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दुर्ग। नगर पालिक निगम दुर्ग के बाजार विभाग में नियमों को ताक पर रखकर 'अवैध' को 'वैध' बनाने का खेल धड़ल्ले से जारी है। ताजा मामला इंदिरा मार्केट के सी-ब्लॉक से जुड़ा है, जहां आवंटन की शर्तों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि इस गंभीर अनियमितता की पूरी जानकारी होने के बावजूद बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की निष्क्रियता अब संदेह के घेरे में है। शहर में चर्चा है कि क्या एक ग्रेड-3 स्तर का कर्मचारी, जिले के कड़क आईएएस अधिकारी और निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल को भी गुमराह करने में सफल हो रहा है?
नियमों की धज्जियां: 'नो रेंट' की शर्त, फिर भी किराए पर दुकान
इंदिरा मार्केट सी-ब्लॉक के भूतल पर सीढ़ी के बगल स्थित एक दुकान को लेकर निगम के आवंटन पत्र में स्पष्ट शर्त थी कि संचालक इसे किसी अन्य को किराए पर नहीं दे सकेगा। इसके बावजूद, उक्त दुकान को न केवल किराए पर दिया गया है, बल्कि वहां खुलेआम व्यापार संचालित हो रहा है।
डेढ़ महीने की खामोशी: मार्च के प्रथम सप्ताह में ही बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा को इस अवैध संचालन की बिंदुवार जानकारी दी गई थी। तब उन्होंने 'जल्द कार्रवाई' का आश्वासन दिया था, लेकिन डेढ़ महीना बीत जाने के बाद भी फाइलें दबी हुई हैं। यह देरी बाजार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर 'मिलीभगत' और 'अपना राजस्व बढ़ाने' जैसे गंभीर आरोप लगा रही है।
बाजार प्रभारी शेखर चंद्राकर का 'मौन' सुशासन पर सवाल
लोकतंत्र में जब अधिकारी लापरवाह हों, तो जनप्रतिनिधियों से हस्तक्षेप की उम्मीद की जाती है। परंतु, बाजार विभाग के प्रभारी शेखर चंद्राकर की इस पूरे मामले पर रहस्यमयी चुप्पी ने आग में घी डालने का काम किया है। शहर में चर्चा का बाजार गर्म है कि क्या बाजार प्रभारी भी 'सुशासन' के बजाय 'निजी राजस्व' की राह पर चल पड़े हैं? आखिर क्यों एक निर्वाचित प्रतिनिधि, सरकारी नियमों के इस खुले उल्लंघन पर मौन है?
क्या गुमराह हो रहे हैं निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल?
दुर्ग निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल अपनी प्रशासनिक दृढ़ता और पारदर्शिता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन, बाजार विभाग की यह स्थिति उनकी कार्यप्रणाली को भी संदेह के घेरे में ला रही है।
क्या अभ्युदय मिश्रा जैसे कर्मचारी आयुक्त तक सही जानकारी पहुंचने ही नहीं दे रहे?
क्या एक ग्रेड-3 कर्मचारी के पास इतनी ताकत है कि वह शासन की छवि को धूमिल कर सके?
क्या महापौर श्रीमती अलका बाघमार के नेतृत्व वाले निगम प्रशासन में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं?
निष्कर्ष: कार्रवाई या सिर्फ खानापूर्ति?
लिखित शिकायत का इंतजार करने का तर्क देने वाले अधिकारी यह भूल रहे हैं कि जब अपराध और उल्लंघन सार्वजनिक हो, तो कार्रवाई के लिए कागज नहीं, बल्कि नीयत की जरूरत होती है। यदि जल्द ही इस अवैध दुकान और इसके पीछे के 'संरक्षकों' पर कार्यवाही नहीं हुई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि दुर्ग निगम में 'जनहित' नहीं, बल्कि 'अधिकारी हित' सर्वोपरि है।
फिलहाल, जनता की नजरें अब आयुक्त सुमित अग्रवाल पर टिकी हैं—क्या वे इस भ्रष्टाचार के मकड़जाल को काटकर दोषियों पर गाज गिराएंगे?
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
