August 03, 2026
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    भगवान शिव का शंख से जलाभिषेक करना है निषिद्ध, ये है इसके पीछे की कहानी

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    धर्म संसार / शौर्यपथ / दैत्यराज दंभ संतानहीन थे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कठिन तप कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। श्रीहरि ने दंभ से वरदान मांगने को कहा। दंभ ने मांगा— प्रभु! मुझे अपने समान तेजस्वी और बलवान पुत्र का वरदान दीजिए, जो तीनों लोकों में अजेय और महापराक्रमी हो। नारायण के आशीर्वाद से दंभ के यहां एक बलशाली पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया शंखचूड़। आरंभ में शंखचूड़ बहुत धर्मवान था। उसने पुष्कर में जाकर घोर तप किया। ब्रह्माजी उसके तप से प्रसन्न हुए। ब्रह्मा ने वर मांगने को कहा। शंखचूड ने ब्रह्मदेव से वर मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने शंखचूड़ को इच्छित वरदान के साथ-साथ नारायण कवच भी प्रदान किया।

    शंखचूड़ का विवाह धर्मध्वज की परम तेजस्वी और साध्वी कन्या तुलसी से हुआ। शंखचूड का जन्म श्रीहरि के आशीर्वाद से हुआ था। ब्रह्मा से उसने वरदान लिया था। यह सोचकर शंखचूड़ में अभिमान आ गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर देवता भगवान विष्णु की शरण में गए। श्रीहरि ने कहा- मैंने स्वयं दंभ को अपने समान परम बलशाली पुत्र का वरदान दिया है। इसलिए शंखचूड़ के अत्याचारों से महादेव ही मुक्ति दिला सकते हैं। देवताओं ने महादेव को जाकर अपना कष्ट सुनाया। महादेव देवताओं के दुख दूर करने को तैयार हो गए। महादेव व शंखचूड़ के बीच घोर युद्ध आरंभ हुआ। शंखचूड़ के पास नारायण कवच था। इसके साथ-साथ उसकी पत्नी वृंदा ने, जिनका नाम तुलसी भी है, पतिव्रत धर्म के प्रभाव से शंखचूड़ को एक अभेद्य कवच से युक्त कर दिया था। इस कारण महादेव उसका वध नहीं कर पा रहे थे।

    देवताओं ने श्रीहरि से शंखचूड़ के वध की राह निकालने की प्रार्थना की। शंखचूड़ बड़ा दानी भी था। वह प्रतिदिन दान किया करता था। श्रीविष्णु ब्राह्मण रूप बनाकर शंखचूड़ के पास गए और नारायण कवच दान में ले लिया। उसके बाद श्रीहरि ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और तुलसी के पास गए। अनेक वर्ष के बाद पति को लौटा देख तुलसी प्रसन्न हुईं और पत्नी समान आचरण किया। तुलसी का पतिव्रत खंडित हो गया। इसके खंडित होते ही कवच भंग हो गया। महादेव ने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया। कहते हैं कि त्रिशूल के प्रहार से नारायण के समान बलशाली शंखचूड़ की हड्डियां चूूर हुईं, तो उससे शंख बना।
    चतुर्भुज नारायण अपने एक हाथ में शंख धारण करते हैं। इसलिए श्रीहरि एवं अन्य देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है, परंतु महादेव ने उसका वध किया था, इसलिए उनका शंख से जलाभिषेक करना निषिद्ध है। गजानन भी शिवपुत्र हैं, इसलिए उन्हें भी शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता।

     

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