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दुर्ग / शौर्यपथ / स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और कोरोना पॉजिटिव नेगेटिव के खेल में 2 माह की मासूम बलि चढ़ गई।परिजनों की शिकायत पर जांच कमेटी गठित की गई परन्तु जांच कमेटी द्वारा सारी गलती का जिम्मेदार डाटा एंट्री ऑपरेटर के ऊपर डालकर चेतावनी दिए जाने योग्य बता कर परिजनों की शिकायत को निराधार आए नेस्ताबूत करने के योग्य बताया गया।
परंतु जांच रिपोर्ट की अगर बात करे तो जांच रिपोट में कई तरह के सवाल उभर कर सामने आ रहे है।
*परिजनों का कहना था कि बच्ची को वेंटिलेटर की जरूरत होना बताकर जिला अस्पताल में बच्चो का वेंटिलेटर न होने की बात कहते हुए रेफर किया गया जबकि जिला अस्पताल दुर्ग में बच्चो का वेंटिलेटर होने के बावजूद 4 साल से चलाने के लिए टेक्नीशियन नही है इसका जिम्मेदार कौन..??
*जिला अस्पताल से जिला अस्पताल कैसे रिफर कर दिया गया जबकि कोविड अस्पताल के लिए जिला अस्पताल रायपुर पंडरी में कोविड का इलाज नही किया जाता एव जिला अस्पताल से जिला अस्पताल रेफर नही किया जा सकता।इसका जिम्मेदार कौन..???
*मेकाहारा अस्पताल में उपस्थित स्टाफ के सामने आधे घंटे तक परिजन प्राथमिक उपचार करने के लिए मिन्नते करते रहे परंतु कोई भी बच्ची को उपचार करने नही आया पर एप्प के माध्यम से मोबाइल में ही बेड ढूंढने की बात कहते रहे उपचार के अभाव में बच्ची की एम्बुलेंस में मौत हो गयी इसका जिम्मेदार कौन..??
*शिकायत पर एंबुलेस चालक के खिलाफ जांच क्यों नही की गई क्योंकि बच्ची को टाइम पर लेने नही आया एवं आने पर वाहन 40 की स्पीड में चलाकर पंडरी जिला अस्पताल लेकर गया जबकि सुबह के समय रोड पर भीड़ नही रहती व मृत बच्ची को कैसे बीच मे छोड़ कर आ सकता था पर फिर भी 108 एंबुलेंस को जांच के दायरे पर नही लिया गया।इसका जिम्मेदार कौन...???
जांच कमेटी द्वारा इस सभी का ठीकरा बस डाटा एंट्री ऑपरेटर पर चश्मा नया नया पहनने की बात कहते हुए देखने मे परेशानी की बात कहते हुए रिपोर्ट की एंट्री करने की बात कही गयी जबकि जांच कमेटी के सदस्य स्वयं अपर कलेक्टर जो कि स्वयं जिला अस्पताल के नोडल अधिकारी है वही जिला अस्पताल के ही 3 वरिष्ठ चिकित्सक जांच कमेटी के सदस्य रहे है।
गौरतलव है कि 26 अप्रेल की सुबह इलाज के आभाव में 2 महीने की मासूम ने एम्बुलेंस में दम तोड़ दिया था, जिसको लेकर परिजनों ने दुर्ग जिला अस्पताल समेत एम्बुलेंस के चालक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसको सज्ञान में लेते हुए जिला कलेक्टर ने चार लोगो की टीम बनाकर मामले की जांच करने के आदेश भी दे दिए, जाँच के दौरान जांच टीम के द्वारा मृतक के मामा को बुलाकर यह बताने का प्रयास किया गया कि कुछ त्रुटी हुई है लेकिन वो मानवीय त्रुटी है, अब जिला अस्पताल में बच्चों का वेंटीलेटर होते हुए, सिर्फ इसलिए की किसी को चलाना नहीं आता, इसलिए मरीज को गंभीर अवस्था में दुसरे अस्पताल में रिफर कर देना, और मरीज की पर्ची में कोरोना टेस्ट पाजिटिव लिख देना और रिफर किये जाने वाले अस्पताल से बिना जानकारी लिए की वहा कोविड के मरीज का इलाज संभव है या नहीं ये जाने बगैर डॉक्टर द्वारा रिफर किया जाना कहा तक मानवीय त्रुटी को दर्शाता है, वो भी एक जिला अस्पताल से दुसरे जिला अस्पताल के लिए रिफर किया जाना कहा तक सही है जबकि रिफर कभी भी अपने से बड़े अस्पताल में ही किया जाता है, बच्ची को गंभीर अवस्था में इस प्रकार रायपुर में एक अस्पताल से दुसरे अस्पताल तब भटकना और इलाज के आभाव में बच्ची मौत हो जाना कहा तक मानवीय त्रुटी है? एम्बुलेंस में बच्ची की मौत हो जाती है और एम्बुलेंस ड्राईवर बच्ची को परिजन को सौप निजी वाहन से वापस घर ले जाने को कहकर चले जाना कहा तक मानवीय त्रुटी है .
सिविल सर्जन का कहना है कि 108 का प्रोटोकॉल उसने फालो किया, क्या 108 का प्रोटोकॉल कोरोना के प्रोटोकॉल से भी भारी है? बच्ची के दाह संस्कार के सिर्फ चार घंटे बाद मोबाइल पर कोरोना की रिपोर्ट नेगेटिव आना जबकि बच्ची की मौत का प्रमुख कारण बच्ची की पर्ची में कोरोना पाजिटिव लिखा होना था जिसकी वजह से समय रहते बच्ची को इलाज नहीं मिला, क्या अब ये भी मानवीय त्रुटी है? किसी की दुनिया लुट गई, किसी की गोद सुनी हो गई और जिला प्रशासन का कहना की ये एक मानवीय त्रुटी थी कहा तक जायज है !
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
