November 08, 2026
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    प्रशासनिक दायित्वों के बीच साहित्य की दुनिया में हार्दिक श्रीवास्तव की दस्तक

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    रायपुर के तहसीलदार का पहला अंग्रेजी उपन्यास ‘द मैन हू वाउंड द क्लॉक’ प्रकाशित, टाइम-लूप और मनोवैज्ञानिक रहस्य पर आधारित थ्रिलर अमेज़न इंडिया पर उपलब्ध

    रायपुर / शौर्यपथ। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच साहित्य के लिए समय निकालते हुए छत्तीसगढ़ शासन में तहसीलदार के पद पर कार्यरत रायपुर निवासी हार्दिक श्रीवास्तव ने लेखन की दुनिया में अपनी पहली पुस्तक के साथ कदम रखा है। उनका पहला अंग्रेजी उपन्यास ‘द मैन हू वाउंड द क्लॉक’ (The Man Who Wound the Clock) प्रकाशित हो चुका है। टाइम-लूप और मनोवैज्ञानिक रहस्य की रोमांचक पृष्ठभूमि पर रचा गया यह उपन्यास पेपरबैक संस्करण में अमेज़न इंडिया पर पाठकों के लिए उपलब्ध है। विशेष बात यह है कि इस पुस्तक की पूरी रचना छत्तीसगढ़ में रहते हुए की गई है और इसका स्वतंत्र रूप से प्रकाशन किया गया है।

    एक पार्किंग रसीद, भविष्य की तारीख और मौत का तय समय!

    उपन्यास की कहानी का केंद्र एक ऐसी रहस्यमयी घटना है, जो पाठक को शुरुआत से ही जिज्ञासा और रोमांच के संसार में ले जाती है। कहानी का नायक अर्जुन देशमुख एक ऐसा व्यक्ति है, जो अपने जीवन की हर गतिविधि को नियंत्रित रखने में विश्वास करता है। दरवाजे पर दो ताले, सप्ताह के प्रत्येक दिन के लिए निर्धारित कमीज और अपने हर दुःस्वप्न का हिसाब रखने वाला चार्ट उसकी व्यवस्थित दिनचर्या का हिस्सा हैं। उसके लिए जीवन में संयोग की कोई जगह नहीं है।

    लेकिन मुंबई के दादर की एक सामान्य शाम उसकी जिंदगी को पूरी तरह बदल देती है। एक कार पार्किंग में आंखें बंद करने के बाद जब वह खुद को एक अनजान पार्किंग स्थल पर पाता है, तो उसके हाथ में मौजूद एक पार्किंग रसीद उसके होश उड़ा देती है। रसीद पर एक महीने आगे की तारीख और रात 21:47 बजे का समय दर्ज है। यही वह समय है, जिसे उसकी मृत्यु का समय बताया गया है। अब अर्जुन के पास अपनी नियति को बदलने के लिए केवल तीस दिन शेष हैं।

    मुंबई की पृष्ठभूमि में बुना गया मनोवैज्ञानिक रहस्य

    बारिश से भीगी मुंबई, फूलों के ठेले, पार्किंग अटेंडेंट और हाउसिंग सोसाइटियों के बीच आगे बढ़ती कहानी में घटनाएं बार-बार समय के एक ही चक्र में लौटती हैं। उपन्यास केवल एक रहस्यमयी घटना का वर्णन नहीं करता, बल्कि मानव मन, भय, नियंत्रण और नियति के बीच चलने वाले संघर्ष को भी सामने रखता है।

    लेखक ने कहानी के माध्यम से यह सवाल उठाया है कि आखिर इंसान अपने जीवन को किस हद तक नियंत्रित कर सकता है और हर चीज को अपने अनुसार चलाने की कोशिश की क्या कीमत चुकानी पड़ती है।

    पुस्तक की टैगलाइन भी इसकी रहस्यमयी विषयवस्तु को रेखांकित करती है— “जो पहले से इंतज़ार कर रहा है, उससे भागा नहीं जा सकता।”

    लेखन के पीछे जीवन को देखने का नजरिया

    अपने पहले उपन्यास की रचना के बारे में हार्दिक श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होंने यह पुस्तक उस अनुभव से प्रेरित होकर लिखी, जिसे वे अपने आसपास के लोगों और स्वयं के जीवन में बार-बार महसूस करते रहे हैं। उनके अनुसार, मनुष्य अपना पूरा जीवन चीजों को व्यवस्थित रखने, भविष्य की योजनाएं बनाने और परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में रखने में लगा देता है, लेकिन कई बार जितना अधिक वह किसी चीज को कसकर पकड़ने की कोशिश करता है, वह उतनी ही तेजी से उसके हाथों से फिसलती जाती है।

    वे एक ऐसे पात्र की कहानी लिखना चाहते थे, जिसे अपनी जिंदगी का एक दिन दोबारा जीने का अवसर मिलता है, लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि इस अवसर की भी एक कीमत है। इसी विचार ने टाइम-लूप और मनोवैज्ञानिक रहस्य से जुड़ी इस कहानी का स्वरूप लिया।

    प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच लेखन को बनाया अभिव्यक्ति का माध्यम

    हार्दिक श्रीवास्तव वर्तमान में रायपुर में छत्तीसगढ़ शासन के अंतर्गत तहसीलदार के पद पर कार्यरत हैं। प्रशासनिक दायित्वों और व्यस्त दिनचर्या के बीच उन्होंने सुबह-सवेरे और देर शाम मिलने वाले समय का उपयोग अपने साहित्यिक विचारों को शब्द देने में किया।

    उनका मानना है कि लेखन केवल रचनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि स्वयं को अभिव्यक्त करने और अपने विचारों की सीमाओं से मुक्त होने का एक माध्यम है। वे चाहते हैं कि उनकी पुस्तक पाठकों के मन में केवल पढ़ने तक सीमित न रहे, बल्कि पुस्तक समाप्त होने के बाद भी उसके विचार और सवाल लंबे समय तक उनके साथ बने रहें।

    पहले उपन्यास के प्रकाशन के साथ हार्दिक श्रीवास्तव ने साहित्यिक क्षेत्र में अपनी नई यात्रा शुरू की है। वे भविष्य में भी पुस्तक लेखन जारी रखने की तैयारी में हैं। प्रशासनिक सेवा के साथ साहित्यिक अभिरुचि को आगे बढ़ाने का उनका यह प्रयास छत्तीसगढ़ में रचनात्मक लेखन की एक नई संभावनापूर्ण तस्वीर भी प्रस्तुत करता है।

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