August 03, 2026
Hindi Hindi

Login to your account

Username *
Password *
Remember Me
    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    सेहत / शौर्यपथ / हर किसी को गुस्सा आता है और यह बेहद स्वाभाविक है। लेकिन, अगर आप उनमें से हैं जो अपने गुस्से का इजहार नहीं करते तो सर्तक हो जाइए। अपने गुस्से को व्यक्त करने में न सिर्फ आपकी मानसिक भलाई है बल्कि मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक)को रोकने में भी यह अहम भूमिका निभाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के शोधकर्ताओं की टीम ने पाया है कि गुस्से को दबाकर रखने से महिलाओं के कारोटिड धमनियों में गंदगी (प्लाक)जमने लगती है जिससे मस्तिष्काघात का खतरा बढ़ जाता है।

    दिमाग को खून सप्लाई करती हैं धमनियां-
    यह धमनियों दिमाग तक होने वाली खून की सप्लाई को नियंत्रित करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन धमनियों में सिकुड़न आने से मस्तिष्काघात का खतरा जानलेवा हो सकता है। पूर्व के शोधों के अनुसार लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग में सूजन पैदा होती है जिससे मस्तिष्काघात, दिल के दौरे, और सीने में दर्द के खतरे बढ़ जाते हैं।

    भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिमागी स्वास्थ्य में संबंध-
    प्रमुख शोधकर्ता कारेन जाकुबोवस्की ने कहा, हमारे शोध से पता चलता है कि महिलाओं में सामाजिक-भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिमाग के स्वास्थ्य के बीच संबंध पाया गया है। इस तरह के शोध महत्वूपर्ण होते हैं क्योंकि यह दर्शाता है कि कैसे किसी महिला का भावनात्मक स्वभाव उसके शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इन परिणामों से प्रोत्साहित होकर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को अपने रोगियों के सामाजिक-भावनात्मक कारकों को ध्यान में रखते हुए एक निवारक देखभाल योजना की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए।

    मस्तिष्काघात अमेरिका में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। स्ट्रोक सेंटर के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में हर साल मस्तिष्काघात से 140,000 लोगों की मौत हो जाती है। यूके में मस्तिष्काघात चौथा सबसे बड़ा मौता का कारण है। यहां साल भर में करीब 100,000 लोगों की मौत मस्तिष्काघात के कारण हो जाती है।

    एथेरोस्क्लेरोसिस ब्रेन स्ट्रोक का कारण-
    एथेरोस्क्लेरोसिस ब्रेन स्ट्रोक का एक प्रमुख कारण है। यदि पट्टिका फट जाती है, तो यह एक रक्त का थक्का बना सकता है जो आगे मस्तिष्क तक ऑक्सीजन युक्त रक्त के प्रवाह को अवरुद्ध करता है। महिलाओं में पुरुषों की तुलना में स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है और उनके ठीक होने की संभावना कम होती है। यह मासिक धर्म चक्र, हार्मोनल गर्भ निरोधकों और गर्भावस्था की जटिलताओं से जुड़ा हुआ है।

    शोधकर्ता इस बात की जानने के इच्छुक थे कि गुस्से को स्वयं दबा लेने से महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने लिखा, कई लोगों ने तर्क से बचने या किसी रिश्ते के टूटने से बचाने के प्रयास में अपने विचारों और भावनाओं को अंदर ही छुपा या दबा लेते हैं। गुस्से को दबा लेने से महिलाएं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

    ऐसे किया गया अध्ययन-
    इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 40 से 60 साल के उम्र की 304 महिलाओं पर शोध किया। यह सभी महिलाएं धूम्रपान नहीं करती थीं। इन महिलाओं से पूछा गया कि यह कितनी जल्दी-जल्दी अपने गुस्से को व्यक्त करती थीं। अल्ट्रासाउंड स्कैन की मदद से उनके कारोटिड धमनियों ने जमा गदंगी के स्तर को आंका गया।

    इन परिणामों से पता चला कि जो महिलाएं अपने गुस्से को दबा रही थीं उनमें एथेरोस्क्लेरोसिस का खतरा ज्यादा था। पूर्व के शोधों में कहा गया है कि दिमाग के तनाव का स्तर बढ़ने से दिमाग बोन मैरो को संकेत भेजता है कि वो और सफेद रक्त कोशिकाएं बनाए। यह सफेद कोशिकाएं धमनियों में सूजन पैदा कर सकती हैं।

    गुस्से का इंसानी शरीर पर असर-
    - शरीर में एड्रिनालिन और नोराड्रिनलिन हॉर्मोंस का स्तर बढ़ जाता है
    - उच्च रक्तचाप, सीने में दर्द, तेज सिर दर्द, माइग्रेन, एसिडिटी जैसी कई शारीरिक बीमारियां हो सकती हैं।
    - जो लोग जल्दी-जल्दी और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते हैं, उन्हें स्ट्रोक, किडनी की बीमारियां और मोटापा होने का जोखिम होता है।
    - ज्यादा पसीना आना, अल्सर और अपच जैसी शिकायतें भी गुस्से की वजह से हो सकती हैं।
    - ज्यादा गुस्से की वजह से दिल के रक्त को पंप करने की क्षमता में कमी आती है और इसकी वजह से दिल की मांसपेशियों को क्षति पहुंचती है।
    - लगातार गुस्से से रैशेज, मुंहासे जैसी स्किन से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।

     

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / प्राकृतिक नियमों के अनुसार एक महिला तभी तक गर्भधारण कर सकती है जब तक उसे मासिक धर्म आता है। सामान्तय महिलाएं 50 साल की उम्र में रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) की अवस्था प्राप्त कर लेती हैं। रजोनिवृत्ति वो अवस्था होती है जब मासिक धर्म बंद हो जाते हैं और गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। लेकिन, अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसा प्रजजन संबंधी इलाज ढूंढ़ निकाला है जिसकी मदद से रजोनिवृत्ति के बाद भी महिलाएं मां बन सकेंगी।

    ग्रीस में वैज्ञानिकों ने ऐसा ही एक इलाज विकसित किया है जिसकी मदद से रजोनिवृत्ति प्राप्त कर चुकी तीन महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया है। ग्रीस के जेनेसिस एथेंस फर्टिलिटी क्लीनिक के विशेषज्ञों ने इस इलाज में एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया है जिसका इस्तेमाल घावों को जल्द ठीक करने के लिए किया जाता है। यह तकनीक ऊतकों और रक्त वाहिकाओं को बढ़ावा देती है। इस तकनीक को प्लेटलेट रिच प्लाजमा (पीआरपी) कहते हैं।

    ऐसे किया गया शोध-
    क्लीनिक के विशेषज्ञों ने 46 से 49 साल के उम्र की महिलाओं के अंडाशय में पीआरपी इंजेक्ट किया। यह सभी महिलाएं रजोनिवृत्ति को प्राप्त कर चुकी थीं। जब महिलाएं रजोनिवृत्ति प्राप्त कर लेती हैं तब वे गर्भधारण नहीं कर पातीं। नए इलाज की मदद से 70 फीसदी प्रतिभागियों में मासिक धर्म को दोबारा शुरू किया जा सका।

    इनमें वे महिलाएं शामिल थीं जिन्हें पांच साल से मासिक धर्म नहीं हुआ था। शोधकर्ताओं की टीम ने तीन महिलाओं से अंडे लिए और उन्हें लैब में निषेचित किया। फिर इससे उन्हें गर्भधारण कराया गया।

    ज्यादा उम्र में मां बनना होगा आसान-
    क्लीनिक के विशेषज्ञ कोंस्टानटिनोस पानटोस ने कहा कि यह इलाज ज्यादा उम्र में भी महिलाओं को मां बनने में मदद करेगा। उन्होंने कहा, कई महिलाएं 40 की उम्र तक अपने करियर पर ध्यान देती हैं और फिर बच्चों के बारे में सोचती हैं। ऐसे में कई महिलाओं के रजोनिवृत्ति की उम्र आ जाती है और वे बच्चे पैदा नहीं कर पाती। पानटोस ने कहा कि इस इलाज के लिए भी महिलाओं की उम्र सीमा तय करना जरूरी है।

     

    दुर्ग।शौर्यपथ। दुर्ग निगम बाजार विभाग की टीम ने आज बाजार प्रभारी थान सिंह के मार्गदर्शन में आज सुबह समय से पूर्व व्यवसाय संचालन करते हुए पाए जाने पर हटरी बाज़ार स्थित पन्ना स्वीट्स व शर्मा स्वीट्स को सील किया गया । सील की कार्यवाही के दौरान बाजार विभाग प्रभारी व उनकी टीम के सदस्य शशिकांत यादव ,भुवन साहू ,ईश्वर वर्मा ,आदि लोग थे । बता दे कि शहर में लॉक डाउन चल रहा जिसमे व्यापारियों को दुकान खोलने व बन्द करने का समय निर्धारित किया गया है । निर्धारित समय पूर्व या पश्चात व्यवसाय करने वालो पर निगम प्रशासन बारीक नज़र रखे हुए है । लॉक डाउन के नियमो की अवहेलना करते पाए जाने वालों पर प्रशासन सख्ती से कार्यवाही को अंजाम दे रहा है । आज की कार्यवाही में नव पदस्थ बाजार प्रभारी द्वारा बिना किसी पुलिस बल के मदद के की गई कार्यवाही ये दर्शाती है कि निर्धारित समय के पूर्व या पश्चात की कार्यवाही का व्यापारियों द्वारा भी समर्थंन प्राप्त है ।

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / शहद को सेहत और स्किन दोनों के लिए बेहद कारगर माना जाता है। रोजाना एक चम्मच शहद के सेवन से आपकी सेहत ठीक रहती है बल्कि इससे आपकी स्किन में भी निखार आता है लेकिन अक्सर शहद की शुद्धता को लेकर मन में सवाल उठते हैं, ऐसे में आप इन उपायों से असली-नकली शहद की पहचान कर सकते हैं-


    ऐसे करें शहद की पहचान
    विनिगर और पानी के सॉलूशन में शहद की कुछ बूंदें डालें। अगर इस मिश्रण में फोम यानी झाग बनने लगता है तो इसका मतलब है कि आपके शहद में मिलावट की हुई है और शहद शुद्ध नहीं है। जब शहद को गर्म चीज के संपर्क में लाया जाता है तो शहद जलता नहीं है। इस टेस्ट को करने के लिए शहद में कॉटन बड या माचिस की तीली को डुबोएं और फिर उसे जलाने की कोशिश करें। अगर वो जल जाता है तो इसका मतलब है कि शहद शुद्ध है। अगर शहद मिलावटी है तो वह सही तरीके से जलेगा नहीं, अगर आपका शुद्ध शुद्ध है तो वह पानी में पूरी तरह से घुलेगा नहीं और एक बार घोलने के बाद आपको काफी मेहनत करनी पड़ेगी ताकि शहद पानी में घुल जाए लेकिन अगर शहद मिलावटी है और उसमें चीनी का ग्लूकोज की मिलावट की गई है तो वह आसानी से पानी में घुल जाएगा और फिर सफेद मार्क छोड़ देगा।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / 18 अगस्त 2020, मंगलवार को कुशोत्पाठिनी अमावस्या है। इस दिन पोला पिठोरा पर्व मनाया जाता है। भाद्रपद मास की इस अमावस्या तिथि को कुशग्रहणी अमावस्या कहते हैं।

    अगस्त महीने में खेती-किसानी का काम समाप्त हो जाने के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पोला त्योहार मनाया जाता है। प्रतिवर्ष पिठोरी अमावस्या पर मनाया जाने वाला पोला-पिठोरा पर्व मूलत: खेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को यह पर्व विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है।

    महाराष्ट्रीयन समाज में पिठोरी अमावस्या पर पोला (पोळा) पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और यह छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भी है। इस दिन अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए चौसष्ठ योगिनी और पशुधन का पूजन किया जाएगा। इस अवसर पर जहां घरों में बैलों की पूजा की जाएगी, वहीं लोग पकवानों का लुत्फ भी उठाएंगे। इसके साथ ही इस दिन 'बैल सजाओ प्रतियोगिता' का आयोजन किया जाता है।

    पोला त्योहार मनाने के पीछे यह कहावत है कि अगस्त माह में खेती-किसानी का काम समाप्त होने के बाद इसी दिन अन्नमाता गर्भ धारण करती है यानी धान के पौधों में इस दिन दूध भरता है इसीलिए यह त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार पुरुषों-स्त्रियों एवं बच्चों के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस दिन पुरुष पशुधन (बैलों) को सजाकर उनकी पूजा करते हैं।

    स्त्रियां इस त्योहार के वक्त अपने मायके जाती हैं। छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों की पूजा करते हैं। इस दिन पोला पर्व की शहर से लेकर गांव तक धूम रहती है। इस दौरान जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना होती है। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुलाकर सजाएंगे और फिर घरों में लाकर विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करके घरों में बने पकवान उन्हें खिलाते हैं।

    पर्व के 2-3 दिन पहले से ही बाजारों में मिट्टी के बैलजोड़ी बिकते दिखाई देते हैं। बढ़ती महंगाई के कारण इनके दामों में भी बढ़ोतरी हो गई है। इसके अलावा मिट्टी के अन्य खिलौनों की भी भरमार बाजारों में दिखाई देती है। लेकिन इस बार कोरोना वायरस के चलते पोला पर्व पर हमेशा जैसी रौनक नहीं होगी। महाराष्ट्र में कोरोना की अधिकता के कारण यह पर्व बेजान और फीका-फीका रहने की संभावना है। इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है। पहले कई गांवों में इस अवसर पर बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता था, लेकिन समय के साथ यह परपंरा अब समाप्त होने लगी है। इस अवसर पर बैल दौड़ और बैल सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें अधिक से अधिक किसान अपनी बैलों के साथ भाग लेते हैं। खास सजी-संवरी बैलों की जोड़ी को इस दौरान पुरस्कृत भी किया जाता है। लेकिन इस बार यह रौनक नजर नहीं आ पाएगी।

    दरअसल, यह त्योहार कृषि आधारित पर्व है। वास्तव में इस पर्व का मतलब खेती-किसानी, जैसे निंदाई-रोपाई आदि का कार्य समाप्त हो जाना है, लेकिन कई बार अनियमित वर्षा के कारण ऐसा नहीं हो पाता है। बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। किसान बैलों को देवतुल्य मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

    महाराष्‍ट्रीयन परिवारों में पोला पर्व के दिन घरों में खासतौर पर पूरणपोली (पूरणपोळी/ पोसाटोरी) और खीर बनाई जाती है। बैलों को सजाकर उनका पूजन किया जाता है, फिर उन्हें पूरणपोली और खीर भी खिलाई जाती है। शहर के प्रमुख स्थानों से उनकी रैली निकाली जाती है।

    जिन-जिन घरों में बैल होते हैं, वे इस दिन अपने बैलों की जोड़ी को अच्छी तरह सजा-संवारकर इस दौड़ में लाते हैं। मोती मालाओं तथा रंग-बिरंगे फूलों और प्लास्टिक के डिजाइनर फूलों और अन्य आकृतियों से सजी खूबसूरत बैलों की जोड़ी हर इंसान का मन मोह लेती है।

    कई समाजवासी पोला पर्व को बहुत ही उत्साहपूर्वक मनाते हैं। बैलों की जोड़ी का यह पोला उत्सव देखते ही बनता है। खासतौर पर छत्तीसगढ़ में इस लोकपर्व पर घरों में ठेठरी, खुरमी, चौसेला, खीर-पूरी जैसे कई लजीज व्यंजन बनाए जाते हैं।

    इस पूजन के बाद माताएं अपने पुत्रों से पहले 'अतिथि कौन?' इस तरह पूछेंगी और इस दौरान पुत्र अपना नाम माता को बताएंगे, उसके बाद ही पूरणपोली और खीर का प्रसाद ग्रहण करेंगे। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला लोक पर्व का यह नजारा देखने में बहुत ही खूबसूरत दिखाई देता है, लेकिन इस बार शायद यह संभव नहीं हो पाएगा।

    कुशोत्पाटनी अमावस्या 2020 : जानिए इस दिन क्या करें,क्या न करें
    18 अगस्त 2020 को कुशोत्पाटनी अमावस्या है। इसे कुशग्रहणी अमावस्या भी कहते हैं। कुशोत्पाठिनी अमावस्या और पोला पिठोरा भी कुछ लोग कहते हैं...कुशोत्पाटनी अमावस्या पर उखाड़ा गया कुश 1 वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है। सामान्यत: किसी भी अमावस्या को उखाड़ा गया कुश 1 मास तक प्रयोग किया जा सकता है।

    कुश को हमारे शास्त्रों में विशेष शुद्ध माना गया है। हमारे शास्त्रों में जप इत्यादि करते समय कुश को पावित्री के रूप में धारण करने का नियम है। कुश उखाड़ने के लिए श्रद्धालुओं को निम्न रीति का प्रयोग करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में कुश की महती आवश्यकता होती है।
    1. प्रात: काल स्नान के उपरांत सफेद वस्त्र धारण कर कुश उखाड़ें।

    2. कुश उखाड़ते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व की ओर रखें।

    3. सर्वप्रथम 'ॐ' बोलकर कुश का स्पर्श करें। फ़िर निम्न मंत्र पढ़कर प्रार्थना करें-

    'विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्जन।
    नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकरो भव॥'
    4. तत्पश्चात् हथेली और अंगुलियों के द्वारा मुट्ठी बनाकर एक झटके से कुश उखाड़ें। कुश को एक बार में ही उखाड़ना चाहिए। अत: पहले उसे लकड़ी के नुकीले टुकड़े से ढीला कर लें, लोहे का स्पर्श ना करावें।
    5. कुश उखाड़ते समय 'हुं फ़ट्' कहें।

    प्रयोग करने योग्य कुश-

    1. जिसका अग्रभाग कटा न हो।

    2. जो जला हुआ ना हो।

    3. जो मार्ग या गंदे स्थान पर ना हो।

     

    मनोरंजन / शौर्यपथ / सुशांत सिंह राजपूत मामले में सीबीआई ने रिया चक्रवर्ती के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। इस बीच रिया का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। यह वीडियो उनकी फिल्म जलेबी के प्रमोशन के दौरान का है।

    गुड टाइम्स से बात करते हुए रिया बताती हैं कि फिल्म जलेबी को करने के बाद कैसे प्यार को लेकर उनकी सोच बदल गई है। रिया कहती हैं, पहले मैं वही सोची थी जैसे बाकी सब सोचते हैं जैसे डेट पर जाना, रोमांटिक चीजें करना, ये और वो। इसके बाद लास्ट में जब इन सब चीजों से भर जाए तो 1 या 1.5 साल साल के बाद ऐसा समय आता है जब आपका इन सबसे मन भर जाता है और फिर आप एक दूसरे को मारना चाहते हैं या एक दूसरे को बदलना चाहते हैं।

    रिया आगे कहती हैं, लेकिन अब मुझे लगता है कि चीजें अलग हैं। अब प्यार को लेकर मेरी सोच बदल गई है। अब प्यार को लेकर मेरी सोच और गहरी हो गई है और रियल फीलिंग है और इसका यही मतलब है कि मैं पूरी लाइफ सिंगल रहने वाली हूं।

    सुशांत का टच थेरेपी से इलाज करवाती थी रिया चक्रवर्ती, स्पिरिच्यूल गुरू ने किया खुलासा

    हाल ही में खबर आई कि रिया चक्रवर्ती, सुशांत को स्पिरिच्यूल गुरू के पास ले जाती थी। बीते वर्ष 2019 के नवंबर महीने में वह सुशांत को ठाणे स्स्थित स्पिरिच्यूल गुरू के पास ले गई थी। सुशांत जहां गए थे वहां उनका टच थेरेपी के द्वारा ट्रीटमेंट करने का दावा किया गया था। रिया अक्सर यहां सुशांत को लाया करती थीं।

    ईलाज करने वाले ने दावा किया है कि यहां किसी जादू-टोने के जरिये मरीज का उपचार नहीं किया जाता। कई सेलीब्रेटी परेशान होने के बाद इस जगह आते हैं। उसने यह भी कहा कि सुशांत को देखते ही यह कह दिया गया था कि उन्हें किसी तरह की डिप्रेशन की बीमारी नहीं है। उन्होंने काफी अच्छे से सभी लोगों के साथ बातचीत की थी। अब सवाल यह है कि टच थेरेपी से ईलाज करने वाले ने भी जब यह कह दिया कि सुशांत को किसी तरह की बीमारी नहीं थी तो क्या रिया जानबूझकर उनके दिमाग में बीमार होने की बात भरती थी ताकि वह उनके रुपये को मनामने ढंग से खर्च कर सके।

     

    खेल / शौर्यपथ / पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के मौजूदा तनाव को देखते हुए इन दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सीरीज होना बहुत मुश्किल है। स्काई स्पोर्ट्स की डॉक्यूमेंटरी में पूर्व पाकिस्तानी कप्तान इमरान ने कहा, ''इस माहौल में क्रिकेट बहुत उपयोगी नहीं होगा। भारत में जिस तरह की सरकार है, मैं यही कहूंगा इस भयानक समय में द्विपक्षीय सीरीज संभव नहीं है।''

    2008 के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कोई टेस्ट सीरीज नहीं हुई है। मुंबई हमले के बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सीरीज विराम लग गया था। हालांकि, 2012 में पाकिस्तान ने व्हॉइट बॉल क्रिकेट के लिए भारत दौरा किया था। पाकिस्तान ने इमरान खान के नेतृत्व में 1992 का विश्व कप जीता था। वह भारत में 1979 और 1987 में दो सीरीज खेल चुके हैं। तब दोनों देशों के बीच क्रिकेट के लिए अच्छा माहौल था।

    इमरान खान ने कहा, ''स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ होती थी और सरकार भी आपसी बाधाओं को दूर कर रही थी, यानी मैदान पर माहौल अच्छा था। 1979 में दोनों देश क्रिकेट में अच्छे थे, लेकिन 1987 में जब पाकिस्तान क्रिकेट टीम ने भारत का दौरा किया मैं कप्तान था, उस समय माहौल ठीक नहीं था। दोनों देशों के बीच तनाव था, इसलिए दर्शकों के व्यवहार में भी नफरत दिखाई दे रही थी।

    इमरान खान ने कहा कि भारत ने 2005 में पाकिस्तान का दौरा किया और भीड़ ने मेहमान टीम को चीयर किया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत पाकिस्तान सीरीज एशेज से भी बड़ा ईवेंट है। एशेज की अपनी महत्ता है, लेकिन भारत पाकिस्तान के बीच मैच का मजा ही कुछ अलग है, क्योंकि यह अलग माहौल और बेहद तनाव, दबाव और आनंद में खेला जाता है।

    उन्होंने कहा, ''भारत और पाकिस्तान सीरीज हीरोज पैदा करती है और जो परफॉर्म नहीं कर पाते, उन्हें खलनायक बना देती है।'' इमरान खान ने टेस्ट फॉर्मैट को बेस्ट बताते हुए कहा कि टी-20 में जिस तरह के स्ट्रोक खेले जाते हैं, उनसे वह बहुत प्रभावित हुए हैं। इमरान ने कहा कि यदि टी20 का कोई करीबी मैच हो तो वह मजेदार होता है, लेकिन मेरे लिए टेस्ट ही श्रेष्ठ है।

     

    नजरिया / शौर्यपथ / शनिवार को जब देश स्वतंत्रता दिवस के जश्न में डूबा था, तमिलनाडु के वरिष्ठ मंत्री मुख्यमंत्री ई पलानीसामी और उप-मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम के बीच सुलह-समझौते कराने में व्यस्त थे। देर शाम मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री ने एक साझा बयान जारी करते हुए पार्टी के नेताओं को सख्त निर्देश दिया कि वे मीडिया में पार्टी या नेतृत्व पर किसी तरह की टीका-टिप्पणी से बचें। यह बयान, दरअसल दोनों नेताओं के बीच सरकार व पार्टी पर नियंत्रण बनाने के सवाल पर चल रहे परोक्ष युद्ध का नतीजा है, जिसका दायरा बढ़कर समर्थकों तक पहुंच गया है। इन सबकी शुरुआत एक मंत्री के उस बयान से हुई, जिसमें जोर दिया गया कि अन्नाद्रमुक पार्टी अपने नेता ई पलानीसामी को बतौर चेहरा पेश करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ेगी। जवाब में एक अन्य मंत्री ने कहा कि चुनाव के बाद विधायक अपना नेता खुद चुनेंगे। स्वतंत्रता दिवस के दिन हालात बिगड़ गए, जब पनीरसेल्वम के समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग वाले पोस्टर उनके गृहनगर में चिपकाए और पलानीसामी के समर्थकों ने उसे फाड़ दिया। नतीजतन, चेन्नई में पनीरसेल्वम के घर पर शांति बैठक हुई, जिसमें पलानीसामी के 10 मंत्रियों ने उप-मुख्यमंत्री के साथ गंभीर विमर्श किया। इसके बाद प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेजे गए थे, जिसका नतीजा यह संयुक्त बयान रहा। हालांकि, इसमें असल मुद्दा गौण है और उस पर चर्चा की बजाय पार्टी के नेताओं के लिए सलाह जारी की गई है।
    पनीरसेल्वम दो बार कार्यवाहक मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जब जयललिता को भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाना पड़ा था। दोनों बार उन्होंने वफादार की तरह अपने कर्तव्यों का पालन किया। अम्मा की मौत के बाद उनकी सहयोगी वी के शशिकला ने उन्हें तीसरी बार यह दायित्व सौंपा। संदेश साफ था कि पिछली दो पारियों की वजह से उनको यह पद सौंपा गया है, इसलिए उन्हें अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर नहीं करनी चाहिए। 31 दिसंबर, 2016 को शशिकला ने औपचारिक रूप से अन्नाद्रमुक की बागडोर संभाल ली और 5 फरवरी, 2017 को उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया गया। नतीजतन, अगले दिन ही पनीरसेल्वम ने पद छोड़ दिया, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें पद पर बने रहने का कहा, क्योंकि आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह एक फैसले का इंतजार कर रहे थे, जो शशिकला के खिलाफ आया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लिहाजा शशिकला की नई पसंद पलानीसामी बने।
    पलानीसामी और पनीरसेल्वम के बीच गुटीय लड़ाई रोकने के लिए केंद्र ने एक सौदा किया, क्योंकि एकजुट अन्नाद्रमुक हर किसी के हित में था। शायद इसी सौदे के तहत पलानीसामी के पद पर बने रहने की सहमति बनी और पनीरसेल्वम उप-मुख्यमंत्री बनाए गए। पनीरसेल्वम को पार्टी संयोजक बनाकर अन्नाद्रमुक की बागडोर भी उन्हीं के हाथों में सौंपी गई। पर यह पूर्ण व्यवस्था नहीं थी, पलानीसामी को सह-संयोजक बनाया गया व महासचिव का पद खाली रखा गया। भाजपा की मंशा शायद यह थी कि जब तक राज्य में उसका समर्थन-आधार नहीं बन जाता, तब तक सूबे की मित्र-सरकार की मदद से अपनी पकड़ मजबूत बनाकर रखी जाए। अगर उसकी यह योजना थी, तो यह कारगर साबित नहीं हुई है, क्योंकि पलानीसामी धीरे-धीरे मजबूत हुए हैं।
    बहरहाल, मुख्यमंत्री ने पिछले पखवाड़े में नई शिक्षा नीति की मुखालफत करके अपने प्रशंसकों व आलोचकों को चौंका दिया। गणेश चतुर्थी के जुलूस पर पाबंदी लगााने से भी उनके आलोचक मुखर हुए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने तो यह तक दावा किया है कि उनकी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में एजेंडा तय करेगी। आमतौर पर तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टियां जूनियर सहयोगी रही हैं, इसलिए उनका यह बयान चौंकाने वाला है, क्योंकि सूबे में भाजपा का आधार सीमित है। चूंकि सितंबर के पहले हफ्ते में शशिकला की रिहाई हो सकती है, इसलिए माना जा रहा है कि उनके सक्रिय होने से पहले ही पलानीसामी और पनीरसेल्वम अपनी हैसियत मजबूत बनाना चाहते हैं। अब जबकि विधानसभा चुनाव आठ महीने दूर है, दोनों नेता अपने-अपने तरीके से नैरेटिव गढ़ना चाहते हैं। पैर जमाने के लिए भाजपा की आक्रामक नीति ने भी यहां के चुनावी माहौल को दिलचस्प बना दिया है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

     

    सम्पादकीय / शौर्यपथ / सोशल मीडिया के जिस मंच को दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा अलंबरदार माना जाता रहा है, उस ‘फेसबुक’ पर इन दिनों जैसी तोहमतें लग रही हैं, वे यकीनन स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पैरोकारों को निराश करने वाली हैं। लेकिन उतनी ही चिंताजनक बात यह भी है कि इस कंपनी की एक वरिष्ठ अधिकारी को धमकाने की कोशिश की गई है। फेसबुक की क्षेत्रीय पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर अंखी दास ने दिल्ली पुलिस में इस बाबत शिकायत दर्ज कराई है। विडंबना देखिए, जिस नफरती प्रवृत्ति के खिलाफ कथित नरमी बरतने के आरोपों पर फेसबुक को सफाई देनी पड़ रही है, उसकी अधिकारी अब दूसरी तरफ के असहिष्णु लोगों के निशाने पर हैं। दरअसल, पिछले दिनों एक बड़े अमेरिकी अखबार ने खबर छापी थी कि फेसबुक कंपनी भारत में पक्षपाती भूमिका अपना रही है और सत्ताधारी नेताओं की घोर सांप्रदायिक टिप्पणियों को भी प्रतिबंधित नहीं कर रही। जाहिर है, विपक्ष को एक मौका हाथ लग गया है और वह इसे यूं ही नहीं छोड़ना चाहता।
    ‘हेट स्पीच’ और नुकसानदेह सामग्रियों के खिलाफ फेसबुक में बाकायदा एक बड़ा विभाग है और उसका काम ही है ऐसी सामग्रियों की निगरानी करना और उन्हें प्रकाशित-प्रसारित होने से रोकना, जो न सिर्फ नस्लीय घृणा, सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा देने वाली हों, बल्कि जो मानव स्वास्थ्य को किसी भी रूप में नुकसान पहुंचाने वाली हों। मौजूदा कोरोना काल में हमने देखा और महसूस भी किया कि इसके इलाज के तरह-तरह के टोटकों और फर्जी तजवीजों के खिलाफ फेसबुक ने तत्परता से कदम उठाया। इसमें कोई दोराय नहीं कि यह बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि दुनिया भर में हर सेकंड छह नए यूजर इस माध्यम से जुड़ रहे हैं और रोजाना लाखों तस्वीरें व टिप्पणियां इस पर पोस्ट की जा रही हैं। ऐसे में, इस माध्यम की बुनियादी खूबी की रक्षा करते हुए इसके दुरुपयोग को रोकना एक बहुत बड़ी चुनौती है। कंपनी ने प्रकारांतर से स्वीकार भी किया है कि उसे अभी इस दिशा में काम करने की जरूरत है।
    लेकिन फेसबुक एक कारोबारी कंपनी है और व्यावसायिक हित-अहित से संचालित उसकी नीतियां तभी तक मान्य हैं, जब तक उसकी पहुंच वाले देशों के आंतरिक मामलों में वे कोई बाधा नहीं खड़ी करतीं। भारत में जो ताजा विवाद खड़ा हुआ है, वह राजनीतिक पक्षधरता से जुड़ा है, इसीलिए इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि, फेसबुक ने अपनी सफाई पेश की है कि उसकी नीतियां तटस्थता पर आधारित हैं और वे किसी देश की किसी पार्टी से प्रभावित नहीं हैं। लेकिन दुर्योग से कई अन्य देशों में ऐसे ही आरोप उस पर पहले भी लग चुके हैं। तुर्की में तो इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए सांसद बाकायदा एक कानूनी मसौदा तैयार कर रहे हैं। हमारे यहां फेसबुक यूजर्स की संख्या 34 करोड़ से भी अधिक है। इतने बड़े बाजार को कंपनी नजरअंदाज नहीं कर सकती, क्योंकि किसी भी कंपनी की तरक्की में साख का बड़ा योगदान होता है। बहरहाल, हमें यह तो देखना ही पडे़गा कि कोर्ई भी बाहरी तत्व हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को किसी रूप में प्रभावित न करने पाए। अपनी सुरक्षा के मद्देनजर हमने चीन के दर्जनों एप को अभी हाल में ही प्रतिबंधित किया है, तो फेसबुक और ट्विटर जैसे जन-प्रभावशाली माध्यमों पर भी हमें हर पल नजर रखनी होगी।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / लॉकडाउन के समय से सभी स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाएं तो शुरू हो गईं, लेकिन वे बस नाम की रह गई हैं। विशेषकर प्राइमरी कक्षाओं में तो शिक्षक प्रश्नोत्तर की एक सारणी बनाकर पीडीएफ के रूप में अभिभावकों को भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ले रहे हैं। न तो विद्यार्थियों को विषय-वस्तु के बारे में समझाया जाता है, न बच्चों से कोई संवाद किया जाता है। बच्चे केवल स्क्रिन पर देखकर प्रश्नों के उत्तर अपनी कॉपी में उतार लेते हैं। कई बच्चे मोबाइल फोन अथवा कंप्यूटर के आगे बैठे तो रहते हैं, पर पढ़ने में उनकी कोई रुचि नहीं होती। यहां मैं दोष शिक्षकों को दूंगी कि उन्हें इस तरह पढ़ाना चाहिए कि बच्चे सरल तरीके से सब कुछ समझ सकें। वर्तमान स्थिति में शिक्षण-सामग्री और पठन-पाठन, दोनों ही उपयोगी और रुचिपूर्ण हो, तभी ऑनलाइन कक्षा का उद्देश्य पूरा होगा।
    विभा गुप्ता, बेंगलुरु

    डूब गया सितारा
    चेतन चौहान का निधन एक तारा के टूटने के समान है। क्रिकेट के मैदान में कई ऑलराउंडर देखने को मिलते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में चंद लोग ही ऑलराउंडर बनते हैं। क्रिकेट के मशहूर बल्लेबाज रहे चेतन चौहान ने हमेशा इस खेल से अपना लगाव बनाए रखा और विभिन्न भूमिकाओं में रहकर इसकी सेवा की। बाद में समाज सेवा के लिए वह राजनीति में आए, और अभी उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में भी शामिल थे। अपनी काबिलियत से वह विरोधियों का भी दिल जीत लेते थे। यही वजह है कि क्रिकेटर, प्रशासक और राजनेता, सभी भूमिका में वह सफल साबित हुए। उनका जीवन सदैव नौजवानों को मार्गदर्शन और प्रेरणा देता रहेगा। उनके आकस्मिक निधन से समाज, राजनीति और खेल जगत, सभी को अपूरणीय क्षति हुई है।
    हिमांशु शेखर, गया

    आत्मनिर्भरता पर जोर
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले से दिए गए भाषण में सबसे प्रमुख मुद्दा था, आत्मनिर्भर भारत, जिसके लिए सरकार प्रतिबद्ध दिखती है। इसी कारण से गरीब मजदूरों, छोटे कारोबारियों, कुटीर उद्योग वाले व्यापारियों को बैंक से बिना किसी ब्याज के कर्ज मुहैया कराया जा रहा है। जिस दिन ये छोटे कुनबे के लोग अपने-अपने व्यापार में सफल होंगे, देश का विकास खुद हो जाएगा। प्लास्टिक के गिलास को छोड़कर कुल्हड़ का प्रयोग करना ही देश और हमारे स्वास्थ्य के लिए श्रेयस्कर है। सरकार सभी नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के भरसक प्रयास कर रही है, जिससे हमारी पूंजी और मुनाफा हमारा रहे, कोई दूसरे देश की कंपनी न ले जाए। जल्द ही भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर होगा। इसके लिए सभी नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
    शुभम पांडेय गगन
    अयोध्या, उत्तर प्रदेश

    मैदान को टाटा
    अपनी कप्तानी और बल्लेबाजी से हजारों-लाखों लोगों का दिल जीतने वाले भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने स्वतंत्रता दिवस की शाम को अपने इंस्टाग्राम पर ‘पल दो पल का शायर हूं’ कहते हुए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। इससे स्वाभाविक तौर पर उनके समर्थकों को झटका लगा और उनमें मायूसी छा गई। हालांकि, धौनी के संन्यास के बाद उनके जोड़ीदार सुरेश रैना ने भी ऐसा ही एलान किया और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट छोड़ने की बात कही। धौनी टीम इंडिया के एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी ही नहीं थे, बल्कि सलाहकार और टीम की जीत की राह बनाने वाले एक अच्छे फिनिशर भी थे। रैना के साथ उनकी जोड़ी तो वाकई तमाम क्रिकेटप्रेमियों को याद रहेगी। भले ही रैना और धौनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया है, पर जब-जब अंतरराष्ट्रीय मैचे खेले जाएंगे, उनकी बात जरूर होगी।
    अनिल, दिल्ली विश्वविद्यालय

     

    हमारा शौर्य

    हमारे बारे मे

    whatsapp-image-2020-06-03-at-11.08.16-pm.jpeg
     
    CHIEF EDITOR -  SHARAD PANSARI
    CONTECT NO.  -  8962936808
    EMAIL ID         -  shouryapath12@gmail.com
    Address           -  SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
    LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
    © 2015 Shouryapath. All Rights Reserved. Designed By Global Vision