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April 05, 2026
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बच्चों की लर्निंग डिसेबिलिटी से जुड़ा हुआ है डिस्लेक्सिया, ये हैं लक्षण और सुझाव

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 टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /डिस्लेक्सिया के बारे में हम सभी ने कभी न कभी किसी से, कहीं कुछ पढ़ा या सुना होगा। शायद आपके परिवार में, पड़ोस में या रिश्तेदारी में कोई इस बीमारी से पीड़ित हो, लेकिन यह भी सच है कि आपको इस बीमारी के बारे में ज्यादा पता नहीं होगा।  ऐसा भी हो सकता है कि हममें से ज्यादातर लोगों को डिस्लेक्सिया के बारे में ज्यादा नहीं पता होता है। जानकारी की इसी कमी के कारण जब कोई हमें डिस्लेक्सिया से पीड़ित दिखता है तो हम उसे कम बुद्धि वाला व्यक्ति, बेवकूफ या मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति मान लेते हैं। हालांकि इसमें से कुछ भी सच नहीं है। डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों को अगर सही सहयोग और मदद दी जाए तो वे अपने करियर में भी बहुत तरक्की कर सकते हैं।
क्या है डिस्लेक्सिया-
डिस्लेक्सिया सीखने समझने में होने वाली कठिनाई है जो पढ़ने में दिक्कत, लिखने और वर्तनी की समस्याओं का कारण बनती है। यह बुद्धि को प्रभावित नहीं करता है। लेकिन, बच्चे सीधे अक्षर को उल्टा लिखते हैं, जो एक तरह की लर्निंग डिसेबिलिटी है।
डॉ. ज्योति कपूर, (फाउंडर और सीनियर साइकेट्रिस्ट- मन:स्थली वेलनेस) के अनुसार डिस्लेक्सिया बोलचाल और सीखने से सम्बंधित एक बीमारी है, इससे बच्चे किसी चीज का उच्चारण करने में, पढ़ने में, लिखने में और सामने अक्षरों को देखकर सीखने और शब्दों को बोलने में परेशानी महसूस करते हैं। दरअसल इस बीमारी से पीड़ित बच्चे को उन अक्षरों और शब्दों की ध्वनि को किसी पुस्तक, ब्लैकबोर्ड या डिजिटल सतह पर लिखा हुआ देख कर खुद समझने में समस्या होती है।
डिस्लेक्सिया के लक्षण-
-स्पेलिंग को पढ़ने में दिक्कत
-राइमिंग सीखने या उसका खेल खेलने में मुश्किल
-समस्याओं को हल करने, चीजों को याद रखने या समझने में दिक्कत जो वो सुनते है
-शब्दों या अक्षरों में समानता और अंतर करने में कठिनाई
-एक विदेशी भाषा सीखने में कठिनाई
-पढ़ाई में अच्छा परफॉर्म न कर पाना
-सुनाई देने पर भी बातों को समझने में देरी होना
-सवालों के जवाब देते समय सही शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर पाना
-एक जैसे शब्दों या पर्यावाची शब्दों में फर्क नहीं बता पाना
-नए शब्दों को बोलने व सीखने में दिक्कत आना
-पढ़ने वाली गतिविधियों से परहेज करना
डिस्लेक्सिया  के लिए जिम्मेदार कारण-
डिस्लेक्सिया  का कारण पर्सनल इंटेलिजेंस या बुद्धिमत्ता नहीं है। इसका संबंध कुछ ऐसे जीन्स से है जो मस्तिष्क के विकास को नियंत्रित करते हैं। यह एक विरासत में मिली हुई स्थिति है जो ब्रेन की अक्षरों और शब्दों को समझने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
डिस्लेक्सिया का मतलब कम बुद्धि वाला होना नहीं है-
यहां यह जान लेना जरूरी है कि डिस्लेक्सिया का मतलब कम बुद्धि से नही होता है। इसके विपरीत डिस्लेक्सिया और शब्दों के माध्यम से जानकारी को सोचने और प्रोसेस करने में असमर्थ रहने वाले डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे विज्युवल इमेजरी और स्टोरीटेलिंग फ़ॉर्मेट का उपयोग करके बहुत मजबूत विज्युवल इन्फोर्मेशन प्रोसेसिंग स्किल विकसित कर सकते हैं। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो डिस्लेक्सिया से जो बच्चे पीड़ित होते हैं अगर उनको सही सलाह और मदद दी जाए तो उनकी रचनात्मक सोच एक अलग स्तर तक पहुंच सकती है। इसके लिए बस उन्हें सही से प्रोत्साहन मिलना चाहिए। उन्हें उनके कामों में मदद करनी चाहिए। घर और स्कूल दोनों जगहों पर एक खुशनुमा, और अनुकूल भावनात्मक वातावरण प्रदान किया जाना चाहिए इससे उनके सोचने की क्षमता काफी मदद हो सकती है।
डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों को माता-पिता और शिक्षक कैसे करें डील-
अगर बच्चा डिस्लेक्सिया से पीड़ित है और इसका पता जल्दी चल जाए तो काफी मदद मिल सकती है। माता-पिता और शिक्षकों को सबसे पहले से इस बीमारी के बारे में अच्छे से रिसर्च करनी चाहिए और इसे अच्छे से समझना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि डिस्लेक्सिया कोई मानसिक बीमारी या साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर नहीं है। यह सीखने से सम्बंधित समस्या है जिसे ठीक किया जा सकता है, सुधार किया जा सकता है और इसे बच्चे के लिए एक एडवांटेज के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि बच्चे के डिस्लेक्सिया से पीड़ित होने पर जितना जल्दी हो सके लक्षणों की पहचान जल्दी कर लेनी चाहिए और इसके निवारण के लिए बेहतर तरीके से रणनीति बनानी चाहिए। डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों के माता-पिता को ध्यान रखनी चाहिए ये बातें-
चूंकि बच्चे घर के अलावा स्कूल में सबसे ज्यादा समय बिताते हैं इसलिए माता-पिता को बच्चों के शिक्षकों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखना चाहिए और बच्चे की गतिविधि और परेशानी की सारी जानकारी रखनी चाहिए। डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे के लिए विशेष रूप से योजना बनाने से उनके सीखने के तरीके में सुधार किया जा सकता है। माता-पिता को बच्चों के साथ बात करनी चाहिए, उनके साथ रीडिंग करनी चाहिए और उनसे मौखिक रूप से बात करनी चाहिए ताकि उनके शब्दों के समझने की ताकत मजबूत हो सके और भाषा में तथा शब्दकोश में भी सुधार हो सके। अगर बच्चों के साथ रीडिंग ऊंची आवाज में की जाए और बार-बार इसका अभ्यास किया जाए तो इससे बच्चे को मदद मिल सकती है। हर बच्चे में कुछ न कुछ स्पेशल टैलेंट होता है, अगर इस बात को माता-पिता समझते हैं तो वे बच्चे के उस विशेष गुण की पहचान कर सकते हैं और उसमे सकारात्मक सोच और सम्मान के साथ आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि यह ध्यान रखना चाहिए कि माता-पिता को अपने बच्चे का होमवर्क या सवाल खुद से हल नहीं करना चाहिए। बल्कि उन्हें कुछ हिंट और क्लू देने से वे अपने दिमाग का इस्तेमाल करके सवालों को हल करने में सक्षम हो सकते हैं। डिस्लेक्सिया का सम्पूर्ण समाधान करने के बजाय बच्चे की सोच में लगातार वृद्धि बहुत जरूरी होती है, इससे बच्चे को बीमारी से उबरने में काफी मदद मिलती है।
संक्षेप में कहा जाए तो बच्चे के माता-पिता और शिक्षक डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे की सीखने की क्षमता में सुधार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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