August 19, 2026
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    ये मैं हूं:न डिग्री-न रिसर्च, दीमक से की दोस्ती, 70 साल की 'साइंटिस्ट' भगवती आज हैं किसानों की रोल मॉडल 3 घंटे पहले

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    ये मैं हूं /शौर्यपथ/

    18 साल पहले की बात है, जब एक दिन चूल्हे-चौके में काम करने के बाद मैं खेतों में जलाने के लिए लकड़ियां जुटा रही थी। उस वक्त जुटाई गई लकड़ियों में मैंने देखा कि सफेदे ( यूकेलिप्टस) की लकड़ी में ढेर सारे दीमक लगी हुई है। मेरे मन में यह ख्याल आया कि जिस सफेदे को दीमक इतने प्रेम से खाती हैं, अगर उसे फसलों के बीच-बीच में रख दिया जाए तो शायद दीमक फसलों को छोड़कर सफेदे की लकड़ियों को खाने लगेंगी। मैंने सबसे पहले इस तरकीब को गेहूं की फसल में आजमाकर देखा। यह तरकीब रंग लाई। यह कहना है राजस्थान के सीकर जिले की 70 साल की महिला किसान भगवती देवी का, जो अब किसानों की रोल मॉडल हैं।

    'खेतों के वैज्ञानिक' सम्मान और 50 हजार रुपए के 'कृषि प्रेरणा सम्मान' से नवाजी जा चुकीं भगवती देवी भास्कर वुमन से बातचीत में वैसे तो राजस्थानी में अपनी बात कहती हैं, मगर उनके पति सुंडाराम वर्मा इसका हिंदी में तर्जुमा भी करते जाते हैं, जो खुद कृषि वैज्ञानिक हैं और नए-नए प्रयोगों को अंजाम देने में लगे रहते हैं। भगवती देवी कहती हैं कि मैंने जब यह तरकीब अपनी फसलों पर आजमाई तो यह बेहद कारगर साबित हुई। उसके बाद से तो मैंने दीमक को अपना दाेस्त ही बना लिया।

     सफेदा खरीदने की जरूरत नहीं, बस आप अपने खेतों में लगाइए

    सीकर जिले के दांतारामगढ़ गांव की महिला किसान भगवती देवी कहती हैं, फसलों को नुकसान पहुंचाने में दीमक सबसे आगे होती हैं। यह कीड़ा किसी भी मौसम, नमी, सूखा, गर्मी, सर्दी या किसी भी परिस्थिति में लग जाता है। इससे फसलें बर्बाद हो जाती हैं। मगर, सफेदे की लकड़ी से किसान के हर साल हजारों रुपए बच सकते हैं। न प्रदूषण का झंझट, न उर्वरता का खतरा। सफेदा खरीदने की भी जरूरत नहीं है। बस, आप अपने खेत में यूकेलिप्टस के एक-दो पेड़ लगा लें और दीमक से मुक्ति पाएं। सफेदे की ये लकड़ियां ही दीमक को ललचाएंगी। भगवती देवी के खेत में खेजड़ी, बबूल, बेर, अरड़ू, शीशम, सफेदा और नीम के वृक्ष मुख्य रूप से लगे हुए हैं। इसके अलावा भी कुछ अन्य प्रजातियों के पेड़ पौधे हैं। इन पेड़ों की लकड़ियां हर साल खेत में सफाई के दौरान खेत के चारों ओर बनी सीमा पर डाल दी जाती हैं।

    पहला प्रयोग 2004 में आजमाया, दीमक भी केंचुए की तरह ही जमीन के लिए कारगर

    भगवती देवी बताती हैं कि मैंने अपना पहला प्रयोग 2004 में किया। अपनी तरकीब को मैंने गेहूं के खेत में आजमाया, जाे कामयाब रहा। 3 फीट की सफेदे की लकड़ी गेहूं की दो कतारों के बीच इस तरह जमीन में गाड़ा कि उसका आधा हिस्सा जमीन में रहे। बाद में देखा तो गेहूं की फसल में दीमक नहीं लगी। सारे दीमक सफेदे की लकड़ी चूसने में लगी हुई थीं। वहीं, सफेदे की लकड़ी के नीचे जहां दीमक थे, उसके पास के दाने ज्यादा अच्छे और चमकदार निकले। इससे यह भी पता चला कि दीमक भी केंचुए की तरह ही मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। फिर तो मैंने बाकी खेतों में भी यही तरकीब अपनाई। यह बात इतनी तेजी से इलाके में फैली कि लोग हमारे खेतों को देखने दूर-दूर से आने लगे।


    मेरी तरकीब को बीकानेर के विश्वविद्यालय ने जांचा-परखा, तब दी मान्यता

    भगवती देवी कहती हैं कि मेरी इस तरकीब के बारे में जब कृषि वैज्ञानिकों को पता चली तो हकीकत जानने के लिए राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (बीकानेर) के कृषि अनुसंधान निदेशक डॉ. एमपी साहू भगवती देवी के खेतों पर पहुंच गए। उस वक्त मेरे खेत में मिर्च की फसल लगी हुई थी। मैंने उन्हें अपना प्रयोग दिखाया। सफेदे की लकड़ी फसल के बीच रखकर अपना प्रयोग डॉ साहू को दिखा दिया। उसके बाद डॉ साहू के निर्देशन में मेरी तकनीक का पुनः शेखावटी कृषि अनुसंधान केंद्र पर किया गया। जब वहां भी प्रयोग सफल रहा तो मेरे प्रयोग को मान्यता मिल गई।

    पति का मिला कदम-कदम पर साथ, कुछ नहीं समझ आता तो बड़े प्यार से बताते

    भगवती देवी बताती है कि मैं तो अंगूठाछाप हूं। जब मैं पति के घर आई तो मैंने देखा कि मेरे पति दिन-रात किसानी में लगे रहते हैं और नई-नई तरकीब आजमाते रहते हैं। उनकी यह कोशिश देख मैं भी उनके साथ खेती-किसानी में जुट गई। मेरे पति को बीते साल कृषि में उनके नए-नए प्रयोगों के लिए पद्मश्री से नवाजा गया। उनके द्वारा एक लीटर पानी से एक पौधा उगाने की तकनीक को देश-दुनिया में पहचान मिली है। वह भी मेरा कदम-कदम पर साथ दे रहे हैं और इस तकनीक को देश के बाकी किसानों तक पहुंचाने की कोशिश में जुटे है। मुझे जब कुछ भी नहीं समझ आता था तो वह मुझे प्यार से विज्ञान की बारीकियों के बारे में बताते।


    बचपन में तंगहाली के चलते नहीं कर सकी पढ़ाई, आज महिलाओं को देती हूं ट्रेनिंग

    भगवती देवी कहती है कि सीकर जिले के गोवटी गांव में टेडूरामजी के यहां 1952 में मेरा जन्म हुआ। मेरे पिता पहाड़ी के मकानों में छत के लिए काम आने वाली पट्टियां निकालते और मां मूलीदेवी के साथ हम पांच भाई और दो बहनें खेत में काम करतीं। 1971 में मेरी शादी दांता निवासी सुंडाराम वर्मा से हुई। मेरे पति ने बीएससी की पढ़ाई की थी। मैं पढ़ी तो नहीं थी, मगर उनकी पढ़ाई-लिखाई मेरे काम आई। मैंने पढ़ाई नहीं की, मगर चाहत बहुत थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से मैं पढ़ नहीं पाई। मगर, पति की वजह से अब यह मलाल नहीं रहा। अब तो मैं दूसरों को कीटनाशकों के छिड़काव से बचने की ट्रेनिंग देती हूं। महिलाओं को नए-नए प्रयोगों के लिए उनका उत्साह बढ़ाती हूं। आज हमारी स्वाभिमान नाम की एक संस्था है, जो आसपास की महिला-पुरुष किसानों को प्रेरित करने का काम करती है। यह संस्था उन्नत बीजों और खेती के नए तौर-तरीकों और कीटनाशकों के नुकसान के बारे में किसानों को जागरूक कर रही है।

    ज्यादा कीटनाशक के इस्तेमाल से जमीन हो जाती है जहरीली

    भगवती देवी कहती हैं, अगर किसी फसल पर कीटों का प्रकोप होता है तो एक हेक्टेयर में 1 लीटर कीटनाशक का छिड़काव किया जाता है। वहीं, दीमक का प्रकोप होता है तब 1 हेक्टेयर खेत में साल भर में 10 लीटर कीटनाशक का छिड़काव करना पड़ता है। इतने कीटनाशक से जमीन खराब और जहरीली हो जाती है। वहीं, सफेदे की लकड़ी का इस्तेमाल सस्ता और सुरक्षित भी है।

    बारिश का पानी बर्बाद न हो, इसके लिए भी खोज निकाला नया तरीका

    पूरे राजस्थान में पानी की किल्लत रहती है। इसे देखते हुए वॉटर हॉर्वेस्टिंग भी भगवती देवी ने अनूठे तरीके से की है। भगवती देवी ने बरसात के पानी की बर्बादी को रोकने के लिए खेतों में पॉलीथिन बिछा दी, जिससे होकर पानी एक बड़े गड्‌ढे में ठहर जाता है। यह पानी साल भर फसलों की सिंचाई के काम आता है।

     

    शरद पवार ने खेतों के वैज्ञानिक सम्मान से नवाजा था

    मेरे इस काम के लिए 2011 में उस समय के केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान से नवाजा था। इसके अलावा राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर और मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी, जोधपुर की ओर से भी ‛खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान मिला है। दिल्ली में ‛महिंद्रा समृद्धि इंडिया एग्री अवार्ड्स’ में ‛कृषि प्रेरणा सम्मान’ (उत्तरी ग्रामीण क्षेत्र) के लिए भी मुझे 2013 में 50,000 रुपए का पुरस्कार मिल चुका है। भगवती देवी के दो बेटे और 5 बेटियां हैं। सभी की शादियां हो चुकी हैं।

    भगवती देवी का कहना है कि मैं बिना किसी कीटनाशक के दीमक को काबू करना चाहती थी। मैंने अपने अनुभव को दूसरी फसलों पर भी आजमाया। मुझे इस बात की भी खुशी है कि मैंने अनाज के अलावा दलहनी एवं तिलहनी फसलों और सब्जियों में भी इस प्रयोग को किया और हर बार जीत मिली। इस सफलता से मेरा हौसला कुछ नया करने को बढ़ता गया।

     

     

     

     

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