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18 महीने की शहरी सरकार पर भेदभाव के आरोप, कचरा, गड्ढे, अंधेरे मार्ग और बदहाल बाजार से जनता परेशान; सत्ता पक्ष के पार्षद भी उठा रहे सवाल
शौर्यपथ विशेष
दुर्ग। महापौर को नहीं होनी चाहिए तकलीफ, भले ही जनता होती रहे परेशान! दुर्ग नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल अब केवल महापौर अलका बाघमार तक सीमित नहीं हैं। शहर में धूल, कचरे, गड्ढों से भरी सड़कों, अंधेरे मार्गों और बदहाल बाजार व्यवस्था से जूझती जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि शहरी सरकार की कार्यशैली का राजनीतिक खामियाजा आगामी विधानसभा चुनाव में विधायक एवं प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को भी भुगतना पड़ सकता है या नहीं?
दुर्ग विधानसभा चुनाव में गजेंद्र यादव लगभग 48 हजार मतों के अंतर से विजयी हुए थे, वहीं नगरीय निकाय चुनाव में महापौर अलका बाघमार को लगभग 64 हजार मतों के अंतर से जीत मिली। ट्रिपल इंजन की सरकार और विकास के वादों के साथ भाजपा को मिले इस जनादेश से शहरवासियों को बेहतर सड़क, सफाई, रोशनी और व्यवस्थित बाजार की उम्मीद थी। लेकिन महापौर के लगभग 18 महीने के कार्यकाल में शहर की बदहाल व्यवस्था और निगम की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल इन उम्मीदों की परीक्षा ले रहे हैं।
सत्ता पक्ष के पार्षदों के आरोप भी चिंता का विषय
नगर निगम की सामान्य सभाओं में सत्ता पक्ष के पार्षदों द्वारा वार्डों के विकास में कथित भेदभाव के आरोप लगाए जाने की चर्चा शहरी सरकार के लिए गंभीर संकेत है। जब अपने ही दल के पार्षद विकास कार्यों के वितरण और वार्डों की उपेक्षा पर सवाल उठाएं, तो आम जनता की परेशानियों का अंदाजा लगाया जा सकता है।
भाजपा के वार्ड क्रमांक 11 के पार्षद आशीष चंद्राकर ने निगम में आई लगभग 2,400 स्ट्रीट लाइटों के समानांतर वितरण नहीं होने का मुद्दा उठाया था। सितंबर की सामान्य सभा में विद्युत प्रभारी द्वारा जानकारी देने का आश्वासन दिए जाने के बावजूद, पार्षद के अनुसार, 15 दिन बाद भी उन्हें अपेक्षित जानकारी नहीं मिली थी। यदि ऐसा है, तो यह केवल लाइट वितरण नहीं, बल्कि पार्षदों को जानकारी देने और परिषद में किए गए आश्वासनों के पालन का भी सवाल है।
कचरे के ढेर से बाजार की अव्यवस्था तक सवाल
धमधा नाका और जलाराम वाटिका के समीप कचरे के जमाव, सड़कों पर गड्ढों, धूल और अंधेरे मार्गों की समस्याएं नगर निगम की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करती हैं। वहीं शहर के प्रमुख व्यावसायिक केंद्र इंदिरा मार्केट की अव्यवस्था को लेकर भी सामान्य सभा में बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यशैली की आलोचना होने की चर्चा है।
बाजार अधिकारी को लेकर निगम में कथित पक्षपात और कार्यक्षमता से संबंधित सवाल भी उठते रहे हैं। महापौर का किसी अधिकारी पर भरोसा होना अलग बात है, लेकिन उस भरोसे का मूल्यांकन कामकाज और परिणामों के आधार पर होना चाहिए। बाजार व्यवस्था में सुधार नहीं दिखने पर जवाबदेही तय करना निगम प्रशासन का दायित्व है।
गरीबों पर कार्रवाई, प्रभावशाली लोगों पर नरमी के आरोप
पसरा लगाकर रोजी-रोटी कमाने वाले छोटे व्यापारियों पर कार्रवाई और बड़े कारोबारियों के मामलों में कथित नरमी को लेकर भी सवाल उठते हैं। निर्माण कार्यों के ठेके महापौर के करीबी बताए जाने वाले व्यक्तियों को मिलने की चर्चाओं ने भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इन आरोपों की पुष्टि के लिए ठेका आवंटन, निविदा प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।
इसी तरह, भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों और निष्क्रिय अधिकारियों के कामकाज पर भी निष्पक्ष जांच तथा जवाबदेही जरूरी है। नियमों का पालन गरीब और प्रभावशाली, दोनों के लिए समान होना चाहिए। यदि जनता के बीच भेदभाव की धारणा मजबूत होती है, तो इससे नगर निगम के साथ सत्तारूढ़ दल की छवि भी प्रभावित हो सकती है।
विधायक और महापौर के अधिकार अलग, जनता की नाराजगी एक!
विधायक और महापौर की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। स्थानीय सफाई, स्ट्रीट लाइट, बाजार और नगर निगम की सड़कों की सीधी जिम्मेदारी शहरी सरकार की है। लेकिन आम जनता प्रशासनिक अधिकारों के अंतर से अधिक अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को महत्व देती है। उसे सड़क, सफाई और रोशनी जैसी मूलभूत सुविधाएं चाहिए।
वर्तमान राजनीतिक चर्चाओं में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए गजेंद्र यादव का नाम संभावित भाजपा प्रत्याशी के रूप में लिया जा रहा है, हालांकि टिकट को लेकर कोई आधिकारिक निर्णय नहीं हुआ है। यदि भाजपा उन्हें दोबारा प्रत्याशी बनाती है, तो उन्हें अपने विकास कार्यों के साथ नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों का सामना भी करना पड़ सकता है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या महापौर की कार्यप्रणाली के कारण भाजपा को विधानसभा चुनाव में राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है? शहर की जनता को यदि धूल, कचरे, गड्ढों, अंधेरे मार्गों और वार्डों में कथित भेदभाव से राहत नहीं मिली, तो उसका असंतोष मतदान में सामने आ सकता है। जनता के लिए महापौर और विधायक की जिम्मेदारियां अलग हो सकती हैं, लेकिन दोनों स्तरों पर एक ही दल की सरकार होने के कारण जवाबदेही का प्रश्न भी साथ खड़ा होता है।
जनादेश सत्ता की सुविधा के लिए नहीं, जनता की सेवा के लिए मिलता है। अब दुर्ग की शहरी सरकार को यह साबित करना होगा कि विकास किसी की पसंद या राजनीतिक समीकरण से नहीं, बल्कि जरूरत और समानता के आधार पर होता है। अन्यथा महापौर अलका बाघमार की कार्यप्रणाली से उपजी नाराजगी का असर केवल नगर निगम तक सीमित रहेगा, इसकी गारंटी नहीं है—आगामी चुनाव में इसका खामियाजा भाजपा और उसके संभावित प्रत्याशी गजेंद्र यादव को भी भुगतना पड़ सकता है।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
