August 03, 2026
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    डूबते खातों और बैंकों को उबारने की बढ़ती चुनौती

    • rounak group

    नजरिया / शौर्यपथ / वैसे तो कोरोना से सभी क्षेत्रों का बुरा हाल है, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र का हाल आगामी महीनों में सबसे बुरा होने वाला है। इसकी पुष्टि बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक से तीन लाख करोड़ रुपये के कर्ज खातों को पुनर्गठित (रिस्ट्रक्चरिंग) करने की मांग से होती है। मोटे तौर पर ये कर्ज होटल, विमानन और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुडे़ हैं। इन क्षेत्रों को कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। इनके ऋण खातों को पुनर्गठित करने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि इसके बाद कंपनियों को अनेक तरह से राहत दी जाती है। कुछ समय के लिए पुनर्गठित खाते गैर-निष्पादित आस्ति (एनपीए) होने से बच जाते हैं और कंपनियों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका मिल जाता है। दरअसल, कंपनी के दिवालिया होने पर बैंक जितनी वसूली कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक पैसे उन्हें ऋण खातों के पुनर्गठन से मिलने की उम्मीद होती है।
    अप्रैल 2020 के अंत तक होटल क्षेत्र पर बैंकों के 45,862 करोड़ रुपये, विमानन क्षेत्र पर 30,000 करोड़ रुपये और रियल एस्टेट क्षेत्र पर 2.3 लाख करोड़ रुपये बकाया थे। इन क्षेत्रों को उबरने में छह महीने से भी ज्यादा समय लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, खस्ता हाल विमानन क्षेत्र को अपना अस्तित्व बचाने के लिए आगामी तीन साल में लगभग 35,000 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। आज कई होटल कर्ज में हैं। व्यावसायिक रियल एस्टेट और किराए के कारोबार में भी 25 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट के कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में, इन क्षेत्रों से जुड़े ऋण खातों का पुनर्गठन और जरूरी हो जाता है।
    ध्यान रहे, भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को खुदरा ऋणों की किस्त और ब्याज को सिर्फ टालने का निर्देश दिया है, माफ करने का नहीं। अगर कर्जदार मोराटोरियम का फायदा लेना चाहते हैं, तो उन्हें बाद में किस्त व ब्याज, दोनों चुकाने होंगे। अनुमान है कि मोराटोरियम अवधि समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में कार, गृह व व्यक्तिगत ऋण एनपीए में तब्दील हो सकते हैं। ऐसे में, एनपीए से उपजी समस्याओं के निवारण के लिए सरकार को बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की जरूरत पड़ेगी। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का भी कहना है कि बैंकों का पुनर्पूंजीकरण समय की मांग है। बैंकों का हालिया विलय भी इस बीमारी के इलाज में असमर्थ है।
    भारतीय स्टेट बैंक, केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक व बैंक ऑफ बड़ौदा पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। स्टेट बैंक को 20,000 करोड़ रुपये तक पूंजी जुटाने की मंजूरी मिली है और पंजाब नेशनल बैंक 7,000 करोड़ रुपये तक की पूंजी जुटाने के लिए शेयरधारकों से मंजूरी लेने वाला है। इनके अलावा, दूसरे बैंक पूंजी के लिए सरकार पर निर्भर हैं। वैसे अभी तक पुनर्पूंजीकरण के बहुत अच्छे नतीजे नहीं निकले हैं। सरकार ने संचयी तौर पर वित्त वर्ष 2015 से वित्त वर्ष 2020 के दौरान बैंकों में लगभग 43 अरब डॉलर की पूंजी डाली है, लेकिन बैंकों के पूंजी आधार में सुधार नहीं हो पाया, क्योंकि बैंकों का नुकसान निवेशित पूंजी से दो-तीन गुना ज्यादा था। बैंकों में डाली गई पूंजी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पिछले दो साल में डाला गया है।
    बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यह क्षेत्र एनपीए की समस्या से जूझ रहा है। दिसंबर 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट में कहा गया था कि सितंबर 2020 तक भारतीय अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का एनपीए कुल कर्ज के 9.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच सकता है। सितंबर 2020 में 53 देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी कम हो जाएगी। बैंकों का मुनाफा कम होगा, जिससे उन्हें ऋण देने में परेशानी होगी। सभी क्षेत्रों को खोलने के बाद उद्योगों को वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ेगी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है, जिसकी एक बड़ी राशि जरूरतमंदों को ऋण के रूप में दी जानी है। ऐसे में, अगर बैंकों को पूंजी की समस्या का सामना करना पड़ा, तो अर्थव्यवस्था में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। अत: मौजूदा स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक को कॉरपोरेट और खुदरा ऋणों को डूबने से बचाने के हरसंभव उपाय करने होंगे। साथ ही, सबसे जरूरी यह है कि जो लोग और कंपनियां सक्षम हैं, वे अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऋण चुकाएं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)सतीश सिंह , मुख्य प्रबंधक, आर्थिक अनुसंधान, एसबीआई

     

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