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June 17, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ


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कोलकाता | विशेष संवाददाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई 2026 की तारीख एक युगांतकारी परिवर्तन की गवाह बनी है। राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल सत्ता का समीकरण बदला है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने अभेद्य दुर्ग को भी ढहा दिया है। भाजपा ने 206 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल कर बंगाल के राजनीतिक मानचित्र पर अपनी ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज कराई है। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट कर रह गई है।

भवानीपुर में बड़ा उलटफेर: शुभेंदु बने 'जायंट किलर'

इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला परिणाम ममता बनर्जी के अपने गढ़ भवानीपुर से आया, जहाँ भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें पटखनी देकर यह साबित कर दिया कि बंगाल में सत्ता विरोधी लहर (Anti-Inumbency) कितनी गहरी थी। उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल तक भगवा लहर ने टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है।

भ्रष्टाचार पर भारी पड़ा परिवर्तन का संकल्प

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिटफंड मामले और भर्ती घोटालों के गंभीर आरोपों ने जनता के भरोसे को हिलाकर रख दिया था। 92.93% के रिकॉर्ड तोड़ मतदान ने स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की जनता नीतिगत स्पष्टता और 'डबल इंजन' सरकार की आकांक्षा रख रही थी। इस जीत का सीधा असर 2029 के लोकसभा चुनावों पर पड़ेगा, जहाँ पूर्वी भारत अब भाजपा के लिए एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरेगा।

क्या बंगाल को मिलेगी पहली भाजपाई महिला मुख्यमंत्री?

वर्तमान राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा मुख्यमंत्री के नाम को लेकर है। जहाँ शुभेंदु अधिकारी जीत के सबसे बड़े नायक के रूप में उभरे हैं, वहीं दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से एक नई सुगबुगाहट सुनाई दे रही है।

महिला कार्ड से मास्टरस्ट्रोक की तैयारी: > महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन और देश की आधी आबादी को नेतृत्व देने के संकल्प के बीच, भाजपा के पास पश्चिम बंगाल में किसी महिला चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर देश को एक बड़ा संदेश देने का सुनहरा अवसर है। इस दौड़ में अग्निमित्रा पॉल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, जिन्होंने आसनसोल दक्षिण में अपनी पकड़ मजबूत रखी है। यदि भाजपा नेतृत्व किसी महिला पर दांव लगाता है, तो यह 'नारी शक्ति' के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा वैश्विक विज्ञापन होगा।

9 मई को शपथ ग्रहण, बाज़ार में उत्साह

नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 9 मई 2026 को होने की संभावना है। इस ऐतिहासिक जीत की धमक दलाल स्ट्रीट पर भी सुनाई दी, जहाँ कोलकाता आधारित कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल देखा गया। निवेशकों को उम्मीद है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने से बंगाल में औद्योगिक क्रांति का नया अध्याय शुरू होगा।

मुख्य आकर्षण:

प्रचंड बहुमत: भाजपा 206 सीटें, टीएमसी 80 सीटें।

ऐतिहासिक मतदान: बंगाल के इतिहास में पहली बार 92.93% वोटिंग।

चेहरा कौन? शुभेंदु अधिकारी, अग्निमित्रा पॉल और दिलीप घोष रेस में सबसे आगे।

बाज़ार का रुख: नीतिगत स्पष्टता की उम्मीद में शेयर बाज़ार में रिकॉर्ड बढ़त।

कोलकाता/शौर्यपथ।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों और चुनाव बाद उभरे राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ा संवैधानिक घटनाक्रम सामने आया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस शिवगणनम ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) अपीलीय ट्रिब्यूनल के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने त्यागपत्र में “व्यक्तिगत कारणों” का उल्लेख किया है, लेकिन इस्तीफे के समय और पृष्ठभूमि ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या था SIR ट्रिब्यूनल का उद्देश्य?

SIR यानी Special Intensive Revision प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण किया गया था। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। जिन लोगों ने इस कार्रवाई को चुनौती दी, उनकी अपील सुनने के लिए एक विशेष अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किया गया था, जिसकी जिम्मेदारी जस्टिस शिवगणनम संभाल रहे थे।

90 लाख नाम हटने का दावा, 27 लाख अपीलें

सूत्रों और चुनावी बहसों में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के दौरान 90 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जबकि लगभग 27 लाख लोगों ने इस निर्णय के खिलाफ अपील दाखिल की। विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा प्रहार बताते हुए प्रक्रिया की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठाए थे।

“चार साल लग जाएंगे” — काम के बोझ पर जताई थी चिंता

इस्तीफे से पहले जस्टिस शिवगणनम ने कथित रूप से यह चिंता व्यक्त की थी कि जिस गति और तरीके से अपीलों की जांच हो रही है, उस हिसाब से केवल कोलकाता क्षेत्र की अपीलों को निपटाने में ही लगभग चार वर्ष लग सकते हैं। इससे यह संकेत मिला कि ट्रिब्यूनल के सामने मामलों का अत्यधिक बोझ था और पूरी प्रक्रिया प्रशासनिक तथा कानूनी चुनौती बन चुकी थी।

चुनाव बाद हिंसा के बीच आया इस्तीफा

यह इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद कई जिलों से हिंसा, राजनीतिक झड़पों और तनाव की खबरें आ रही हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में एक वरिष्ठ न्यायिक व्यक्ति का इस्तीफा राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

विपक्ष ने उठाए नए सवाल

विपक्षी दलों का कहना है कि यह इस्तीफा केवल “व्यक्तिगत कारणों” तक सीमित नहीं माना जा सकता। विपक्ष का आरोप है कि यदि लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित हैं और ट्रिब्यूनल प्रमुख स्वयं प्रक्रिया की गति पर सवाल उठा चुके हैं, तो इससे पूरी SIR प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

कई सामाजिक संगठनों और चुनावी अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मांग की है कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया और अपील निपटान की संपूर्ण व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।

लोकतंत्र और मताधिकार पर बहस तेज

विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटना और उसके बाद अपीलों का वर्षों तक लंबित रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। चुनावी पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा को लेकर अब बहस और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल जस्टिस टीएस शिवगणनम के इस्तीफे ने बंगाल की चुनावी राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है, जिसके दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

शौर्यपथ विशेष विश्लेषण

भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब अदालत, राज्यपाल और विधानसभा की संवैधानिक सीमाएं एक-दूसरे से टकराती हुई दिखाई देती हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार का पतन और पश्चिम बंगाल की संभावित संवैधानिक स्थिति को लेकर उठ रहे सवाल इसी बहस के केंद्र में हैं।

हाल के दिनों में राजनीतिक और सोशल मीडिया मंचों पर यह तुलना तेजी से सामने आई है कि यदि ममता बनर्जी चुनाव परिणामों को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, तो क्या उन्हें भी उद्धव ठाकरे जैसी संवैधानिक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है? इस प्रश्न को समझने के लिए पहले महाराष्ट्र मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और फिर पश्चिम बंगाल की वास्तविक संवैधानिक स्थिति को समझना आवश्यक है।


उद्धव ठाकरे मामला: सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

11 मई 2023 को सुप्रीम Court की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। इस फैसले में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को व्यक्तिगत राहत नहीं मिली, लेकिन अदालत ने कई संवैधानिक टिप्पणियां कीं जो भविष्य की राजनीति के लिए मिसाल बन गईं।

फैसले के प्रमुख बिंदु

1. इस्तीफा बना सबसे बड़ा कारण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था। इसलिए अदालत उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री पद पर बहाल नहीं कर सकती।

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी कि यदि ठाकरे इस्तीफा नहीं देते और फ्लोर टेस्ट का सामना करते, तो अदालत स्थिति को पहले जैसी (status quo ante) बहाल करने पर विचार कर सकती थी।

2. राज्यपाल की भूमिका पर सवाल

अदालत ने माना कि तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास ऐसा कोई ठोस संवैधानिक आधार नहीं था जिससे यह सिद्ध हो सके कि उद्धव ठाकरे सरकार ने वास्तव में बहुमत खो दिया था। केवल बागी विधायकों के बयानों के आधार पर फ्लोर टेस्ट बुलाना उचित नहीं माना गया।

3. शिंदे गुट के व्हिप को लेकर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा शिंदे गुट के व्हिप को मान्यता देने की प्रक्रिया पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं और उसे कानूनसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना।

4. लेकिन सरकार क्यों नहीं गिरी?

यहीं सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु सामने आया। अदालत ने कहा कि चूंकि उद्धव ठाकरे पहले ही इस्तीफा दे चुके थे, इसलिए अदालत के पास उन्हें पुनः बहाल करने का आधार सीमित हो गया। इसी कारण शिंदे-फडणवीस सरकार को तत्काल राहत मिली।


पश्चिम बंगाल की स्थिति: क्या वास्तव में मुख्यमंत्री का पद स्वतः समाप्त हो जाता है?

पश्चिम बंगाल विधानसभा के कार्यकाल और चुनावी विवादों को लेकर कई दावे किए जा रहे हैं। लेकिन संवैधानिक स्थिति को सटीक रूप से समझना आवश्यक है।

विधानसभा का कार्यकाल और मुख्यमंत्री की स्थिति

संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार किसी राज्य विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। पांच वर्ष पूर्ण होने पर विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है या उसे भंग माना जाता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मुख्यमंत्री उसी क्षण स्वतः पदमुक्त हो जाते हैं। भारतीय संसदीय परंपरा में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद सामान्यतः तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक नई सरकार शपथ नहीं ले लेती। इस अवधि में वे कार्यवाहक (caretaker) सरकार के रूप में कार्य करते हैं।

अर्थात केवल विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाने से मुख्यमंत्री का पद तत्काल शून्य नहीं हो जाता।


क्या राज्यपाल तुरंत बर्खास्त कर सकते हैं?

संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री को हटाने का अधिकार केवल विशेष परिस्थितियों में होता है, जैसे:

  • मुख्यमंत्री सदन का विश्वास खो दें,
  • बहुमत परीक्षण में असफल हो जाएं,
  • या संवैधानिक प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लंघन हो।

यदि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका हो और नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया जारी हो, तो सामान्यतः मौजूदा मुख्यमंत्री कार्यवाहक रूप में बने रहते हैं। इसलिए यह कहना कि कार्यकाल समाप्त होते ही मुख्यमंत्री स्वतः बर्खास्त हो जाएंगे, पूरी तरह सटीक संवैधानिक व्याख्या नहीं मानी जाती।

हाँ, यदि कोई असाधारण संवैधानिक संकट उत्पन्न हो, सरकार प्रशासन चलाने में असमर्थ हो, या चुनाव परिणामों को लेकर ऐसी स्थिति बने जिससे शासन व्यवस्था ठप हो जाए, तब राज्यपाल रिपोर्ट भेज सकते हैं और अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की संभावना बन सकती है। लेकिन यह अंतिम संवैधानिक विकल्प माना जाता है।


ममता बनर्जी की संभावित कानूनी रणनीति

राजनीतिक बयानबाजी के बीच ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की ओर से चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

उनकी ओर से जिन बिंदुओं को उठाया जा रहा है, उनमें शामिल हैं:

  • ईवीएम में कथित तकनीकी गड़बड़ी,
  • बैटरी चार्जिंग प्रतिशत में असामान्य अंतर,
  • मतदान प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं,
  • और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल।

यदि इन आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होती है, तो अदालत मुख्यतः निम्न प्रश्नों पर विचार कर सकती है:

  1. क्या चुनाव प्रक्रिया में कोई वास्तविक संवैधानिक या तकनीकी त्रुटि हुई?
  2. क्या आरोपों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण हैं?
  3. क्या चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाला कोई ठोस आधार मौजूद है?

भारतीय न्यायपालिका सामान्यतः चुनाव परिणामों में हस्तक्षेप करते समय अत्यंत सावधानी बरतती है और ठोस प्रमाणों को प्राथमिकता देती है।


उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी: सबसे बड़ा संवैधानिक अंतर

यहीं दोनों मामलों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है।

मुद्दा उद्धव ठाकरे मामला संभावित ममता बनर्जी स्थिति
संकट का कारण दल-बदल और बहुमत संकट चुनाव परिणाम विवाद
मुख्य संवैधानिक प्रश्न फ्लोर टेस्ट की वैधता चुनावी प्रक्रिया की वैधता
इस्तीफे की भूमिका इस्तीफे से कानूनी राहत सीमित हुई यदि इस्तीफा न दें तो कार्यवाहक भूमिका संभव
राज्यपाल की भूमिका फ्लोर टेस्ट का आदेश नई सरकार गठन प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट का दायरा बहुमत परीक्षण और राज्यपाल की शक्ति चुनावी विवाद और प्रमाणों की जांच

क्या उद्धव ठाकरे की तरह ममता बनर्जी को भी नुकसान हो सकता है?

संवैधानिक दृष्टि से सबसे बड़ा सबक यही माना जा रहा है कि किसी भी मुख्यमंत्री के लिए समय से पहले इस्तीफा देना अदालत में उपलब्ध संभावित राहत को सीमित कर सकता है। महाराष्ट्र मामले में यही हुआ था।

लेकिन पश्चिम बंगाल की परिस्थिति अलग प्रकृति की है क्योंकि वहां मामला बहुमत परीक्षण का नहीं बल्कि चुनाव परिणामों की वैधता और चुनावी प्रक्रिया पर उठे प्रश्नों का हो सकता है।

यदि कोई मुख्यमंत्री अदालत जाने से पहले इस्तीफा दे देता है, तो व्यावहारिक रूप से उसकी स्थिति कमजोर पड़ सकती है। वहीं यदि वह संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर बने रहते हुए कानूनी चुनौती देता है, तो अदालत के पास स्थिति पर विचार करने का अधिक व्यापक अवसर रहता है।


निष्कर्ष

महाराष्ट्र संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीति में संवैधानिक समय-निर्धारण (timing) अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उद्धव ठाकरे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की कार्रवाई पर प्रश्न उठाए, लेकिन इस्तीफे ने उनकी संभावित कानूनी वापसी का रास्ता बंद कर दिया।

पश्चिम बंगाल को लेकर चल रही चर्चाओं में भी यही प्रश्न केंद्र में है कि यदि चुनाव परिणामों को चुनौती दी जाती है, तो संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किस प्रकार होगा। हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी मुख्यमंत्री सामान्यतः कार्यवाहक रूप में बने रह सकते हैं, जब तक नई सरकार का गठन न हो जाए।

अंततः किसी भी राजनीतिक संकट का समाधान अदालत, संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया—तीनों के संतुलन से ही निकलता है।

16 जिलों के समाजजन पहुंचे दुर्ग, पटेल चौक पर चक्का जाम… देवालय खोलने और नए अध्यक्ष को भवन सौंपने की मांग

दुर्ग। केंद्रीय गोंडवाना धमधागढ़ देवालय एवं गोंडवाना भवन को लेकर आदिवासी समाज में लंबे समय से चल रहा विवाद सोमवार को खुलकर सड़क पर दिखाई दिया। समाज के आस्था केंद्र माने जाने वाले इस देवालय में तालाबंदी की कार्रवाई के विरोध में 16 जिलों से पहुंचे समाजजनों ने पहले जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और बाद में अचानक पटेल चौक पर चक्का जाम कर दिया।

बताया जा रहा है कि केंद्रीय गोंडवाना धमधागढ़ देवालय गोंडवाना समाज का एक प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक केंद्र है, जहां वर्षों से समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं। पिछले लगभग 20 वर्षों तक संस्था के अध्यक्ष रहे एम.डी. ठाकुर हाल ही में हुए चुनाव में पराजित हो गए थे, जिसके बाद कमलेश ध्रुव नए अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

हालांकि चुनाव संपन्न होने के बाद भी भवन और देवालय के संचालन को लेकर विवाद समाप्त नहीं हो सका। समाज के लोगों का आरोप है कि कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक पेचीदगियों का हवाला देकर गोंडवाना भवन एवं देवालय में तालाबंदी कर दी गई, जिससे समाज की धार्मिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।

इसी मुद्दे को लेकर बड़ी संख्या में समाजजन जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और देवालय को तत्काल खोलने तथा भवन का संचालन नव-निर्वाचित अध्यक्ष को सौंपने की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा।

स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब समस्या का तत्काल समाधान नहीं निकलता देख समाज के लोगों ने अचानक पटेल चौक पर चक्का जाम कर दिया। देखते ही देखते क्षेत्र में यातायात प्रभावित हो गया और पुलिस प्रशासन को मोर्चा संभालना पड़ा।

पुलिस एवं जिला प्रशासन के अधिकारी लगातार समाज के प्रमुख लोगों से चर्चा कर स्थिति को सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से समाज के प्रतिनिधियों के एक समूह को चर्चा के लिए कलेक्टर कार्यालय बुलाया गया है।

समाचार लिखे जाने तक प्रशासन और समाज के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता जारी थी, जबकि पटेल चौक पर प्रदर्शन और चक्का जाम की स्थिति बनी हुई थी।

समाज के लोगों में पूर्व अध्यक्ष एम.डी. ठाकुर के प्रति नाराजगी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि समाज की आस्था से जुड़े इस केंद्र को विवाद और तालेबंदी से मुक्त कर नए निर्वाचित नेतृत्व को सौंपा जाना चाहिए, ताकि समाज की गतिविधियां सामान्य रूप से संचालित हो सकें।

फिलहाल पूरे मामले पर जिला प्रशासन की नजर बनी हुई है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वार्ता के बाद समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।

मुंगेली | भक्ति, सेवा और सामाजिक समरसता की प्रतीक शिरोमणि भक्त माता कर्मा की जयंती के अवसर पर ग्राम पौनी (मुंगेली) में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस गौरवशाली उत्सव में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री अरुण साव एवं केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए। अतिथियों ने माता कर्मा के तैलचित्र पर दीप प्रज्वलित कर छत्तीसगढ़ की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

भक्ति का ऐसा उदाहरण विरल: अरुण साव

समारोह को संबोधित करते हुए उपमुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने कहा कि माता कर्मा का जीवन त्याग और अटूट श्रद्धा की पराकाष्ठा है। उन्होंने कहा:

"भगवान श्रीकृष्ण के प्रति माता कर्मा की भक्ति इतनी निश्छल थी कि भगवान को स्वयं उनके हाथों से खिचड़ी खाने आना पड़ा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में ही सबसे बड़ी शक्ति है। उनके आदर्श केवल एक समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा पुंज हैं।"

सामाजिक एकता और संस्कृति पर जोर

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री श्री तोखन साहू ने भी समाज को संबोधित किया। उन्होंने माता कर्मा के सेवा भाव को याद करते हुए सामाजिक एकजुटता और भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर बल दिया।

कार्यक्रम की प्रमुख झलकियाँ:

भव्य स्वागत: ग्राम आगमन पर ग्रामीणों और साहू समाज द्वारा अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया गया।

प्रेरक उद्बोधन: वक्ताओं ने नई पीढ़ी को माता कर्मा के पदचिह्नों पर चलकर समाज सेवा का संकल्प लेने को प्रेरित किया।

भक्तिमय वातावरण: माता कर्मा के भजनों और जयकारों से पूरा पौनी क्षेत्र भक्तिमय हो गया।

निष्कर्ष: यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र रहा, बल्कि इसने सामाजिक समरसता और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को और अधिक मजबूती प्रदान की। मुंगेली जिले के इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक बंधु और ग्रामीण जन उपस्थित रहे।

रायपुर ।  उप मुख्यमंत्री एवं कवर्धा विधायक  विजय शर्मा की अनुशंसा पर कवर्धा विधानसभा के अलग-अलग ग्रामों में निर्माण कार्यां के लिए 19 लाख 50 हजार रूपए की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई है। निर्माण कार्य के लिए कलेक्टर  गोपाल वर्मां द्वारा मुख्य नगर पालिका अधिकारी कवर्धा को क्रियान्वयन एजेंसी बनाया गया है। उप मुख्यमंत्री  विजय शर्मा की अनुशंसा से कवर्धा विधानसभा क्षेत्र के कवर्धा शहर के वार्ड क्रमांक 16 मां दंतेश्वरी वार्ड में सामुदायिक भवन निर्माण के लिए 10 लाख रूपए और वार्ड 13/14 में महर्षि कश्यप चैक निर्माण के लिए 9 लाख 75 हजार रूपए की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई है।

गुण्डरदेही। नगर पंचायत गुण्डरदेही में आम जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए 'सुशासन तिहार' की शुरुआत की गई है। इसके तहत 1 मई से 13 मई तक नगर पंचायत कार्यालय में आवेदन लिए जा रहे हैं।अभी तक 25 आवेदन विभिन्न वार्डों से प्राप्त हुए है नगर पंचायत अध्यक्ष प्रमोद जैन ने नगर के सभी पार्षदों और नागरिकों से इस अभियान का अधिक से अधिक लाभ उठाने की अपील की है 

आवेदन करने की तिथि: 1 मई से 13 मई तक

समय: सुबह 10:00 बजे से दोपहर 03:00 बजे तक

*आवेदन की प्रक्रिया और कार्य*

नगर के नागरिक और पार्षद अपने वार्ड से जुड़ी समस्याओं का लिखित आवेदन जमा कर सकते हैं। इसके बाद की प्रक्रिया और संबंधित सेवाओं का विवरण इस प्रकार है:

*डिजिटलीकरण और प्रेषण:*- प्राप्त सभी आवेदनों को ऑनलाइन दर्ज कर संबंधित विभागों को भेजा जाएगा।

*संबंधित विभाग:* राशन कार्ड, भवन अनुमति, जन्म प्रमाण पत्र एवं विकास कार्यों से जुड़े आवेदनों को शासन के पास भेजा जाएगा और शिविर के दौरान त्वरित निराकरण का प्रयास किया जाएगा।

*अधिकारियों की उपस्थिति:* 14 मई को आयोजित होने वाले जन समस्या निवारण शिविर में सभी विभागों के अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहेंगे ताकि मौके पर ही समस्याओं का समाधान किया जा सके।

*नगर पंचायत अध्यक्ष की अपील*

नगर पंचायत अध्यक्ष प्रमोद जैन ने अपील की है कि सभी नगरवासी और पार्षद अपने वार्ड की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करने के लिए आगे आएं और अपने आवेदन जमा करें। यह पहल आमजन की समस्याओं को सीधे शासन-प्रशासन तक पहुंचाने और उन्हें सुलझाने का एक बेहतरीन अवसर है।

 शौर्यपथ लेख / यूक्रेन में जारी युद्ध के खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिखने और मध्य-पूर्व के 'न युद्ध, न शांति' के दलदल में फंसे होने के बावजूद, हाल के समय के दूसरे संघर्षों के मुकाबले 'ऑपरेशन सिंदूर' को एक मानक अभियान के तौर पर देखना महत्वपूर्ण है। 'ऑपरेशन सिंदूर' की सबसे खास बातें थीं— सैन्य ताकत का तीव्र और नियंत्रित तरीके से निर्णायक इस्तेमाल, ताकि प्रबंधन करने योग्य संघर्ष-विस्तार में रहते हुए ऐसे रणनीतिक नतीजे हासिल किए जा सकें, जिनकी 'बाहर निकलने की रणनीति' स्पष्ट हो और जो मोदी सरकार के राजनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप हों। इस संघर्ष की शुरुआत का उद्देश्य था - पाकिस्तान के भारत-विरोधी आतंकवादी नेटवर्क के गढ़ पर सीधा हमला करना और अगर पाकिस्तान की सेना भारत के शुरुआती आतंकवाद-रोधी हमले का सैन्य जवाब देती है, तो उसे भारी नुकसान पहुंचाना। ये ऐसे बड़े लक्ष्य नहीं थे, जिनके लिए बहुत बड़े पैमाने पर और हर तरफ सैन्य ताकत के इस्तेमाल की ज़रूरत पड़ती। यह एक ज़िम्मेदार ताकत द्वारा, राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के बार-बार दोहराए जाने वाले कृत्यों को सज़ा देने के लिए चलाया गया एक सटीक, सक्रिय और संयमित प्रतिरोधी अभियान था।
हालांकि भारत ने 2019 में बालाकोट में आतंकवाद-रोधी अभियानों में आक्रामक हवाई शक्ति के इस्तेमाल का प्रयोग किया था, लेकिन इस बार जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालयों पर—जो क्रमशः बहावलपुर और मुरीदके में स्थित हैं—हमला करने की उसकी तत्परता ने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए जोखिम उठाने की एक नई प्रवृत्ति और संघर्ष को बढ़ाने की इच्छाशक्ति को उजागर किया। फिर भी, राजनीतिक स्तर पर सोच में पूरी स्पष्टता थी कि एक व्यापक संघर्ष भारत के हित में नहीं है, भले ही पाकिस्तान की सैन्य परिसंपत्तियों को और अधिक नुकसान पहुँचाने का सैन्य प्रलोभन मौजूद था।
समझदारी और संयम, ज़िम्मेदार राज-काज और सैन्य अभियानों के दो ऐसे साथ-साथ चलने वाले पहलू हैं, जिन्हें भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अच्छी तरह प्रदर्शित किया; खासकर इस मामले में कि उसने अपने हमलों के दौरान कोई भी अतिरिक्त नुकसान नहीं होने दिया और सैन्य श्रेष्ठता होने के बावजूद पाकिस्तान के युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। अब पीछे मुड़कर देखने पर, एक लंबे और बड़े संघर्ष से मिलने वाले फ़ायदे, उसके संभावित आर्थिक और मानवीय नुकसानों के मुकाबले बहुत ही मामूली लगते हैं। चार दिनों के भीतर ही संघर्ष को समाप्त कर देने से जो सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत हुई, उसने मध्य-पूर्व में चल रहे मौजूदा संघर्ष के दौरान भारत की आर्थिक सहनीयता में योगदान दिया है। दूसरी ओर, मध्य-पूर्व के संघर्ष में अमेरिका के 27 अरब डॉलर से भी ज़्यादा खर्च हो चुके हैं और इस संघर्ष का कोई अंत भी नज़र नहीं आ रहा है।
भारत के मौजूदा उच्च रक्षा संगठन ने संघर्ष के दौरान अच्छी तरह काम किया। ऑपरेशन के नीति-निर्माण और तैयारी के चरण में 'केंद्रीकृत और निर्देशात्मक नियंत्रण' का एक स्पष्ट मॉडल देखने को मिला; इसके पहले स्तर पर प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षा मंत्री थे, जबकि दूसरे स्तर पर सीडीएस और तीनों सेना के प्रमुख इसे समर्थन दे रहे थे। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सेना प्रमुखों और खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट और ठोस रणनीतिक परिणाम बताए गए थे, जिसके बाद उन्हें एक व्यावहारिक 'कार्ययोजना’ तैयार करने की जिम्मेदारी दी गयी।
भले ही हज़ारों सालों में युद्ध के स्वरूप में कई बदलाव आए हों, लेकिन कौटिल्य, सुन त्ज़ू, क्लॉज़विट्ज़ और लिडेल हार्ट जैसे प्राचीन और आधुनिक रणनीतिकारों द्वारा बताए गए युद्ध के अधिकांश मूल सिद्धांत समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। कुल मिलाकर, 'ऑपरेशन सिंदूर' की भारत की सफलता ने तनाव बढ़ाने और प्रतिरोध करने की सीमाओं का विस्तार किया, भारत ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि इसने समय की कसौटी पर खरे उतरे युद्ध के कुछ सिद्धांतों और संकट के समय फ़ैसले लेने के तरीकों का पालन किया। इनमें से, लक्ष्य का चयन और उसे बनाए रखना, शक्ति का केंद्रीकरण, आक्रामक कार्रवाई, अचानक हमला, कमान की एकता, सुरक्षा, सरलता, मनोबल और अनुकूलनशीलता ऐसे सिद्धांत हैं, जिन पर और अधिक विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
परिचालन स्तर पर, भारत की उभरती हुई बहु-क्षेत्रीय सैन्य रणनीति के 'तलवार' के रूप में आईएएफ का इस्तेमाल करने का फ़ैसला एक साहसी कदम था, जो आज के दौर के संघर्षों के बदलते स्वरूप को दिखाता है और जिस पर बारीकी से नज़र रखने और विश्लेषण करने की ज़रूरत है। पाकिस्तान की चीन से मिली वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने और उन्हें जाम करने के बाद, भारत ने 7 मई को पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में घुसकर हमला किया। इस हमले में पाकिस्तान और पीओजेके में मौजूद 9 अहम आतंकवादी ठिकाने तबाह हो गए, और लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज़्बुल मुजाहिदीन के प्रमुख केंद्र नष्ट हो गए। 10 मई को, कुछ ही घंटों के भीतर, भारत ने अपने हमले का दायरा और बढ़ाया तथा 11 प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया, जिनमें नूर खान एयरबेस, रफ़ीक़ी एयरबेस, मुरीद एयरबेस, सुक्कुर एयरबेस, सियालकोट एयरबेस, पसरूर एयरबेस, चुनियां एयरबेस, सरगोधा एयरबेस, स्कार्दू एयरबेस, भोलारी एयरबेस और जैकोबाबाद एयरबेस शामिल थे। इस कार्रवाई से पाकिस्तान की हवाई और युद्ध संबंधी क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुँचा। आईएएफ की हवाई हमलों की तीव्रता से यह ज़ाहिर हो गया है कि इन हवाई अड्डों, विमानों और वहाँ तैनात हथियार प्रणालियों को पहुँचाया गया नुकसान, 1971 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर आईएएफ द्वारा पीएएफ के हवाई अड्डों को पहुँचाए गए कुल नुकसान से कहीं ज़्यादा है। 'ऑपरेशन सिंदूर' ने भारत की एकीकृत हवाई रक्षा प्रणाली की परिपक्वता को भी साबित कर दिया, जो दुश्मन की मिसाइल और ड्रोन-केंद्रित रणनीति का मुक़ाबला करने में सक्षम है। हालाँकि, आईएएफ को भविष्य में, अधिक शक्तिशाली दुश्मनों के ख़िलाफ़ किसी भी सीमित संघर्ष की स्थिति में अपने प्लेटफ़ॉर्म, हथियारों और प्रणालियों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए, तेज़ गति से लगातार सीखते रहने की आवश्यकता होगी।
भविष्य के युद्ध-क्षेत्रों में, लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों का सामना करने के लिए, ज़्यादा एकीकरण और तालमेल की ज़रूरत होगी। वर्तमान में चल रहे सुधारों और संरचनात्मक पहलों पर शायद फिर से विचार करना पड़े, ताकि एक ऐसा संगठनात्मक ढांचा तैयार किया जा सके जो 'भारत-विशिष्ट' हो और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान सीखे गए अनुभवों पर आधारित हो। हालांकि, दुनिया भर में चल रहे संघर्षों से कई रणनीतिक और परिचालन संबंधी सबक मिलते हैं, लेकिन भारत को दूसरी जगहों से युद्ध-लड़ाई के मॉडल उठाने और उन्हें अपने रणनीतिक और परिचालन वातावरण पर लागू करने के प्रति सावधान रहना चाहिए। उदाहरण के लिए, हवाई परिचालन में मिसाइल और ड्रोन पर ज़्यादा ज़ोर देने के समर्थकों को अपने विचार पर फिर से सोचना चाहिए। भारत के पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर जैसा हवाई माहौल है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देते हैं, वहाँ सिर्फ़ 'बहु-क्षेत्रीय परिचालन' ही सफल होंगे।
भारत के सशस्त्र बलों ने एक जटिल युद्धक्षेत्र के माहौल में खुद को साबित किया है—भले ही सीमित पैमाने पर —जिसने उन्हें कई तरह के ऑपरेशन चलाने और सरकार द्वारा तय किए गए राष्ट्र के सर्वोत्तम हितों के अनुसार, सही समय पर पीछे हटने का अवसर दिया। भारत के रणनीतिक और राष्ट्रीय डीएनए में अलग-अलग पहलू शामिल हैं, जो 21वीं सदी में अब तक राजनीतिक सोच और रणनीतिक अभिव्यक्तियों के संयोजन के रूप में सामने आए हैं। ज़िम्मेदारी और संयम के साथ सक्रिय प्रतिरोध की नींव पर निर्मित 'संपूर्ण राष्ट्र दृष्टिकोण' की ओर एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिला है। 'ऑपरेशन सिंदूर' इसी धीरे-धीरे उभरते डीएनए की अभिव्यक्ति था।
**साभार -एयर वाइस मार्शल (डॉ.) अर्जुन सुब्रमण्यम (सेवानिवृत्त)
(लेखक एक सैन्य इतिहासकार और रणनीतिक विश्लेषक हैं। वे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय में 'राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में राष्ट्रपति उत्कृष्टता पीठ' के पूर्व अध्यक्ष हैं। वर्तमान में वे कौटिल्य स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में सहायक संकाय सदस्य हैं और भारत के सभी युद्ध महाविद्यालयों में अतिथि संकाय के रूप में कार्यरत हैं।)

डौंडी | शौर्यपथ समाचार

बालोद जिले के डौंडी थाना क्षेत्र अंतर्गत चोरहापड़ाव रेलवे ट्रैक पर एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां एक प्रेमी जोड़े ने ट्रेन के सामने आकर अपनी जान दे दी। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 16 वर्षीय नाबालिग युवती और 20 वर्षीय युवक बीते दिन से लापता थे। आज सुबह लगभग 4 बजे दल्लीराजहरा से भानुप्रतापपुर की ओर जा रही ट्रेन के सामने दोनों ने कथित तौर पर आत्मघाती कदम उठा लिया।

घटना की सूचना मिलते ही डौंडी पुलिस एवं रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) की टीम तत्काल मौके पर पहुंची। पुलिस ने घटनास्थल से एक मोटरसाइकिल भी जब्त की है, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि दोनों साथ में वहां पहुंचे थे।

मृतकों की पहचान लिलिसा उइके (16 वर्ष), निवासी साल्हे गांव, विकासखंड डौंडी, और जितेश्वर तारम (20 वर्ष), निवासी कुम्हालोरी गांव के रूप में हुई है।

पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। प्रारंभिक तौर पर इसे आत्महत्या का मामला माना जा रहा है, हालांकि सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।

घटना ने एक बार फिर युवा वर्ग में बढ़ते भावनात्मक दबाव और सामाजिक संवेदनशीलता के मुद्दे को उजागर किया है। प्रशासन द्वारा परिजनों से पूछताछ कर घटना के कारणों का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

कवर्धा/कबीरधाम | शौर्यपथ समाचार | ब्यूरो चीफ: प्रवीण गुप्ता

कबीरधाम पुलिस ने एक बार फिर अपनी संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का परिचय देते हुए एक अज्ञात मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला को सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराने की सराहनीय पहल की है। पुलिस की तत्परता और संवेदनशील कार्रवाई के चलते महिला को अब उचित देखभाल और इलाज मिल रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिनांक 2 मई को थाना कोतवाली को सूचना मिली कि ग्राम डबराभाट में लगभग 25 से 30 वर्ष की एक महिला, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत हो रही थी, गांव में इधर-उधर भटक रही है। सूचना मिलते ही पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुंची और महिला से बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन वह अपना नाम और पता बताने में असमर्थ रही।

महिला की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए पुलिस उसे थाना कोतवाली लेकर आई, जहां से जिला अस्पताल में उसका स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। इसके बाद उसे सुरक्षित वातावरण में रखने के लिए सखी सेंटर में रखा गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों—पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र बघेल एवं अमित पटेल, तथा उप पुलिस अधीक्षक (मुख्यालय) आशीष शुक्ला—के निर्देशन में महिला को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

न्यायालय ने महिला की मानसिक स्थिति और उसकी पहचान अज्ञात होने के कारण उसे मानसिक स्वास्थ्य केंद्र सेंदरी, बिलासपुर में भर्ती कराने का आदेश दिया। आदेश के पालन में 5 मई 2026 को पुलिस द्वारा महिला को विधिवत सेंदरी मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया, जहां अब उसका उपचार जारी है।

कबीरधाम पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी को उक्त महिला के संबंध में कोई भी जानकारी प्राप्त हो, तो वे तत्काल थाना कोतवाली कबीरधाम या पुलिस कंट्रोल रूम (मोबाइल नंबर: 9479192499) पर सूचना दें, ताकि महिला को उसके परिजनों से मिलाने में सहायता मिल सके।

यह पहल न केवल पुलिस की कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाती है, बल्कि समाज के प्रति उसकी मानवीय जिम्मेदारी का भी एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करती है।


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