August 18, 2026
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    क्या है ऑस्कर में गई इस भारतीय फिल्म की कहानी? देखें या नहीं?

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    मनोरंजन /शौर्यपथ /RRR जैसी फिल्मों को पछाड़ते हुए भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए गई फिल्म लास्ट फिल्म शो वो फिल्म है जो हर फिल्म देखने वाले के दिल को छूने का माद्दा रखती है। फिल्म देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि क्यों ये फिल्म भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए गई थी। फिल्म में थिरकने को मजबूर करने वाले गाने नहीं हैं, बड़ी स्टार कास्ट नहीं है, बहुत ग्लैमर नहीं है, लेकिन बावजूद इसके यह फिल्म बहुत खास है। चलिए जानते हैं क्यों?
    क्या है Last Film Show की कहानी?
    छेल्लो शो या लास्ट फिल्म शो समय नाम के एक लड़के की कहानी है जो सुदूर खेत-खलिहानों के बीच पड़ने वाले एक रेलवे स्टेशन पर चाय बेचता है। उसके पिता की इसी स्टेशन पर चाय की दुकान है और स्टेशन के पीछे थोड़ी ही दूरी पर खेतों के बीच एक कच्चा घर है जिसमें उसका परिवार रहता है।
    समय के पिता को फिल्मों से नफरत है। लेकिन एक दिन उसे पता चलता है कि उसके पापा सबको फिल्म दिखाने शहर ले जा रहे हैं। पूछने पर समय को पता चलता है कि यह एक धार्मिक फिल्म है इसलिए वह लोग फिल्म देखने जा रहे हैं। थिएटर में समय के पिता उसे बताते हैं कि फिल्में देखना अच्छी बात नहीं होती है। इसलिए यह उसके जीवन का पहला और आखिरी शो है जिसे वो देखने आए हैं।
    लेकिन समय के लिए फिल्म देखने का यह पहला और आखिरी अनुभव किस तरह उसकी पूरी जिंदगी बदलकर रख देता है यहीं से शुरू होती है वो दिलचस्प कहानी जो कई लेयर्स खोलती है और हर एक परत एक नई तरह की कहानी लेकर आती है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है वैसे-वैसे आप समझने लगते हैं कि समय की कहानी असल में भारतीय सिनेमाघरों में आए बदलावों की कहानी है।
    समय को कहानियां सुनना और सुनाना पसंद है। वह स्टेशन पर चाय बेचने के बाद पटरियों पर घूम-घूमकर माचिस की डिब्बियां बीनता है और फिर इन डिब्बियों पर बने चित्रों के जरिए एक कहानी बनाता है जिसे वो अपने दोस्तों को सुनाता है। लेकिन जब समय थिएटर में फिल्म देखने जाता है तो उसे सिनेमाघर की उस तकनीक से प्यार हो जाता है जिसके जरिए कहानियों को सुनने के साथ-साथ देखा भी जा सकता है।
    धीरे-धीरे समय की दोस्ती प्रोजेक्टर रूम में काम करने वाले एक शख्स से हो जाती है। समय फजान नाम के इस शख्स को अपनी मां के हाथ का बनाया लजीज खाना खिलाता है जिसके बदले में वह उसे प्रोजेक्टर रूम में बैठकर फिल्म देखने देता है। धीरे-धीरे समय सिनेमाघर की सारी तकनीकियां सीख लेता है। लेकिन एक दिन समय और फजान की जिंदगी में भूचाल आ जाता है जब उन्हें पता चलता है कि थिएटर से पुराने निगेटिव रोल वाले प्रोजेक्टर्स को हटाया जा रहा है।
    फिल्म में क्या अच्छा, क्या बुरा?
    समय की कहानी के जरिए आप भारतीय सिनेमा के एक पूरे युग को जीते हैं। फिल्म बहुत डाउन टू अर्थ है। बचपन की वो मासूमियत और सादगी आपको पूरे वक्त मुस्कुराते रहने पर मजबूर करती है। फिल्म में एक कमाल का सादापन है जो आपके दिल को छू जाता है। जिस तरह के सीन और बैकग्राउंड म्यूजिक का इस्तेमाल हुआ है वो बहुत कमाल का है। हर एक कलाकार ने अपना काम बखूबी किया है और कहना होगा कि डायरेक्शन के मामले में नलिन ने अपना बेस्ट दिया है। फिल्म के जरिए उन दिग्गजों को सलाम किया गया है जिन्होंने सिनेमा को वहां पहुंचाया जहां ये आज है।
    फिल्म देखनी चाहिए या नहीं?
    इस सवाल का जवाब थोड़ा सब्जेक्टिव है। अगर आपको थिरकने के लिए मजबूर कर देने वाला म्यूजिक, ग्लैमर, हीरोइज्म, दमदार एक्शन, रोमांस या ड्रामा देखना है तो 'लास्ट फिल्म शो' आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप रूटीन सिनेमा से हटकर कुछ बहुत खास और यूनिक देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। फिल्म आपके दिल को एक अजीब का सुकून देती है और एक ऐसी कहानी सुनाती है जिससे ज्यादातर लोग अछूते ही रहे हैं। समय की शैतानियां कई बार आपको हंसाती हैं तो कई बार उसके मासूम सवाल आपको सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। कुल मिलाकर एक बहुत खूबसूरत और कमाल की फिल्म है।

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