August 03, 2026
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    सुशासन के दावों के बीच दुर्ग निगम का ‘अतिक्रमण मॉडल’,राम रसोई, कथित पत्रकार और निगम आयुक्त की भूमिका पर उठते गंभीर सवाल Featured

    • rounak group

    दुर्ग।

    प्रदेश में मुख्यमंत्री द्वारा सुशासन के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन दुर्ग नगर पालिका निगम की ज़मीनी हकीकत इन दावों को चुनौती देती नजर आ रही है। निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल का कार्यकाल अब प्रशासनिक अनुशासन से अधिक विवादों, आरोपों और कथित संरक्षण के आरोपों से जुड़ता जा रहा है।

    निगम के ही कर्मचारी शुभम गोईर द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप—कि उनसे निजी घरेलू कार्य कराए गए और आदेश न मानने पर नौकरी से बाहर करने की तैयारी की गई—अब माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हैं। मामला न्यायालय में लंबित है, किंतु इस प्रकरण ने निगम आयुक्त की कार्यप्रणाली पर पहले से उठ रहे सवालों को और गहरा कर दिया है।

    सड़क पर अवैध कब्जा, निगम की रहस्यमयी चुप्पी

    शहर में अवैध अतिक्रमण अब छिपा नहीं, बल्कि खुलेआम और बेखौफ दिखाई दे रहा है। गणेश मंदिर के सामने मुख्य मार्ग पर स्थित राम रसोई द्वारा किए गए कथित अवैध कब्जे ने पूरे शहर में चर्चाओं को जन्म दिया है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जानकारी होने के बावजूद निगम प्रशासन द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

    शहर में यह चर्चा आम है कि यह अतिक्रमण यूं ही नहीं पनप रहा, बल्कि इसे कथित संरक्षण प्राप्त है। यही कारण है कि व्यंग्य में इसे अब “आदर्श अतिक्रमण मॉडल” कहा जाने लगा है—जहां सड़क पर कब्जा भी सुरक्षित है और कार्रवाई भी नदारद।

    चुनिंदा कार्रवाई, बाकी शहर में मौन

    आरोप यह भी है कि निगम आयुक्त द्वारा कपड़ा लाइन जैसे चुनिंदा इलाकों में तो नियमित कार्रवाई की जाती है, लेकिन चर्च मार्ग, घुमंतियों की फौज और अन्य व्यस्त क्षेत्रों में चल रहे अवैध बाजारों पर निगम की सख्ती अचानक गायब हो जाती है।

    यह स्थिति महज प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि भेदभावपूर्ण नीति की ओर इशारा करती है।

    कर्मचारी का आरोप: विवाद में आयुक्त बने बिचौलिया

    निगम कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि एक कथित पत्रकार और निगम कर्मचारी के बीच हुए विवाद में आयुक्त सुमित अग्रवाल ने बिचौलिये की भूमिका निभाई।

    आरोप है कि इस कथित मध्यस्थता के जरिए मामले को कानूनी प्रक्रिया तक पहुँचने से पहले ही दबाने का प्रयास किया गया।

    सूत्रों के अनुसार, कर्मचारियों के पारिवारिक फोटो और निजी जानकारियों के माध्यम से दबाव बनाने और शिकायतों को कमजोर करने की कोशिशों की बातें भी सामने आ रही हैं। यदि ये आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक मर्यादा का उल्लंघन होगा, बल्कि संवैधानिक पद की गरिमा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाएगा।

    कथित चैटिंग से बढ़ा विवाद, जांच की मांग तेज

    निगम कर्मचारियों और आयुक्त से जुड़ी कथित चैटिंग अब निगम परिसर से बाहर निकलकर शहर भर में चर्चा का विषय बन चुकी है।

    कर्मचारियों का कहना है कि कुछ मामलों को “अर्जेंट” बताकर उठाना और अन्य गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज करना, शासकीय पद के दुरुपयोग की ओर संकेत करता है।

    इसी वजह से अब आम नागरिकों के साथ-साथ निगम कर्मचारी भी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं।

    स्थानांतरण होगा, लेकिन शहर भुगतेगा परिणाम

    सूत्रों के अनुसार आयुक्त सुमित अग्रवाल का भविष्य में किसी अन्य जिले में स्थानांतरण संभव है, लेकिन उनके कार्यकाल में जिस तरह अवैध अतिक्रमण को मौन स्वीकृति मिलती दिखाई दे रही है, वह दुर्ग शहर के लिए दीर्घकालिक समस्या बन सकती है।

    आज की निष्क्रियता, कल के बड़े विवाद का कारण बन सकती है।

    सबसे बड़ा सवाल

    अब सवाल केवल अदालत के निर्णय का नहीं है, सवाल यह है कि—

    क्या दुर्ग नगर निगम में कानून सबके लिए समान है?

    क्या सुशासन के दावे ज़मीनी हकीकत से मेल खाते हैं?

    और क्या संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारी जवाबदेही से ऊपर हैं?

    फिलहाल निगाहें माननीय उच्च न्यायालय पर टिकी हैं। लेकिन तब तक दुर्ग नगर निगम से जुड़ा यह पूरा घटनाक्रम, प्रदेश सरकार के सुशासन के दावों को लगातार आईना दिखाता रहेगा।

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