August 03, 2026
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    विशेष लेख : धान-परती भूमि में सरसों की खेती से किसानों की अच्छी आय संभव

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    रायपुर। छत्तीसगढ़ की परती भूमि अब सोना उगलने लगी है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस राज्य में किसानों का रुझान राई-सरसों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इससे न केवल किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलना शुरू हुई है, बल्कि देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की राह भी आसान होती नजर आ रही है। बता दें कि यहां के किसान धान कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं, यानी रबी फसल की बुवाई नहीं करते हैं।
    इस कारण उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। किसानों के इन हालातों को देखते हुए आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने ठोस रोडमैप के साथ प्रयास शुरू किए। परिणामस्वरूप परती भूमि पर अब सरसों की फसल लहलहाने लगी है। संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि राज्य की भूमि में खजाना छिपा हुआ है। यदि किसान धान कटाई के बाद देर से पकने वाली राई-सरसों किस्मों की बुवाई करें तो उनकी आर्थिक स्थिति में असम के किसानों के समान बदलाव देखने को मिल सकता है।
    गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कुल कृषि क्षेत्र 4.78 मिलियन हेक्टेयर है। इसमें केवल 23 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। वार्षिक वर्षा लगभग 1190 मिमी है, जिसमें लगभग 88 प्रतिशत वर्षा मानसून (मध्य जून से सितंबर) के दौरान होती है। इस दौरान किसान धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन लेते हैं। वहीं रबी में गेहूं और थोड़े क्षेत्रफल में दलहनों की बुवाई करते हैं, लेकिन राई-सरसों का उत्पादन हाशिए पर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि परती भूमि, बस्तर के पठारी और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती की अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान का यह शुरुआती प्रयास है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
    उन्होंने बताया कि धान कटाई के बाद कृषि भूमि परती रह जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर सीमित हो जाते हैं। राई-सरसों की फसल परती भूमि को उत्पादक बनाने में मददगार बन सकती है।
    परती भूमि की चुनौती
    छत्तीसगढ़ में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जबकि धान उत्पादन लगभग 9.8 मिलियन टन है। खरीफ में अधिक वर्षा और चिकनी मिट्टी के कारण धान का उत्पादन भरपूर होता है, लेकिन रबी में यही खेती सीमित रह जाती है। धान के कुल क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, जिससे कटाई के बाद पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों के लगभग 40–60 प्रतिशत खेत परती रह जाते हैं। इस स्थिति में राई-सरसों का बुवाई क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।
    31 हजार हेक्टेयर में खेती
    संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि यहां की जलवायु रबी तिलहन के लिए अनुकूल है, बशर्ते खरीफ के बाद मृदा में नमी का संरक्षण और उचित कृषि तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए। क्योंकि राई-सरसों को कम पानी में उगाया जा सकता है और यह कम समय में पक जाती है।
    गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में महज 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है। करीब 17,260 टन उत्पादन और उत्पादकता 563 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश से और बढ़ाया जा सकता है।
    20 प्रतिशत ज्यादा उपज
    उन्होंने बताया कि अनुसंधान परीक्षण के आधार पर धान के परती खेतों में राई-सरसों की अच्छी पैदावार मिलती है। इस फसल की लगभग 20 प्रतिशत अधिक पैदावार प्राप्त हुई है। प्रदर्शन के दौरान सरसों की किस्म डीआरएमआर-150-35 ने उत्साहजनक परिणाम दिए। यह किस्म 95–110 दिनों में पक जाती है, जिससे धान की कटाई के बाद मध्य नवंबर से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई सहजता से की जा सकती है। इसके अलावा किसान छत्तीसगढ़ सरसों, टीबीएम, एनआरसीएचबी-101 और बीबीएम-1 जैसी किस्मों का उपयोग कर सकते हैं।
    किसानों को आजीविका सुरक्षा
    धान परती क्षेत्रों में राई-सरसों को शामिल करने से किसानों की आय और आजीविका सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वर्षा आधारित धान पारिस्थितिकी तंत्र में किए गए प्रदर्शनों से यह सिद्ध हुआ है कि शून्य जुताई के तहत राई-सरसों से 8–14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इससे प्रति हेक्टेयर 27 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। साथ ही सरसों के साथ मधुमक्खी पालन करके किसान अपनी आमदनी को और भी बढ़ा सकते हैं।
    छत्तीसगढ़ में राई-सरसों की खेती किसानों को त्रिस्तरीय लाभ दे सकती है, जिसमें आय वृद्धि, परती भूमि का उपयोग और खाद्य तेल उत्पादन में बढ़ोतरी शामिल है। इस फसल से राज्य के कृषि परिदृश्य को बदला जा सकता है। इस फसल पर अनुसंधान के काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।

    डॉ. पी.के. राय, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद –राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान

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