August 08, 2026
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    100 दिन में उजागर हुआ असंतोष: दुर्ग निगम में फिर याद आए सरोज पांडेय और धीरज बाकलीवाल के दौर, एमसीसी कर्मचारी की मनमानी के आगे क्या महापौर भी बेबस

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    दुर्ग। शौर्यपथ।

       दुर्ग नगर निगम में वर्तमान शहरी सरकार ने अभी मात्र 100 दिन पूरे किए हैं, लेकिन इन सौ दिनों में निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर कर्मचारियों से लेकर आम जनता तक में असंतोष की लहर साफ तौर पर देखी जा सकती है। जहां एक ओर सत्ताधारी जनप्रतिनिधि इन 100 दिनों को "जनसेवा की प्रतिबद्धता" का समय कह रहे हैं, वहीं कर्मचारियों और जनता के एक बड़े वर्ग का मानना है कि यह कार्यकाल अब तक "अवमानना, भेदभाव और गुटबाजी" की मिसाल बनकर रह गया है।

    कर्मचारियों में उपेक्षा की भावना
     निगम कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें लगातार अपमानित और नजरअंदाज किया जा रहा है। हाल ही की घटनाओं में जनप्रतिनिधियों से जुड़े लोगों द्वारा निगम अधिकारियों से दुव्र्यवहार की खबरें सामने आईं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से निगम की शीर्ष नेतृत्व – महापौर या अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई। इस चुप्पी ने कर्मचारियों के बीच असंतोष और अविश्वास को और गहरा कर दिया है।

    फिर याद आया पुराना कार्यकाल
      इसी संदर्भ में अब निगम के कर्मचारी और वरिष्ठ पार्षद आपसी चर्चाओं में पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल और सुश्री सरोज पांडेय के कार्यकाल को याद कर रहे हैं, जब निगम परिवार को "सम्मान, संवाद और सहयोग" की संस्कृति में कार्य करने का अवसर मिला था। कर्मचारी यह भी कहते हैं कि भले ही विचारधाराएं भिन्न रही हों, लेकिन तब नेतृत्व में स्पष्टता, जवाबदेही और संवेदनशीलता थी।

    एमसीसी कर्मचारी की मनमानी और प्रशासन की चुप्पी
      एक और चिंताजनक स्थिति यह भी सामने आई है कि नगर निगम के एमसीसी (मिशन क्लीन सिटी ) से जुड़े कर्मचारियों, जिनकी ड्यूटी शहर की मैदानी गतिविधियों जैसे सफाई व्यवस्था, कचरा प्रबंधन आदि पर केंद्रित होनी चाहिए, उन्हें कार्यालयीन कार्यों में लगाया गया है। महापौर बाघमार द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि ऐसे कर्मचारियों को पुन: उनके मूल कार्यक्षेत्र में भेजा जाए, परंतु अधिकारियों की मौन सहमति के बाद भी एक प्रमुख एमसीसी कर्मचारी नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र शाखा में कार्यरत है। इस अवैधानिक नियुक्ति के बावजूद प्रशासनिक अमला पूरी तरह अनभिज्ञ बना हुआ है, जो निगम की शासन-प्रशासनिक गंभीरता और नियंत्रणहीनता को उजागर करता है।

    जनता को अब भी इंतज़ार है ठोस कार्यों का
      विकास कार्यों के नाम पर शहर में कुछ औपचारिक घोषणाएं और सोशल मीडिया प्रचार तो हुआ, लेकिन वास्तविक धरातल पर समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। विशेष रूप से कचरा प्रबंधन और साफ-सफाई जैसे बुनियादी मुद्दों पर शहरी सरकार की उदासीनता आगामी बरसात में भारी पड़ सकती है। शहर के बीचोंबीच स्थित स्रुक्ररू सेंटर से उठती दुर्गंध पहले ही जनस्वास्थ्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

    गुटबाजी और विपक्ष की उपेक्षा
     शहर की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह भी चिंता का विषय है कि विपक्ष की आवाज़ को नजऱअंदाज़ किया जा रहा है। पार्षदों के बीच स्पष्ट गुटबाजी और सत्ता पक्ष के एकाधिकार की भावना से नगर निगम की लोकतांत्रिक संरचना कमजोर होती दिख रही है। एक राष्ट्र, एक चुनाव की कल्पना को साकार करने की बातें सिर्फ भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सिमट गई हैं।

    क्या होगा आने वाले दिनों में?
      अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में नगर निगम की कार्यशैली में कोई सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा? क्या निगम परिवार में संवाद और सहयोग का वातावरण फिर से बहाल हो सकेगा? या फिर यह आंतरिक असंतोष और गुटबाजी भविष्य में और विकराल रूप लेगी?
      नगर निगम की इस 100 दिन की कार्यावधि ने जनता को उम्मीदों की बजाय आशंकाओं से भर दिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझे, कर्मचारियों को सम्मान और सुरक्षा का भरोसा दे, और जनता के सवालों का जवाब जमीन पर कार्यों के रूप में दे — न कि केवल सोशल मीडिया की चकाचौंध में।

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