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धर्म संसार /शौर्यपथ /गंगा नदी की महिमा का वर्णन पुराणों में मिलता है। गंगा नदी को भारत की सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इसकी पवित्रता तब और बढ़ जाती है जबकि कुंभ पर्व आता है। पुराणों में गंगा को
तीन स्थानों पर उसे दुर्लभ कहा गया है। दुर्लभ का अर्थ है कि तीन तीर्थों में गंगा बड़े भाग्य से मिलती है। ये तीन स्थान हैं, हरिद्वार, प्रयाग और गंगा सागर।
पुराणों के अनुसार तीर्थराज प्रयाग में सभी तीर्थ निवास करते हैं। खासतौर से माघ महीने में उन्हें अपने राजा के पास आना पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-
देव, दनुज, किन्नर नर श्रेनी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिवेणी॥
त्रिवेणी के पवित्र जल में स्नान करके देवता भी धन्य हो जाते हैं। अर्धकुंभ और कुंभ योग की पुण्यगरिमा ऐसी है, जिससे प्रभावित होकर सभी देवताओं को तीर्थराज प्रयाग में आना पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-
माघ मकरगति जब रवि होई।
तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
यह अंतरसम्बन्ध बहुदेववादी हिन्दू तीर्थों का संस्कृति में एकता का परिचायक है। विविधता में एकता का यह अनूठा सांस्कृतिक उदाहरण है।
गौतमी गंगा : इन तीन तीर्थों का अंतरसंबन्ध गंगा की पुण्यगरिमा से प्रमाणित होता है। त्र्यंबकेश्वर तीर्थ (नासिक) कुंभ पर्व का केन्द्र है। यह गोदावरी के तट पर स्थित है। पवित्र गोदावरी का दूसरा नाम गौतमी गंगा है। पुराण के अनुसार, महर्षि गौतम ने सूखे से पीड़ित प्राणियों की जीवन रक्षा के लिए कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वरदान मांगने को कहा।
सभी प्राणियों के कष्ट दूर करने को आतुर ऋषि ने यह वरदान मांगा कि गंगा, स्वयं उनके तपोवन में आए। वे अपनी धारा से इस क्षेत्र के सभी प्राणियों को धन-धान्य और सुख-सम्पदा का वरदान दें। गौतम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा को उस क्षेत्र में प्रकट होना पड़ा, इसीलिए उन्हें गौतमी गंगा नाम दिया गया।
माघ पूर्णिमा के दिन करें ये 3 कार्य, मिट जाएंगे सभी संकट
माघ माह में हरिद्वार कुंभ मेला चल रहा है। हिन्दू पंचांग के चंद्रमास के अनुसार वर्ष का ग्यारहवां महीना है माघ। पुराणों में माघ मास के महात्म्य का वर्णन मिलता है। पुराणों के अनुसार माघ माह में पूर्णिमा के दिन निम्नलिखित 5 कार्य करने से आपके जीवन के सभी तरह के संकट मिट जाते हैं और हर तरह का सुख मिलता है।
1. स्नान : माघ मास या माघ पूर्णिमा को संगम में स्नान का बहुत महत्व है। संगम नहीं तो गंगा, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा, कृष्णा, क्षिप्रा, सिंधु, सरस्वती, ब्रह्मपुत्र आदि पवित्र नदियों में स्नान करना चाहिए।
प्रयागे माघमासे तुत्र्यहं स्नानस्य यद्रवेत्।
दशाश्वमेघसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि।।
प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल होता है वह फल पृथ्वी में दस हजार अश्वमेघ यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता है।
2. दान : माघ मास में दान करने का बहुत महत्व है। वेदों में तीन प्रकार के दान हैं- 1. उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्ट माना गया है। पुराणों में अनोकों दानों का उल्लेख मिलता है जिसमें अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्य भी है।
दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। मृत्यु आए इससे पूर्व सारी गांठे खोलना जरूरी है, जो जीवन की आपाधापी के चलते बंध गई है। दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेद और पुराणों में दान के महत्व का वर्णन किया गया है।
3. सत्संग : माघ माह में मंदिरों, आश्रमों, नदी के तट पर सत्संग, प्रवचन के साथ माघ महात्म्य तथा पुराण कथाओं का आयोजन होता है। आचार्य विद्वानों द्वारा धर्माचरण की शिक्षा देने वाले प्रसंगों को श्रोताओं के समक्ष रखा जा रहा है। कथा प्रसंगों के माध्यम से तन-मन की स्वस्थता बनाए रखने के लिए अनेक प्रसंग सुना जाता हैं। सत्संग से धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है। धर्म के ज्ञान से जीवन की बाधओं से मुकाबला करने का समाधान मिलता है।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
