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नई दिल्ली / एजेंसी / वंदे मातरम् के गायन और इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा। सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा की आवाज के कारण राष्ट्रीय गीत की कुछ या सभी पंक्तियां नहीं गाता है, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की।
2026 के संशोधन को दी गई है चुनौती
विवाद की प्रमुख वजह अगस्त 2026 में संसद से पारित ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026’ और इसके तहत जारी किए गए प्रावधान बताए जा रहे हैं। याचिका में आरोप है कि संशोधित कानून के जरिए वंदे मातरम् को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी संरक्षण दिया गया है।बताया गया है कि कानून में वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकने, उसमें बाधा डालने या उसका अपमान करने पर तीन वर्ष तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा गृह मंत्रालय के निर्देशों के तहत सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन का प्रावधान किए जाने को भी चुनौती दी गई है।
टी. एम. कृष्णा ने उठाए धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल
प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत गायक टी. एम. कृष्णा ने कानून और गृह मंत्रालय के संबंधित सर्कुलर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
याचिका में दलील दी गई है कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरों के बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक संदर्भ हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, सभी नागरिकों के लिए इसके पूर्ण गायन को अनिवार्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांत से संबंधित सवाल उठाता है।याचिका में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक मंचों पर वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों के गायन की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और अब सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने का प्रयास किया जा रहा है।
‘राष्ट्रीय गीत क्या है, यह तय करना सरकार का काम’
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय गीत क्या है और उससे जुड़ी भावनाओं का निर्धारण करना सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत ने इस मुद्दे को लेकर अपनी भूमिका और सीमाओं पर भी टिप्पणी की।
पीठ ने 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले का संदर्भ लिया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक आधार पर राष्ट्रगान नहीं गाने वाले छात्रों के मामले में कहा था कि यदि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते हैं, तो केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।सुनवाई के दौरान इसी सिद्धांत की प्रासंगिकता वंदे मातरम् के मामले में भी सामने आई।
केंद्र और याचिकाकर्ता के वकील के बीच बहस
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि देशभक्ति और राष्ट्रीय गीत के सम्मान के लिए कानूनी दबाव या एडवाइजरी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए तथा धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या अत्यधिक संकीर्ण तरीके से नहीं की जानी चाहिए।बहस के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ओर से ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर याचिकाकर्ता के वकील डॉ. एस. मुरलीधर ने आपत्ति जताई।अब केंद्र सरकार के जवाब दाखिल करने के बाद मामले की अगली सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
