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April 19, 2026
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दुर्ग कांग्रेस: ‘रिमोट कंट्रोल’ की राजनीति से ‘नयी रोशनी’ की ओर मज़बूत कदम

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दुर्ग। दुर्ग की राजनीति हमेशा से छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख केंद्र रही है। लेकिन पिछले चार दशकों से यहाँ कांग्रेस का संगठन एक ही 'परिवार' और 'रिमोट कंट्रोल' की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ निर्णय संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा नहीं, बल्कि एक खास दरबार में लिए जाते थे। परिणाम? जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोरी, निष्क्रिय कार्यकर्ता और जनता से दूरी।

धीरज बाकलीवाल: ‘जमीनी संगठन’ और ‘बूथ मज़बूती’ का नया दौर

लेकिन अब दुर्ग शहर कांग्रेस में एक 'नयी रोशनी' दिखाई दे रही है, जिसका श्रेय शहर अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल को जाता है। बाकलीवाल ने पुरानी परिपाटी को चुनौती देते हुए संगठन को फिर से सक्रिय करने का काम शुरू किया है। उनका स्पष्ट विश्वास है कि एक 'सशक्त बूथ ही सशक्त संगठन की आधारशिला' है।

संगठनात्मक कसावट: बाकलीवाल ने 5 ब्लॉक, 10 मंडल, 60 वार्ड और 275 बूथों पर संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने का अभियान चलाया है।

सक्रिय विपक्ष: वह केवल संगठनात्मक कार्यों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि जनता के मुद्दों को भी मजबूती से उठा रहे हैं। चाहे वो ई-चालान का मुद्दा हो या हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के छात्रों के भविष्य से जुड़ी लापरवाही, बाकलीवाल प्रशासन के सामने मजबूती से पक्ष रख रहे हैं।

सामाजिक सरोकार: धीरज बाकलीवाल सामाजिक रूप से भी जनता से जुड़ रहे हैं। तिरुपति से लौटे तीर्थयात्रियों का स्वागत और ऐसी अन्य गतिविधियाँ उन्हें जनता के करीब ला रही हैं।

अरुण वोरा की ‘गिरती साख’ और ‘गुटबाजी’ का घेरा

दूसरी ओर, पूर्व विधायक अरुण वोरा की कार्यशैली अब चर्चा का विषय बनी हुई है। उनके समय में संगठन के निर्णय एक ही दरबार से लिए जाते थे। पुराने जिला अध्यक्षों को तो संगठन की गतिविधियों की जानकारी तक नहीं होती थी; हर छोटे-बड़े सवाल का जवाब 'वोरा जी से पूछकर बताएंगे' में सिमट जाता था। जानकार मानते हैं कि पूर्व की राजनीति केवल चुनाव के समय कार्यकर्ताओं को याद करने और संगठन को अपनी मुट्ठी में रखने तक सीमित थी। यह 'एकल ध्रुवीय' व्यवस्था दुर्ग में कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका साबित हुई।

चुनौतियां अभी बाकी हैं: ‘मतलबपरस्त’ नेताओं और ‘चाटुकारों’ की फौज

यद्यपि यह 'नया उदय' सुखद है, लेकिन धीरज बाकलीवाल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। संगठन में अभी भी ऐसे नेताओं की फौज है जो केवल सत्ता के लाभ के लिए मंचों पर आसीन हो जाते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनकी कोई अहमियत नहीं है। चाटुकारों की यह फौज गुटबाजी को हवा देती है और संगठन के कार्यों में बाधा डालती है।

निष्कर्ष: ‘नयी रोशनी’ से ‘भविष्य की जीत’ की ओर

अगले 17-18 महीनों में चुनावी मोड शुरू हो जाएगा। बाकलीवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 'मतलबपरस्त' नेताओं से बचते हुए कर्मठ कार्यकर्ताओं की ऐसी टीम तैयार करना है, जो कांग्रेस की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचा सके। यदि धीरज बाकलीवाल इसी तरह संगठन और कार्यालय को आबाद रखने में सफल रहे, तो दुर्ग शहर कांग्रेस के लिए यह 'नया उदय' न केवल सुखद होगा, बल्कि भविष्य की जीत का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

यह राजनीतिक लेख दुर्ग कांग्रेस में चल रही इस बड़ी उथल-पुथल और 'नयी रोशनी' की शुरुआत को बयां करता है।

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