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May 23, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

नई दिल्ली | (शौर्यपथ समाचार) भारत और अल्जीरिया के बीच रक्षा सहयोग को नई गति देते हुए 5 मई 2026 को नई दिल्ली में संयुक्त आयोग की पहली बैठक आयोजित…
नई दिल्ली | (शौर्यपथ समाचार) प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी एवं राष्ट्रपति श्री तो लम के साथ संयुक्त प्रेस वक्तव्य में भारत-वियतनाम संबंधों…

लखनऊ | (शौर्यपथ समाचार)

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान दो दिवसीय लखनऊ प्रवास पर हैं, जहां वे 6 और 7 मई को आयोजित होने वाले “फ्रूट होराइज़न-2026” कार्यक्रम में भाग लेंगे। यह आयोजन देश के बागवानी और फल उत्पादन क्षेत्र को नई दिशा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है, जिसमें किसानों से लेकर वैज्ञानिकों और निर्यातकों तक सभी प्रमुख हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

पहले दिन 6 मई को गोमतीनगर स्थित होटल रेनेसां में केंद्रीय मंत्री श्री चौहान निर्यातकों और उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ सीधा संवाद करेंगे। इस दौरान फल निर्यात को बढ़ावा देने, वैश्विक बाजार की चुनौतियों, गुणवत्ता सुधार और प्रतिस्पर्धात्मक रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा होगी। शाम को प्रगतिशील निर्यातकों के साथ विशेष बैठक भी प्रस्तावित है, जिसमें निर्यात क्षमता बढ़ाने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने पर जोर रहेगा।

दूसरे दिन 7 मई को मुख्य कार्यक्रम आईसीएआर के केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा में आयोजित होगा। यहां श्री चौहान किसानों, पौधशाला संचालकों और प्रसंस्करण क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ संवाद करेंगे। इसके पश्चात मुख्य सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही और श्री दिनेश प्रताप सिंह भी शामिल होंगे।

कार्यक्रम के एजेंडे में फल उत्पादन की गुणवत्ता, वैल्यू एडिशन, निर्यात बढ़ाने की रणनीति, “जीरो रिजेक्शन” नीति, एफपीओ (FPO), एफपीसी (FPC) और स्वयं सहायता समूहों (SHG) की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इस मंच के माध्यम से नई तकनीकों, आधुनिक प्रसंस्करण पद्धतियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार के अवसरों पर भी चर्चा होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि “फ्रूट होराइज़न-2026” जैसे आयोजन किसानों की आय बढ़ाने, बागवानी क्षेत्र में नवाचार लाने और भारत को वैश्विक फल निर्यात के क्षेत्र में मजबूत स्थिति दिलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी एवं वैज्ञानिक भी मौजूद रहेंगे, जिससे नीति और तकनीक के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होने की उम्मीद है।

नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। राज्य में अवैध रेत उत्खनन पर सख्ती के दावे भले कागज़ों में मजबूत दिखते हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत ग्राम पंचायत बनियागांव के आश्रित ग्राम बेलगांव में कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कुछ दिन पहले माइनिंग विभाग द्वारा रेत उत्खनन में लगी मशीन को जब्त कर ‘बड़ी कार्रवाई’ का दावा जरूर किया गया, मगर अब वही क्षेत्र फिर से रेत निकासी का केंद्र बनता नजर आ रहा है।

सूत्रों और स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारियों के मुताबिक, प्रस्तावित टेंडर प्रक्रिया से पहले ही खदान से दिन-रात ट्रैक्टरों के जरिए रेत निकासी की गतिविधियां जारी रहने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक मशीन की जब्ती के बाद क्या अवैध उत्खनन पर प्रभावी रोक लग पाई, या फिर यह कार्रवाई केवल सीमित असर तक ही रह गई?

चर्चा यह भी है कि जब तक विभाग टेंडर प्रक्रिया पूरी करेगा, तब तक खदान के भंडार पर असर पड़ सकता है। यानी टेंडर के समय वास्तविक स्थिति प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

सबसे चिंताजनक पहलू यह बताया जा रहा है कि कथित गतिविधियां विभागीय जानकारी के दायरे में होने के बावजूद प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि अपेक्षित है, लेकिन जिम्मेदारों की चुप्पी कई सवाल जरूर खड़े कर रही है—क्या यह लापरवाही है या समन्वय की कमी? क्योंकि जिस स्तर पर रेत निकासी की बातें सामने आ रही हैं, वह स्थानीय निगरानी से जुड़ा विषय भी माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री द्वारा अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं, लेकिन बेलगांव की स्थिति इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। एक मशीन की जब्ती के बाद भी यदि गतिविधियां जारी रहने की बातें सामने आती हैं, तो यह कार्रवाई की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

यदि समय रहते ठोस और त्वरित कदम नहीं उठाए गए, तो टेंडर प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और खदान के संसाधनों पर भी असर पड़ने की आशंका है। ऐसे में आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है, तो नियमानुसार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि शासन की मंशा, राजस्व और पर्यावरणीय संतुलन की प्रभावी सुरक्षा हो सके।

लेखक: शरद पंसारी, संपादक – शौर्यपथ समाचार

भारतीय लोकतंत्र केवल चुनावी जीत-हार का खेल नहीं है, बल्कि यह नेताओं के चरित्र, उनकी संवेदनशीलता और जनता के प्रति उनके व्यवहार का भी आईना है। हाल के दिनों में राजनीतिक चर्चाओं में दो प्रमुख नाम—तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी—एक बार फिर तुलना के केंद्र में हैं।

हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि एम.के. स्टालिन के चुनाव हारने या कोलाथुर में हार के बाद पहुंचने जैसी खबरों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में इस विषय को एक व्यापक राजनीतिक व्यवहार और नेतृत्व शैली के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।

स्टालिन: संयम और संवाद की राजनीति

एम.के. स्टालिन की राजनीतिक शैली को अक्सर शांत, संतुलित और संगठन-केंद्रित माना जाता है। वे द्रविड़ राजनीति की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें जनता के साथ निरंतर संवाद और संगठन की मजबूती को प्राथमिकता दी जाती है।

यदि कोई नेता कठिन समय में भी जनता के बीच जाकर उनका आभार व्यक्त करता है, तो यह लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत माना जाता है। DMK का इतिहास इस बात का गवाह है कि पार्टी ने कई बार हार के बाद मजबूत वापसी की है।

ममता बनर्जी: संघर्ष और विवादों के बीच नेतृत्व

ममता बनर्जी भारतीय राजनीति की सबसे जुझारू नेताओं में से एक रही हैं। उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद सत्ता प्राप्त की और कई बार उसे कायम रखा। उनकी छवि एक आक्रामक और जनांदोलन से उभरी नेता की है।

हालांकि, समय-समय पर उनके राजनीतिक रुख—विशेषकर विपक्ष या चुनावी परिणामों को लेकर—विवादों में भी रहे हैं। लोकतंत्र में सवाल उठाना स्वाभाविक है, लेकिन उसकी निरंतरता और शैली सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करती है।

जनादेश और जननेता का संबंध

लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है। एक परिपक्व नेता वही होता है जो:

जीत में विनम्रता बनाए रखे

हार में धैर्य और जनता के प्रति आभार प्रकट करे

कठिन समय में भी संवाद का रास्ता न छोड़े

निष्कर्ष: व्यवहार ही बनाता है स्थायी छवि

नेताओं की असली पहचान चुनावी परिणामों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार से बनती है।

संयम, संवाद और संगठन—दीर्घकालिक राजनीति की नींव हैं

आक्रामकता और आरोप—तात्कालिक लाभ तो दे सकते हैं, लेकिन छवि को प्रभावित भी करते हैं

एम.के. स्टालिन और ममता बनर्जी, दोनों ही अपने-अपने राज्यों की मजबूत राजनीतिक हस्तियां हैं। लेकिन उनकी कार्यशैली और प्रतिक्रिया का अंतर यह दर्शाता है कि लोकतंत्र में नेतृत्व केवल सत्ता तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण और दृष्टिकोण का भी विषय है।

राजनांदगांव | 

छत्तीसगढ़ की 'मदर टेरेसा' कही जाने वाली और प्रसिद्ध समाज सेविका पद्मश्री फूलबासन बाई यादव के साथ कल (5 मई) एक रूह कंपा देने वाली घटना घटी। राजनांदगांव जिले में बदमाशों ने फिल्मी अंदाज में उनका अपहरण करने की कोशिश की, जिसे छत्तीसगढ़ पुलिस की सतर्कता और सूझबूझ ने नाकाम कर दिया। इस मामले में पुलिस ने एक मुख्य आरोपी महिला सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया है।

सेल्फी के बहाने रची गई साजिश: घटना का पूरा विवरण

जानकारी के अनुसार, मुख्य आरोपी खुशबू साहू (निवासी बेमेतरा) अपने अन्य साथियों के साथ राजनांदगांव के सुकुलदैहान गांव स्थित फूलबासन बाई के निवास पर पहुंची। आरोपियों ने बड़ी चतुराई से इस साजिश को अंजाम दिया:

बहाना: खुशबू ने फूलबासन जी को घर से बाहर बुलाया और कहा कि कार में एक दिव्यांग महिला बैठी है जो उनके साथ सेल्फी लेना चाहती है।

अपहरण: जैसे ही फूलबासन बाई कार के पास पहुंचीं, आरोपियों ने उन्हें जबरदस्ती खींचकर गाड़ी के अंदर डाल लिया और तेजी से फरार हो गए।

कार के अंदर बर्बरता: पकड़े जाने के डर से आरोपियों ने कार के भीतर ही फूलबासन जी के हाथ-पैर बांध दिए और उनके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि वे मदद के लिए शोर न मचा सकें।

चिखली पुलिस चौकी पर 'मिर्गी' का ड्रामा और गिरफ्तारी

अपहरणकर्ता खैरागढ़ मार्ग की ओर भाग रहे थे, लेकिन उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया। चिखली पुलिस चौकी के पास पुलिस की टीम रूटीन चेकिंग कर रही थी।

पुलिस का संदेह: जब संदिग्ध कार को रोका गया, तो घबराए हुए आरोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए झूठ बोला कि "फूलबासन जी को मिर्गी का दौरा पड़ा है और वे उन्हें जल्दबाजी में अस्पताल ले जा रहे हैं।"

सतर्क पुलिसकर्मी की पहचान: चेकिंग के दौरान एक पुलिसकर्मी ने कार के भीतर बंधक स्थिति में पद्मश्री फूलबासन बाई को पहचान लिया। संदिग्ध स्थिति देख पुलिस ने तुरंत घेराबंदी कर चारों आरोपियों (2 महिला और 2 पुरुष) को हिरासत में ले लिया।

क्यों हुआ अपहरण? साजिश के पीछे की कहानी

प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। मुख्य आरोपी खुशबू साहू पिछले 4 महीनों से फूलबासन जी के संपर्क में थी। पुलिस को संदेह है कि:

बेमेतरा क्षेत्र में स्वयं सहायता समूहों (SHG) के नाम पर अवैध वसूली की कोई बड़ी योजना थी।

रोजगार प्रशिक्षण के बहाने पद्मश्री के नाम का उपयोग कर कोई बड़ा वित्तीय लाभ कमाने की साजिश रची जा रही थी।

वर्तमान स्थिति

पुलिस की त्वरित कार्रवाई की पूरे राज्य में सराहना हो रही है। पद्मश्री फूलबासन बाई अब सुरक्षित हैं और उन्हें उनके घर पहुंचा दिया गया है। पुलिस आरोपियों से कड़ी पूछताछ कर रही है ताकि इस अपहरण कांड के पीछे छिपे असली मकसद और किसी बड़े गिरोह के शामिल होने की पुष्टि की जा सके।

"अपराधियों के हौसले बुलंद थे, लेकिन पुलिस की एक छोटी सी रूटीन चेकिंग ने छत्तीसगढ़ की एक महान हस्ती को बड़ी अनहोनी से बचा लिया।"

दुर्ग | 

दुर्ग शहर के विभिन्न वार्डों में गहराते जल संकट और बदहाल जलापूर्ति व्यवस्था को लेकर आज जन-प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों ने जिला कलेक्टर से मुलाकात की। शहर के कई हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से पानी की बूंद-बूंद के लिए मची हाहाकार और स्थानीय तालाबों के सूखने/खाली किए जाने के विरोध में एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई।

प्रमुख समस्याएँ: क्यों प्यासा है दुर्ग?

ज्ञापन में शहर की जलापूर्ति व्यवस्था की खामियों को उजागर करते हुए प्रमुख रूप से तीन बिंदुओं पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया गया:

तालाबों का अस्तित्व खतरे में: शहर के पारंपरिक जल स्रोतों (तालाबों) को खाली किया जा रहा है, जिससे न केवल भूजल स्तर गिर रहा है बल्कि पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है।

अनियमित जलापूर्ति: कई मोहल्लों में नल कनेक्शन होने के बावजूद पानी का दबाव (Pressure) बहुत कम है, और कुछ क्षेत्रों में तो घंटों तक पानी की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है।

भीषण गर्मी में आम नागरिक बेहाल: पारा बढ़ने के साथ ही पानी की खपत बढ़ी है, लेकिन नगर निगम और संबंधित विभाग सुचारू व्यवस्था सुनिश्चित करने में विफल साबित हो रहे हैं।

ज्ञापन की मुख्य मांगें

कलेक्टर को सौंपे गए पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि जल्द ही समाधान नहीं निकला, तो नागरिक सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:

जलापूर्ति की नियमित मॉनिटरिंग: उन क्षेत्रों को चिन्हित किया जाए जहाँ पानी नहीं पहुँच रहा है और वहां टैंकरों के बजाय पाइपलाइन व्यवस्था को सुधारा जाए।

तालाबों का संरक्षण: तालाबों को खाली करने की प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगे और उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए जल संचय की योजना बनाई जाए।

दोषियों पर कार्रवाई: जलापूर्ति बाधित होने के पीछे यदि कोई तकनीकी लापरवाही या प्रशासनिक ढिलाई है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

प्रशासनिक आश्वासन

कलेक्टर महोदय ने ज्ञापन को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग के अधिकारियों को वस्तुस्थिति की जांच करने और जल्द से जल्द जलापूर्ति बहाल करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने आश्वस्त किया है कि "हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुँचाना प्रशासन की प्राथमिकता है और इसमें किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।"

"पानी का अधिकार, बुनियादी अधिकार है। दुर्ग की जनता को प्यासा रखकर विकास की बातें बेमानी हैं। हमें उम्मीद है कि प्रशासन इस पर त्वरित एक्शन लेगा।"

कोलकाता | 

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ लोकतांत्रिक परंपराएं और संवैधानिक नियम आमने-सामने हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा पद छोड़ने से इनकार किए जाने के बाद राज्य में एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट (Constitutional Crisis) की आहट सुनाई दे रही है। चुनावी नतीजों के बाद उभरी यह स्थिति अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि राजभवन की शक्तियों और संविधान के अनुच्छेदों के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

संवैधानिक मर्यादा और राज्यपाल की शक्तियाँ

विशेषज्ञों के अनुसार, मुख्यमंत्री का पद पर बने रहना किसी व्यक्तिगत इच्छा का नहीं, बल्कि विधायी संख्याबल का विषय है। इस स्थिति में निम्नलिखित बिंदु महत्वपूर्ण हैं:

अनुच्छेद 164 और 'प्रसादपर्यंत' का सिद्धांत: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं और सरकार राज्यपाल के "प्रसादपर्यंत" (Pleasure of the Governor) पद पर बनी रहती है। यदि विधानसभा में बहुमत खो जाता है, तो राज्यपाल के पास सरकार को बर्खास्त करने की संवैधानिक शक्ति होती है।

फ्लोर टेस्ट (Floor Test): यदि बहुमत को लेकर कोई भी धुंधली तस्वीर सामने आती है, तो 'शक्ति परीक्षण' ही एकमात्र रास्ता है। राज्यपाल सदन में बहुमत साबित करने का आदेश दे सकते हैं। आंकड़े पक्ष में न होने पर इस्तीफा अनिवार्य हो जाता है।

अनुच्छेद 356 की संभावना: यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देतीं और नई सरकार के गठन में बाधा उत्पन्न होती है, तो इसे 'संवैधानिक तंत्र की विफलता' माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल की सिफारिश पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।

ममता बनर्जी की रणनीति: 'फ्री बर्ड' बनाम कानूनी लड़ाई

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी भावी रणनीति के संकेत देते हुए स्पष्ट किया है कि वे इस लड़ाई को सड़क और अदालत दोनों जगह लड़ेंगी:

चुनावी नतीजों को चुनौती: मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए परिणामों को न्यायालय में चुनौती देने का मन बनाया है।

जनता के बीच संघर्ष: उन्होंने खुद को एक "फ्री बर्ड" की संज्ञा देते हुए कहा है कि वे अब आम नागरिक के रूप में जनता के बीच जाकर 'संघर्ष' करेंगी।

INDIA गठबंधन का साथ: राज्य की राजनीति से इतर, ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के साथ मिलकर केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी में हैं।

निष्कर्ष: अंतिम निर्णय संख्याबल का

लोकतंत्र की बुनियादी शर्त 'बहुमत' है। यदि विपक्षी खेमे (भाजपा) के पास स्पष्ट बहुमत है, तो राजभवन को नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी मुख्यमंत्री बिना सदन के विश्वास के अनिश्चितकाल तक पद पर काबिज नहीं रह सकता।

आने वाले 48 घंटे पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए निर्णायक होने वाले हैं। क्या राज्य एक सुचारू सत्ता परिवर्तन देखेगा, या फिर यह विवाद देश के सबसे बड़े कानूनी और संवैधानिक मामलों में तब्दील हो जाएगा? पूरे देश की नजरें अब कोलकाता के राजभवन पर टिकी हैं।

*बालोद शौर्यपथ संवाददाता,*

छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस को आखिरकार उसका ‘कप्तान’ मिल गया। राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लंबा ने सोमवार को वो फैसला कर दिया जिसका पूरे प्रदेश को इंतजार था - संजारी-बालोद की दमदार विधायक संगीता सिन्हा अब महिला कांग्रेस की कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष हैं।

*‘सियासी पारा हाई’*  

सोमवार दोपहर आदेश की कॉपी वायरल होते ही कांग्रेस खेमे में जश्न और विपक्ष में सन्नाटा छा गया। व्हाट्सएप ग्रुप से लेकर चौपाल तक बस एक ही नाम - संगीता सिन्हा। कार्यकर्ता बोले - “दीदी आईं, अब आंधी आएगी”।

*बालोद बना ‘मिनी रायपुर’, रात तक बजी बधाइयां*  

नियुक्ति की खबर लगते ही संजारी-बालोद में दिवाली जैसा नजारा था। संगीता सिन्हा के घर के बाहर आतिशबाजी, ढोल और लड्डुओं का दौर चला। बुजुर्ग बोले - “बेटी ने पूरे इलाके का नाम रोशन कर दिया”। संगीता सिन्हा की मिलनसार छवि और हर घर में पहचान ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

*‘महिला कार्ड’ से 2026 की बिसात*  

अलका लंबा ने संगीता सिन्हा को कमान देकर सीधा 2026 के चुनाव पर निशाना साधा है। संगीता सिन्हा का जमीनी नेटवर्क और महिलाओं में पकड़ कांग्रेस के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकती है। एक कार्यकर्ता ने कहा - “संगीता दीदी जिस घर में चाय पी लें, उस घर का वोट पक्का”।

*हिमांशु लावत्रे ने दी बधाई*  

युवा नेता हिमांशु लावत्रे ने कहा - “संगीता सिन्हा जी की नियुक्ति से महिला कांग्रेस को नई दिशा मिलेगी। उनकी मिलनसार कार्यशैली पूरे संगठन में जोश भरेगी”।

*अब मिशन ‘आधी आबादी’*  

पद संभालते ही संगीता सिन्हा का ऐलान - “अब हर ब्लॉक, हर गांव, हर वार्ड में महिला कांग्रेस की टीम खड़ी करेंगे। 2026 में आधी आबादी का पूरा आशीर्वाद कांग्रेस को दिलाएंगे।”

भिलाई ब्यूरो 

भिलाई। छत्तीसगढ़ और नागपुर विदर्भ क्षेत्र में तबलीग़ जमात के 'अमीर' हाजी मोहम्मद असलम का शनिवार 2 मई को तड़के दो बजे इंतकाल हो गया। हाजी असलम कई दिनों से बीमार चल रहे थे। खुर्सीपार निवासी सैय्यद असलम ने बताया कि मरहूम हाजी मोहम्मद असलम के जनाजे की नमाज़ यंग मुस्लिम फुटबॉल ग्राउंड मोमिनपुरा नागपुर में उनके बेटे मौलाना अब्दुल्ला ने पढ़ाई। 

 नमाजे जनाजा मे निजामुद्दीन मरकज दिल्ली, बरार, महाराष्ट्र, विदर्भ और छत्तीसगढ़ के उलेमा के साथ आम लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के मुस्लिम समाज के लोगों ने हजारों की तादाद में नागपुर पहुंच कर अपनी अकीदत का इजहार किया। 

गौरतलब है कि तबलीग़ जमात में आध्यात्मिक स्तर पर संगठन प्रमुख 'अमीर' का पद मशविरा से तय होता है। हाजी मोहम्मद असलम नागपुर के रहने वाले थे और तबलीग़ के काम को लेकर छत्तीसगढ़ बरार , महाराष्ट्र सहित देश विदेश में सक्रिय थे। उन्होंने बताया कि हाजी मोहम्मद असलम ने अल्लाह के दीन और हज़रत मोहम्मद सल्लु अलैहिस्सलाम की पाकीजा जिंदगी को अपनाने लोगों की सच्ची रहनुमाई की। समाज के लिए उनका दुनिया से जाना एक रहनुमा एक सच्चा दाई (प्रेरक व्यक्तित्व) और बुर्जुग शख्सियत का चला जाना है।

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