August 03, 2026
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    “दुर्ग की नाराज़गी, भिलाई की रणनीति: क्या अलका बाघमार का ‘रिपोर्ट कार्ड’ बिगाड़ेगा विजय बघेल की पसंद?” Featured

    • rounak group

    भिलाई/दुर्ग | विशेष राजनीतिक विश्लेषण

    भिलाई नगर निगम चुनाव में भले अभी लगभग छह महीने का समय शेष हो, लेकिन सियासी सरगर्मियां अभी से तेज हो गई हैं। आरक्षण के बाद महापौर पद के लिए पिछड़ा वर्ग से प्रत्याशी तय होना है, और इसी के साथ भारतीय जनता पार्टी के भीतर नामों की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। इन नामों में सबसे प्रमुख नाम महेश वर्मा का उभरकर सामने आ रहा है—जो वर्तमान में भिलाई नगर निगम के पार्षद हैं और लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण संगठन के भीतर एक मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।

    महेश वर्मा: अनुभव बनाम समीकरण

    महेश वर्मा का नाम केवल “सांसद विजय बघेल के करीबी” होने के कारण ही नहीं, बल्कि

    नगर निगम की राजनीति में सक्रिय भूमिका

    स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ

    संगठनात्मक अनुभव और कार्यकर्ताओं से जुड़ाव

    के चलते भी प्रमुखता से लिया जा रहा है।

    यही वजह है कि उन्हें एक ग्राउंडेड और अनुभवी चेहरा माना जा रहा है, जो महापौर पद की जिम्मेदारी संभालने में सक्षम हो सकते हैं।

    दुर्ग का ‘रिपोर्ट कार्ड’ बना सियासी मुद्दा

    प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद हुए नगरीय निकाय चुनाव में विजय बघेल की पसंद को प्राथमिकता मिली थी। लेकिन दुर्ग की महापौर अलका बाघमार की कार्यप्रणाली पिछले एक साल में कई विवादों में घिरी रही।

    मुख्य आरोपों में शामिल हैं:

    गरीबों के ठेले-गुमटी पर सख्ती, लेकिन अमीरों के अतिक्रमण पर नरमी

    गणेश मंदिर के सामने कथित अवैध निर्माण पर चुप्पी

    बस स्टैंड की जमीन पर अनुबंध समाप्ति के बाद भी कब्जा

    शनिवार बाजार और चौक-चौराहों पर लगातार बढ़ता अतिक्रमण

    सफाई व्यवस्था की बदहाली और पेयजल संकट

    इन मुद्दों पर ठोस कार्रवाई न होने से जनता ही नहीं, पार्टी के पार्षदों में भी असंतोष बढ़ा है।

    जब अपनी ही पार्टी ने उठाए सवाल

    हाल ही में सामान्य सभा में जो हुआ, उसने इस असंतोष को सार्वजनिक कर दिया।

    सभापति ने खुलकर कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए

    कई भाजपा पार्षदों ने इसे पार्टी की साख से जोड़ते हुए नाराज़गी जताई

    यह घटनाक्रम बताता है कि मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकट बन चुका है।

    भिलाई में प्रत्याशी चयन पर असर तय

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दुर्ग के अनुभव का असर भिलाई नगर निगम चुनाव में प्रत्याशी चयन पर पड़ेगा?

    राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि:

    संगठन इस बार सिर्फ “पसंद” नहीं, “परफॉर्मेंस” को भी तवज्जो देगा

    महेश वर्मा का नाम मजबूत जरूर है, लेकिन अंतिम निर्णय में कई अन्य समीकरण भी प्रभाव डालेंगे

    इसी बीच, वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन की धर्मपत्नी के भी दावेदारी पेश करने की चर्चाएं हैं, जिससे मुकाबला और रोचक हो सकता है।

    विजय बघेल की भूमिका पर नजर

    दुर्ग में महापौर चयन में अहम भूमिका निभाने वाले सांसद विजय बघेल की राय इस बार भी महत्वपूर्ण रहेगी।

    लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि

    “क्या इस बार उनकी पसंद को उतनी ही प्राथमिकता मिलेगी?”

    यदि संगठन महेश वर्मा के नाम को दरकिनार करता है, तो इसे सीधे तौर पर

    दुर्ग महापौर के प्रदर्शन और अंदरूनी नाराज़गी से जोड़कर देखा जाएगा।

    कांग्रेस नहीं, भाजपा में ज्यादा हलचल

    आम तौर पर चुनावी हलचल कांग्रेस में ज्यादा देखने को मिलती है, लेकिन इस बार स्थिति उलट दिख रही है।

    भाजपा के भीतर ही खींचतान, असंतोष और रणनीतिक मंथन तेज हो गया है।

    निष्कर्ष:

    भिलाई नगर निगम चुनाव अब सिर्फ एक स्थानीय चुनाव नहीं, बल्कि

    भाजपा के लिए “आंतरिक संतुलन और विश्वसनीयता” की परीक्षा बनता जा रहा है।

    आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि—

    ? पार्टी अनुभव और जमीनी पकड़ वाले चेहरों को आगे लाती है

    या

    ? फिर राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता देती है

    लेकिन इतना तय है कि

    दुर्ग की सियासत ने भिलाई की रणनीति को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।

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