रूप से आर्यो के रहने के स्थान था। यह बात इस संकल्प श्लोक से सिद्ध की जा सकती है जो प्रत्येक पूजा विधि की पुस्तकों में मिलता है।
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।
त्योरेवान्तरंग गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधा:।।- मनुस्मृति अध्याय-2, श्लोक-22
मनुस्मृति : झा जनार्दन/ द्वितीय संस्कारण-1926 : प्रकाशक वेजनाथ केडिया, प्रोपाइटर हिन्दी पुस्तक एजेंसी 129 हरिसन रोड कलकत्ता। मुद्रक किशोरीलाल केडिया, वणिक प्रेस, सरकार लेन- कलकत्ता।
कई जगहों पर इस भारतवर्ष को आर्यावर्त देश नाम से भी संबोधित किया गया है परंतु रामायण और महाभारत के पूर्व से प्रचलित मनुस्मृति में आर्यावर्त की सीमा का उल्लेख मिलता है कि पूर्व समुद्र से लेकर पश्चिम के समुद्र तक हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य भाग में जो भाग है, उसे विद्वान लोग आर्यावर्त कहते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि विन्ध्याचल के बाद का स्थान जो कन्याकुमारी तक फैला था वह आर्यावर्त के अंतर्गत नहीं था यह भारतखण्ड के अंतर्गत था। मार्केन्डय पुराण के अनुसार संपूर्ण भारतवर्ष के पूर्व, पश्चिम और दक्षिण की ओर समुद्र है जो कि उत्तर में हिमालय के साथ धनुष 'ज्या' (प्रत्यंचा) की आकृति को धारण करता है। लगभग सभी पुराणों में यही सीमा उल्लेख मिलता है।
आस्था,अतुल और राहुल,अंकिता,चंदन रहे इस साल विद्यालय के प्रमुख टॉपर
भिलाई / शौर्यपथ / केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल, नई दिल्ली द्वारा आज घोषित सीनियर सेकेंडरी सर्टिफिकेट परीक्षा परिणाम 2021 में शकुन्तला ग्रुप ऑफ स्कूल्स ने हमेशा की तरह इस वर्ष भी उत्कृष्ट परीक्षाफल देकर पालकों का विश्वास बनाये रखने में कामयाब रहा। 2020-21 में इस विद्यालय के कुल 295 विद्यार्थी सम्मिलित हुये। शाला का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रहा।
शाला स्तर पर आस्था सिद्दार 97.2 प्रतिशत के साथ प्रथम रही। अतुल नायक 96.4 प्रतिशत के साथ द्वितीय, राहुल देवांगन 95.8 प्रतिशत के साथ तृतीय, अंकिता सरकार 95.6 प्रतिशत के साथ चौथे एवं चंदन साहू 95.2प्रतिाश .के साथ पांचवें स्थान पर रहे। 90: से अधिक अंक पाने वाले 34 विद्यार्थी रहे। विद्यालय का परीक्षा परिणाम उत्कृष्ट रहा। उत्कृष्ट परीक्षाफल के लिए शकुन्तला ग्रुप ऑफ स्कूल्स के डायरेक्टर संजय ओझा ने प्राचार्य, उपप्राचार्य एवं संबधित शिक्षको को बधाई देते हुए अपने विद्यार्थियों और उनके पालकों की सराहना करते हुए उनको अपने पाल्य की उच्च शिक्षा के लिये सहयोग देने की अपील भी की। विद्यालय उश्रम से अतिउश्रम परीक्षाफल की ओर अग्रसर रहने का प्रयत्न करता है।
विद्यार्थियों के उत्कृष्ट परीक्षाफल के लिए स्कूल प्राचार्य विपिन कुमार, आरती मेहरा, प्रंबधक ममता ओझा, उपप्राचार्या जी रंजना कुमार, अनिता नायर, हेड मिस्ट्रेस अर्चना मेश्राम, सीनियर मिस्ट्रेस बलजीत कौर, व्याख्याता संजीव कुमार, रविधर दीवान, सीमा त्रिपाठी, भारती सिंह, दीपा मजुमदार, बी.एस. राजपूत, मनोज पांडे, सुनिता सक्सेना, ममता बोस, स्मिता साहू, शशि साह, रमिंदर कौर, राजेश्वरी गुुप्ता, सुजाता सोनकुल, एन. सुनील, जिशान बेग एवं अन्य शिक्षक-शिक्षिकाओं ने सामूहिक रुप से सभी विद्यार्थियों एवं अभिभावकों को बधाई देते हुए हर्ष व्यक्त किया।
भूमिका, पूर्वी ने पाया स्कूल में प्रथम तो श्रद्धा और दीक्षा ने पाया दूसरा और तीसरा स्थान
भिलाई / शौर्यपथ / केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल, नई दिल्ली द्वारा आयोजित सी.बी.एस.ई. सीनियर सेकेंडरी सर्टिफिकेट परीक्षा परिणाम आज घोषित हुआ। जिसमें शारदा विद्यालय रिसाली ने हमेशा की तरह इस बार भी कम व्यय सर्वोत्त्म शिक्षा के माध्यम से उत्कृष्ट परीक्षाफल देकर पालकों का विद्यालय में प्रति फिर विश्वास बनाए रखा। इस साल कक्षा बारहवी के इस विद्यालय से 142 विद्यार्थी सम्मिलित हुए जिसमें सभी का परीक्षा परिणाम उत्कृष्ट रहा और शाला का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत रहा।
भूमिका देवांगन एवं पूर्वी देवांगन 95.6 प्रतिशत विज्ञान संकाय प्राप्त कर शाला में प्रथम स्थान पर रहीं । इसी के साथ श्रध्दा सिंह 92.8 प्रतिशत वाणिज्य संकाय द्वितीय स्थान तथा दीक्षा मंडावी 92.2 प्रतिशत विज्ञान संकाय तृतीय स्थान पर रहीं। सात विद्यार्थियों ने 90 तथा 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए। अंग्रेजी में 95, पी.ई. में 98 , भौतिक में 96 , गणित में 97 , हिन्दी में 94 , रसायन में 96,ं जीव विज्ञान में 96, अर्थशास्त्र में 88, एकाउन्टस में 95, बिजनेस स्टडी में 93 एवं कम्पयूटर सांइस में 96 अंक रहे ।
उत्कृष्ट परीक्षाफल के लिए शकुन्तला गु्रप ऑफ स्कूल्स के डायरेक्टर संजय ओझा ने प्राचार्य एवं संबंधित शिक्षकों को बधाई दी एवं अपने विद्यार्थियों और उनके पालकों की सराहना करते हुए उनको अपने पाल्य की उच्च शिक्षा के लिये सहयोग देने की अपील भी की । विद्यालय उतम से अतिउत्तम परीक्षाफल की ओर अग्रसर रहने का प्रयत्न करता है।
विद्यार्थियों के उत्कृष्ट परीक्षाफल के लिए चेयरमैन स्कूल मैनेजिंग कमेटी विपिन ओझा, प्राचार्य गजेन्द्र भोई एवं मैनेजर ममता ओझा , विभोर ओझा, हेड मिस्ट्रेस पुष्पा सिंह, सीनियर मिस्ट्रेस पूजा बब्बर , शिक्षक - शिक्षिकाओं में निशा गुप्ता , अजय रॉय , अनुपमा सिंह, मीना शर्मा , डॉली ,अवनि चौरसिया, चारूश्री शर्मा, सुवर्णा शीलेदार, निकिता वामनकर, पी.विनी, एवं अन्य शिक्षक - शिक्षिकाओं ने सामूहिक रूप से सभी विद्यार्थियों एवं अभिभावकों को बधाई देते हुए हर्ष व्यक्त किया ।
रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश में आदिम जाति तथा अनुसूचित जनजाति विभाग द्वारा संचालित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में विद्यार्थी दूरस्थ अंचलों से प्रवेशित होते हैं, जहां पर शिक्षण के माध्यम अत्यंत सीमित हैं। कोविड-19 के फलस्वरूप शाला बंद होने के कारण विद्यार्थियों की शिक्षा प्रभावित हुई है। फलस्वरूप एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में ऑनलाईन शिक्षण हेतु विभाग द्वारा योजना तैयार की गई है। इस संबंध में सभी जिला कलेक्टरों को इन स्कूलों में योजना के प्रावधान अनुसार ऑनलाईन शिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित कराने निर्देशित किया गया है। जिन कक्षाओं में ऑफलाईन कक्षा संचालन की अनुमति नहीं है, उन कक्षाओं में तब तक ऑनलाईन अध्यापन व्यवस्था जारी रखने कहा गया है।
ऑनलाईन शिक्षण योजना का उद्देश्य इन विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को स्कूली शिक्षक द्वारा सीबीएसई, सीजी पाठ्यक्रम अनुसार पढ़ाई कराना, विद्यार्थियों को पढ़ाई से जोड़े रखना, नियमित टेस्ट का मूल्यांकन, विद्यार्थियों को मनोवैज्ञानिक सहायता और मार्गदर्शन, विद्यार्थियों के पालकों से संपर्क और विद्यार्थियों की परेशानी ज्ञात कर उनका निराकरण करना है। विद्यार्थियों को नियमित शिक्षण सहायता एवं मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए शाला स्तर पर ऑनलाईन अध्यापन का सेटअप तैयार कर विद्यार्थियों को गूगल मीट के द्वारा ऑनलाईन शिक्षा की व्यवस्था का प्रावधान है। योजना में विद्यार्थियों को कक्षावार, विषयवार अध्यापन, डाउट क्लास, मार्गदर्शन और मूल्यांकन शामिल है। ऑनलाईन शिक्षण का लाभ विद्यार्थियों को किस प्रकार मिल रहा है, इसके लिए विभागीय शिक्षकों, छात्रावास अधीक्षकों और मंडल संयोजकों के माध्यम से मैदानी स्तर पर मॉनिटरिंग का प्रावधान है।
ऑनलाईन शिक्षण योजना का क्रियान्वयन सहायक आयुक्त आदिवासी विकास स्तर पर एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों की प्राचार्यों की बैठक लेकर विद्यालयवार संचालित होने वाली कक्षावार और विषयवार विद्यार्थियों की संख्या और उपलब्ध विषयवार शिक्षकों की जानकारी ली जाएगी। इसके बाद प्रत्येक विद्यालय में इंटरनेट कनेक्टिविटी के क्या साधन उपलब्ध हैं और विद्यालय में ऑनलाईन शिक्षण के लिए अन्य आवश्यक सामग्रियों की समीक्षा की जाएगी। विद्यार्थियों की कक्षावार और विषयवार टाईम-टेबल बनाने के बाद कक्षावार ऑनलाईन क्लास के लिए सामग्री और शिक्षकों की आवश्यकता का आंकलन किया जाएगा। व्यवस्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय को नोडल विद्यालय बनाया जाएगा और यहीं से जिले के अन्य एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय जहां ऑनलाईन शिक्षण की सुविधा नहीं हो को भी ऑनलाईन से जोड़ा जाएगा। सभी शिक्षकों से नोडल विद्यालय में ही शिक्षण कार्य लिया जाएगा। मॉनिटरिंग के लिए जिले के छात्रावास अधीक्षकों, मंडल संयोजकों को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
प्रत्येक जिले में एक एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय को नोडल स्कूल के रूप में चिन्हांकित किया जाएगा, जहां शिक्षक और ऑनलाईन शिक्षण हेतु संसाधन उपलब्ध होंगे। नोडल विद्यालय में किसी भी कक्षा, विषय में अध्यापन के लिए बच्चों का समूह 120 से अधिक नहीं होगा। बच्चों की संख्या ज्यादा होती है तो ऑनलाईन के लिए दूसरे समूह और सेटअप भी स्कूल में बनाया जाएगा। जिले के अन्य एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय के विद्यार्थियों की जानकारी नोडल प्राचार्य के पास उपलब्ध कराई जाएगी। नोडल विद्यालय में कक्षावार शिक्षा के लिए ऑनलाईन प्लेटफार्म बनाया जाएगा, जहां पर सभी आवश्यक डिजिटल उपकरण उपलब्ध हों। ऑनलाईन अध्ययन के लिए शिक्षकों की व्यवस्था कलेक्टर द्वारा की जाएगी। इससे पहले स्थायी शिक्षकों और अन्य शालाओं से शिक्षक संलग्न कर टीम बनाई जाएगी। यह अध्यापन टीम कक्षावार, विषयवार, ऑनलाईन प्लेटफार्म से टाईम-टेबल अनुसार अध्यापन कार्य करेंगे। विषयवार प्रत्येक विषय के लिए एक कोरगु्रप बनाया जाएगा, जिसमें उस विषय के न्यूनतम तीन शिक्षक होंगे। इनका दायित्व गु्रप की प्रति सप्ताह बैठक कर उसमें विषय से संबंधित अध्यापन की समीक्षा करना तथा इसे और कैसे बेहतर बनाया जाए इस पर चर्चा करना होगा। नोडल प्राचार्य द्वारा ऑनलाईन अध्यापन का कार्यक्रम बनाकर कार्य किया जाएगा। ऑनलाईन अध्यापन के लिए सामान्यतः गूगल मीट का उपयोग किया जाएगा। शिक्षण को बेहतर बनाने के लिए आवश्यकता पड़ने पर संदर्भ सामग्री यू-ट्यूब, दीक्षा, स्वयंप्रभा, पढ़ई तुंहर दुआर द्वारा पोर्टल से ली जा सकेगी। ऑनलाईन अध्ययन के लिए सभी स्कूल के बच्चों का आईडी बनाया जाएगा। विषय शिक्षक द्वारा प्रत्येक दिन का लिंक विद्यार्थियों को भेजा जाएगा, जिस पर विद्यार्थी अपने आईडी, पासवर्ड से ऑनलाईन कक्षा में जुड़ेंगे। किस स्कूल से कितने और कौन विद्यार्थी कक्षा से जुड़े और अनुपस्थित रहे इसकी जानकारी विषय शिक्षक द्वारा रखी जाएगी। विषय शिक्षक द्वारा मासिक टेस्ट और मूल्यांकन भी किया जाएगा और मासिक प्रगति रिपोर्ट प्राचार्य को भेजी जाएगी। ऑनलाईन शिक्षक की आवश्यक व्यवस्था और मॉनिटरिंग सहायक आयुक्त आदिवासी द्वारा और राज्य स्तर पर आयुक्त द्वारा समीक्षा की जाएगी। ग्राम स्तर से विभागाध्यक्ष स्तर तक मॉनिटरिंग की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है।
शौर्यपथ /इस बार आप फ्रेंडशिप डे के मौके पर मार्केट के बजाय घर पर ही बनाएं आसानी से फ्रेंडशिप बैंड। अपनाएं आसान से टिप्स।
* मोतियों वाला फ्रेंडशिप बैंड बनाने के लिए आपको सूई-धागे और मोतियों की जरूरत पड़ेगी। आप अलग-अलग साइज के मोती लीजिए।
* अब एक लंबा धागा सूई में डालें। धागे को छोटा न लें और इससे लंबा ही रखें।
* अब मोतियों को आप इन धागों में पिरोते जाएं। अगर आपने अलग-अलग साइज के मोती लिए हैं, तो पहले बड़ा मोती फिर उससे छोटा मोती पिरोते जाएं।
* अपने साइज के हिसाब से फ्रेंडशिप बैंड में मोती पिरो लें तो बचे हुए धागे को कांट लें और दोनों छोर से धागे पर गठान बांध लें जिससे कि मोती निकल न पाएं।
तो लीजिए इन आसान स्टेप्स को फॉलो कर आप घर पर ही बना सकती हैं मोतियों का फ्रेंडशिप बैंड।
2. कैसे बनाएं सिम्पल फ्रेंडशिप बैंड-
* एक आइसक्रीम स्टीक लें। अब पेन या पेंसिल से इस पर उल्टा C शेप बनाकर उसे उस शेप के हिसाब से कट कर लें।
* अब उस शेप में कटी हुई स्टीक पर आप अपने फ्रेंड का नाम या कोई मैसेज जैसे 'बेस्ट फ्रेंड फॉर एवर' या 'बेस्ट फ्रेंड' लिख सकते हैं।
* आप अलग-अलग कलर के साथ इस पर आउटलाइन बना सकते हैं।
* अब स्टीक को उल्टा करके उसके पीछे ग्लू लगा लें। अब एक डोरी लें, जो हाथ पर मजबूती के साथ बंध सके।
* उसे ग्लू के ऊपर चिपका लें। सैलो टेप चिपका लें।
* अब फ्रेंडशिप बैंड के साइड में डोरी के ऊपर अपने हिसाब से मोती चिपका लें। ऐसे करके आप अपने फ्रेंडशिप बैंड को सजा सकते हैं।
तो लीजिए तैयार है आपका घर पर बना फ्रेंडशिप बैंड सिम्पल फ्रेंडशिप बैंड।
शौर्यपथ /दोस्त की जरूरत सभी को होती है। फिर आप कोई सी भी उम्र के हो। स्कूल के शुरूआत से जीवन के आखिरी पड़ाव तक। कहते हैं दोस्त नहीं होता है तो जिंदगी कुछ नहीं है। लेकिन दोस्त अगर रूठ जाएं तो जिंदगी उससे भी अधिक बुरी होती है। दोस्त नहीं होने के गम से अधिक दोस्त के रूठ जाने या बात नहीं करने का गम अधिक हेाता है। इसलिए अगर आपके दोस्त भी आपसे किसी वजह से रूठ गए है तो इस फ्रेंडशिप डे पर उन्हें जरूर मना लें। आप उन्हें गिफ्ट्स भी दे सकते हैं, लेकिन उनकी पसंद के। ताकि वह मान जाएं। और आपसे फिर से दोस्ती कर लें। साथ ही प्रॉमिस भी करें लड़ाई होती रहेगी लेकिन दोस्ती कभी नहीं टूटेगी। तो आइए जानते हैं अपने दोस्त को मनाने के लिए क्या गिफ्ट्स दे सकते हैं -
1. ऑनलाइन गिफ्ट - अगर आपका दोस्त किसी अलग शहर में है तो आप गिफ्ट सीधे अपने दोस्त के घर भी भेज सकते हैं। और आपसे इतने खास दिन पर गिफ्ट पा कर जरूर मान जाएगा। ऑनलाइन गिफ्ट में आप उन्हें जरूरतमंद चीज दे सकते हैं, उनके फेवरेट आयटम दे सकते हैं, कोई कैरेक्टर दे सकते हैं जो उन्हें पसंद है या इंस्पायर करते हैं।
2. पर्सनलाइज्डगिफ्ट- आप अपने दोस्त के लिए पर्सनलनाइज्ड गिफ्ट भी खरीद कर दे सकते हैं। कॉफी मग, मोबाइल कवर, पेन, पिलो कवर, टी-शर्ट, फोटो फ्रेम, दीवार घड़ी यह कुछ गिफ्ट। इन सभी गिफ्ट पर आपकी और आपके दोस्त की फोटो हो सकती है, आप दोनों के कुछ फनी या सबसे साथ में बिताएं सुगम के पलों का एक कोलाज भी बना सकते हैं या अपने दोस्त का फनी केरेक्टर भी डिजाइन करा सकते हैं।
3. मेल या फीमेल दोस्त - अक्सर किसी के लड़के दोस्त अधिक होते हैं तो किसी की लड़कियां दोस्त अधिक होती है। पर समझ नहीं पाते हैं कि उन्हें गिफ्ट क्या दें। अगर आपके लड़के दोस्त अधिक है तो आप उन्हें कई सारे गिफ्ट दे सकते हैं। जैसे - पर्स, हाथ घड़ी, सनग्लास, पेन, परफ्यूम, बेल्ट, ब्रोच, टाई, टी-शर्ट, शर्ट दे सकते हैं। वहीं अगर लड़की की बात की जाएं तो वैसे गिफ्ट आयटम की कमी नहीं है। जैसे- ईयरिंग, हाथ घड़ी, टॉप, पर्स, सनग्लास, मेकअप प्रोडक्ट, फुटवियर, हैंड बैग, बैग पैक दे सकते हैं।
4. गिफ्ट कूपन - कभी हम समझ नहीं पाते हैं कि दोस्त को गिफ्ट क्या दें। या उन्हें किस चीज की जरूरत है। ऐसे में आप गिफ्ट कूपन दे सकते हैं। जहां सभी तरह के आइटम उपलब्ध हो और वह अपनी पसंद से ले सकें। आज कल कई सारी एमएनसी कंपनियां गिफ्ट कूपन भी प्रोवाइड करती है। शायद इस खास दिन पर दोस्त को अपनी पसंद की या जरूरत की चीज मिल जाएं।
व्रत त्यौहार / शौर्यपथ / हरियाली अमावस्या को श्रावणी अमावस्या कहते हैं। सावन मास की अमावस्या और पूर्णिमा तिथि का बहुत महत्व होता है। हरियाली अमावस्या सावन शिवरात्रि के दूसरे दिन पड़ती है। इस साल सावन की हरियाली अमावस्या 8 अगस्त रविवार के दिन है। इस दिन व्यातीपात और वरियान योग साथ में पुष्य नक्षत्र रहेगा। आओ जानते हैं 20 खास बातें।
1. हरियाली अमावस्या के दिन पौधा रोपड़ का बहुत महत्व होता है। हरियाली अमावस्या पर देववृक्ष पीपल, बरगद, केला, नींबू, तुलसी आदि का वृक्षारोपण करना शुभ माना जाता है।
2. इस दिन पितृदोष से मुक्ति हेतु पितृ तर्पण वह पिंडदान किया जाता है।
3. हरियाली अमावस्या के दिन भगवान शिव को सफेद आंकड़े के फूल, बिल्व पत्र और भांग, धतूरा चढ़ाएं। इस दिन भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से करना चाहिए।
4. इस दिन सावन के झुले में बच्चे और महिलाएं झुले झुलते हैं।
5. इस दिन अमावस्या का व्रत रखा जाता है।
6. इस दिन नदी या कुंड में स्नान करके पितरों के निमित्त तर्पण करने का महत्व रहता है।
7. इस दिन दान देने का महत्व भी बढ़ जाता है। दीपदान भी करना चाहिए।
8. इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करके उसकी परिक्रमा की जाती है।
9. इस दिन किसी नदी या तालाब में जाकर मछली को आटे की गोलियां खिलाने से धन समृद्धि की प्राप्ति होती है।
10. इस दिन घर के पास चींटियों को सूखे आट में चीनी मिलाकर खिलाने से संभी तरह के संकट दूर होते हैं।
11. इस दिन हनुमान मंदिर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमानजी को सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं।
12. इस दिन किसी गरीब व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद उसे दक्षिणा दें।
13. इस दिन आटे के दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करने से पितृदेव और माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
14. इस दिन गेहूं और ज्वार की धानी का प्रसाद वितरण करें।
15. इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं।
16. अमावस्या के दिन भूत-प्रेत, पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य ज्यादा सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। ऐसे दिन की प्रकृति को जानकर विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
17. इस दिन शनिदेवजी के मंदिर में विधि अनुसार दीपक लगाने से वे प्रसन्न होते हैं।
18. हरियाली अमावस्या के दिन शिवजी और श्रीविष्णु के मंत्रों का जाप और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें।
19. इस दिन पितृसूक्त पाठ, गीता पाठ, गरुड़ पुराण, गजेंद्र मोक्ष पाठ, रुचि कृत पितृ स्तोत्र, पितृ गायत्री पाठ, पितृ कवच का पवित्र पाठ या पितृ देव चालीसा और आरती करें।
20. हरियाली अमावस्या की रात्रि में पूजा करते समय पूजा की थाली में स्वास्तिक या ॐ बनाकर और उसपर महालक्ष्मी यंत्र रखें फिर विधिवत पूजा अर्चना करें, ऐसा करने से घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होगा और आपको सुख समृद्धि की प्राप्ति होगी।
धर्म संसार / शौर्यपथ /31 जुलाई 2021 शनिवार को कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन भैरव बाबा के लिए व्रत रखा जाता है। हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार हिन्दू कैलेंडर में हर माह आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मासिक कालाष्टमी पर्व के रूप में मनाई जाती है। यह अष्टमी भगवान भैरव को समर्पित है तथा इसे काला अष्टमी भी कहा जाता है। यह तिथि भगवान भैरव से असीम शक्ति प्राप्त करने का समय मानी जाती है अत: इस दिन पूजा और व्रत करने का विशेष महत्व है।
भैरव बाबा को कैसे करें प्रसन्न :
1. इस दिन भगवान बटुक भैरव को कच्चा दूध अर्पित करें।
2. इस दिन भगवान काल भैरव को शराब अर्पित करें।
3. कई लोग इस दिन उन्हें शराब का भोग लगाते हैं।
4. हलुआ, पूरी और मदिरा उनके प्रिय भोग हैं।
5. इसके अलावा इमरती, जलेबी और 5 तरह की मिठाइयां भी अर्पित की जाती हैं।
काल भैरव की पूजा विधि
1. इस दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर नित्य-क्रिया आदि कर स्वच्छ हो जाएं।
2. एक लकड़ी के पाट पर सबसे पहले शिव और पार्वतीजी के चित्र को स्थापित करें। फिर काल भैरव के चित्र को स्थापित करें।
3. जल का छिड़काव करने के बाद सभी को गुलाब के फूलों का हार पहनाएं या फूल चढ़ाएं।
4. अब चौमुखी दीपक जलाएं और साथ ही गुग्गल की धूप जलाएं।
5. कंकू, हल्दी से सभी को तिलक लगाकर हाथ में गंगा जल लेकर अब व्रत करने का संकल्प लें।
6. अब शिव और पार्वतीजी का पूजन करें और उनकी आरती उतारें।
7. फिर भगवान भैरव का पूजन करें और उनकी आरती उतारें।
8. इस दौरान शिव चालीसा और भैरव चालीसा पढ़ें।
9. ह्रीं उन्मत्त भैरवाय नमः का जाप करें। इसके उपरान्त काल भैरव की आराधना करें।
10. अब पितरों को याद करें और उनका श्राद्ध करें।
11. व्रत के सम्पूर्ण होने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं या कच्चा दूध पिलाएं।
12 अंत में श्वान का पूजन भी किया जाता है।
13. अर्धरात्रि में धूप, काले तिल, दीपक, उड़द और सरसों के तेल से काल भैरव की पूजा करें।
14. इस दिन लोग व्रत रखकर रात्रि में भजनों के जरिए उनकी महिमा भी गाते हैं।
काल भैरव मंत्र ( kaal bhairav mantra ) :
अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,
भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!!
अन्य मंत्र:
ॐ कालभैरवाय नम:।
ॐ भयहरणं च भैरव:।
ॐ ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।
ॐ भ्रं कालभैरवाय फट्।
नारद पुराण के अनुसार कालभैरव की पूजा करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्य किसी रोग से लम्बे समय से पीड़ित है तो वह रोग, तकलीफ और दुख भी दूर होती हैं।
काल भैरव आरती:
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैंरव देवा।
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा।।
तुम्हीं पाप उद्धारक दुख सिंधु तारक।
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक।।
वाहन शवन विराजत कर त्रिशूल धारी।
महिमा अमिट तुम्हारी जय जय भयकारी।।
तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होंवे।
चौमुख दीपक दर्शन दुख सगरे खोंवे।।
तेल चटकि दधि मिश्रित भाषावलि तेरी।
कृपा करिए भैरव करिए नहीं देरी।।
पांव घुंघरू बाजत अरु डमरू डमकावत।।
बटुकनाथ बन बालक जन मन हर्षावत।।
बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावें।
कहें धरणीधर नर मनवांछित फल पावें।।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
