August 03, 2026
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    दुर्ग / शौर्यपथ

    छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार जहां सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी प्राथमिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम से सामने आया एक प्रकरण इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मामला न केवल प्रशासनिक निर्णयों की असंगतता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार छोटे कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई और वरिष्ठ अधिकारियों पर महज औपचारिक माफी की नीति अपनाई जा रही है।

    दो साल बाद पदोन्नति निरस्त : पीडि़त कौन, दोषी कौन?
    दुर्ग नगर निगम में वर्षों से पंप अटेंडेंट के रूप में कार्यरत कर्मचारी राजू लाल चंद्राकर को तत्कालीन आयुक्त लोकेश चंद्राकर के कार्यकाल में विभागीय पदोन्नति समिति (ष्ठक्कष्ट) की संस्तुति पर जल कार्य निरीक्षक के पद पर पदोन्नति प्रदान की गई थी। यह पदोन्नति किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत निर्णय से नहीं, बल्कि विधिवत गठित समिति की अनुशंसा पर हुई थी।
    इस समिति में —
    दिनेश नेताम, कार्यपालन अभियंता
    जितेंद्र सोमैया, सहायक अभियंता (वर्तमान में सेवानिवृत्त)
    राजकमल बोरकर, कार्यालय अधीक्षक
    जावेद अली, तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी
    भूपेंद्र गोईर, सहायक ग्रेड-3
    शामिल थे। स्थापना प्रभारी बंजारे द्वारा आवश्यक अभिलेख समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे। समिति ने उपलब्ध पद, सेवा अभिलेख और नगरीय निकाय नियमों के आधार पर राजू लाल चंद्राकर को पदोन्नति देने का निर्णय लिया।

    वर्तमान आयुक्त का आदेश और उठा विवाद
    लगभग दो वर्ष तक जल कार्य निरीक्षक के पद पर कार्य करने के बाद, जुलाई 2025 में वर्तमान आयुक्त सुमित अग्रवाल ने एक आदेश जारी कर न केवल राजू लाल चंद्राकर की पदोन्नति निरस्त कर दी, बल्कि उन्हें पुन: पंप अटेंडेंट के पद पर डिमोशन दे दिया। साथ ही, पदोन्नति समिति के सभी सदस्यों को नोटिस जारी किया गया।
    नोटिस के जवाब में समिति के सभी सदस्यों ने स्पष्ट किया कि —पदोन्नति नगरीय निकाय नियमों के अनुरूप थी,पद की उपलब्धता मौजूद थी,पूर्व में भी इसी प्रकार की पदोन्नतियां हो चुकी हैं। इसके बावजूद, समिति के उत्तरों को अस्वीकार कर दिया गया। परिणाम यह रहा कि — समिति के सदस्यों को केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया,जबकि कर्मचारी राजूलाल चंद्राकर को पदावनत कर दिया गया।यही बिंदु आज दुर्ग निगम में सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

    सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक मामला
    राजू लाल चंद्राकर ने वेतन और पद से जुड़े विवाद को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। एक शपथ पत्र में स्वयं आयुक्त सुमित अग्रवाल ने यह स्वीकार किया कि राजू लाल चंद्राकर उनके अधीनस्थ कर्मचारी हैं और जल कार्य निरीक्षक के रूप में कार्यरत रहे हैं।
    प्रशासनिक कानून के जानकारों का कहना है कि — यदि पदोन्नति अवैध थी, तो दो वर्षों तक कार्य क्यों कराया गया? और यदि अवैध नहीं थी, तो डिमोशन का आधार क्या है? यही प्रश्न अब माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

    नियम विरुद्ध पदोन्नति थी तो अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
    इस पूरे प्रकरण का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि — यदि मान लिया जाए कि पदोन्नति नियमों के विरुद्ध थी, तो फिर:पदोन्नति समिति के सदस्यों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं? ,स्थापना शाखा और फाइल आगे बढ़ाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं?
    सिर्फ एक कर्मचारी को दंडित कर देना और निर्णय लेने वाले अधिकारियों को "चेतावनी का गुलदस्ता" थमा देना, प्रशासनिक न्याय की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है। निगम के भीतर इसे निजी द्वेष और भेदभावपूर्ण नीति के रूप में देखा जा रहा है।

    चयनात्मक कार्रवाई का लंबा इतिहास
    दुर्ग निगम में यह पहला मामला नहीं है। वर्तमान आयुक्त के कार्यकाल में उच्च अधिकारियों की प्रताडऩा से त्रस्त कर्मचारियों द्वारा आत्महत्या के मामले सामने आए,बाद में नियमों को शिथिल कर आनन-फानन में परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई,जबकि अन्य समान मामलों में कर्मचारी महीनों से निलंबन झेल रहे हैं।
    इसी तरह, सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह यादव पर पार्किंग घोटाले में पेनल्टी लगने और लॉलीपॉप विज्ञापन घोटाले में भौतिक सत्यापन के दौरान अनियमितता बरतने के आरोप हैं। इन मामलों में निगम को राजस्व हानि हुई, परंतु कार्रवाई का दायरा ठेकेदार तक सीमित रहा — कर्मचारी फिर बच निकले।

    सुशासन पर आईना
    दुर्ग नगर निगम की यह कार्यप्रणाली अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रही। यह मामला सीधे तौर पर राज्य सरकार के सुशासन के दावों पर असर डाल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बार-बार सुशासन की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी यदि अपनी संवैधानिक शक्तियों का चयनात्मक और मनमाना प्रयोग करते हैं, तो उसकी आंच सरकार तक पहुंचना स्वाभाविक है।
    अब सबकी निगाहें माननीय उच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल राजू लाल चंद्राकर के भविष्य का निर्धारण करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही किसकी होगी?और क्या वास्तव में दुर्ग निगम में 'कानून सबके लिए समानÓ है?फिलहाल, दुर्ग में चर्चा का बाजार गर्म है और सवाल एक ही है — क्या यह सुशासन है, या सत्ता की छाया में पनपता भेदभाव?

    दुर्ग (शौर्यपथ)। जनवरी–फरवरी के निगम चुनावों में सुशासन का वादा कर जीत का दावा करने वाली ट्रिपल-इंजन सरकार का दुर्ग नगर निगम पर दिखता चेहरा अब सवालों के घेरे में है। स्थानीय नागरिकों, पार्षदों और विकास कार्यों से जुड़े ठेकेदारों का आरोप है कि निगम प्रशासन में भेदभाव और निष्क्रियता ऐसी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है कि शहर की रोज़मर्रा की समस्याएँ — अतिक्रमण, खुले नाले-पानी और अधूरे काम — सामान्य हो गए हैं।

    नागरिकों का कहना है कि नगर आयुक्त सुमित अग्रवाल केवल कपड़ा लाइन पर बार-बार कार्रवाई कर के अपनी रिपोर्ट-कार्ड चमकाने में लगे हैं, जबकि गणेश मंदिर के सामने सड़क पर खुलेआम कब्जा और चर्च रोड पर बिना अनुमति लगा अवैध बाजार, समृद्धि बाजार में अवैध अतिक्रमण जैसे मामलों पर पर निगम आयुक्त का मौन रहना चिंता बढ़ाने वाला है। विभागीय सूत्रों की माने तो निगम के पास पिछले वर्ष से राजस्व वसूली में भारी वृद्धि हुई — लगभग ढाई गुना — और तमाम सरकारी राशि उपलब्ध होने के बाबजूद शहर के विकास कार्य रुकावटों का शिकार हैं।

    ठेकेदारों व कर्मियों का आरोप है कि भुगतान महीनों तक रुके रहने से परियोजनाओं की रफ्तार ठप पड़ जाती है; इसके परिणामस्वरूप आम जनता को जहरीले पानी, अधूरी सड़कें , सड़कों पर आवारा पशुओं की फौज और अतिक्रमण वाली समस्याओं का दंश सहना पड़ रहा है। कई कर्मचारी व अधिकारी भी प्रशासनिक दमन व असमंजस की शिकायत करते हैं — “कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, अधिकारी और कर्मचारी दहशत में हैं।”

    एक ओर जहाँ स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि ठेके व अनुबंधों में अनियमितताएँ हैं — खासकर ‘लॉलीपॉप’ अनुबंध से जुड़े मामलों में जिसमेंखुलेआम राजस्व की हानि हुई बावजूदइसकेजिम्मेदार अधिकारी पर निगम प्रशासन द्वारा कार्यवाही न होने से “नैतिकता और जवाबदेही की कमी” के सन्देश जनता तक जा रहे हैं। निगम कार्यालय में कंप्यूटरों की अदला-बदली और अन्य व्यवस्थागत गड़बड़ियों के कारण विभागीय जवाबदेही भी प्रश्नचिह्न के नीचे आ चुकी है — नागरिकों का मत है कि जहरीले पानी मामले में प्लेसमेंट-कर्मचारी पर कार्रवाई कर के कागजी कार्यवाही दिखाई जा रही है, असल जिम्मेदारी अनछुई रह जाती है।

    इन सभी आरोपों व शिकायतों के बीच सबसे अहम सवाल यह उठता है कि जब नगरीय निकाय विभाग उपमुख्यमंत्री अरुण साव के पास है तो क्या मंत्रालय स्तर पर किसी सख्त हस्तक्षेप की जरूरत नहीं दिखती? चुनावी मंचों पर सुशासन की बातें करने वाले उपमुख्यमंत्री के पास विभाग होने के बावजूद दुर्ग में प्रशासनिक बदहाली जारी रहना सीधे तौर पर उनकी नीतिगत जवाबदेही पर भी प्रश्न खड़ा करता है।

    नगर पालिक निगम के मौजूदा आयुक्त को स्थानीय गतिविधियों व शिकायतों से अवगत कराया जा चुका है — लेकिन हालात में कोई ठोस सुधार न होना जनता के मन में यह आशंका पैदा कर रहा है कि क्या प्रशासन कुछ खास लोगों के प्रति नरम रवैया अपनाकर समग्र जनता की समस्याओं को अनदेखा कर रहा है। पार्षदों और नागरिक समूहों की मांग है कि या तो तुरंत सघन निरीक्षण कर दोषियों को कड़ी सजा दी जाए या फिर स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि शहर के विकास और सुशासन की बातें सिर्फ चुनावी बयानों तक सीमित न रहें।

    नगर निगम की राजनीति में ‘पोस्टर से गायब चेहरा’ बन गया नया संकेत;

    शहर की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस — क्या टूट रही है सरकार और निगम की साझी तालमेल की डोर?

    दुर्ग। शौर्यपथ।

    राजनीति में चेहरे बहुत कुछ कह जाते हैं — खासकर तब, जब किसी आयोजन या उत्सव की तस्वीरों में कोई चेहरा जानबूझकर गायब किया गया हो। ऐसी ही एक तस्वीर ने आज दुर्ग की नगर राजनीति में नए विवाद को जन्म दे दिया है। नगर निगम दुर्ग की महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने हाल ही में जीएसटी-2 बी फार्मा उत्सव पर सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए एक पोस्ट साझा की। लेकिन इस पोस्ट में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उसमें प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री और दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक गजेन्द्र यादव की तस्वीर नदारद थी — जबकि उसी पोस्ट में दूसरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों को स्थान मिला।

    इस एक ‘गायब चेहरे’ ने अब पूरे शहर में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा यही है कि आखिर महापौर और मंत्री के बीच ठंडी जंग क्यों चल रही है?

    ? क्या यह दूरी सिर्फ राजनीतिक है या व्यक्तिगत भी?

    महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेन्द्र यादव, दोनों ही एक ही दल से आते हैं। इसके बावजूद दोनों के बीच संबंधों में रंजिश और दूरी लंबे समय से सुर्खियों में रही है। जानकारों का कहना है कि नगर निगम के कई विकास कार्यों और बजट अनुमोदन के दौरान भी महापौर ने मंत्री की सिफारिशों को नज़रअंदाज़ किया था।

    अब जब महापौर ने सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पोस्ट में मंत्री को दरकिनार कर दिया, तो यह संकेत काफी गहरे हैं — मानो यह कहा जा रहा हो कि “निगम अब अपने बूते चलेगा।”

    ? क्या विकास की गाड़ी अब पटरी से उतर रही है?

    शहर की मौजूदा स्थिति इस राजनीतिक खींचतान की कीमत चुका रही है।

    मुख्य मार्गों पर फैला कचरा, सड़कों के गड्ढे, जगह-जगह जलभराव, और स्ट्रीट लाइटों के बंद रहने से नागरिक परेशान हैं।

    आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार और भ्रष्टाचार के आरोपों ने नगर निगम की छवि को इतिहास की सबसे बदहाल स्थिति में पहुँचा दिया है।

    दीपावली के ठीक पहले ठेकेदारों को बकाया भुगतान में भी भारी कटौती ने हालात और बिगाड़ दिए। ठेकेदारों को “10–20 प्रतिशत” भुगतान कर संतोष कराने की कोशिश हुई, परंतु बाकी राशि के अभाव में कई काम ठप पड़ गए।

    ? जनता के मन में सवाल – “क्या अकेले महापौर शहर संभाल लेंगी?”

    जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर महापौर अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरियां बनाए रखेंगी, तो क्या निगम को प्रदेश सरकार का सहयोग मिल पाएगा?

    राज्य सरकार की योजनाओं, निधियों और विकास कार्यों में तालमेल आवश्यक है — और यदि यह तालमेल टूट गया, तो उसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।

    ? “पोस्टर पॉलिटिक्स” का संदेश क्या है?

    राजनीति में कहा जाता है कि पोस्टर से गायब चेहरा, रिश्तों की सच्चाई बयान कर देता है।

    महापौर की पोस्ट में मंत्री का नाम या तस्वीर शामिल न करना सिर्फ एक सोशल मीडिया घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। यह संदेश साफ है — दुर्ग नगर निगम की प्रमुख अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान गढ़ने के रास्ते पर हैं।

    परंतु सवाल यह भी है कि क्या इस स्वतंत्रता का खामियाजा शहर भुगतेगा?

    क्या दुर्ग का विकास अब राजनीतिक अहंकार और व्यक्तिगत टकराव के बीच कुर्बान हो जाएगा?

    ? निष्कर्ष:

    दुर्ग की जनता ने महापौर अलका बाघमार को नगर निगम का नेतृत्व इस उम्मीद से सौंपा था कि वे शहर को विकास की नई दिशा देंगी।

    परंतु आज शहर की तस्वीर कुछ और कहती है — सड़कों पर गड्ढे हैं, गलियों में अंधेरा है, और सोशल मीडिया पर ‘गायब चेहरे’ की बहस जारी है।

    ऐसे में यह सवाल अब और गहरा हो गया है कि —

    > “क्या महापौर अलका बाघमार अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरी बनाकर, दुर्ग के विकास की धारा को आगे बढ़ा पाएंगी?”

     

     

    दुर्ग। शौर्यपथ।

    नगर निगम दुर्ग प्रशासन में एक बार फिर सख्ती के संकेत नजर आ रहे हैं। निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल ने सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी शुभम गोईर को कंप्यूटर के आदान-प्रदान के दौरान उपकरण गायब होने के मामले में 24 घंटे के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का नोटिस जारी किया है। जवाब नहीं देने पर दंडात्मक कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं।

    यह नोटिस जारी होने के बाद अब निगम कर्मचारियों में चर्चा का विषय यह बन गया है कि क्या इसी तरह की सख्ती तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव पर भी दिखाई जाएगी?

    ज्ञात हो कि वर्ष 2021-22 में पार्किंग घोटाले से संबंधित प्रकरण में लगभग ₹80,000 की राजस्व वसूली के लिए तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसके अलावा गौरव पथ पर विज्ञापन बोर्ड के गलत साइज और आकलन के मामले में भी थान सिंह यादव का नाम चर्चा में रहा है।

    वहीं दूसरी ओर, शुभम गोईर पर बीते तीन-चार महीनों में आयुक्त अग्रवाल द्वारा लगभग डेढ़ दर्जन नोटिस जारी किए जा चुके हैं और वे वर्तमान में निलंबन की स्थिति में हैं। आयुक्त की यह कार्यवाही निगम प्रशासन में अनुशासन की कसावट के रूप में देखी जा रही है।

    अब कर्मचारियों के बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या यह सख्ती सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित रहेगी या फिर आयुक्त अग्रवाल निष्पक्ष प्रशासनिक सिद्धांतों का पालन करते हुए विवादित मामलों में शामिल अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई करेंगे?

    फिलहाल, सभी की निगाहें आयुक्त सुमित अग्रवाल के अगले कदम पर टिकी हैं — क्या थान सिंह यादव जैसे विवादित अधिकारी पर भी कार्यवाही होगी या फिर निगम प्रशासन एक बार फिर मौन साध लेगा?

    नगर निगम कार्यालय में फिलहाल यही चर्चा जोरों पर है।

      मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के संभावित विदेश दौरे से पहले विस्तार की चर्चा तेज़
      90-सदस्यीय विधानसभा में संवैधानिक सीमा अनुसार अधिकतम 14 मंत्री (मुख्यमंत्री सहित) संभव—वर्तमान में 11
      क्या 33% महिला भागीदारी की ‘आदर्श परिपाटी’ मंत्रिमंडल में दिखेगी?

     रायपुर/विशेष संवाददाता शौर्यपथ
      छत्तीसगढ़ में कैबिनेट विस्तार की अटकलें एक बार फिर परवान चढ़ गई हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि 18 से 21 अगस्त के बीच किसी भी दिन मंत्रिमंडल में नए चेहरों को जगह मिल सकती है। फिलहाल सरकार में मुख्यमंत्री सहित 11 मंत्री हैं; संवैधानिक सीमा के अनुरूप तीन रिक्त पद भरे जा सकते हैं। चर्चा यह भी है कि इस विस्तार में महिला प्रतिनिधित्व को प्रमुखता दी जाएगी ताकि 33% आरक्षण की ‘आदर्श परिपाटी’ का संदेश कैबिनेट स्तर पर भी जाए।

    मुख्य विवरण
    संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 164(1A) के तहत 90-सदस्यीय विधानसभा में मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या 14 तय है (मुख्यमंत्री सहित)।
    वर्तमान स्थिति: सरकार में 11 मंत्री कार्यरत; 3 स्थान रिक्त।
    चर्चा: 18–21 अगस्त के बीच विस्तार की संभावना—आधिकारिक घोषणा शेष।
    राजभवन के ‘दरबार हॉल’ का नाम ‘छत्तीसगढ़ मंडपम’ किए जाने व यहीं शपथ समारोह की तैयारी की चर्चा—औपचारिक पुष्टि प्रतीक्षित।

    महिला प्रतिनिधित्व: नारा नहीं, नीति
       वर्तमान मंत्रिपरिषद में महिला मंत्रियों की संख्या 1 है। यदि कैबिनेट 14 तक भरता है, तो 33% के आदर्श मानक के हिसाब से कम-से-कम 5 महिलाओं की हिस्सेदारी का लक्ष्य प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर नीतिगत भागीदारी का संकेत देगा। विस्तार में कम-से-कम 1–2 नई महिला चेहरों को शामिल किए जाने की चर्चा है। बस्तर से लता उसेंडी और दुर्ग संभाग से भावना बोहरा (जिन्हें 2024 में ‘उत्कृष्ट विधायक’ के रूप में सम्मानित किए जाने का उल्लेख है) जैसे नाम सियासी चर्चा में हैं।
      केंद्र स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘नारी शक्ति वंदन’ (33% आरक्षण) के पैरोकार रहे हैं और यह विधेयक संसद से पारित हो चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के लिए यह विस्तार ‘आदर्श राज्य’ की छवि गढ़ने का अवसर बन सकता है।

    संभावित दावेदारों की भूमिका: दिए गए नाम सियासी चर्चाओं में चल रहे संभावित विकल्प हैं; आधिकारिक सूची/घोषणा शेष है। उद्देश्य सभी प्रमुख दावेदारों की भूमिका और संभावित संकेत को समग्रता से रखना है।

    1) गजेन्द्र यादव: दुर्ग से कांग्रेस के पिछले तीस सालो से लगातार हार / जीत के बावजूद प्रत्याशी रहे अरुण वोरा को चुनावी मैदान में आसान शिकस्त दी आसान इसलिए कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ कांग्रेसी ही मैदान में परदे के पीछे खड़े रहे शहर की जनता भी लगातार एक ही कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन से उब चुकी थी निष्क्रियता और चाटुकारिता से घिरे विधायक की छवि के कारण दुर्ग विधान सभा में चुनावी मौसम में यह चर्चा रही कि भाजपा से कोई भी प्रत्याशी मैदान में होगा जीत निश्चित है ऐसे में भाजपा प्रत्याशी गजेन्द्र यादव को आसान और बड़ी जीत मिली.वर्तमान समय में विधायक यादव और महापौर बाघमार की राजनैतिक दुरी संगठन के कार्यकर्ताओ की विधायक से दुरी के साथ साथ दल्बद्लुओ की फौज का करीबी होना चर्चा का विषय है तो सामाजिक स्तर पर यादव समाज के प्रतिनिधितत्व एक बड़ा फेक्टर साथ दे रहा है .

    2) राजेश अग्रवाल (सरगुजा)

    क्षेत्रीय महत्व: सरगुजा संभाग का प्रतिनिधित्व मज़बूत करता है, जहाँ संतुलन साधना आवश्यक माना जा रहा है। उत्तरी छत्तीसगढ़ की प्राथमिकताओं—सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई—पर फोकस।
    3) गुरु खुशवंत साहिब (रायपुर संभाग ): गुरु खुशवंत साहिब प्रदेश के एक बड़े वर्ग के धार्मिक guru के रूप में जाने जाते है ऐसे में प्रदेश सरकार इस बड़े वर्ग को भी साधने के लिए इन्हें मौका दे सकती है . एससी /एसटी वर्ग को प्रतिनिधितव मिलने से इस वर्ग के मतदाता का रुझान भी पार्टी की तरफ ज्यादा रहेगा ऐसे में इनकी दावेदारी की भी प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है और इन्हें केबिनेट में जगह मिलने की बात से चर्चो का बाजार गर्म है .
    4) राजेश मूणत : लंबे समय से सक्रिय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी रखने वाले वरिष्ठ नेता।अनुभवी हाथों से विभागीय डिलीवरी में तेजी लाने का संकेत। किन्तु पिछली बार भाजपा की सत्ता में रहने के दौरान महत्तवपूर्ण विभाग कीई जिम्मेदारी सँभालने वाले पूर्व मंत्री राजेश मुड़त के कई विभागीय कार्यो में अनियमितता और कमीशनखोरी की चर्चो से पूर्व की भाजपा सरकार को काफी नुकसान हुआ था और सत्ता हाथ से जाने का एक बड़ा कारण भी मुड़त को माना गया .
    5) अमर अग्रवाल: भाजपा के कद्दावर नेता के रूप में पहचान अनुभवी होने के साथ साथ प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ विधायक व लम्बे प्रशासनिक कार्यो का अनुभव किन्तु बड़ी अड़चन यह कि प्रदेश सरकार की वर्तमान राजनितिक गलियारों में चर्चा के अनुसार नए एवं युवा विधायको को यह मौका देने का जोर कही ना कही अमर अग्रवाल जैसे वरिष्ठ भाजपा विधायक को दरकिनार करता नजर आ रहा है वर्तमान समय में मंत्री मंडल में नए विधायको को जिम्मेदारी मिली जो सरकार की मंशा के अनुरूप जोश के साथ कार्य को अंजाम दे रहे है वही नै पीढ़ी को आगे करने की रणनीति कार्यकर्ताओ में भी उम्मीद की किरण के रूप में एक सार्थक माहौल को जन्म दे रही जो संगठन के लिए भी काफी महत्तवपूर्ण है भविष्य की राजनीती के
    6) भावना बोहरा (दुर्ग संभाग ): भावना बोहरा : महिला सशक्तिकरण की नई पहचान

    पंडरिया विधानसभा से पहली बार चुनाव जीतने वाली विधायक भावना बोहरा ने अपने सामाजिक और विकास कार्यों से जनता के बीच गहरी छाप छोड़ी है। धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली बोहरा को 2024 में उत्कृष्ट विधायक सम्मान भी मिला। व्यावसायिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं पर पकड़ बनाकर प्रशासनिक दक्षता दिखाई है।
    राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि प्रदेश सरकार उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान देती है तो यह न केवल महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम होगा, बल्कि भाजपा संगठन को भी महिलाओं के बीच सशक्त नेतृत्व प्रदान करेगा।
      निष्कर्षक संकेत: यदि तीन रिक्त स्थान में 2 पुरुष + 1 महिला या 1 पुरुष + 2 महिलाएँ का फार्मूला अपनता है, तो क्षेत्रीय-सामाजिक संतुलन के साथ महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी जाता है। दूसरी ओर 3 पुरुष विकल्प चुनने की स्थिति में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने का रोडमैप अगले फेरबदल में स्पष्ट करना होगा।
    ‘हरियाणा मॉडल’ का संदर्भ
     चर्चित ‘हरियाणा मॉडल’ का आशय संख्या-संतुलन और कार्य-वितरण वाले संकुचित-सक्षम कैबिनेट से है। छत्तीसगढ़ पहले से 14 की संवैधानिक सीमा में आता है; अतः यहाँ ‘मॉडल’ का अर्थ प्रशासनिक कार्यकुशलता और संतुलित प्रतिनिधित्व की कार्यशैली से है, न कि किसी कानूनी अपवाद से।
    चुनावी गणित बनाम शासन-प्राथमिकताएँ
     विधानसभा चुनावों के चक्र में प्रायः अंतिम वर्ष चुनावी मोड में बीतता है। ऐसे में इस विस्तार के बाद नए मंत्रियों के पास करीब दो वर्ष होंगे—अपने विभागीय प्रदर्शन से संदेश देने के लिए। क्षेत्रीय संतुलन (रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा, बस्तर), सामाजिक संतुलन (ST/SC/OBC/सामान्य/धार्मिक-भाषाई समुदाय) और राजनीतिक योगदान/संगठनात्मक सक्रियता—इन तीनों कसौटियों पर संतुलित चयन सरकार की प्राथमिकताओं का संकेत देगा।

    कैबिनेट विस्तार सरकार के राजनीतिक मनोविज्ञान और शासन-दृष्टि की परीक्षा है। यदि महिला प्रतिनिधित्व को अर्थपूर्ण ढंग से बढ़ाया जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि छत्तीसगढ़ में नारी शक्ति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि निर्णय-निर्माण की मेज़ पर बराबरी से बैठी है।आधिकारिक निर्णय आते ही नामों/तिथियों/स्थल का उल्लेख अद्यतन किया जाएगा।

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