August 03, 2026
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    आर्टिकल :सीपीआई के आधार वर्ष में बदलाव: क्या बदला है और यह क्यों ज़रूरी है

    • rounak group

    साभार - लेखक सौरभ गर्ग

    महंगाई देश के सबसे अहम आर्थिक संकेतकों में से एक है, जिसे आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सीधे महसूस करते हैं, जैसे घर का राशन, किराया और पेट्रोल-डीज़ल के खर्च में बढ़ोतरी से।
    उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) इसी महंगाई को मापता है। यह उन चीज़ों और सेवाओं के दाम देखता है, जिनका इस्तेमाल आम परिवार रोज़ करता है। सरल शब्दों में, सीपीआई आम आदमी की ज़िंदगी का आईना है। यह बताता है कि थाली में खाने का खर्च कितना बढ़ा, घर का किराया कितना हुआ, और काम पर जाने के लिए ईंधन कितना महंगा हुआ।

    सीपीआई भले ही एक आंकड़ा लगता हो, लेकिन यह सरकार को यह समझने में मदद करता है कि लोगों पर महंगाई का असली असर क्या है। इसी आधार पर वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसले किए जाते हैं, ताकि ज़रूरी चीज़ें आम लोगों की पहुंच में बनी रहें।

    भारतीय रिज़र्व बैंक भी ब्याज दर और महंगाई को नियंत्रित करने जैसे फैसलों के लिए सीपीआई आधारित महंगाई को ही सबसे मुख्य पैमाना मानता है। इसलिए जब सीपीआई ज़मीन की हकीकत सही तरीके से दिखाता है, तब सरकार और आरबीआई की नीतियाँ भी लोगों की असली परेशानियों के अनुसार बेहतर बन पाती हैं।

    महंगाई सिर्फ दाम बढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि दामों में बदलाव से घर के बजट पर कितना असर पड़ता है। इसलिए जितना ज़रूरी दामों को मापना है, उतना ही ज़रूरी यह भी है कि महंगाई का सूचकांक लोगों की आज की खर्च करने की आदतों को सही तरीके से दिखाए। इसी संदर्भ में भारत में सीपीआई के आधार वर्ष को 2012 से बदलकर 2024 किया जा रहा है।

    पिछली बार आधार बदले जाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया है। शहरों की आबादी बढ़ी है, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ा है, डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण खरीदारी का तरीका बदला है और घरों का खर्च अब कई नई चीजों पर होने लगा है।

    इसीलिए नया सीपीआई 2024 तैयार करने में 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
    समय के साथ लोगों की ज़रूरतें और खर्च बदलते हैं, इसलिए सीपीआई में अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं को दी जाने वाली अहमियत भी बदली गई है। जिन चीजों पर अब परिवार ज़्यादा खर्च करते हैं, उन्हें सीपीआई में ज़्यादा महत्व दिया गया है,
    और जिन पर खर्च कम हो गया है, उन्हें कम महत्व दिया गया है।

    इससे सीपीआई वही महंगाई दिखाता है, जो सच में आम परिवार के बजट को प्रभावित करती है। साथ ही, उपभोग की टोकरी (कंजम्पशन बास्केट) को भी बदला गया है, ताकि सेवाओं पर बढ़ते खर्च जैसे नए रुझान दिखाई दे सकें, जो बढ़ती आय और बदलती जीवनशैली की वजह से बढ़ रहे हैं। सीपीआई को मापने का तरीका अपडेट करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना यह तय करना कि उसमें क्या-क्या शामिल किया जाए।

    नया संशोधित सीपीआई अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के ज्यादा करीब है, लेकिन इसमें भारत से जुड़ी खास बातें भी बनी हुई हैं। इससे भारत की महंगाई की तुलना दूसरे देशों से करना आसान हो जाता है।

    आम परिवार के लिए इसका मतलब यह है कि सरकार और नीति बनाने वाले लोग यह बेहतर समझ पाते हैं कि भारत में दामों में होने वाला बदलाव दुनिया के हालात से कैसे जुड़ा है, और साथ ही यह भी ध्यान रहता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।

    सीपीआई के लिए आंकड़े जुटाने का तरीका भी अब लोगों की बदलती खरीदारी और खर्च की आदतों के अनुसार बेहतर बनाया गया है। जहां पहले की तरह बाजारों से दाम इकट्ठा किए जाते रहेंगे, खासकर खाने-पीने और ज़रूरी चीज़ों के, वहीं 2024 के नए ढांचे में अब कुछ सेवाओं के ऑनलाइन दाम भी शामिल किए जा रहे हैं। जैसे मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं, हवाई टिकट और कुछ अन्य सेवाओं के दाम अब ऑनलाइन स्रोतों से भी लिए जाएंगे।

    नई सीपीआई श्रृंखला में अब कंप्यूटर की मदद से दाम इकट्ठा किए जा रहे हैं। इससे हाथ से होने वाली गलतियाँ कम हुई हैं और तुरंत जाँच भी हो जाती है। इससे दामों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता दोनों बेहतर हुई हैं। सीपीआई के आंकड़े सही और समय पर मिलना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसी के आधार पर ऐसे फैसले होते हैं, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं, जैसे कर्ज कितना महंगा होगा, बचत पर कितना ब्याज मिलेगा, और बढ़ती महंगाई से घर का बजट कैसे प्रभावित होगा।

    नए आधार वर्ष की सीपीआई में अब कई मामलों में सरकारी स्रोतों से मिलने वाले आधिकारिक आंकड़ों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे रेल किराया, डाक शुल्क, ईंधन के दाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाली चीजें। इससे इन दामों को पहले से ज्यादा सही तरीके से दर्ज किया जा रहा है और बाजार सर्वे में होने वाली गलती या पक्षपात की संभावना भी कम हो जाती है।

    अब सर्वे के आंकड़े, सरकारी रिकॉर्ड और डिजिटल माध्यमों से मिलने वाले दाम, तीनों को मिलाकर सीपीआई तैयार की जा रही है। यह पुरानी व्यवस्था की तुलना में बड़ा सुधार है और इससे दामों में होने वाले बदलाव की ज्यादा भरोसेमंद तस्वीर मिलती है।

    इतने बड़े स्तर पर सीपीआई के आधार वर्ष में बदलाव करना एक बहुत बड़ा संस्थागत प्रयास होता है। इसमें देश भर के फील्ड दफ्तरों, सांख्यिकी विभागों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी होता है। इस पूरी प्रक्रिया में मेथडोलॉजी की गहराई से जाँच की जाती है, अलग-अलग विकल्पों को परखा जाता है और अर्थशास्त्रियों व विषय-विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने विशेषज्ञ समूहों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत की है, ताकि किए गए बदलाव साफ, समझने में आसान और वैज्ञानिक रूप से सही हों।

    टोकरी, वेटेज और आंकड़ों के स्रोत बदलने के बाद भी सीपीआई का मूल उद्देश्य वही रहता है-यानी एक परिवार की नज़र से दामों में होने वाले बदलाव को दिखाना। यह निरंतरता इसलिए ज़रूरी है, ताकि हम समय के साथ महंगाई की तुलना कर सकें।

    सीधे शब्दों में, सीपीआई को बेहतर बनाया जा रहा है, लेकिन उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़कर ही रखा गया है, ताकि वह नीति बनाने वालों के लिए एक भरोसेमंद मार्गदर्शक बना रहे।सीपीआई हमें यह याद दिलाता है कि हर आंकड़े के पीछे करोड़ों लोगों की असली ज़िंदगी छिपी होती है। आखिरकार, आंकड़े लोगों के लिए ही होते हैं। यह चुपचाप यह दिखाता है कि दामों में बदलाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करता है और सरकार की नीतियों को दिशा देता है।

    आधार वर्ष में चल रहे संशोधन के ज़रिये सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने यह सुनिश्चित किया है कि सीपीआई सही, समय के अनुसार अपडेट और लंबे समय तक एक-जैसे तरीके से मापा गया रहे। ताकि सीपीआई सिर्फ एक संख्या न होकर, पूरे देश के लोगों की असली ज़िंदगी की सच्चाई दिखाने वाला आईना बना रहे।


    (लेखक सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं, यह उनके निजी विचार हैं)

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