August 03, 2026
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    ED बनाम ममता बनर्जी: ‘सबूत चोरी’ के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, FIR पर रोक—हाई कोर्ट से लेकर शीर्ष अदालत तक बढ़ा संवैधानिक टकराव

    • rounak group

    नई दिल्ली/कोलकाता।
    प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रहा कानूनी टकराव अब देश की शीर्ष अदालत तक पहुंच चुका है। 14 और 15 जनवरी 2026 को कलकत्ता उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इस विवाद को संवैधानिक, प्रशासनिक और राजनीतिक संकट के रूप में स्थापित कर दिया है।


    कलकत्ता हाई कोर्ट: TMC की याचिका खारिज, ED ने लगाए गंभीर आरोप

    14 जनवरी 2026 को कलकत्ता उच्च न्यायालय में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में मांग की गई थी कि I-PAC कार्यालय पर छापेमारी के दौरान जब्त किए गए पार्टी के संवेदनशील चुनावी डेटा को सुरक्षित रखा जाए।

    हालांकि, ED के वकील ने अदालत को स्पष्ट किया कि छापेमारी के दौरान कोई भी डेटा या दस्तावेज जब्त नहीं किया गया। इस बयान के बाद न्यायमूर्ति सुभ्रा घोष ने TMC की याचिका को निपटा दिया।

    इसी सुनवाई के दौरान ED ने अभूतपूर्व और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कोयला तस्करी मामले की जांच के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं I-PAC कार्यालय पहुंचीं और जांच से जुड़े अहम सबूत—एक लैपटॉप और एक ‘हरा फोल्डर’—अपने साथ ले गईं।

    ED ने इसे जांच में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बताते हुए मुख्यमंत्री और राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों के खिलाफ CBI जांच की मांग की। लेकिन, चूंकि इसी विषय पर ED पहले ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी थी, इसलिए हाई कोर्ट ने अपनी कार्यवाही स्थगित कर दी।


    सुप्रीम कोर्ट: FIR पर रोक, CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश

    15 जनवरी 2026 को मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए आया। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस मामले को “अत्यंत गंभीर” करार दिया।

    शीर्ष अदालत ने—

    • मुख्यमंत्री ममता बनर्जी,

    • पश्चिम बंगाल सरकार,

    • पुलिस महानिदेशक (DGP) और

    • कोलकाता पुलिस कमिश्नर

    को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

    साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR पर तत्काल अंतरिम रोक लगा दी और स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक ED अधिकारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।

    कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया कि 8 जनवरी 2026 को I-PAC कार्यालय और उसके आसपास की सभी CCTV फुटेज व इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं, ताकि सबूतों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न हो।


    अदालत की कड़ी टिप्पणियाँ

    सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि—

    “केंद्रीय जांच एजेंसियों के काम में राज्य एजेंसियों का हस्तक्षेप अराजकता (lawlessness) की स्थिति पैदा कर सकता है।”

    ED की ओर से अदालत में कहा गया कि यह मामला केवल ‘दखल’ का नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री द्वारा की गई ‘चोरी’ और ‘डकैती’ का है, क्योंकि वह सशस्त्र पुलिस बल के साथ जांच में बाधा डालने पहुंचीं।

    वहीं, मुख्यमंत्री की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि ममता बनर्जी वहां पार्टी के गोपनीय और संवेदनशील डेटा की सुरक्षा के लिए गई थीं और ED की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण व राजनीतिक रूप से प्रेरित है।


    अब क्या तय करेगा सुप्रीम कोर्ट?

    सुप्रीम कोर्ट अब इस मूल प्रश्न पर विचार करेगा कि—

    • क्या किसी मुख्यमंत्री का छापेमारी स्थल पर पहुंचना,

    • और वहां से कथित रूप से दस्तावेज ले जाना,
      कानूनी रूप से “जांच में बाधा” और आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है या नहीं।

    मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है।


    राजनीतिक और संवैधानिक मायने

    यह मामला केवल कानून तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र बनाम राज्य, संवैधानिक मर्यादा, और जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। आने वाली सुनवाई देश की राजनीति और संघीय ढांचे के लिए दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।

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