August 01, 2026
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    दिल्ली की दहलीज और सियासी हकीकत: जब 'अहंकार' ने छीन लिया 'मुख्यमंत्री' का ताज!

    • rounak group

      शौर्यपथ राजनीतिक लेख। भारतीय राजनीति के इतिहास में दिल्ली की सत्ता का मोह बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए 'मृगतृष्णा' साबित हुआ है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय क्षत्रपों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस को दरकिनार कर खुद को 'विकल्प' के रूप में पेश करने की कोशिश की, तब-तब वक्त ने उन्हें कड़ा सबक सिखाया।

    अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी—ये तीन ऐसे नाम थे, जिनके पास अपनी-अपनी सल्तनत थी, लेकिन दिल्ली की लालसा ने उनके सियासी भूगोल को ही बदल कर रख दिया।

    1. अरविंद केजरीवाल: 'सुपर सीएम' से 'जेल' और फिर कुर्सी गँवाने तक का सफर

    आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के विरोध से की थी। पंजाब में जीत के बाद उनका सपना प्रधानमंत्री बनने का था। उन्होंने खुद को कांग्रेस का एकमात्र विकल्प घोषित किया, लेकिन दिल्ली की सत्ता और संगठन पर पकड़ ढीली होती गई। अंततः, भ्रष्टाचार के आरोपों और कानूनी पेचीदगियों के बीच उन्हें अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस को 'अप्रासंगिक' बताने के चक्कर में वे खुद अपनी ही जमीन पर संघर्ष करते नजर आए।

    2. नीतीश कुमार: 'पलटूराम' की छवि और पीएम बनने की अधूरी हसरत

    बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में एक लंबी पारी खेलने वाले नीतीश कुमार ने जब 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन की नींव रखी, तो उनके मन में दिल्ली के सिंहासन की छवि स्पष्ट थी। वे खुद को विपक्ष का चेहरा बनाना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि कांग्रेस उन्हें वह तवज्जो नहीं दे रही, तो उन्होंने फिर पाला बदला। आज स्थिति यह है कि वे सत्ता में तो हैं, लेकिन उस 'मुख्यमंत्री' की हैसियत और स्वायत्तता को खो चुके हैं, जिसके लिए वे जाने जाते थे। दिल्ली की दौड़ ने उन्हें उनके ही गढ़ में कमजोर कर दिया।

    3. ममता बनर्जी: 'दीदी' का दिल्ली मिशन और थर्ड फ्रंट की नाकामी

    बंगाल फतह करने के बाद ममता बनर्जी का अगला लक्ष्य 'थर्ड फ्रंट' के जरिए दिल्ली की कुर्सी थी। उन्होंने 'एकला चलो' की नीति अपनाई और कांग्रेस को बंगाल सहित पूरे देश में चुनौती दी। उनका दावा था कि कांग्रेस अब लड़ नहीं सकती। लेकिन ममता की इस जिद ने न केवल विपक्षी एकता में दरार डाली, बल्कि बंगाल के भीतर भी उनके वर्चस्व को हिलाकर रख दिया।

    सियासत का कड़वा सच: कांग्रेस को नजरअंदाज करना भारी पड़ा

    इन तीनों नेताओं के राजनीतिक हश्र से कुछ बड़े सबक सामने आते हैं:

    अहंकार बनाम दूरदृष्टि: राजनीति में लोकप्रियता होना एक बात है, लेकिन देश की सबसे बड़ी पुरानी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और ऐतिहासिक उपस्थिति को नजरअंदाज करना एक रणनीतिक चूक है।

    वोटों का बिखराव: कांग्रेस का विरोध करके इन नेताओं ने विपक्षी वोटों को ही बांटा, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला।

    आईना दिखा गया वक्त: आज ये तीनों चेहरे अपनी पुरानी चमक खोते दिख रहे हैं। जो कांग्रेस को कमजोर मान रहे थे, आज वे खुद अपने राज्यों में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

    निष्कर्ष

    सत्ता का सपना देखना गलत नहीं है, लेकिन राजनीति में 'दूरदृष्टि' का होना अनिवार्य है। जो देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को मिट्टी में मिलाने की कोशिश करते हैं, वक्त अक्सर उन्हें ही आईना दिखा देता है। 2026 के मुहाने पर खड़ी राजनीति चीख-चीख कर कह रही है— "कांग्रेस को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।"

    #सियासत #कांग्रेस #राजनीति_की_सच्चाई #विपक्ष_का_भविष्य

    क्या आपको लगता है कि क्षेत्रीय दलों के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर चलना ही एकमात्र विकल्प बचा है?

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