August 02, 2026
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    पाबंदी से खुलेंगे कई दरवाजे

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    ओपिनियन / शौर्यपथ /केंद्र सरकार ने 59 स्मार्टफोन एप को प्रतिबंधित करके चीन के प्रति अपना सख्त रुख दिखाया है। अब तक भारत में भी यही सोच हावी थी कि दोनों देशों का कारोबारी रिश्ता जितना मजबूत होगा, उतनी ही राजनीतिक घनिष्ठता बढ़ेगी, जिससे दोनों मुल्कों का नैसर्गिक विकास होगा। कहा भी जा रहा था कि मौजूदा सदी एशिया की है, जिसमें चीन और भारत मिलकर तरक्की की एक नई इबारत लिख सकते हैं। मगर चीन की हरकतें बताती हैं कि वह इससे इत्तिफाक नहीं रखता। उसकी नजर में यह सदी ‘चीन-केंद्रित’ है, जिसमें भारत की कोई जगह नहीं है। पूर्वी लद्दाख के गलवान का खूनी संघर्ष उसकी इसी सोच का नतीजा था। मगर अब कई चीनी एप पर पाबंदी लगाकर भारत ने साफ कर दिया है कि भारतीय बाजार में चीन की कंपनियों का दखल और सीमा पर खूनी टकराव, दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।
    सवाल यह है कि चीन को इससे कितना नुकसान और हमें कितना फायदा होगा? इसके आर्थिक नुकसान का आकलन फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि ज्यादातर एप मुफ्त होते हैं। मगर, उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ने से एप पर आने वाले विज्ञापनों से डेवलपर्स (एप बनाने वाली कंपनी) को काफी फायदा मिलता है। चीन अपने यहां से यही लाभ उठाता रहा है। सेंसर टावर के आंकड़े बताते हैं कि 2019 में डाउनलोड किए गए नॉन-गेमिंग एप (खेल से जुड़े एप से अलग) में टिक टॉक सबसे ऊपर था, जबकि शीर्ष 10 एप में छह चीन के थे। चीन ने यह पैठ महज चार वर्षों में बनाई थी, क्योंकि इसी आंकडे़ के मुताबिक, 2015 में अपने यहां अमूमन अमेरिकी एप लोकप्रिय थे। यह देखते हुए कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खुला बाजार है, केंद्र सरकार के फैसले से चीन को मिलने वाले फायदे में स्वाभाविक तौर पर कमी आ सकती है।
    जाहिर है, यह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया गया पहला ठोस कदम है। यह हमारे लिए अवसरों के कई दरवाजे खोल सकता है। संभव है कि आने वाले दिनों में चीन से आयात पर रोक लगे और फिर, उन उत्पादों का स्वेदशी निर्माण हो। दरअसल, चीन किसी भी देश के बाजार में इसलिए दबदबा बनाता रहा है, क्योंकि उसके उत्पाद सस्ते होते हैं। प्रतिस्पद्र्धा खुले बाजार की मांग है, पर चीन की कंपनियां अपने सरकार द्वारा मिलने वाले प्रोत्साहन की वजह से उत्पादों की कीमतें अपेक्षाकृत कम रखती हैं। चीन की सरकार अपनी कंपनियों को सब्सिडी देकर दूसरे देश के बाजारों में पैठ जमाने में मदद करती है, और यह सुविधा सरकारी ही नहीं, निजी कंपनियों को भी हासिल है। नतीजतन, चीनी कंपनियां अन्य देशों के बाजार पर कब्जा करने में सफल रही हैं। भारत में भी उनके बढ़ते दबदबे की वजह यही है। यहां मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक ही नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी चीन की कंपनियां ठेके हासिल कर रही हैं। ऐसे में, यदि भारतीय बाजार के दरवाजे उनके लिए बंद हो जाते हैं, तो उनकी आर्थिक सेहत को काफी चोट पहुंचेगी।
    चीनी एप पर जासूसी के आरोप बेजा नहीं हैं। हमें यह तो नहीं पता कि अपने एप के माध्यम से चीन ने अब तक हमारी कितनी जानकारियां हासिल कर ली हैं, मगर वह किस तरह से हमारा डाटा इकट्ठा कर रहा है, इसे कैमस्कैनर नामक एक एप के उदाहरण से समझा जा सकता है। इस एप से हम जिस दस्तावेज को स्कैन करते हैं, वह भारत से बाहर चीनी कंपनी के सर्वर पर सेव हो जाता है। इसका अर्थ है कि कैमस्कैनर से स्कैन की गई कोई जानकारी गोपनीय नहीं रहती। संभवत: इन्हीं वजहों से साल 2017 में रक्षा मंत्रालय ने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए चीन से संचालित 42 एप के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। कहा तो यह भी जाता है कि चीन ने अपनी डिजिटल इंडस्ट्री अमेरिका से चोरी करके तैयार की है। चीन पर जासूसी करने का आरोप पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट सी ओब्रेन ने भी लगाया है। 26 जून को दिए गए अपने एक वक्तव्य में उन्होंने बताया है कि किस तरह चीन से आने वाले छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों से गे्रजुएट करने के बाद अमेरिकी कंपनियों में काम हासिल करते हैं और यहां की तकनीक चुराकर चीन ले जाते हैं।
    साफ है, केंद्र सरकार के ताजा फैसले से न सिर्फ हम अपने डाटा को सुरक्षित रखने में सफल हो सकेंगे, बल्कि भारतीय एप को भी इससे प्रोत्साहन मिलेगा। तमाम क्षेत्रों में चीन पर बढ़ी हमारी निर्भरता को कम करने की भी यह एक अच्छी शुरुआत है। हालांकि, हमारे स्टार्ट-अप में चीन का काफी निवेश है, इसलिए बायकॉट और पाबंदी के इतर हमारी कोशिश यह भी होनी चाहिए कि चीनी निवेशकों को हतोत्साहित करें। इसके लिए हमें आने वाले समय में बाजार या निवेश में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी और चीन की हिस्सेदारी कम करनी होगी। पिछले पांच वर्षों में जिस तरह से हमारी साइबर दुनिया में चीन का दखल बढ़ा है, उसी तरह से अगले पांच साल में उसे कम करने का लक्ष्य हमें बनाना होगा।
    जरूरत चीन का विकल्प खोजने की भी है। हरेक क्षेत्र में हमें उसका तोड़ निकालना होगा। चीन से यदि हम अपना आयात रोकते हैं, तो हमें उन उत्पादों को अपने यहां बनाना होगा या फिर दूसरे देशों से उनका आयात करना होगा। इलेक्ट्रॉनिक चीजों के आयात के लिहाज से दक्षिण कोरिया, ताइवान और जापान जैसे देश चीन का विकल्प बन सकते हैं।
    चीन का दबदबा घटाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यह स्थानीय विकल्पों को खत्म कर देता है। जैसे, चीन की ज्यादातर इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां सरकारी हैं, इसलिए सरकारी प्रोत्साहन पाकर वे बहुत कम कीमतों में ढांचागत निर्माण करती हैं। इससे स्थानीय कंपनियों का काम सिमटने लगता है। यह परंपरा अब बंद हो जानी चाहिए। चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने की शुरुआत करके भारत सरकार ने यह साफ कर दिया है कि सीमा पर तनाव का जवाब सिर्फ बंदूक नहीं है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)प्रांजल शर्मा, डिजिटल नीति विशेषज्ञ

     

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