August 03, 2026
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    “अपने ही घर में परायी बनती महापौर अलका बाघमार — क्या मंत्री गजेन्द्र यादव से दूरी दुर्ग के विकास पर भारी पड़ेगी?” Featured

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    नगर निगम की राजनीति में ‘पोस्टर से गायब चेहरा’ बन गया नया संकेत;

    शहर की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस — क्या टूट रही है सरकार और निगम की साझी तालमेल की डोर?

    दुर्ग। शौर्यपथ।

    राजनीति में चेहरे बहुत कुछ कह जाते हैं — खासकर तब, जब किसी आयोजन या उत्सव की तस्वीरों में कोई चेहरा जानबूझकर गायब किया गया हो। ऐसी ही एक तस्वीर ने आज दुर्ग की नगर राजनीति में नए विवाद को जन्म दे दिया है। नगर निगम दुर्ग की महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने हाल ही में जीएसटी-2 बी फार्मा उत्सव पर सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए एक पोस्ट साझा की। लेकिन इस पोस्ट में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उसमें प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री और दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक गजेन्द्र यादव की तस्वीर नदारद थी — जबकि उसी पोस्ट में दूसरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों को स्थान मिला।

    इस एक ‘गायब चेहरे’ ने अब पूरे शहर में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा यही है कि आखिर महापौर और मंत्री के बीच ठंडी जंग क्यों चल रही है?

    ? क्या यह दूरी सिर्फ राजनीतिक है या व्यक्तिगत भी?

    महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेन्द्र यादव, दोनों ही एक ही दल से आते हैं। इसके बावजूद दोनों के बीच संबंधों में रंजिश और दूरी लंबे समय से सुर्खियों में रही है। जानकारों का कहना है कि नगर निगम के कई विकास कार्यों और बजट अनुमोदन के दौरान भी महापौर ने मंत्री की सिफारिशों को नज़रअंदाज़ किया था।

    अब जब महापौर ने सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पोस्ट में मंत्री को दरकिनार कर दिया, तो यह संकेत काफी गहरे हैं — मानो यह कहा जा रहा हो कि “निगम अब अपने बूते चलेगा।”

    ? क्या विकास की गाड़ी अब पटरी से उतर रही है?

    शहर की मौजूदा स्थिति इस राजनीतिक खींचतान की कीमत चुका रही है।

    मुख्य मार्गों पर फैला कचरा, सड़कों के गड्ढे, जगह-जगह जलभराव, और स्ट्रीट लाइटों के बंद रहने से नागरिक परेशान हैं।

    आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार और भ्रष्टाचार के आरोपों ने नगर निगम की छवि को इतिहास की सबसे बदहाल स्थिति में पहुँचा दिया है।

    दीपावली के ठीक पहले ठेकेदारों को बकाया भुगतान में भी भारी कटौती ने हालात और बिगाड़ दिए। ठेकेदारों को “10–20 प्रतिशत” भुगतान कर संतोष कराने की कोशिश हुई, परंतु बाकी राशि के अभाव में कई काम ठप पड़ गए।

    ? जनता के मन में सवाल – “क्या अकेले महापौर शहर संभाल लेंगी?”

    जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर महापौर अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरियां बनाए रखेंगी, तो क्या निगम को प्रदेश सरकार का सहयोग मिल पाएगा?

    राज्य सरकार की योजनाओं, निधियों और विकास कार्यों में तालमेल आवश्यक है — और यदि यह तालमेल टूट गया, तो उसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।

    ? “पोस्टर पॉलिटिक्स” का संदेश क्या है?

    राजनीति में कहा जाता है कि पोस्टर से गायब चेहरा, रिश्तों की सच्चाई बयान कर देता है।

    महापौर की पोस्ट में मंत्री का नाम या तस्वीर शामिल न करना सिर्फ एक सोशल मीडिया घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। यह संदेश साफ है — दुर्ग नगर निगम की प्रमुख अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान गढ़ने के रास्ते पर हैं।

    परंतु सवाल यह भी है कि क्या इस स्वतंत्रता का खामियाजा शहर भुगतेगा?

    क्या दुर्ग का विकास अब राजनीतिक अहंकार और व्यक्तिगत टकराव के बीच कुर्बान हो जाएगा?

    ? निष्कर्ष:

    दुर्ग की जनता ने महापौर अलका बाघमार को नगर निगम का नेतृत्व इस उम्मीद से सौंपा था कि वे शहर को विकास की नई दिशा देंगी।

    परंतु आज शहर की तस्वीर कुछ और कहती है — सड़कों पर गड्ढे हैं, गलियों में अंधेरा है, और सोशल मीडिया पर ‘गायब चेहरे’ की बहस जारी है।

    ऐसे में यह सवाल अब और गहरा हो गया है कि —

    > “क्या महापौर अलका बाघमार अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरी बनाकर, दुर्ग के विकास की धारा को आगे बढ़ा पाएंगी?”

     

     

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