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February 25, 2026
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“रिमोट किसी और के हाथ, बटन किसी और के दुर्ग कांग्रेस में असली अध्यक्ष कौन? Featured

  • devendra yadav birth day

कार्यकारिणी घोषित होते ही कार्यकर्ताओं में निराशा, गुटबाजी के संकेत तेज

दुर्ग।

दुर्ग शहर कांग्रेस की नई कार्यकारिणी की घोषणा के साथ ही संगठन के भीतर उम्मीदों की जगह निराशा की चर्चा तेज हो गई है। चार दशक तक दुर्ग कांग्रेस की कमान वोरा परिवार के प्रभाव में रही। लंबे अंतराल के बाद छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद के अनुरूप पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल को शहर अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब यह माना जा रहा था कि संगठन में नई ऊर्जा और सक्रियता का संचार होगा।

लेकिन अध्यक्ष पद संभालने के लगभग चार माह बाद भी कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि संगठन में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आ रहा।

वोरा बंगले से बाकलीवाल बंगले तक?

शहर में यह चर्चा आम है कि दुर्ग कांग्रेस की राजनीति केवल “चेहरों के बदलाव” तक सीमित रह गई है। पहले जो प्रभाव एक परिवार विशेष का माना जाता था, अब वही केंद्रीकरण दूसरे खेमे में सिमटता दिखाई दे रहा है। कार्यकारिणी की घोषणा के बाद यह धारणा और मजबूत हुई है कि निर्णय प्रक्रिया कुछ सीमित लोगों तक केंद्रित हो गई है।

कई कार्यकर्ता खुलकर तो नहीं, परंतु निजी बातचीत में यह कहने लगे हैं कि संगठन “रिमोट कंट्रोल” से संचालित होता प्रतीत हो रहा है।

गुटबाजी की आहट और सामाजिक संतुलन पर सवाल

नई कार्यकारिणी में कुछ अनुभवहीन चेहरों को प्रमुख जिम्मेदारी दिए जाने पर भी चर्चा गर्म है। वहीं सतनामी समाज, ताम्रकार समाज , बरई समाज और उड़िया समाज जैसे प्रभावी वर्गों की कथित अनदेखी को लेकर भी असंतोष सामने आ रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुर्ग जैसे सामाजिक रूप से विविध शहर में संतुलन साधना संगठनात्मक मजबूती की पहली शर्त होती है। यदि सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठते हैं, तो उसका असर चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

प्रवक्ताओं की निष्क्रियता भी चर्चा में

कांग्रेस संगठन में प्रवक्ताओं की भूमिका सरकार और निगम की नीतियों के खिलाफ मुखर विपक्ष तैयार करने की होती है। लेकिन वर्तमान संरचना में कुछ निष्क्रिय चेहरों को पुनः स्थान दिए जाने से यह संदेश जा रहा है कि संगठन आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने के मूड में नहीं है।

सोशल मीडिया और जनसंपर्क के दौर में यह कमी संगठन की राजनीतिक धार को कमजोर कर सकती है।

निगम में विपक्ष की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह

पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल की पसंद से बने नेता प्रतिपक्ष की सक्रियता को लेकर भी कार्यकर्ताओं में असंतोष है। नगर निगम की बदहाल व्यवस्थाओं, नागरिक समस्याओं और विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं के मुद्दों पर अपेक्षित आक्रामकता दिखाई नहीं दी।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जब विपक्ष जनता की आवाज नहीं बन पाता, तो संगठन की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर होती है।

क्या पूर्व मुख्यमंत्री के फैसले पर उठेंगे सवाल?

शहर अध्यक्ष की नियुक्ति पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद के अनुरूप मानी जाती रही है। ऐसे में अब संगठन के भीतर उठती आलोचनाओं को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि खुलकर कोई सामने नहीं आ रहा, परंतु यह संकेत मिल रहे हैं कि यदि स्थिति नहीं बदली तो असंतोष सार्वजनिक रूप ले सकता है।

आने वाले चुनाव की परीक्षा

नई कार्यकारिणी घोषित हो चुकी है। अब असली परीक्षा आने वाले चुनावों में होगी। क्या यह टीम अनुभवहीनता के आरोपों से ऊपर उठकर संगठन को नई दिशा दे पाएगी?

या फिर पद ग्रहण की औपचारिक खुशियों तक ही सीमित रह जाएगी?

दुर्ग कांग्रेस के भीतर उठते ये सवाल केवल संगठनात्मक फेरबदल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले चुनावी परिणामों की भूमिका भी लिख सकते हैं।

राजनीतिक संदेश स्पष्ट है —

यदि संगठन जमीनी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर, सामाजिक संतुलन साधते हुए और आक्रामक विपक्ष की भूमिका में नहीं आता, तो “चेहरे बदलने” से ज्यादा कुछ नहीं बदलेगा।

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