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April 05, 2026
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महापौर के दावेदार रिकेश सेन पर क्या भाजपा संगठन कर पाएगी भरोसा ... Featured

  • hanumaan janmotsav

दुर्ग / शौर्यपथ / भिलाई निगम चुनाव का आगाज हो चूका है . 20 दिसंबर को वोटिंग होनी है ऐसे में भाजपा और कांग्रेस से दिग्गजों की फौज पार्षद चुनाव के लिए मैदान में आ गयी इन सभी दिग्गजों की नजर महापौर की खुर्सी पर है . ऐसे दिग्गज नेताओ में निगम के पिछले कार्यकाल में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व निभाने वाले रिकेश सेन भी राम नगर वार्ड से मैदान में है . रिकेश सेन के बारे में एक बड़ी बात यह है कि रिकेश सेन हर बार अलग अलग वार्ड से प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतारे है साथ ही कभी कांग्रेस की टिकिट पर तो कभी भाजपा की टिकिट पर तो कभी निर्दलीय मैदान में रिकेश सेन उतर कर अपनी जीत दर्ज करा चुके है .
  वर्तमान में भाजपा से उम्मीदवार रिकेश सेन राम नगर क्षेत्र से मैदान में है . पिछले निगम चुनाव में महापौर की जीत से ज्यादा चर्चा रिकेश सेन की रही . रिकेश सेन ने भाजपा से टिकिट नहीं मिलने पर आत्महत्या की कोशिश भी की थी . बावजूद इसके उन्हें भाजपा संगठन ने टिकिट नहीं दिया अपितु जीत के बाद नेता प्रतिपक्ष के रूप में रिकेश सेन की निगम में मौजूदगी ज़रूर रही . लगातार चार जीत के बाद रिकेश सेन पांचवी बार चुनावी मैदान में है किन्तु इन जीतो के बाद भी संगठन में रिकेश सेन की विश्वसनीयता पर हमेशा प्रश्नचिन्ह ही लगता रहा है . शायद यही कारण है कि रिकेश सेन को टिकिट नहीं दिया गया और निर्दलीय मैदान में उतरना पड़ा .
  इस बार शासन के नियमो के अनुसार महापौर का चुनाव पार्षदों को ही करना है . पार्टी किसी एक के नाम को आगे करेगी और उसकी जीत सुनिश्चित हो ऐसा प्रयास करेगी . जिसके पार्षद परिषद् में ज्यादा होंगे उनकी जीत सुनिश्चित मानी जाएगी . अभी तक भिलाई निगम के चुनाव में कांग्रेस ने वर्ष 2000 के चुनाव में ही भाजपा से ज्यादा सीट जीती थी उसके बाद प्रत्येक चुनाव में भाजपा की सीटो की संख्या ज्यादा रही साथ ही निर्दलीय पार्षदों की जीत की संख्या भी इतनी रहती है जो जिस तरफ झुके सरकार उनकी बन सकती है . अगर वर्तमान में भी यही स्थिति रही तो एक बार फिर राष्ट्रिय दलों को निर्दलीय पार्षदों को साधना होगा .
 बात रिकेश सेन की करे तो जीत के बाद सबसे ज्यादा बार जितने वाले पार्षद में रिकेश सेन का नाम होगा किन्तु संगठन द्वारा रिकेश सेन के नाम को महापौर की खुर्सी तक पहुँचाने में कई बातो का विचार करना पड़ेगा . रिकेश सेन की जिद के बारे में बात करे तो उन्हें किसी भी पार्टी से कोई मतलब नहीं दिखाई देता संगठन के विश्वासपात्र ना होना उनके रास्ते में बड़ी रुकावट है शायद यही कारण है कि कांग्रेस संगठन ने टिकिट नहीं दिया तो निर्दलीय मैदान पर उतर गए फिर भाजपा की प्रदेश में सरकार थी तो भाजपा की तरफ से मैदान में उतर गए फिर भाजपा ने टिकिट नहीं दिया तो निर्दलीय मैदान पर उतर गए अब एक बार फिर अंतिम क्षणों में भाजपा ने टिकिट दे दिया. ऐसे में एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या रिकेश सेन को भाजपा महापौर के दावेदार के रूप में महापौर चयन के समय स्वीकार करेगा या फिरे रिकेश सेन इस चयन में अपना नाम आगे करने के लिए कोई ऐसा रास्ता अख्तियार करेगे जिससे भाजपा मजबूर हो जाए . वैसे तो भाजपा संगठन के बारे में यह बात आम है कि संगठन एक बार जो फैसला कर लेती है उससे पीछे हटने की संभावना कम ही रहती है जैसा कि पिछले बार देखने को मिला था . जब रिकेश सेन को टिकिट नहीं मिला था तब उन्होंने आत्महत्या जैसे घातक कदम भी उठा लिया था अब यह कदम कितना घातक था या राजनितिक स्टंड ये तो जाँच का विषय है किन्तु तब इस मामले पर किसी भी तरह की जाँच का ना होना भी कई संदेहों को जन्म देता है . इन्ही संदेहों और पूर्व के कार्यो के आधार पर भिलाई की राजनीती में चर्चा है कि रिकेश सेन भले ही वार्ड से चुनाव जीत जाये किन्तु संगठन उन पर फिर भी विश्वास नहीं करेगा . वैसे भी पिछले कार्यकाल में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भलीभांति नहीं उठाने की बात होती रही है . भिलाई की धार्मिक संगठन राम जन्मोत्सव समिति के द्वारा जिस तरह विपक्ष की जिम्मेदारी उठाई गयी ऐसी जिम्मेदारी आम जनता को निगम के विपक्ष कि तरफ से कभी देखने को नहीं मिली शुरू शुरू में थोडा जोश जरुर था किन्तु बाद में यह सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया ही नजर आयी .
  अब देखना यह है कि निगम के वरिष्ठ पार्षद की गिनती में आने वाले और इस बार दूसरी बार भाजपा की टिकिट से चुनाव लड़ने वाले रिकेश सेन की क्या रणनीति होती है पार्षद की जीत के लिए और जीत के बाद महापौर की खुर्शी तक पहुँचने के लिए

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