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सेहत / शौर्यपथ / सब्जियों में मशहूर खीरा हर किसी को पसंद होता है। कई लोग इसे सलाद के रूप में नियमित खाना पसंद करते हैं। शरीर को हाइड्रट रखने के साथ ही त्वचा की खूबसूरती तक कई अनमोल गुणों का खजाना है खीरा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि खीरे खाने के तुरंत बाद पानी पीना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि खीरे में पानी के साथ ही अन्य पोषक तत्व भी उचित मात्रा में मौजूद होते हैं और खीरा खाने के बाद पानी पीने से आप उन आवश्यक पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं, जो शरीर को फायदा पहुंचाने वाले होते हैं।
खीरे की सबसे बड़ी खासियत है, कि इसमें 80 प्रतिशत पानी होता है। खीरा प्यास बुझाता है और शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। खीरा खाने के बाद शरीर को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है। यह हमारे शरीर के आंतरिक अंगों और त्वचा की गहराई से सफाई करता है। इसके अलावा धूप से झुलसी हुई त्वचा को न केवल राहत देता है बल्कि त्वचा की जलन और टेनिंग भी कम करता है। हमें प्रतिदिन कुछ विटामिन्स लेना बेहद जरूरी होता है।
जैसे विटामिन ए, बी और सी हमें नियमित लेना चाहिए। खीरा अकेला हमें प्रतिदिन के विटामिन्स देता है। खीरे के छिलके में विटामिन सी होता है। खीरा में पौटेशियम, मैगनीशियम और सिलीकॉन अत्यधिक मात्रा में होता है। यह खनिज त्वचा के लिए बहुत जरूरी हैं। खीरा में जल की मात्रा ज्यादा होती है जबकि कैलोरी नहीं। इसलिए यह जल्दी पेट को तृप्त करती है।
आइए अब आप भी जान लीजिए खीरा खाने के बाद पानी पीने से सेहत को क्या नुकसान होता है ?
1. पाचन की समस्याएं- हम सभी जानते हैं कि भोजन को डाइजेस्ट करने के लिए पीएच लेवल की आवश्यकता होती है, लेकिन खीरे के साथ या इसे खाने के तुरंत बाद पानी पीने से पीएच लेवल कमजोर हो जाता है। और यह खाना या खाद्य पदार्थों को पचाने के लिए आवश्यक एसिड प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाता, जिससे पाचन संबंधी समस्याएं होने लगती है।
2. पोषक तत्व- खीरे में 80 प्रतिशत पानी और अन्य पोषक तत्व होते हैं। अत: अन्य पोषक तत्व भी उचित मात्रा में मौजूद होते हैं और खीरा खाने के बाद पानी पीने से आप उन आवश्यक पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं।
3. प्राकृतिक प्रक्रिया को नुकसान- खीरे खाने के बाद पानी पीने से जीआई गतिशीलता बढ़ जाती है, अत: यह पाचन और अवशोषण की प्राकृतिक प्रक्रिया को भी नुकसान पहुंचता है।
4. लूजमोशन (दस्त), डायरिया की समस्या- विशेषज्ञों की मानें तो खीरा खाने से कब्ज की समस्या नहीं होती है। लेकिन अगर आप खीरे के बाद पानी पीते हैं तो इससे डायरिया और लूजमोशन की शिकायत हो सकती है।
5. इन चीजों के साथ भी न पीएं पानी- विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ खीरा ही नहीं बल्कि पानी से भरपूर कई फल जैसे अनानस, तरबूज और स्ट्रॉबेरी के बाद पीने न पीने की सलाह देते हैं। इसलिए खीरा खाने और पानी पीने के बीच कम से कम 20 से 30 मिनट का अंतराल रखना उचित रहता है।
6. और क्या-क्या न खाएं- इसके अलावा अगर आप सलाद के रूप में खीरा खाने के बाद भोजन के साथ लस्सी पीते हैं तो खीरे के ऊपर लस्सी पीना आपका पेट खराब कर सकती है और आपको पेट संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। अत: खीरा खाने के तुरंत बाद लस्सी कभी भी न पीएं। साथ ही खीरे के ऊपर दूध भी पीने से बचना चाहिए, क्योंकि खीरे की तासीर ठंडी होती हैं और इसके ऊपर गरम दूध पीने से व्यक्ति को खांसी, बुखार और अन्य कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / मानसून में हेयर फॉल होना आम बात है लेकिन बहुत बाल झड़ना परेशानी बन जाती है। अक्सर मन में ख्याल आने लगते हैं कही सारे बाल नहीं झड़ जाएं। कई बार यह सोच-सोच कर और अधिक बाल गिरने लगते हैं। ऐसे में परेशान होने की जरूरत नहीं है। आपको बताने जा रहे हैं कलौंजी के तेल के बारे में जिसे लगाने के बाद आपको बहुत हद तक आराम मिलेगा। और बाल पोषण से भरपूर नजर आएंगे। आइए जानते हैं कैसे बनाएं कलौंजी का तेल है और इससे होने वाले फायदों के बारे में -
सामग्री - 1 बड़ा चम्मच कलौंजी
-1 बड़ा चम्मच मेथी दाना
-200 एमएल नारियल तेल
-50 एमएल अरंडी का तेल और
कांच का बाउल
विधि - कलौंजी और मेथी दानों को पीस लें। इस पाउडर को कांच के बाउल में निकाल दें। इसके बाद नारियल तेल और अरंडी का तेल डालकर मिक्स करें। बाउल को ढककर धूप में रख दें। कम से कम 3 सप्ताह रखें। इसके बाद तेल को हिलाकर हर सप्ताह में कम से कम 2 बार जरूर लगाएं। एक महीने में आपको फर्क नजर आने लगेगा। और झड़ते बालों से बहुत हद तक राहत भी मिल जाएगी।
कलौंजी के तेल के फायदे -
दरअसल कलौंजी के तेल सिर में नमी प्रदान कर बालों को पोषित करता है। इसका तेल सिर में लगाने से कंडीशनिंग का काम भी होता है। इसमें एंटी इंफ्लेमेटरी,एंटी बैक्टीरियल और एंटीफंगल मौजूद होते हैं। जो सिर में हो रहे रूसी, डैंड्रफ और गंदगी से रक्षा करती है। कुछ लोगों के सिर में तेल का उत्पादन कम होता है। इससे बाल रूखे और बेजान हो जाते हैं। इस वजह से कलौंजी का तेल फायदेमंद है।
आस्था / शौर्यपथ /धार्मिक शास्त्रों के अनुसार प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन एक विशेष व्रत किया जाता है। जिसे जया-पार्वती व्रत अथवा विजया-पार्वती व्रत के नाम से जाना जाता है। यह व्रत पांच दिनों तक यानी शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होकर श्रावण मास के कृष्ण पक्ष तृतीया तक चलता है। वर्ष 2021 में यह व्रत 22 जुलाई से शुरू 26 जुलाई तक जारी रहेगा।
यह व्रत को पूरे मन से करने पर भगवान शिव और पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह मालवा क्षेत्र का लोकप्रिय पर्व है और बहुत कुछ गणगौर, हरतालिका, मंगला गौरी और सौभाग्य सुंदरी व्रत की तरह है। इस व्रत से माता पार्वती को प्रसन्न किया जाता है। अखंड सौभाग्य और समृद्धि के लिए वह व्रत रखा जाता है। पुराणों के अनुसार यह व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
यह व्रत करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होता है। इस व्रत का रहस्य भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को बताया था। कहीं इसे एक दिन और कहीं इसे 5 दिन तक मनाया जाता है। इस व्रत को कुंआरी लड़कियां अच्छा पति तथा सुहागिनें पति की दीर्घायु के लिए रखती है। इस व्रत को शुरू करने के बाद कम से कम 5, 7, 9, 11 या 20 साल तक करना होता है।
इस व्रत में बालू रेत का हाथी बना कर उन पर 5 प्रकार के फल, फूल और प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। इस व्रत में नमक खाने की मनाही होती है। इसके अलावा गेहूं का आटा और सभी तरह की सब्जियां भी नहीं खाना चाहिए ऐसी मान्यता है। व्रत के दौरान फल, दूध, दही, जूस एवं दूध से निर्मित मिठाइयां खा सकते हैं। इस व्रत में सिर्फ एक समय बिना नमक का ज्वार से बना भोजन किया जाता है। आइए जानें विजया-पार्वती व्रत के दिन कैसे करें व्रत पूजन-
कैसे करें विजया-पार्वती व्रत का पूजन-
* आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान करें।
* तत्पश्चात व्रत का संकल्प करके माता पार्वती का स्मरण करें।
* घर के मंदिर में शिव-पार्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
* फिर शिव-पार्वती को कुंमकुंम, शतपत्र, कस्तूरी, अष्टगंध और फूल चढ़ाकर पूजा करें।
* नारियल, अनार व अन्य सामग्री अर्पित करें।
* अब विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन करें।
* माता पार्वती का स्मरण कर स्तुति करें।
* फिर मां पार्वती का ध्यान धरकर सुख-सौभाग्य और गृहशांति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना कर अपने द्वारा हुई गलतियों की क्षमा मांगें।
* पार्वती मंत्र : ॐ शिवाय नम: का अधिक से अधिक जाप करें।
* कथा का श्रवण करें, कथा के बाद आरती कर पूजन संपन्न करें।
* ब्राह्मण को भोजन करवाएं और इच्छानुसार दक्षिणा देकर, चरण छूकर आशीर्वाद लें।
* अगर बालू रेत का हाथी बनाया है तो रात्रि जागरण के पश्चात उसे नदी या जलाशय में विसर्जित करें।
विजया-पार्वती व्रत पूजन के शुभ मुहूर्त-
* अभिजीत मुहूर्त- अपराह्न 11:57 से 12:52 तक।
* विजय मुहूर्त दोपहर 02:43 से 03:38 तक।
* गोधूलि - सायंकाल 07:05 से 07:29 तक रहेगा।
कथा-
विजया पार्वती व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार किसी समय कौंडिल्य नगर में वामन नाम का एक योग्य ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सत्या था। उनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान नहीं होने से वे बहुत दुखी रहते थे।
एक दिन नारद जी उनके घर पधारें। उन्होंने नारद की खूब सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। तब नारद जी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शिव माता पार्वती के साथ लिंगस्वरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूरी होगी।
तब ब्राह्मण दंपत्ति ने उस शिवलिंग की ढूंढकर उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इस प्रकार पूजा करने का क्रम चलता रहा और 5 वर्ष बीत गए। एक दिन जब वह ब्राह्मण पूजन के लिए फूल तोड़ रहा था तभी उसे सांप ने काट लिया और वह वहीं जंगल में गिर गया। ब्राह्मण जब काफी देर तक घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी उसे ढूंढने आई। पति को इस हालत में देख वह रोने लगी और वन देवता व माता पार्वती को स्मरण किया।
ब्राह्मणी की पुकार सुनकर वन देवता और मां पार्वती चली आईं और ब्राह्मण के मुख में अमृत डाल दिया, जिससे ब्राह्मण उठ बैठा। तब ब्राह्मण दंपत्ति ने माता पार्वती का पूजन किया। माता पार्वती ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने के लिए कहा। तब दोनों ने संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की, तब माता पार्वती ने उन्हें विजया पार्वती व्रत करने की बात कहीं।
आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन उस ब्राह्मण दंपत्ति ने विधिपूर्वक माता पार्वती का यह व्रत किया, तब उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इस दिन व्रत करने वालों को संतान की प्राप्ति होती है तथा उनका सौभाग्य अखंड बना रहता है।
आस्था / शौर्यपथ /ज्योतिषीयों अनुसार पितृदोष कई प्रकार का होता है। कुंडली की भिन्न स्थिति अनुसार जाना जाता है कि किसी जातक को पितृदोष हैं या नहीं। कहते हैं कि पितृदोष के होने से व्यक्ति की आर्थिक उन्नती रुक जाती है, गृहकलह होता है, घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं हो पाता है। आओ जानते हैं पितृ दोष के 12 कारणों को।
1. कुंडली का नौवां घर यह बताता है कि व्यक्ति पिछले जन्म के कौन से पुण्य साथ लेकर आया है। यदि कुंडली के नौवें में राहु, बुध या शुक्र है तो यह कुंडली पितृदोष की है।
2. कुंडली के दशम भाव में गुरु के होने को शापित माना जाता है। गुरु का शापित होना पितृदोष का कारण है।
3. सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष माना जाता है।
4. लग्न में राहु है तो सूर्य ग्रहण और पितृदोष, चंद्र के साथ केतु और सूर्य के साथ राहु होने पर भी पितृदोष होता है।
5. पंचम में राहु होने पर भी कुछ ज्योतिष पितृदोष मानते हैं।
6. जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है।
7. विद्वानों ने पितर दोष का संबंध बृहस्पति (गुरु) से बताया है। अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घटता है और यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है।
8. घर का उत्तर और ईशान कोण सही नहीं है तो देवदोष और पितृदोष का कारण बनेगा।
8. यदि आपके ग्रह-नक्षत्र भी सही हैं, घर का वास्तु भी सही है तब भी किसी प्रकार का कोई आकस्मिक दुख या धन का अभाव बना रहता है, तो फिर पितृ बाधा पर विचार करना चाहिए। हो सकता है कि आपके कर्म खराब हों।
8. सभी कुछ ठीक होने के बाद भी परेशानी है तो यह माना जाता है कि आपके पूर्वजों के कर्म का आप भुगतान कर रहे हैं।
9. आपके किसी पूर्वज या कुल के किसी सदस्य का रोग आपको लगा है तो यह भी पितृदोष माना जाता है।
10. पितृ बाधा का मतलब यह होता है कि आपके पूर्वज आपसे कुछ अपेक्षा रखते हैं। उनकी मुक्ति नहीं हो पाई है या कोई अदृश्य शक्ति आपको परेशान करती है तो भी पितृ दोष माना जाता है।
11. जब कोई जातक अपने जातक पूर्व जन्म में धर्म विरोधी कार्य करता है तो वह इस जन्म में भी अपनी इस आदत को दोहराता है। ऐसे में उस पर यह दोष स्वत: ही निर्मित हो जाता है। धर्म विरोधी का अर्थ है कि आप भारत के प्रचीन धर्म हिन्दू धर्म के प्रति जिम्मेदार नहीं हो।
12. यदि आपने अपने पितरों या पूर्वजों का धर्म छोड़ दिया है, कुल धर्म, कुलदेव या कुल देवी का त्याग कर दिया है तो पितृ दोष लगेगा, जो कई जन्मों तक पिछा करता है।
पितृदोष के मुख्य 7 कारण
1. घर के पितरों या बड़ों ने पारिवारिक पुजारी या धर्म बदला होगा।
2. घर के पास में किसी मंदिर में तोडफोड़ हुई होगी या कोई पीपल का पेड़ काटा गया होगा।
3. पिछले जन्म में आपने कोई पाप किया होगा। अपने पिता या माता को सताया होगा।
4. आपके पूर्वजों ने कोई पाप किया होगा जिसका परिणाम आपको भुगतना पड़ रहा है।
5. आप किसी पाप कर्म में संलग्न है जिसके चलते आपे पूर्वज आपने रुष्ठ हो चले हैं।
6. कुछ लोग हमेशा अपने माता-पिता या अपनी संतानों को कोसते, सताते रहते हैं।
7. आपने गाय, कुत्ते और किसी निर्दोष जानवर को सताया होगा।
निवारण : इसका सरल-सा निवारण है कि प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ना। पूर्वजों के धर्म में विश्वास रखना, कुलदेवी और कुलदेव की पूजा करना और श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धा रखना।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ /छोटे स्तर पर किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि मां के दूध में कोरोना टीकों के अंश नहीं मिले। इससे संकेत मिलता है कि एमआरएनए आधारित टीके स्तनपान कराने वाली महिलाओं और उनके बच्चों के लिए सुरक्षित हैं। फाइजर और मॉडर्ना के टीकों की खुराक ले चुकी महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया।
शोध पत्रिका जेएएमए पीडीऐट्रिक्स में प्रकाशित अध्ययन में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। साथ टीका लेने के बाद बच्चों को दूध पिलाना रोकने संबंधी चिंताओं को दूर किया गया। अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (यूएससीएफ) के शोधकर्ताओं ने फाइजर और मॉडर्ना के एमआरएनए आधारित टीके लेने के बाद सात महिलाओं के दूध का विश्लेषण किया और इसमें टीके की खुराक का कोई अंश नहीं मिला।
शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने स्तनपान कराने वाली महिलाओं का टीकाकरण कराए जाने की सिफारिश की है। एकेडमी ऑफ ब्रेस्टफीडिंग मेडिसीन के मुताबिक स्तन के उत्तकों या दूध में टीके के अंश पहुंचने की संभावना बहुत कम है।
यूसीएसएफ के एक सहायक प्रोफेसर ने कहा कि यह परिणाम मौजूदा सिफारिशों को मजबूती देता है कि एमआरएनए आधारित टीके स्तनपान कराने वाली महिलाओं और उनके बच्चों के लिए सुरक्षित हैं तथा महिलाओं को अपने बच्चों को स्तनपान कराना बंद नहीं करना चाहिए। शोध के अग्रणी लेखक यार्डन गोलन ने कहा कि दूध के किसी भी नमूने में टीके के अंश नहीं मिले। यह अध्ययन दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 के बीच किया गया।
सेहत / शौर्यपथ / पेट के बढ़ने की शुरुआत पेट के आसपास जमा चर्बी से होती है। इसके बाद शरीर धीरे-धीरे फैलने लगता है और हम मोटे होते जाते हैं। जब यह बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लग जाती है। वजन कम करने के लिए अथक प्रयास करते हैं लेकिन खाने पर कंट्रोल नहीं करने से परिणाम सामने नहीं आते हैं। ऐसे में एक रास्ता है गेंहू की बजाए बाजरे की रोटी की खाएं। इसके साथ ही अन्य कई सारे फायदे भी हैं। आइए जानते हैं-
पोषक तत्वों से भरपूर बाजरा के फायदे
बाजरा में मैग्नीशियम, कैल्शियम फास्फोरस, फाइबर, विटामिन बी, मैंगनीज और एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं। पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण बाजरा का सेवन स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत अच्छा है। इसका सेवन कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरों को कम करता है। इसमें मौजूद मैग्नीशियम और पोटेशियम ब्लड प्रेशर को भी
नियंत्रित करने में मदद करताहै।
बाजरे की रोटी खाने के फायदे -
1.एनर्जी बढ़ाएं - बरसात के मौसम में मन थोड़ा सा आलसी हो जाता है। ऐसे में बाजरे की रोटी का सेवन करना चाहिए। इसमें स्टार्च की मात्राहोती है, जिससे एनर्जी और ताकत बनी रहती है। साथ ही कार्बोहाइड्रेट और फाइबर की
मात्रा होने से दिनभर एनर्जी का लेवल अप रहता है।
2.हड्डियों को करें मजबूत - बाजरे की रोटी के सेवन से हड्डियां मजबूत होती है। इसमें भरपूर
मात्रा में कैल्शियम होता है। साथ ही गठियाबादी, अर्थराइटिस, ऑस्टियोपीनिया बीमारी के खतरे को भी कम करता है।
3.पाचन
तंत्र को करें मजबूत - अगर आप अपच की समस्या से परेशान है तो बाजरे की रोटी ही खाएं। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। इस वजह से पाचन क्रिया मजबूत होती है। कब्ज और गैस की समस्या में भी निजात मिलती है।
बाजरा वजन कम करने में कैसे करता है मदद दरअसल, बाजरा धीमी गति से पचता है। इसमें मौजूद रेशे से हमारा पेट भरा रहता है। इसलिए बहुत जल्द अधिक भूख नहीं लगती है। इस वजह से तेजी से वजन कम होता है और चर्बी भी कम होने लगती है।
आस्था /शौर्यपथ /भगवान भोलेनाथ की मूर्ति या शिवलिंग पर केतकी और केवड़े का फूल, तुलसी, मेहंदी, हल्दी, कुमकुम, रोली, सिंदूर खंडित अक्षत, तिल, नारियल या नारियल का पानी नहीं अर्पित किया जाता है। आओ जानते हैं कि क्यों नहीं चढ़ाई जाती है मेहंदी, हल्दी और तुलसी।
1. मेहंदी : मेहंदी माता पर्वती को अर्पित की जाती है क्योंकि यह 16 श्रृंगार का हिस्सा है। भोलेनाथ का श्रृंगार को उनका भस्म है।
2. हल्दी : हल्दी का संबंध भगवान विष्णु और सौभाग्य से है इसलिए यह भगवान शिव को नहीं चढ़ती है। हल्दी, कुमकुम, रोली, सिंदूर और मेहंदी देवी पूजन की सामग्री है।
3. तुलसी : जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा के अंश से तुलसी का जन्म हुआ था जिसे भगवान विष्णु ने पत्नी रूप में स्वीकार किया है। इसलिए तुलसी को शिव पूजा में अर्पित नहीं करते हैं। कथानुसार जलंधर नामक राक्षस से सब त्रस्त थे लेकिन उसकी हत्या नहीं हो सकती थी क्योंकि उसकी पतिव्रता पत्नी वृंदा के तप से उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था। तब विष्णु ने छल से वृंदा के पति का वेष धारण किया और उसका धर्म भ्रष्ट कर दिया जिसके बाद भगवान शिव ने जलंधर का वध कर दिया। तब पवित्र तुलसी ने स्वयं भगवान शिव को अपने स्वरूप से वंचित कर यह शाप दिया था कि आपकी पूजन सामग्री में मैं नहीं रहूंगी।
धर्म संसार / शौर्यपथ /23 जुलाई को व्रत की पूर्णिमा प्रारंभ होगी और 24 जुलाई को गुरु पूर्णिमा रहेगी। पूर्णिमा के दिन व्यास पूजा होती है अर्थात महाभारत के लेखक वेद व्यासजी की पूजा। इसी दिन से आषाढ़ माह समाप्त हो जाएगा। भगवान वेद व्यास एक अलौकिक शक्तिसंपन्न महापुरुष थे। आओ जानते हैं वेद व्यासजी के बारे में 15 रोचक बातें।
1. ऋषि पराशर और निषाद कन्या सत्यवती के पुत्र महर्षि वेद व्यास जन्म लेते ही युवा हो गए और तपस्या करने द्वैपायन द्वीप चले गए। आषाड़ी पूर्णिमा को ही उनका जन्म हुआ था।
2. तप से वे काले हो गए इसलिए उन्हें कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा। यह भी कहा जाता है कि उनका जन्म यमुना नदी के बीच एक द्वीप पर हुआ था और वे सांवले थे इसलिए उनका नाम कृष्ण द्वैपायन रखा गया।
3. वेद व्यास एक उपाधी होती है। वे इस कल्प के 28वें वेद व्यासजी थे।
4. श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान विष्णु के जिन 24 अवतारों का वर्णन है, उनमें महर्षि वेद व्यास का भी नाम है।
5. धर्मग्रंथों में जो अष्ट चिरंजीवी (8 अमर लोग) बताए गए हैं, महर्षि वेद व्यास भी उन्हीं में से एक हैं इसलिए इन्हें आज भी जीवित माना जाता है।
6. सत्यवती के कहने पर वेद व्यासजी ने विचित्रवीर्य की पत्नी अम्बालिका और अम्बिका को अपनी शक्ति से धृतराष्ट्र और पांडु नामक पुत्र दिए और एक दासी से विदुर का जन्म हुआ।
7. उपरोक्त इन्हीं 3 पुत्रों में से एक धृतराष्ट्र के यहां जब कोई पुत्र नहीं हुआ तो वेद व्यास की कृपा से ही 99 पुत्र और 1 पुत्री का जन्म हुआ।
8. महाभारत के अंत में जब अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र छोड़ देता है तो उसके ब्रह्मास्त्र को वापस लेने के लिए वेद व्यास अनुरोध करते हैं। लेकिन अश्वत्थामा वापस लेने की विद्या नहीं जानता था तो उसने उस अस्त्र को अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में उतार दिया था। इस घोर पाप के चलते श्रीकृष्ण उसे 3,000 वर्ष तक कोढ़ी के रूप में भटकने का शाप दे देते हैं जिस शाप का वेद व्यास भी अनुमोदन करते हैं।
9. महर्षि वेद व्यास ने ही महाभारत का युद्ध देखने के लिए संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी जिससे संजय ने धृतराष्ट्र को पूरे युद्ध का वर्णन महल में ही सुनाया था।
10. विश्व में सर्पप्रथज्ञ पृथ्वी का पहला भौगोलिक मानचित्र महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास द्वारा ही बनाया गया था।
11. कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास की पत्नी का नाम आरुणी था जिनके महान बालयोगी पुत्र शुकदेव थे।
12. वेद व्यास के 4 महान शिष्य थे जिनको उन्होंने 4 वेद पढ़ाए- मुनि पैल को ॠग्वेद, वैशंपायन को यजुर्वेद, जैमिनी को सामवेद तथा सुमंतु को अथर्ववेद पढ़ाया।
13. एक बार वेद व्यास वन में धृतराष्ट्र और गांधारी से मिलने गए, तब वहां युधिष्ठिर भी उपस्थित थे। धृतराष्ट्र ने व्यासजी से अपने मरे हुए कुटुम्बियों और स्वजनों को देखने की इच्छा प्रकट की। तब महर्षि व्यास सभी को लेकर गंगा तट पर पहुंचे। वहां व्यासजी ने दिवंगत योद्धाओं को पुकारा। कुछ देर बार ही जल में से देखते-ही-देखते भीष्म और द्रोण के साथ दोनों पक्षों के योद्धा निकल आए। वे सभी लोग रात्रि में अपने पूर्व संबंधियों से मिले और सूर्योदय से पूर्व पुन: गंगा में प्रवेश करके अपने दिव्य लोकों को चले गए।
14. महर्षि वेद व्यास ने जब कलयुग का बढ़ता प्रभाव देखा तो उन्होंने ही पांडवों को स्वर्ग की यात्रा करने की सलाह दी थी।
15. महर्षि वेद व्याजी के कथनानुसार ही भगवान गणेशजी ने महाभारत लिखी थी।
व्रत त्यौहार /शौर्यपथ /ईद-उल-अजहा पर ईद की नमाज सुबह दस बजे तक अदा कर ली जाती है। नमाज के बाद क़ुर्बानी का दौर शुरू होता है। इसके बाद साफ-सफाई और फिर गोश्त के हिस्से कर, पकाने का काम शुरू होता है। इन सारे कामों में दोपहर के एक-दो बज जाना आम बात है। इस वक्त घर के तमाम लोगों को जोर की भूख लगी होती है और जल्द से जल्द पक जाने वाली चीज का इंतिख़ाब पकाने के लिए किया जाता है। जल्दी पक जाने वाली चीजें हैं गुरदा, दिल, तिल्ली, कलेजी वग़ैरा। इसलिए सबसे पहले ये चीजें पकाई जाती हैं जो बहुत कम तेल-मसाले में जल्दी से पक जाती हैं और इसे बच्चे-बड़े सब बहुत पसंद करते हैं।
सामग्री :
बोनलेस गोश्त, नमक, मिर्च-पावडर, कुछ हरी मिर्च के बारीक टुकड़े, हरा धनिया, हरी चटनी, नींबू, सलाद।
टिकिया विधि :
बोनलेस गोश्त का कीमा बनाया जाता है। जब अच्छा बारीक कीमा बन जाता है तो उसे एक बार फिर अच्छी तरह पानी से धोने के बाद उसका सारा पानी निथार दिया जाता है। फिर उसमें नमक, मिर्च-पावडर, कुछ हरी मिर्च के बारीक टुकड़े, हरा धनिया अच्छी तरह से मिक्स कर दिया जाता है।
जिस तरह रोटी पकाने से पहले आटा तैयार किया जाता बिलकुल उसी तरह। फिर इसमें से 50-60 ग्राम कीमे को लेकर हथेली पर रख लिया जाता है और दूसरे हाथ की उंगलियों की मदद से उसे चपटा, गोल आकार दे दिया जाता है।
दूसरी तरफ चूल्हे पर तवा रखकर, उस पर कुछ तेल डालकर अच्छी तरह से गर्म कर लिया जाता है। जब तेल अच्छा गर्म हो जाए तो वह टिकिया जो हथेली पर बनाई गई है, उसी आकार में तवे पर डाल दी जाती है। कुछ देर बाद उसे करछी के जरिए पलट दी जाती है। जब ऐसा लगे के उसके दोनों छोर अच्छी तरह सिंक गए हैं तो उसे करछी से एक प्लेट में निकाल लिया जाता है।
एक तवे पर 12-15 टिकिया एक साथ एक के बाद एक डाली जा सकती हैं और अलट-पलट कर सेंकी जा सकती हैं। इन टिकियों को एक प्लेट में सजाकर चटनी, नीबू और सलाद के साथ पेश किया जा सकता हैं।
शामी कबाब
विधि 1:
शामी कबाब बनाने के लिए जो कीमा तैयार किया जाता है उसे सिल्ला पर बारीक पीस लिया जाता है। सिल-बट्टे की मदद से कीमा पिस जाने के बाद उसमें बड़ी इलायची, दालचीनी, नमक, काली मिर्च स्वाद के मुताबिक मिलाकर एकबार फिर सिल-बट्टे पर पीसा जाता है। जब सारी चीजें अच्छी तरह से उसमें मिल जाएं तो फिर उसी तरह से हाथ पर गोल टिकिया बनाकर तवे पर डाला जाता है।
तवे पर तेल बहुत कम होता है, जरा-सा तेल तवे पर डालकर उसे पूरे तवे पर फैला दिया जाता है और हल्की आंच में टिकिया को दोनों तरफ से अच्छी तरह सेंक लिया जाता है। कुछ लोग इसे सिर्फ भाप में ही सेंकते हैं। पेश करने से पहले कटे हुए बारीक प्याज के टुकड़े और नीबू वगैरा भी प्लेट में सजा दिए जाते हैं।
शामी कबाब विधि2:
इस कबाब के लिए जो कीमा तैयार किया जाता है उसमें मामूली फेट भी होता है। या ये कहिए के मामूली फेट वाले गोश्त का कीमा बनाया जाता है। नमक और मिर्च-पावडर जरूरत के हिसाब से मिलाकर कीमे को तैयार कर लिया जाता है। इस कीमे का एक छोटा हिस्सा लेकर उसे लोहे की मोटी छड़ पर चारों तरफ से लपेट दिया जाता है।
करीब दो-ढाई इंच की लंबाई में। छड़ के इस हिस्से को जहां कीमा लपेटा गया है, दहकते हुए कोयले की आंच पर चारों तरफ से छड़ को घुमा-घुमाकर सेंक लिया जाता है। अच्छी तरह सिंकाई हो जाने पर गीले हाथ की मदद से सिंके हुए उस हिस्से को एक प्लेट में निकाल लिया जाता है। एक प्लेट में दो-चार कबाब सजाकर हरी मिर्च की चटनी, प्याज और नीबू के साथ पेश किया जाता है।
आस्था /शौर्यपथ /21 जुलाई 2021 बुधवार को वामन द्वादशी है। चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन वामन द्वादशी का व्रत रखा जाता है इसके बाद आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भी वामन द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। आओ जानते हैं इस संबंध में 10 खास बातें।
1. इस दिन भगावन वामन की पूजा और आराधना करने के महत्व है। आषाढ़ के महीने में अंतिम पांच दिनों में भगवान वामन की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।
2. इस दिन भगावन वामन और बलि का कथा सुनने का महत्व है।
बलि के राज्य केरल में ओणम का उत्सव प्रारंभ हो जाता है।
3. इन दिन भगवान वामन को शहद चढ़ाने का महत्व है। साथ ही इसका सेवन करने से व्यक्ति निरोगी बना रहता है।
4. गृहकलेश हो तो वामन द्वादशी के दिन वामन देवता के समक्ष कांसे के बर्तन में घी का दीपक जलाएं।
5. यदि नौकरी या व्यापार में रुकावट आ रही हो तो इस दिन भगवान वामन को नारियल पर यज्ञोपवीत लपेटकर अर्पित करें।
6. इस दिन भागवत पुराण कथा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।
7. इस दिन भगवान वामनदेव की पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन करने के बाद चावल, दही इत्यादि वस्तुओं का यथाशक्ति अनुसार दान करना भी बेहद ही शुभ माना जाता है।
8. इस दिन भगवान वामन की मूर्ति या चित्र की पूजा करें। मूर्ति है तो दक्षिणावर्ती शंख में गाय का दूध लेकर अभिषेक करें। चित्र है तो सामान्य पूजा करें। इस दिन भगवान वामन का पूजन करने के बाद कथा सुनें और बाद में आरती करें। अंत में चावल, दही और मिश्री का दान कर किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन कराएं।
9. यदि किसी पंडित से पूजा करा रहे हैं तो वह तो विधि विधान से ही पूजा करेगा। ऐसे में इस दिन व्रत रखा जाता है। मूर्ति के समीप 52 पेड़े और 52 दक्षिणा रखकर पूजा करते हैं। भगवान् वामन का भोग लगाकर सकोरों में चीनी, दही, चावल, शर्बत तथा दक्षिणा पंडित को दान करने के बाद वामन द्वादशी का व्रत पूरा करते हैं। व्रत उद्यापन में पंडित को 1 माला, 2 गौ मुखी मंडल, छाता, आसन, गीता, लाठी, फल, खड़ाऊं तथा दक्षिणा देनी चाहिए।
10. वामन कथा : श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार सतयुग में चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वादशी को श्रवण नक्षत्र में अभिजित मुहूर्त में ऋषि कश्यप और देवी अदिति के यहां भगवान वामन का अवतार हुआ था। ऋषि कश्यप उनका उपनयन संस्कार करके उन्हें बटुक ब्रह्मण बनाते हैं। महर्षि पुलह वामन को यज्ञोपवीत, अगस्त्य मृगचर्म, मरीची पलाश दंण, अंगिरस वस्त्र, सूर्य छत्र, भृगु खडाऊं, बृहस्पति कमंडल, अदिति कोपीन, सरस्वती रुद्राक्ष और कुबेर भिक्षा पात्र भेंट करते हैं।
धर्म संसार / शौर्यपथ / हिन्दू माह का चौथा माह होता है आषाढ़ माह। इस माह की शुक्ल एकादशी से चातुमास प्रारंम हो जाते हैं। आषाढ़ी एकादशी के दिन से चार माह के लिए देव सो जाते हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस बार चातुर्मास का प्रारंभ 20 जुलाई 2021 को हो रहा है। आओ जानते हैं कुछ खास।
1. विष्णुजी सो जाते हैं : चातुर्मास 4 महीने की अवधि है, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलता है। ये चार माह है श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक। इसमें आषाढ़ के 15 और कार्तिक के 15 दिन शामिल है। चातुर्मास का प्रारंभ 'देवशयनी एकादशी' से होता है और अंत 'देवोत्थान एकादशी' से होता है। चार माह के लिए भगवान विष्णु सो जाते हैं। कहते हैं कि इस दौरान श्रीहरि विष्णु पाताल के राजा बलि के यहां चार माह निवास करते हैं। भगवान ने वामन रूप में बालि से तीन पग धरती मांग कर संपूर्ण धरती नाप दी थी।
2. शिवजी संभालते हैं सृष्टि कार्य : चार माह के लिए भगवान विष्णु में सो जाते हैं और इस दौरान भगवान शिव के हाथों में सृष्टि का संचालन रहता है। इस अवधि में भगवान शिव पृथ्वीलोक पर निवास करते हैं और चार मास तक संसार की गतिविधियों का संचालन करते हैं। शिव का माह श्रावण माह ही चातुर्मास का प्रथम माह है।
3. पूजा, साधना और तप का रहता है महत्व : इन चाह माह को व्रत, भक्ति, तप और साधना का माह माना जाता है। इन चाह माह में संतजन यात्राएं बंद करके आश्रम, मंदिर या अपने मुख्य स्थान पर रहकर ही व्रत और साधना का पालन करते हैं। इस दौरान शारीरिक और मानसिक स्थिति तो सही होती ही है, साथ ही वातावरण भी अच्छा रहता है। इस दौरान फर्श पर सोना और सूर्योदय से पहले उठना बहुत शुभ माना जाता है। उठने के बाद अच्छे से स्नान करना और अधिकतर समय मौन रहना चाहिए। वैसे साधुओं के नियम कड़े होते हैं। दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए।
उक्त 4 माह को व्रतों का माह इसलिए कहा गया है कि उक्त 4 माह में से प्रथम माह तो सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इस संपूर्ण माह व्यक्ति को व्रत का पालन करना चाहिए। ऐसा नहीं कि सिर्फ सोमवार को ही उपवास किया और बाकी वार खूब खाया। उपवास में भी ऐसे नहीं कि साबूदाने की खिचड़ी खा ली और खूब मजे से दिन बिता लिया। शास्त्रों में जो लिखा है उसी का पालन करना चाहिए। इस संपूर्ण माह फलाहार ही किया जाता है या फिर सिर्फ जल पीकर ही समय गुजारना होता है। चातुर्मास में देव पूजन, रामायण पाठ, भागवत कथा पाठ, व्रत, दान, साधना और ध्यान करना चाहिए।
4. दान करें : इन चार माह में 5 तरह का दान करें। 1.अन्नदान : किसी गरीब को, पशु या पक्षी को भोजन कराएं, 2.दीपदान : नदी के जल में दीप छोड़े या मंदिर में दीप जलाएं। 3. वस्त्रदान : किसी गरीब को वस्त्र का दान करें। 4. छायादान : कटोरी में सरसों के तेल में अपनी चेहरा देखकर उसे शनिमंदिर में दान कर दें। 5.श्रमदान : किसी मंदिर या आश्रम में सेवा करके श्रमदान दे सकते हैं।
5. चातुर्मास की पूजा : इस मास में श्रीहरि विष्णु के साथ ही आषाढ़ में वामन पूजा, श्रावण में शिव पूजा, भाद्रपद में गणेश और श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। आषाढ़ के महीने में अंतिम पांच दिनों में भगवान वामन की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस माह में इन दोनों देवताओं की विशेष कृपा पाने के लिए विशेष व्रत, उपवास, पूजा करना चाहिए।
6. दक्षिणयायन सूर्य: शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण सूर्य के दौरान उत्सव, पर्व और यात्रा और दक्षिणयायन सूर्य के दौरान व्रत, तप और साधना का महत्व रहता है। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो वह उत्तरगामी होता है। उसी तरह जब वह कर्क में प्रवेश करता है तो दक्षिणगामी होता है। मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। दक्षिणायन का काल देवताओं की रात्रि मानी गई है। दक्षिणायन को नकारात्मकता का और उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए कहते हैं कि उत्तरायण उत्सव, पर्व एवं त्योहार का समय होता है और दक्षिणायन व्रत, साधना एवं ध्यान का समय रहता है।
दुर्ग / शौर्यपथ / कथाकार लोकबाबू का उपन्यास बस्तर बस्तर यह अरण्य तो दण्ड का है महाराज का विमोचन आभासी माध्यम से छग प्रगतिशील लेख संघ भिलाई व बिलासपुर में एक साथ किया गया । मु्ख्य अतिथि सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ राजेश्वर सक्सेना ने इस उपन्यास का विमोचन किया और कहा- यह उपन्यास बस्तर की परिस्थितियों को चित्रित करता है।
प्रलेस द्वारा कॉफी हाउस सेक्टर 10 में आयोजित विमोचन समारोह में उपन्यास विमोचन के अवसर पर आलोचक प्रो. सियाराम शर्मा ने कहा कि यह उपन्यास आदिवासियों के दमन और विस्थापन को बड़ी संवेदनशीलता से रेखांकित करता है । आदिवासियों के जीवन की लय को उनके संसाधनों की लूट के चलते कैसे तोड़ा जा रहा है, यह भी दिखाता है । यह उपन्यास विश्वविख्यात लेखक हेमिंग्वे के उपन्यास शस्त्र बिदाई और मारिया वर्गीस व ल्योसा की नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत कृति द स्टोरी टेलर के समकक्ष है । समीक्षक प्रो. जयप्रकाश ने कहा कि बस्तर के आदिवासियों के उत्पीडऩ पर लिखना साहस का काम है ,लोकबाबू ने आदिवासी जीवन को मानवीय दृष्टि से जिस यथार्थ ,समग्रता,और वैचारिकता के साथ प्रस्तुत किया,ऐसा पहले किसी कलमकार ने नहीं किया । सेवानिवृत्त प्रचार्य डॉ. कोमल सिंह सार्वा ने कहा कि आदिवासियों की उपलब्धियों को सोहर की तरह गाया जा रहा है लेकिन विकास के बीच नक्सली कैसे बढ़ते चले गए, इस पर विचार नहीं किया गया ।
प्रो.सुधीर शर्मा ने कहा-यह उपन्यास शोधपरक है और जीवंत पात्रों के माध्यम से बस्तर की सच्चाई को उजागर करने वाला है। सच्चाई यह है कि नक्सली समस्या से न हुक्मरान, पूंजीपति निजात पाना चाहते हैं इस समस्या की आड़ में सभी अपना-अपना उद्योग चला रहे हैं। लोकबाबू का यह उपन्यास बहुत सराहनीय प्रयास है।
छग हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रवि श्रीवास्तव ने कहा-लोकबाबू ने साढ़े चार साल की कड़ी मेहनत से यह उपन्यास लिखा है, जो उन्हें बड़े उपन्यासकारों की अग्रिम पंक्ति में खड़े करता है । छग प्रलेसं के संगठन सचिव परमेश्वर वैष्णव ने कहा- लोकबाबू का यह उपन्यास वर्तमान में पुस्तक व पाठकों के बीच सम्बंधित दुरूहता के मिथक को तोड़ता है इस उपन्यास में आरम्भ से अंत तक पाठक को बांधने की जादुई सहजता है। भाषा बेहद सरल लोकजन्य है।
प्रलेसं भिलाई दुर्ग सचिव विमल शंकर झा, शमशीर सिवानी, थानसिंह वर्मा ,मुमताज,योगेंद्र शर्मा, सुखदेव सिंह आजाद, आलोक चौबे के अलावा वर्चुअल रूप से छत्तीसगढ़ प्रलेसं के महासचिव नथमल शर्मा,सत्यभामा अवस्थी,कपूर वासनिक, मधुकर गोरख,उषा आठले,शोभित वाजपेयी,हबीब खान,योगेंद्र,जगदीश चन्द्र दास, वेदप्रकाश अग्रवाल,प्रितपाल सिंह ,मृदुला सिंह,आदि छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों और कलाकारों ने भागीदारी की। भिलाई नगर के आयोजन का संयोजन परमेश्वर वैष्णव व बिलासपुर के आयोजन का संयोजन सचिन शर्मा ने किया। अंत में उपन्यासकार लोकबाबू ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
खाना खजाना / शौर्यपथ / मानसून का मौसम हो और प्लेट में गर्मा-गर्म राम लड्डू पास रखे हों तो मौसम और जायका, दोनों का ही मजा दोगुना बढ़ जाता है। हरी चटनी के साथ मूली के लच्छों के साथ सर्व किए जाने वाले राम लड्डू को कढ़ाई में तलता देख ही मुंह में पानी आ जाता है। तो चलिए जानते हैं दिल्ली के इस फेमस स्ट्रीट फूड को घर पर बनाने का क्या है आसान तरीका।
राम लड्डू बनाने के लिए सामग्री-
-250 ग्राम मूंग की दाल
-100 ग्राम चने की दाल
-एक चम्मच चाट मसाला
-दो चम्मच अदरक पेस्ट
-चार बारीक कटी हुई हरी मिर्च
-नमक स्वादानुसार
-तलने के लिए तेल
-कद्दूकस की हुई मूली
राम लड्डू बनाने की विधि-
राम लड्डू बनाने के लिए सबसे पहले दाल को साफ करें, फिर उसे सात-आठ घंटे के लिए पानी में भिगो दें। उसके बाद इसे दरदरा पीस लें। फिर उसमें चाट मसला, अदरक पेस्ट, हरी मिर्च, हींग और नमक मिलाकर 10 से 15 मिनट तक हाथ से फेटें, फिर तेल गर्म कर लें। तेल गर्म होने के बाद तैयार मिश्रण को हाथ से एककर गोल-गोल करके लड्डू बनाकर रख लें। फिर मध्यम आंच पर इन लड्डुओं को सुनहरा होने तक तलें। तलने के बाद खट्टी चटनी और मूली के साथ इसे परोसें।
खाना खजाना / शौर्यपथ / सावन का महीना शुरू हो चुका है। ऐसे में भोलेबाबा के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए मीठे का भोग जरूर लगाते हैं। प्रसाद के लिए आपने कभी बेसन तो कभी सूजी का हलवा तो कई बार बनाया होगा लेकिन क्या आपने कभी तरबूज के छिलके का हलवा ट्राई किया है। जी हां ये हलवा न सिर्फ खाने में बेहद टेस्टी होता है बल्कि बनने में भी बेहद आसान होता है। तो देर किस बात की आइए जानते हैं कैसे बनाया जाता है यह स्वादिष्ट हलवा।
तरबूज के छिलके का हलवा बनाने के लिए सामग्री-
-तरबूज के छिलके- 500 ग्राम
-खोया- 150 ग्राम
-चीनी-स्वादानुसार
-इलायची पाउडर- 1/4 चम्मच
-काजू- 1 छोटी कटोरी
-देसी घी- 2 से ढाई चम्मच
तरबूज के छिलके का हलवा बनाने की विधि-
तरबूज के छिलके का हलवा बनाने के लिए सबसे पहले तरबूज के छिलके के पीछे का सख्त हिस्सा निकालकर उसे कद्दूकस करके एक प्लेट में रख दें। अब गैस ऑन करके उस पर कढाही चढ़ाकर उसे गर्म होने दें। कढ़ाही गर्म होने पर उसमें 2 चम्मच घी डाल दें। जब घी पिघल जाए तो कद्दूकस किए हुए तरबूज के छिलके को लगातार चलाते हुए करीबन 10 मिनट तक पकाएं। इस दौरान कढ़ाही को प्लेट से ढक दें और बीच-बीच में चलाते रहें।
10 मिनट बाद जब हलवा पक जाए तो उसमें चीनी मिक्स कर दें, इसके बाद यह हल्का गीला हो जाएगा। अब कढ़ाही को बिना ढके कुछ देर तक पकाना होगा। अब दूसरे साइड गैस को ऑन करें और एक पैन गर्म होने के लिए रख दें। जब पैन गर्म हो जाए तो इसमें आधा चम्मच घी डाल दें और उसे चारो तरफ फैलाएं। अब कढ़ाही में मावा डालेंगे और उसे चलाते हुए थोड़ी भूनेंगे। जब यह अच्छी पक जाए और लगे कि यह तैयार हो चुका है तो गैस बंद कर देंगे।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
