August 02, 2026
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    हम अब लकीर के फकीर नहीं

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    ओपिनियन / शौर्यपथ / पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों में हुए ताजा संघर्ष और पहले के तनावों में अंतर यह है कि इस बार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), यानी चीन की फौज पूरी तैयारी के साथ आई है। पीएलए की कई डिवीजन नजदीकी इलाकों में तैनात हैं, साथ ही भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में भी एक-दूसरे के करीब बड़ी संख्या में फौजी डटे हुए हैं। भारतीय सेना ने भी इलाके में और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आसपास समान तैयारी कर रखी है। जिस तरह से यहां सैनिकों का भारी जमावड़ा किया गया है और असलहा व तोप मंगवाए जाने की खबरें हैं, उसे देखकर स्पष्ट है कि पीएलए ने पूरी तैयारी और योजना के साथ इस खूनी संघर्ष को अंजाम दिया है। इसका मकसद चीनी सैनिकों का उस सीमा-रेखा की तरफ बढ़कर जमीन हथियाना है, जिसे वे वास्तविक नियंत्रण रेखा कहते हैं।
    ऐसा करके चीन दरअसल, भारत के साथ किसी भी तरह की द्विपक्षीय बातचीत के बिना वास्तविक नियंत्रण रेखा का एकतरफा निर्धारण का प्रयास कर रहा है। इससे वह अपनी सीमा तय कर सकेगा और उस पर नियंत्रण की तरफ अपने कदम बढ़ाएगा। मगर भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को रोक दिया है और भारतीय क्षेत्र की अखंडता बनाए रखने के लिए मुस्तैद हो गई है। नतीजतन, इस संघर्ष से पीएलए को जो तमगा हासिल हुआ, वह यह कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति व स्थिरता बनाए रखने के लिए पिछले 25 वर्षों में मजबूत किए गए तमाम सिद्धांतों, मानदंडों व मानक-प्रक्रियाओं का उसने उल्लंघन कर दिया। उसने यह साबित कर दिया है कि खुद उसकी सरकार द्वारा हस्ताक्षरित समझौतों के प्रति उसका क्या नजरिया है?
    कूटनीतिक रूप से भारत और बाकी दुनिया को चीन यह संकेत दे रहा है कि वह एशिया की सबसे बड़ी शक्ति है और अपनी मनमर्जी से कुछ भी कर सकता है, फिर चाहे वह दक्षिण चीन सागर में हो या भारत-चीन सीमा पर। वह चाहता है कि भारत यह समझे और स्वीकार करे कि चीन की समग्र राष्ट्रीय ताकत उससे कहीं अधिक है और नई दिल्ली को एशिया में उसकी सर्वोच्चता मान लेनी चाहिए, लिहाजा उसे पीछे हट जाना चाहिए। उसके मुताबिक, भारत को यह भी समझ लेना चाहिए कि 21वीं सदी एशिया की नहीं, बल्कि चीन की है।
    मगर पूर्वी लद्दाख में भारतीय सैनिकों द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई से चीन को यह संदेश साफ-साफ मिल गया है कि भारत उसके आधिपत्य को स्वीकार नहीं करता और उसकी उकसाने वाली कार्रवाइयों को बर्दाश्त नहीं करेगा। नई दिल्ली अपनी स्थिति से कतई समझौता नहीं करेगी। हमारे देश के बहादुर सैनिकों ने 15 जून की रात गलवान घाटी में ठीक यही किया। यहां पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि बाकी दुनिया साफ-साफ देख रही है। यहां पर चीन ने चुनौती दी है, जिसको भारत ने स्वीकार किया है।
    फौज भेजने का सीधा संकेत है कि हम चीन का मुकाबला करने और भारत सहित अन्य राष्ट्रों पर धौंस जमाने के उसके आक्रामक तरीकों का विरोध करने के लिए तैयार हैं। भारत और चीन का रिश्ता अब पहले की तरह आगे नहीं बढ़ सकता। पुरानी लकीर अब व्यवहार में नहीं लाई जा सकती है। क्यों? अगर भारत सरकार को ऐसा ही करना होता, तो वह अपनी सैन्य कार्रवाई का खंडन कर रही होती। इसीलिए भारत को नीतिगत फैसलों के माध्यम से अपने सैन्य संदेश को मजबूत करने और दोहराने की जरूरत है, जो आगे चलकर इस राष्ट्रीय सहमति को स्पष्ट करेगा कि हमें चीन का बड़े भाई जैसा रवैया पसंद नहीं है। इसी वजह से भारत को ऐसे संकेत देने होंगे कि यदि सीमा पर शांति नहीं होती है, तो चीन के साथ सामरिक के अलावा अन्य रिश्ते भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे। इस संदेश को स्पष्ट तौर पर दिखाने के लिए हमें अपनी चीन-नीति का फिर से मूल्यांकन करना होगा।
    इसी दिशा में हमारा पहला कदम था 59 चीनी एप पर पाबंदी। भारत ने तो सिर्फ शुरुआत की है। देश में 5-जी तकनीक के परीक्षण और उसे लागू करने की प्रक्रिया से चीन की कंपनियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर प्रतिबंधित करना नई दिल्ली की इस सोच को और मजबूत करेगा।
    चीन की कार्रवाइयों का एक जवाब यह भी हो सकता है कि भारत अपने रिश्ते अमेरिका, जापान, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और संभवत: इंडोनेशिया जैसे लोकतंत्रों के साथ मजबूत बनाए। भारत को ताइवान के साथ भी अब अपने संबंधों को विस्तार देना चाहिए। दिल्ली अपनी चीन-नीति संयत होकर तैयार करे। बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया जाहिर करने की कतई जरूरत नहीं है। अपने तमाम विकल्पों पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही हमें आगे बढ़ना चाहिए। मगर हां, इसकी समय-सीमा तय होनी चाहिए। नई नीति इसी साल लागू हो जानी चाहिए।
    विशेषकर आर्थिक क्षेत्र में भारत की नई चीन-नीति खुद को कुछ दर्द दिए बिना तैयार नहीं की जा सकती है। हालांकि, जब हमने यह तय कर लिया है कि चीन को सख्त संदेश देने की जरूरत है, तो हमें कष्ट सहने के लिए भी तैयार रहना होगा। भारतीय सैनिकों ने ऐसा ही सीमाओं पर किया है, और अब आम भारतीयों के लिए यह दिखाने का वक्त आ गया है कि वे भी ऐसा करने के लिए तैयार हैं। यह कष्ट कई रूपों में मिल सकता है- कुछ उत्पादों की उपभोक्ता कीमतें बढ़ सकती हैं, कुछ कंपनियों के मुनाफे घट सकते हैं, तो कुछ कारोबारियों के राजस्व में कमी आ सकती है। अगर हम खुद के मजबूत व एकजुट होने का संदेश देना चाहते हैं, जिसे चीन ने समझने में गलती की है, तो हमें इस तरह के दर्द सहने ही होंगे। भारत को अपना यह चरित्र पूरी मजबूती से चीन के सामने रखना ही होगा कि हम लकीर के फकीर नहीं हैं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)गौतम बम्बावाले, चीन में नियुक्त रहे भारतीय राजदूत

     

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