August 02, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

     शौर्यपथ / कोरोना वायरस के चलते होटल व्यवसाय पर बुरी मार पड़ी है। शोधकर्ताओं का मानना है कि कोरोना संकट के बीच होटलों में रोबोट आधारित सर्विस शुरू करने से लोगों की सुरक्षित रखने के लिए दिशा-निर्देशों का पालन करने में और व्यवसाय को तेजी से पटरी पर लाने में मदद मिल सकती है।

    ब्रिटेन में सरे विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रमुख चुनौतियों की पहचान करने के लिए 19 होटल मानव संसाधन (एचआर) विशेषज्ञों से बात की। उन्होंने कहा कि रोबोट सर्विस को होटल की गतिविधियों की दक्षता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन वे उच्च लागत, कौशल घाटे, होटल की संगठनात्मक संरचना और संस्कृति में महत्वपूर्ण बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कंटेम्परेरी हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट में प्रकाशित शोध पत्र के मुताबिक, रोबोटिक तकनीक के प्रत्याशित उपयोगों के चलते हमें मानव और रोबोट के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।

    होटल उद्योग में रोबोट सर्विस का प्रयोग बढ़ रहा :
    शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया कि मार्च, 2020 में कोविड-19 के चलते दुनिया भर में आर्थिक स्थिति बदहाल हो गई। होटल उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। कई उद्योगों को फिर से पटरी पर लाने के लिए उनकी कार्यप्रणाली में परिवर्तन करना होगा। शोध पत्र की मुख्य लेखक ट्रेसी जू कहती हैं कि होटल उद्योग में रोबोट सर्विस का प्रयोग बढ़ रहा है। हालांकि, इस प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। उन्होंने कहा, संभावना है कि पाबंदिया हटाने के बाद होटल प्रबंधक नए सिरे से शुरुआत करने की योजना बना रहे होंगे, ऐसे में रोबोट सर्विस अपनाना सकारात्मक कदम होगा।

    होटल-रेस्तरां में सर्विस दे रहे हैं रोबोट :
    लीशर होटल्स ग्रुप के निदेशक विभास प्रसाद ने कहा कि रोबोट सर्विस की शुरुआत कोविड-19 से पहले ही होटल उद्योग और हॉस्पिटैलिटी में हो गई थी। बोस्टन में 'स्पाईस रेस्तरां' इस तरह के मशीनीकरण का उपयोग करता है। वहीं सैन फ्रांसिस्को में 'निर्माता' रोबोट का उपयोग शुरू से अंत तक बर्गर बनाने के लिए करता है। लेकिन अभी तक सीधे मेहमानों की आवभगत करने में रोबोट का उपयोग नहीं किया या है।

     

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कोरोना वायरस से बचने के लिए अमेरिका में कई लोग भोजन में ब्लीच तक मिलाकर खाने लगे है। अमेरिकी एजेंसी ‘सेंटर फॉर रिसर्च एंड डीसीज कंट्रोल’ के सर्वे में यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, 19 फीसदी लोग न सिर्फ भोजन में ब्लीच मिला रहे हैं बल्कि वे ब्लीच से ही खाद्य पदार्थों को धोने लगे हैं। इतना ही नहीं, घर साफ करने वाले क्लीनर से वे शरीर के खुले अंगों को डिसइंफेक्ट कर रहे हैं। कई लोगों ने तो क्लीनर को सूंघने की बात भी स्वीकार की है।

    सीडीसी ने मई में 502 वयस्कों के साथ एक ऑनलाइन सर्वेक्षण किया, जिसमें ये चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। सर्वे में शामिल 39 प्रतिशत लोगों ने माना कि उन्होंने कोरोना वायरस को नष्ट करने के लिए सफाई से जुड़े उत्पादों का गलत इस्तेमाल किया। इनमें से एक तिहाई लोगों के शरीर पर इन उत्पादों का नकारात्मक असर भी देखा गया है। शोधकर्ताओं ने लोगों के व्यवहार में आए इस बदलाव को लेकर चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा कि सेनेटाइजर, ब्लीच और साफ-सफाई में प्रयोग किए जाने वाले क्लीनर का सावधानी पूर्वक इस्तेमाल होना चाहिए। इससे आप कोरोना से नहीं बच सके।

    साबुन का पानी शराब में मिलाकर पी गए-
    सर्वे में भाग लेने वाले 18 फीसदी अमेरिकियों ने कहा कि उन्होंने अपनी त्वचा पर घरेलू क्लीनर लगाए। 10 फीसदी वयस्कों ने कहा कि उन्होंने खुद पर कीटाणुनाशक स्प्रे छिड़का। छह फीसदी लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने क्लीनर निगला और इसके स्प्रे से भाप ली और चार फीसदी लोगों ने एल्कोहल आदि नशीले पदार्थों में साबुन का पानी, ब्लीच व अन्य कीटनाशक द्वव्य मिलाकर पी लिए।

    शरीर पर खतरनाक असर-
    ब्लीच:
    क्लीनिंग मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के अनुसार , ब्लीच मिश्रण सिर्फ ठोस सतहों पर इस्तेमाल करें, ब्लीच कपड़ों और नाजुक सतहों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। इसकी भाप भी हानिकारक है। इससे गले में दर्द और मुंह का स्वाद बिगड़ने की शिकायत होती है। ब्लीच का इस्तेमाल करते समय खिड़कियां खुली रखी जाएं। ब्लीच में अमोनिया, विनेगर व जंग मिटाने वाले द्वव्य तेजाब आदि मिलाने से जहरीली गैस बन सकती है।

    क्लीनर-
    क्लीनर से सफाई करते समय पेपर टॉवल सबसे अच्छा विकल्प है। कपड़ा या पोंछा इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें हर बार इस्तेमाल के बाद धोएं और बदलते भी रहें। कई क्लीनिंग उत्पादों के गलत इस्तेमाल से गला व आंखों में जलन, सिरदर्द के अलावा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है।

    सुरक्षा किट पहनकर करें सफाई : आईसीएमआर-
    कोरोना वायरस की दहशत बढ़ने के बाद भारत के अलग-अलग हिस्सों से खबरें आईं कि लोग अपने शरीर से संक्रमण हटाने के लिए सेनेटाइजर तक पी रहे हैं। इसके बाद इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने स्पष्ट चेतावनी जारी की। इसमें कहा गया कि किसी भी तरह के ब्लीच, सेनेटाइजर, क्लीनर का इस्तेमाल शरीर पर करना हानिकारक है। सतहों को विसंक्रमित करते समय लोगों को व्यक्तिगत सुरक्षा किट पहननी चाहिए।

     

    शौर्यपथ /कहते हैं दुनिया में प्रकृति ने प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भिन्न बनाया है। चाल-ढाल, रूप-रंग के साथ-साथ स्वभाव में भी व्यक्ति अधिकतर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। कई बार कुछ चीज़ें मिल भी जाती हैं, लेकिन व्यक्ति में कोई न कोई गुण-अवगुण ऐसा जरूर होता है जो उसे दूसरों से भिन्न बनाता है। इसलिये प्रत्येक व्‍यक्‍ति की मस्तक की रेखाएं भी समान नहीं होती। किसी की गहरी होती हैं,किसी की सीधी तो किसी ज्यादा होती हैं और किसी की कम। लेकिन इनमें भी सात मुख्य रेखाएं हैं। ये हैं– बुध, शुक्र, मंगल, शनि, गुरु, चंद्र एवं सूर्य रेखाएं।

    बुध रेखा– यह रेखा आपकी भौहों के ठीक मध्य बनती है और मध्य से दोनों कानों की ओर जाती है। जिस जातक की बुध रेखा स्‍पष्ट दिखाई देती हो वह उसकी तीव्र बुद्धि की सूचक होती है। इनके भाग्य में काफी धन कमाना लिखा होता है। ये कभी भी आसानी से कोई आर्थिक नुकसान नहीं होने देते।

    शुक्र रेखा– जिन जातकों की शुक्र रेखा स्‍पष्‍ट रूप से दिखाई देती है वे बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। इन्हें घूमने-फिरने का काफी शौक होता है। यह रेखा माथे के ठीक बीचोंबीच होती है। रेखा जितनी गहरी होगी जातक उतना ही भाग्यशाली होता है। यदि यह रेखा स्‍पष्‍ट न दिखाई दे तो ऐसे जातकों का भाग्य उनका साथ नहीं देता। गहरी रेखा वाले जातक प्यार के मामले में भी रोमांटिक होते हैं।

    मंगल रेखा– यह रेखा भी लगभग माथे के बीचो-बीच ही होती है लेकिन इसका स्थान शुक्र रेखा से थोड़ा ऊपर होता है। ऐसे व्यक्ति जो भी कार्य करते हैं, उसके प्रति एक जुनून सा देखा जा सकता है। यदि जातक की मंगल रेखा गहरी हो तो उसका गुस्सा अक्सर सातवें आसमान पर रहता है। हालांकि ये दिल से बहुत ही साफ होते हैं, लेकिन इनके गुस्से से दूर ही रहा जाए तो बेहतर रहता है।

    गुरु रेखा– शुक्र एवं मंगल रेखा के ऊपर पायी जाती है गुरु रेखा। ऐसे जातक आध्यात्मिक प्रवृति के पाये जाते हैं, सामाजिक रूप से भी ये काफी मिलनसार होते हैं। जिन जातकों की गुरु रेखा हल्की होती है या फिर न के बराबर होती है। ऐसे जातकों के पापकर्मों में लिप्त होने की संभावनाएं अधिक होती हैं। हालांकि ज्यादा गहरी रेखा भी इन्हें घर-परिवार एवं समाज से विमुख कर देती है जिस कारण इनमें विरक्ति का भाव आने की संभावनाएं होती हैं। इनका स्वभाव थोड़ा हठी भी होता है।

    शनि रेखा- यह गुरु से ऊपर मस्तक के ऊपरी हिस्से में दिखाई देती है। यदि आपकी शनि रेखा गहरी है तो आपको जीवन में धन की कमी महसूस नहीं होती। जिस भी चीज़ को पाने का विचार एक बार आप मन में ठान लेते हैं तो उसे हासिल करके ही मानते हैं, लेकिन शनि रेखा बहुत कम जातकों के मस्तक में दिखाई देती है।

    चंद्र रेखा– यह रेखा आपके आर्थिक जीवन के उतार-चढ़ाव के प्रदर्शित करने वाली होती है। यदि आपकी यह रेखा स्‍पष्‍ट है तो आपको धन की कोई कमी नहीं रहने वाली, लेकिन यह साफ दिखाई नहीं देती है या फिर खंडित नजर आती है तो आपको आर्थिक रूप से हानि होने की संभावनाएं प्रबल होती हैं। यह रेखा आपकी बाईं तरफ की भौंह के ठीक ऊपर होती है। जिनकी चंद्र रेखा गहरी होती है ऐसे जातक अधिकतर कला क्षेत्र में अपना नाम कमाते हैं।

    सूर्य रेखा– यह चंद्र रेखा से ठीक विपरीत यानी दाईं ओर की भौंह के ऊपर होती हैं। इससे व्यक्ति का भाग्य तेज माना जाता है। जिनके जीवन में यह रेखा नहीं होता या फिर धूंधली होती है तो ऐसे जातकों को अपने जीवन में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

    खेल / शौर्यपथ / वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान डेरेन सैमी ने अपने ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो शेयर कर सनराइजर्स हैदाराबाद टीम में नस्लवाद के आरोप लगाए हैं। पिछले हफ्ते सैमी 'कालू' शब्द का मतलब जानने के बाद काफी गुस्से में आ गए थे। उन्होंने कहा कि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के दौरान मुझे और श्रीलंका के क्रिकेटर थिसारा परेरा को 'कालू' कहा जाता था। हम दोनों उस वक्त सनराइजर्स हैदराबाद के लिए खेलते थे। अब मुझे इस शब्द का मतलब समझ आया है और मैं बहुत गुस्से में हूं। हालांकि, उस वक्त उन्होंने किसी का भी नाम नहीं लिया था।

    अब डेरेन सैमी ने नस्लवाद के मुद्दे को लेकर एक वीडियो जारी किया है। उन्होंने इस वीडियो को शेयर करते हुए कहा है कि मैं उन सभी लोगों को एक संदेश देना चाहता हूं, जो मेरे लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते थे।

    इंस्टाग्राम पर शेयर वीडियो में सैमी ने कहा, ''मैंने पूरी दुनिया में क्रिकेट खेला है और मुझे कई लोगों से प्यार मिला है। मैंने सभी ड्रेसिंग रूम को अपनाया है, जहां मैंने खेला है। इसलिए मैं हसन मिन्हाज को सुन रहा था कि कैसे उनकी संस्कृति के कुछ लोग काले लोगों का वर्णन करते हैं। ''

    उन्होंने कहा, ''यह सब लोगों पर लागू नहीं होता है। इसलिए मैंने जब इस शब्द का मतलब जाना तो मैंने कहा था कि मैं गुस्से में हूं। इस शब्द का अर्थ का पता लगा तो मुझे यह अपमानजनक लगा था। तुरंत मुझे याद आया जब मैं सनराइजर्स हैदराबाद के लिए खेला था, तब मुझे ठीक वही शब्द कहा जा रहा था जो हमें काले लोगों के लिए अपमानजनक है।''

    सैमी ने कहा कि मुझे जब यह शब्द कहा जाता था, तब मैं इसका मतलब नहीं जानता था। उनकी टीम के साथी उन्हें हर बार उस नाम से पुकारते थे और हंसते थे। उन्होंने कहा, मैं उन लोगों को संदेश देना चाहता हूं कि तुम लोग जानते हो कि तुम कौन हो। मुझे उस समय स्वीकार करना चाहिए था, जब मुझे वह शब्द कहा जाता था। लेकिन मुझे लगा कि इस शब्द का अर्थ मजबूत या इससे ही जुड़ा हुआ कुछ है। मैं नहीं जानता था कि इसका क्या मतलब है। जब भी मेरे लिए वह शब्द इस्तेमाल किया जाता था, तब वहां हंसी का माहौल होता था। मुझे लगता था कि टीममेट्स हंस रहे हैं तो शायद इसमें कुछ फनी होगा।''

    डेरेन सैमी ने कहा, ''अब मुझे अहसास हुआ कि यह अपमानजनक था। मैं आप लोगों को मैसेज करूंगा और आप लोगों से पूछूंगा कि जब आप लोग मुझे उस नाम से बुलाते थे तो क्या आप लोगों का मतलब गलत होता था? मेरे सभी ड्रेसिंग रूम्स में बहुत अच्छी यादें हैं। इसलिए जो लोग भी मुझे इस शब्द से बुलाते थे, वे इस बारे में सोचना। इस पर बात करते हैं कि क्या यह आप गलत अर्थों में बोलते थे, अगर हां तो मैं बहुत निराश होऊंगा।''
    बता दें कि विंडीज के पूर्व कप्तान अफ्रीकी-अमेरिकी शख्स जॉर्ज फ्लॉयड की मौत को लेकर काफी मुखर रहे हैं। उन्होंने फ्लॉयड की मौत को लेकर चल रहे विरोध करो अपना सपोर्ट दिया है।
    हाल ही में अमेरिका में अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की अमेरिका में हत्या हो गई।

    46 वर्षीय फ्लॉयड की एक पुलिसकर्मी ने घुटने से उसकी गर्दन दबाई, जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई। उनकी हत्या के विरोध में पूरी दुनिया में विरोध दर्ज किया गया। इस पर डेरेन सैमी ने आईसीसी से यह अनुरोध किया था कि क्रिकेट जगत के लोग नस्लवाद के खिलाफ सामने आना चाहिए।

     

    मनोरंजन / शौर्यपथ / लता मंगेशकर और आशा भोसले के बीच संगीत को लेकर चर्चा नहीं होती है। आशा ने इस बात की जानकारी देते हुए कहा कि आमतौर पर दोनों बहनों में शायद ही कभी संगीत को लेकर चर्चा होती होगी। दोनों दिग्गज गायिकाओं पर किताबें लिखी गई हैं, इसलिए क्या आशा चीजों को अगले स्तर पर ले जाते हुए उनके बारे में किसी को कोई बायोपिक बनाने दे सकती हैं?

    आशा ने आईएएनएस से कहा, "लता दीदी और मैं शायद ही कभी संगीत पर चर्चा करते हैं। हम एक परिवार हैं और हम रोजमर्रा की बहुत सामान्य चीजों की बात करते हैं। हमारा जीवन निजी और व्यक्तिगत है, जहां तक मेरा सवाल है मैं नहीं चाहूंगी कि हम एक फिल्म का विषय बनें।" वर्तमान में अलग-अलग अपार्टमेंट में रह रहीं दोनों बहनों में से छोटी बहन आशा ने कहा, "वह (लता दीदी) 90 साल की हैं और अपने जीवन व परिवेश के साथ शांति में हैं।"


    कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम के मद्देनजर लागू लॉकडाउन के दौरान भी आशा खुद को व्यस्त रखती आई हैं। आशा ने कहा, "मैं अपनी गायकी कर रही हूं. घर पर व्यायाम करना, नए पकवान बनाना, फिल्में देखना और परिवार के साथ समय बिता रही हूं। मैंने अपने नए यूट्यूब चैनल को लॉन्च किया. दूसरे शब्दों में कहूं, तो मैं खुद को बहुत व्यस्त रख रही हूं।"

    वह म्यूजिक कंपोज (संगीत की रचना) भी कर रही हैं। उन्होंने कहा, "मैंने कई धुनों की रचना की है, लेकिन मैंने गीत नहीं लिखे हैं। इसके बारे में मैं प्रसून जोशी और जावेद अख्तर से कह सकती हूं, ताकि फिर इसे रिकॉर्ड करके अपने यूट्यूब पर शेयर कर सकूं।" उन्होंने 1960 से लेकर 1990 के दशक तक कई हिट रचनाएं करने वाले अपने दिवंगत पति का जिक्र करते हुए कहा, "मेरे पास दिवंगत श्री राहुल देव बर्मन की अपने पीछे छोड़ी गई कई महान धुनें हैं।"


    आशा ने लॉकडाउन के बीच हाल ही में प्रशंसकों के साथ संवाद करने और अपने जीवन के कई दिलचस्प पहलूओं को उजागर करने के लिए अपना यूट्यूब चैनल लॉन्च किया है। 86 वर्षीय संगीतकार ने कहा, "मेरी पीढ़ी से कोई नहीं है, जो अब उस युग का वर्णन कर सके। मेरा पहला गाना ब्रिटिश भारत में साल 1943 में रिकॉर्ड किया गया था। मैंने भारत का विभाजन देखने के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध, कई महामारियों और संघर्षों वाला काल देखा है। इसलिए यूट्यूब चैनल के माध्यम से बताने के लिए कई किस्से हैं।

     

    नजरिया / शौर्यपथ / साल 1997 में एशियाई आर्थिक संकट के मद्देनजर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने सात देशों के उस समूह के विस्तार की जरूरत पर बल दिया था, जिसे जी-7 कहा जाता है। उनकी कोशिश के चलते साल 1999 में जी-20 समूह की शुरुआत हुई थी और इसमें यूरोपीय संघ और 19 देश शामिल थे।
    अब उस घटनाक्रम के चौबीस साल बाद एक और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उसी जी-7 के विस्तार की अपील की है और अपनी अपील को आधार देने के लिए उन्होंने इस समूह को ‘बहुत पुराना’ बताया है। वैसे ट्रंप इस विस्तार से चाहते क्या हैं, यह साफ नहीं है। हालांकि, तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन जो चाहते थे, वह भी पहले स्पष्ट नहीं था। अब ट्रंप अतिरिक्त सदस्यों के रूप में भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और रूस को शामिल करते हुए जी-10 या जी-11 बनाने की सोच रहे हैं। इसका गणित स्पष्ट है; यह जी-11 बन जाना चाहिए, लेकिन जी-10 की चर्चा क्यों? गौरतलब है, रूस को 2014 में इस अहम समूह से बाहर कर दिया गया था। तब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था और इसी के कारण जी-8 तब जी-7 बन गया था। दिलचस्प यह है कि जी-7 में शामिल अन्य देशों के अधिकांश प्रमुख रूस के प्रति ट्रंप के उत्साह को साझा नहीं करते हैं। लेकिन अकेली इसी अनिश्चितता की वजह से ट्रंप की जी-7 विस्तार की योजना पर संदेह नहीं करना चाहिए। इस समूह के विस्तार पर चर्चा करने वालों ने वर्ष 1997-99 में भी शामिल होने योग्य प्रत्याशियों पर विचार किया था, लेकिन उन्होंने तब सदस्य संख्या कम रखने को ही सही माना था। उस समूह में भारत के लिए भी जगह बनी थी।
    वाकई 1997 में एशियाई देशों में व्यापक आर्थिक संकट के कारण वैश्विक वित्तीय स्थिरता की राह में खड़ी चुनौतियों से मुकाबले के लिए एक बडे़ मंच की जरूरत थी और जी-20 ने उसकी पूर्ति की। साल 2008 के आर्थिक संकट के बाद भी जी-20 ने प्रभावी भूमिका निभाई थी। अब कहा जा सकता है कि तत्कालीन योजना अपेक्षाकृत ज्यादा सोची-समझी थी।
    दूसरी ओर, ट्रंप की विस्तार योजना अच्छी तरह से सोची-समझी नहीं है। दुनिया कोरोना वायरस के कारण पिछले 100 साल के सबसे खराब स्वास्थ्य संकट का सामना कर रही है, पर ट्रंप की नई कोशिश इस महामारी पर केंद्रित नहीं दिखती। यदि वह इस समस्या से निपटने की कोेशिश में बहुपक्षपवाद पर विश्वास करते, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन में अपने देश के आर्थिक सहयोग को जारी रखते और इस संस्था को भीतर से बदलने के लिए मजबूर करते। इसके साथ ही, समूह विस्तार की उनकी पहल महामारी के समय पैदा हुए आर्थिक संकट पर भी केंद्रित नहीं दिखती है।
    इस समय डोनाल्ड ट्रंप को सबसे ज्यादा चिंता अपने चुनाव की है। वह जीत की संभावनाएं तलाश रहे हैं। यही कारण है, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल, जो पश्चिमी दुनिया के राजनेताओं में सबसे तेज हैं, चुनावी साल में अमेरिका दौरा करने से परहेज करती हैं, वह शिखर सम्मेलन में नहीं जाएंगी और न जाने की उनके पास अन्य वजहें मौजूद हैं। मर्केल चीन के खिलाफ गुट बनाने के किसी भी प्रयास में शामिल होने को तैयार नहीं हैं। ट्रंप के एक सहयोगी ने संकेत दिया है कि राष्ट्रपति ट्रंप जी-7 की अगली बैठक में चीन के भविष्य पर चर्चा करना चाहेंगे। अमेरिका-चीन संबंधों में जो तेज गिरावट देखी जा रही है, उसकी पृष्ठभूमि में यह चर्चा अस्वाभाविक नहीं है। हालांकि इससे यूरोपीय देश सहमत नहीं लगते। चीन को अलग-थलग करने के लिए जी-7 का विस्तार करने पर यूरोपीय देशों को राजी करना मुश्किल है।
    भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेहमान के रूप में बैठक में भाग लेने के लिए ट्रंप का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। भारतीय प्रधानमंत्री ने साल 2019 में राष्ट्रपति इमेनुएल मेक्रॉन के निमंत्रण पर जी-7 शिखर सम्मेलन में मेहमान के रूप में भाग लिया था। फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रॉन ने भी विस्तारित जी-7 में भारत को शामिल करने के ट्रंप के प्रस्ताव का स्वागत किया है। यह समूह, दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं का सबसे अभिजात्य क्लब है, लेकिन बेहतर है कि भारत तब तक अपनी हसरतों को काबू में रखे, जब तक कि वह असली नतीजों और घटनाक्रम के साथ पूरी योजना को देख नहीं लेता।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /कोरोना से लड़ाई में न्यूजीलैंड की कामयाबी जितनी सुखद है, उससे कहीं ज्यादा अनुकरणीय है। लगभग एक महीने से वहां संक्रमण का एक भी नया मामला सामने नहीं आना और एकमात्र सक्रिय मरीज का ठीक हो जाना पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है, तो कोई आश्चर्य नहीं। न्यूजीलैंड और उसकी प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न की तारीफ करते हुए दुनिया के तमाम देशों को देखना चाहिए कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई कैसे सफलतापूर्वक लड़ी जा सकती है। जैसे ही न्यूजीलैंड में कोरोना के मामले 100 तक पहुंचे थे, वहां पूरी कड़ाई से लॉकडाउन लगाया गया था। लोगों ने भी घर से निकलना उचित नहीं समझा, सरकार की अपील और दिशा-निर्देशों की पालना में सबने खुद को समर्पित कर दिया। प्रधानमंत्री जेसिंडा ने शुरू में ही कह दिया था, ‘हमारे पास कुछ करने का मौका है। आइए, वायरस के खिलाफ कुछ ऐसा करें, जो कोई देश नहीं कर पाया है’। जेसिंडा पहले ही अपने लोगों का विश्वास जीत चुकी हैं, तो लोगों ने भी पूरे प्रयास से उस विश्वास को मजबूती दी। जब कोरोना का आखिरी मरीज भी ठीक हो गया, तब प्रधानमंत्री ने अनायास नृत्य किया और देश से भी अपनी खुशी साझा की। यह उस देश के लिए वाकई उत्सव का समय है। यदि अब कोरोना संक्रमण बाहर से नहीं आता है, तो न्यूजीलैंड को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। जाहिर है, वहां लॉकडाउन मजबूरी में नहीं, बल्कि खुशी-खुशी खुला है।
    दुनिया के लिए यह अध्ययन का विषय है कि न्यूजीलैंड ने ऐसा कैसे कर दिखाया। अव्वल तो कड़ाई से लागू किया गया लॉकडाउन पहला कारण है, जिसकी हम चर्चा कर चुके हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण है, कोरोना की जांंच में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना। औसतन प्रति एक लाख व्यक्तियों में से करीब 2,200 की कोरोना जांच की गई है। इतनी जांच तो अमेरिका भी नहीं कर रहा है। अमेरिका में जांच दर प्रति लाख पर 1,420 के करीब है। भारत की बात करें, तो प्रति दस लाख पर करीब 2,000 जांच की दर है। मोटे तौर पर न्यूजीलैंड में भारत की तुलना में 11 गुना ज्यादा जांच दर रही है। नतीजा सामने है। न्यूजीलैंड अपने यहां कुल मामलों को 1,504 पर रोक पाया और यदि वहां केवल 22 लोगों की मौत हुई, तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय वहां हुई अधिकतम कोरोना जांच को ही दिया जाएगा। फैले संक्रमण की पूरी चौकसी करते हुए जांच की गई, मरीजों को आशंका के आधार पर क्वारंटीन किया गया और वायरस की कड़ी जगह-जगह पूरी कड़ाई से तोड़ दी गई। लोगों ने भी सच्चे नागरिक होने का कर्तव्य निभाया और वहां सात सप्ताह के कडे़ लॉकडाउन में ही कोरोना से मुक्ति मिल गई। वह आज मिसाल है।
    क्या बडे़ या बड़ी आबादी वाले देश अपने यहां छोटे-छोटे न्यूजीलैंड बनाकर कोरोना को मात दे सकते हैं? इस पर विचार और व्यवहार की जरूरत है। कोरोना को लेकर कुछ प्रचलित धारणाएं भी टूटी हैं। एक धारणा यह है कि संक्रमण जब एक निश्चित मुकाम पर पहुंचेगा, तभी उसमें गिरावट आएगी, लेकिन न्यूजीलैंड ने इस धारणा को धता बता दिया है। न्यूजीलैंड ने इस भ्रम को भी तोड़ दिया कि किसी लोकतांत्रिक देश में कोरोना से लड़ाई आसान नहीं है। वाम-शासित चीन ही नहीं, अब लोकतांत्रिक न्यूजीलैंड भी है, जो चौतरफा लड़ती दुनिया के लिए तब तक प्रेरणास्रोत रहेगा, जब तक कोरोना है।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ/ अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड नामक अश्वेत नागरिक की मौत के बाद हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही, लेकिन सच यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अश्वेतों के प्रति रवैया सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा है। इसी कारण जॉर्ज फ्लॉयड की मौत का आक्रोश समूचे अमेरिका में देखा जा रहा है। आज अमेरिका नस्लवाद और कोरोना के चलते दोहरी मार झेलने को विवश है। न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया को इस घटना से सबक सीखना चाहिए कि बहुसंख्यकों के साथ-साथ अल्पसंख्यकों का ख्याल रखना भी निहायत जरूरी है। यदि लोकतांत्रिक देश का एक भी नागरिक भय और असंतोषपूर्ण जीवन जी रहा है, तो उसका असंतोष कभी भी फट सकता है। अगर हम भारत के परिप्रेक्ष्य में बात करें, तो पिछले कुछ वर्षों से यहां भी अल्पसंख्यकों के प्रति माहौल ठीक नहीं रहा है। अमेरिका की घटना से हम भी सबक ले सकते हैं।
    अली खान, जैसलमेर, राजस्थान

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    अब दिल्ली सरकार के अस्पतालों में कोरोना के उन्हीं मरीजों का इलाज होगा, जो दिल्ली से हैं। दिल्ली सरकार ने ऐसा फैसला क्यों लिया, यह तो दिल्ली के मुख्यमंत्री जानें, लेकिन जिस तरह से दिल्ली में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है, उसे देखकर केजरीवाल का यह फैसला कुछ हद तक सही जान पड़ता है, क्योंकि दिल्ली में आबादी के मुताबिक स्वास्थ्य-केंद्रों और डॉक्टरों की कमी हो सकती है। बेशक केंद्र सरकार के अस्पतालों को इस फैसले से बाहर रखा गया है, लेकिन मुख्यमंत्री को चाहिए कि वह दिल्ली से कुछ किलोमीटर सटे क्षेत्र के लोगों को, जो दूसरे राज्य के नागरिक हैं, दिल्ली में कोरोना इलाज की इजाजत दें, ताकि कोई भी उनके इस फैसले पर राजनीति करने को कोशिश न कर सके। क्या मुख्यमंत्री ऐसा करेंगे?
    राजेश कुमार चौहान, जालंधर

    दुर्भाग्यपूर्ण फैसला
    दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि जब तक कोरोना महामारी है, तब तक दिल्ली सरकार के अस्पताल सिर्फ दिल्ली वालों का इलाज करेंगे। दिल्ली सरकार का यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। देश इस समय बड़े संकट में है। हमें अभी एक देश होकर सोचना चाहिए, न कि एक राज्य होकर। दिल्ली सरकार के इस फैसले से क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिलेगा, जो हमारे देश की अखंडता के लिए घातक हो सकता है। क्या डॉक्टर सिर्फ इसलिए रोगी का इलाज न करें, क्योंकि वह किसी और राज्य का है? यह उनके भगवान रूपी पेशे को क्या शोभा देता है? यह आदेश हमारे देश के नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों का भी हनन है। यदि सभी राज्य ऐसे ही करने लगे, तो भारत राज्यों का संघ नहीं, सिर्फ राज्य बनकर रह जाएगा। दिल्ली सरकार को अपने इस राजनीतिक फैसले पर फिर से विचार करना चाहिए, क्योंकि दिल्ली सिर्फ राज्य की ही नहीं, देश की राजधानी है।
    प्रमेंद्र कुमार, पटना

    साजिश या मजाक
    पिछले कुछ दिनों में बेजुबान जानवरों को बारूद खिलाने के दो मामलों सामने आए। इन्होंने सभ्य कहे जाने वाले मानव-समाज को शर्मसार किया है। एक घटना केरल की है, तो दूसरी हिमाचल प्रदेश की। इस तरह के कृत्यों से जहां हर शांतिप्रिय लोगों में रोष है, तो दूसरी तरफ किसी साजिश की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। बिल्कुल एक ही तरीके से जानवरों को बारूद खिलाकर उनको चोटिल करने के पीछे कोई साजिश या प्रयोग तो नहीं? पूरा विश्व अभी कोरोना महामारी से जूझ रहा है, लेकिन पशुओं के प्रति ऐसे क्रूर रवैये देखने को मिल रहे हैं। ये मानव समाज के लिए नए खतरे की शुरुआत हो सकते हैं। इसकी जांच गंभीरता से करने की जरूरत है। दोषी कोई भी हो, उसे सख्त सजा मिलनी चाहिए।
    अभिषेक मिश्र, किदवई नगर, कानपुर

     

    ओपिनियन /शौर्यपथ / केरल का एकमात्र मुस्लिम बहुल जिला मलप्पुरम पिछले दिनों गलत वजहों से सुर्खियों में आ गया। 70.2 फीसदी मुस्लिम और 27.6 प्रतिशत हिंदू आबादी वाला यह जिला अक्सर विवाद में घसीट लिया जाता है। हालांकि, स्थानीय बाशिंदे इसे सिरे से नकारते हैं और कहते हैं कि ‘जो लोग इस जिले या राज्य को अच्छी तरह से नहीं समझते, वही ऐसी बातें करते हैं’।
    अभी यह जिला इसलिए चर्चा में आया, क्योंकि यहां एक गर्भवती जंगली हथिनी दुखद हालात में मृत पाई गई। उसने पास के पालक्काड जिले में पटाखों से भरा एक अनानास खा लिया था। ये पटाखे किसानों द्वारा उन जंगली सूअरों को मारने के लिए लगाए गए थे, जो उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसा माना जाता है कि वह हथिनी विस्फोट से घायल होने के बाद साइलेंट वैली के जंगलों से कई किलोमीटर दूर चली गई। मन्नारकाड वन क्षेत्र के अंतर्गत कोट्टप्पडाम पंचायत के अंबलप्पारा में उसे घायल पाया गया। यह इलाका मलप्पुरम नहीं, पालक्काड जिले का हिस्सा है। फिलहाल, वन्य-जीव संरक्षण कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच और कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
    इस घटना ने राज्य में सत्तासीन वाम मोर्चा सरकार के विरोधियों को हमलावर होने का मौका दे दिया। सोशल मीडिया पर बड़ा अभियान छेड़ते हुए राज्य सरकार पर हमला बोला गया और मलप्पुरम को निशाना बनाया गया, जबकि इस घटना से उसका कोई रिश्ता नहीं था। वास्तव में, न तो मलप्पुरम देश का सबसे हिंसक जिला है और न ही इस राज्य में हाथियों को निशाना बनाया जाता है। असलियत में हाथी तो देश भर में, विशेषकर दक्षिणी राज्यों में सबसे अधिक प्यारे और पूजनीय जानवरों में शामिल हैं। अनुमान है कि भारत में 28,000 हाथी हैं, जो किसी भी एशियाई देश से ज्यादा हैं।
    केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तो आमतौर पर ये मंदिरों का हिस्सा होते हैं। प्रशिक्षित मंदिर हाथी केरल में आम तौर पर देखे जाते हैं। सभी प्रमुख त्योहारों में यह राजसी जानवर आकर्षण का केंद्र होता है। इस सूबे में एक सालाना कैंप भी लगता है, जहां कुछ पालतू हाथियों को मानव-पशु संघर्ष कम करने के लिए ‘कुमकी’ के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है। प्रशिक्षित किए गए ‘कुमकी’ हाथी की मदद से इंसान जंगली हाथियों को वापस जंगलों में भेजता है।
    तमिलनाडु में राज्य सरकार हाथियों के लिए सालाना रिट्रीट रखती है, जहां राज्य भर के पालतू हाथियों को ट्रकों में लाया जाता है और उन्हें स्वस्थ माहौल में रखा जाता है। इस कैंप के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के बाद उनका वजन मापा जाता है और पशु चिकित्सक उनकी सेहत की पड़ताल करते हैं। उन्हें अगले चार सप्ताह तक दवाइयां और पौष्टिक आहार दिए जाते हैं। उन्हें सुबह की सैर कराई जाती है और विशेष रूप से तैयार जंबो सॉवर में नहलाया जाता है। कैंप खत्म होने के बाद हाथी बेमन से अपने घर लौटते हैं।
    मगर इंसान और जंगल में रहने वाले हाथियों के बीच संघर्ष भी लगातार जारी रहता है। जंगली हाथियों के लिए खास तौर पर जंगल संरक्षित किए गए हैं, फिर भी वे अमूमन खाने और पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकल आते हैं। इसी का नतीजा इंसान-हाथी संघर्ष के रूप में सामने आता है। कोई भी किसान कई तरह के उपाय अपनाकर अपनी फसल को बचाने की कोशिश करता है। उसका उद्देश्य हाथियों को मारना कतई नहीं होता। अनुमान है कि हाथियों की वजह से हर वर्ष 600 इंसान मारे जाते हैं, जबकि 100 से अधिक हाथी भी सालाना अकाल मौत पाते हैं। हाथियों पर राष्ट्रीय टास्क फोर्स के प्रमुख महेश रंगराजन कहते हैं कि किसानों और हाथियों, दोनों के लिए माहौल को सुरक्षित बनाना जरूरी है, क्योंकि दोनों पीड़ित हैं। किसान की जरूरत अपनी फसल बचाना है, तो हाथी को उसके माहौल के मुताबिक निवास-स्थान मिलना चाहिए। वह कहते हैं, विभिन्न प्रशासनिक उपायों से दोनों का साथ-साथ अस्तित्व संभव है।
    ऐसा अनुमान है कि भारत में हाथियों के लिए 80 गलियारे हैं। ये वे रास्ते हैं, जिनसे जंगली हाथी अपने प्राकृतिक वास के लिए गुजरते हैं, लेकिन विभिन्न निर्माण गतिविधियों को अंजाम देकर इंसान इन स्थानों या गलियारों पर कब्जा कर रहा है। नतीजतन, हाथियों के प्राकृतिक मार्ग खत्म हो रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें, तो हाथी ‘भोजन’ के लिए इंसानों को नहीं मारते। वे तब आक्रामक हो जाते हैं, जब उन्हें अपनी जान पर खतरा महसूस होता है। माना जाता है, जंगली जानवरों की वजह से हर साल पांच लाख से अधिक किसानों को फसलों का नुकसान उठाना पड़ता है। उनका स्वाभाविक प्रयास अपने खेतों की रक्षा करना होता है। इसके लिए कुछ जगहों पर वे बिजली वाले तार लगाते हैं, जिनमें हल्का करंट होता है, तो कुछ स्थानों पर जानवरों को फंसाने के लिए गड्ढा खोद देते हैं। वन्य-जीव संरक्षणवादी जानवर को फंसाने के इन तरीकों की भी मुखालफत करते हैं। हाथियों को किसी भी तरीके से मारना स्वीकार्य नहीं हो सकता। टास्क फोर्स ने किसानों को नुकसान से बचाने के लिए अतिरिक्त फसल बीमा का सुझाव दिया है।
    अनुमान यह भी है कि हर साल कम से कम 40 हाथी अपने दांत के लिए शिकारियों के हत्थे चढ़ते हैं। केंद्र और राज्य, दोनों के वन्य-जीव विभागों ने इन घटनाओं को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। मगर अब भी इनके निवास-स्थान को सुरक्षित बनाने के लिए बहुत कुछ करने की दरकार है।
    पौराणिक कथाओं में खूब उल्लेख के कारण हाथी हिंदुओं द्वारा पूजनीय है। लेकिन आमतौर पर अपने कद और चाल के लिए यह सभी का दुलारा है। बच्चों को तो खासतौर से हाथी पसंद है और वे उसकी तस्वीर भी खूब बनाते हैं। यह बताता है कि हाथी कितना लोकप्रिय है। इसीलिए जब उसकी दुखद मौत की खबर आई, तो यह किसी झटके से कम नहीं था। मगर इससे भी बड़ी त्रासदी थी, उसकी मौत को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश। मलप्पुरम ऐसा अद्भुत जिला है, जहां कई हिंदुओं की बारात मस्जिदों से निकलती है। मेरी नजर में यहां कम से कम एक हिंदू मंदिर ऐसा जरूर है, जिसका पुजारी मुस्लिम है और वह उस वंश का है, जिनके पूर्वज यहां पूजा-पाठ कराते आए हैं। जाहिर है, इंसानों को ही एक-दूसरे के संग और जानवरों के साथ भी सद्भाव से रहना सीखना होगा। हथिनी की मौत की जांच कर रहे रेंज ऑफिसर भी यही संकेत करते हैं, जब वह कहते हैं कि ‘यह मानव-पशु संघर्ष का नतीजा है, सांप्रदायिक संघर्ष का नहीं’।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

     

    दुर्ग / शौर्यपथ / पर्यावरण को संजोने आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण से जोडऩा बेहद आवश्यक है। इसके लिए एक नवाचारी प्रयोग वन विभाग द्वारा किया जाएगा। लगभग 120 बच्चों का समूह जंगल में टैंट में एक दिन का हाल्ट करेगा। यहां फारेस्ट विभाग के ट्रेनर बच्चों को जंगल के जानवरों के बारे में, पक्षियों के बारे में बताएंगे। वे यह बताएंगे कि किस प्रकार पारिस्थितिकी का संरक्षण करना मानवता के लिए उपयोगी होगा। जंगल में अलग-अलग तरह के पक्षियों की आवाजें, उनके आवास, उनके समूह में रहने का तरीका, खानपान की विधि आदि बताई जाएगी।
    कैंप का समय माइग्रेटरी बर्ड का समय होगा, इसलिए उनके डिटेल्स भी बताए जाएंगे। इसमें फारेस्ट विभाग के प्रमुख अधिकारियों के साथ राजू वर्मा जैसे पक्षी विशेषज्ञ भी बच्चों को पक्षियों के बारे में तथ्य साझा करेंगे। आज कलेक्टर डॉक्टर सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे की अध्यक्षता में इस संबंध में बैठक हुई। यहां डीएफओ श्री केआर बढ़ाई ने विस्तार से प्रोजेक्ट की जानकारी दी और बताया कि ये प्रोजेक्ट किस तरह बच्चों की अभिरुचि जगाने में सहायक हो सकता है।
    उल्लेखनीय है कि स्कूली विद्यार्थियों में वन, वन्य प्राणी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने हेतु वन मितान कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। जिसके तहत कक्षा 6वीं से 12वीं के छात्र-छात्राओं को प्राकृतिक वातावरण का अनुभव प्रदान कर उन्हें इसके संरक्षण के लिए जागरुक किया जाएगा।
    कार्यक्रम का उद्देश्य- वन मितान कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को वन वन्य प्राणी एवं पर्यावरण की वन मितान बनाकर उन्हें इसके संरक्षण हेतु प्रेरित करना है। इच्छुक विद्यार्थियों को नेचुरल वॉलेंटियर फोर्स के रूप में विकसित करना है साथ ही विभाग एवं विभागीय अधिकारियों के कार्य उत्तरदायित्वों एवं चुनौतियों से इन विद्यार्थियों को अवगत कराना है।
    विद्यालय एवं विद्यार्थियों का चयन- विद्यालय एवं विद्यार्थियों का चयन एवं निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। ऐसे विद्यार्थी जो पर्यावरण के प्रति अभिरूचि रखते हो। विद्यार्थी का चयन वन्य प्राणी पक्षी इत्यादि की समान्य जानकारी के आधार पर होगा। चयनित विद्यार्थी का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाएगा। शिविर हेतु कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों को चनित किया जा सकता हैं किन्तु प्राथमिकता के आधार पर 8वीं एवं 12वीं के विद्यार्थी को सर्वप्रथामिकता दी जाएगी। प्रत्येक परिक्षेत्र में 120 विद्यार्थी का चयन किया जाकर दो चरणों में 60-60 विद्यार्थी हेतु वन मितान कार्यक्रम किया जाएगा।
    शिविर स्थल का चयन- प्रशिक्षण सह जागरूकता शिविर का आयोजन वन्य परिक्षेत्र में स्थित प्राकृतिक सौन्दर्य के स्थल पर किया जाएगा। शिविर का चयन इस प्रकार से किया जाएगा कि विद्यालय से 25 से 30 किलोमीटर के परिक्षेत्र में स्थित हो।
    गतिविधियॉ- वनमितान शिविर एक दिन का होगा। जिसमें विभिन्न प्रकार की गतिविधियॉ को शामिल किया गया है। शिविर दिवस पर विद्यार्थियों को पक्षी दर्शन, वन्य प्राणी दर्शन, सफारी, नौकायान, वन भ्रमण कराया जाएगा। प्राकृतिक पथ भ्रमण, प्रकृति की पाठशाला, स्थल पर विद्यमान वाणिकी गतिविधियों की जानकारी देने के साथ ही वन एवं वन्य प्राणी एवं पर्यावरण के महत्व से रूबरू कराया जाएगा। जिज्ञासा समाधान व चर्चा, परिचर्चा, वनाचार, प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया जाएगा। शिविर के आयोजन को ध्यान में रखते हुए साफ-सफाई, भोजन, सुरक्षा स्वास्थ्य, सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।

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