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खेल / शौर्यपथ / ब्यूनस आयर्स। मुफलिसी में पले-बढ़े अर्जेंटीना के इन युवाओं के लिए उम्मीद की किरण थी तो बस फुटबॉल। अभावों के बीच अभ्यास में इन्होंने भविष्य का लियोनेल मेस्सी या कार्लोस टेवेज बनने का सपना संजोया लेकिन कोरोनावायरस महामारी ने इनकी उम्मीदों पर मानों तुषारापात कर दिया।
यहां फोर्ट अपाचे के अपार्टमेंट ब्लॉक के बाहर कार्लोस टेवेज का भित्तिचित्र और उसके नीचे लिखा वाक्य ‘मैं उस जगह से आया हूं, जहां कामयाब होना नामुमकिन माना जाता है’, इन युवा फुटबॉलरों के लिए संजीवनी की भांति रहा है।
टेवेज ब्यूनस आयर्स के सबसे गरीब इलाके से निकलकर दूसरी श्रेणी के क्लब अलमाग्रो तक पहुंचे। 16 बरस के आसपास के तमाम फुटबॉलरों के लिए उनकी कामयाबी मील का पत्थर बन गई लेकिन फिर कोरोनावायरस ने दुनिया में दस्तक दी।
पिछले 80 दिन से यहां कोई खेल नहीं हुआ है और ना ही भविष्य में जल्दी होने की संभावना है। ऐसे में अर्जेंटीना के गरीब इलाकों से निकले फुटबॉलरों की बेहतर जिंदगी की एकमात्र उम्मीद भी छिनती नजर आ रही है।
एक फुटबॉलर ने कहा, ‘इस महामारी ने सब कुछ छीन लिया। यह भयावह है। हम घर में बैठे हुए हैं।’ ब्राजील, चिली या पेरू जैसे बाकी लातिन अमेरिकी देशों की तरह तबाही का मंजर अर्जेंटीना में नहीं दिखा लेकिन फुटबॉल के दीवाने इस देश में महामारी के दूरगामी दुष्प्रभाव युवा फुटबॉलरों के कैरियर पर जरूर दिख रहे हैं। इनमें से कइयों ने फुटबॉल छोड़ने का मन बना लिया तो कई ड्रग्स या शराब की लत के शिकार हो रहे हैं । कई खतरनाक अवैध खेलों में शामिल हो गए हैं जो फुटबॉल मैदानों के पास रहने वाले खिलाड़ियों और दर्शकों के बीच इस समय लोकप्रिय है।
सांता क्लारा क्लब के अध्यक्ष डेनियल लोपेज ने कहा, ‘सड़क पर यह सब दिख रहा है। बच्चों ने यहां शरण ली थी पर अब नहीं रह सकते।’ इस क्लब में 170 लड़के लड़कियां प्रशिक्षण ले रहे थे लेकिन अब इस क्लब को किचन में बदल दिया गया है, जहां गरीबों के लिए खाना पकता है।
मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन ने हाल ही में एक फिल्म 'लालबाजार' को अपनी आवाज दी है। यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली है। इस फिल्म का प्रीमियर 19 जून को जी5 पर किया जाने वाला है। हाल ही में इस फिल्म की स्टार कास्ट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें सभी कलाकारों ने अजय देवगन को अपनी आवाज देने के लिए शुक्रिया कहा।
देव डी और ब्लैक फ्राईडे जैसी फिल्में करने वाले कलाकार देवेंद्र भट्टाचार्य का कहना था कि मैंने लाल बाजार इसलिए की क्योंकि इस बार उन्हें कोलकाता का एक नया रूप देखने को मिला। आमतौर पर फिल्मों में जब भी दिखाया जाता है तो कोलकाता का दुर्गा पूजा धूल और नगाड़ों के तरीके से ही दिखाया जाता है। जबकि इस फिल्म में शायद पहली बार कोलकाता की पुलिस और उसके बारे में इतनी गहराई से बताया गया और यही बात मुझे बहुत अच्छी लगी जैसे यह ऑफर मिला मैंने इस फिल्म के लिए और इस रोल के लिए झट से हां बोल दिया।
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लाल बाजार में ही काम करने वाली अभिनेत्री सौरासनी मैत्र का कहना था कि यह फिल्म 2 भाषाओं में शूट की गई है हम नहीं चाहते थे कि कोलकाता की जो असली बंगाली संस्कृति है उसे कहीं मिस किया जाए साथ ही में हम यह भी नहीं चाहते थे कि इसको एक ही भाषा में रखकर इसके दर्शक सीमित किया जाएं। इसलिए हमने हिंदी और बंगाली दोनों में ही इसे शूट किया। एक बार हम बंगाली में शूट करते थे पूरा सीन लेते थे और दूसरी बार हम हिंदी में लिया करते थे तो जैसे बंगाली समझ में आती है वह बंगाली में स्वयं को देखें और जो हिंदी में जाना चाहता है वह हिंदी में फिल्म देखें।
इस फिल्म में ऋषिता भट्ट भी दिखाई देने वाली हैं जो कि एक टीवी पत्रकार के रूप में नजर आने वाली है। अपने इस रोल के बारे में बताते हुए ऋषिता भट्ट ने कहा कि रोल की तैयारी के लिए मैंने किसी भी पत्रकार को नहीं चुना ना मैंने उनसे बात की लेकिन मुझे यह रोल बहुत अच्छा लगा। मेरे इस रोल में प्रोफेशनल जिंदगी भी दिखाई दिखाई देने वाली हैं, साथ ही मेरी पर्सनल लाइफ पर भी जोर दिया गया है। कैसे इन दोनों को साथ में लेकर में चल रही हूं वह आपको फिल्में देखना मिलेगा इससे ज्यादा मैं कुछ अभी तो नहीं बता सकती लेकिन इतना कह सकती हूं कि मेरे लिए वेब सीरीज दो भाषाओं में शूट करना मजेदार ही रहा है।
सबसे अच्छी बात यह रही कि जब भी मैं ट्रैवल करती थी मुझे बार-बार परेशान नहीं होना पड़ता था मैं शूट करती थी वहीं पर अपनी डबिंग करती थी और काम पूरा खत्म करके ही अपने घर लौटती थी।
फिल्म लालबाजार असली घटना पर आधारित है जिसमें रेड लाइट एरिया में होने वाली कुछ हत्याओं को दिखाया गया है और कैसे कोलकाता पुलिस ने सुलझाया है इस बारे में बताया गया है। यह फिल्म 19 जून को जी5 पर रिलीज होने वाली है।
खानाखाजना / शौर्यपथ / आंवले का लजीज मुरब्बा
सामग्री : 1 किलो ताजे आंवला, 10 ग्राम चूना, 25 ग्राम मिश्री, सवा किलो शक्कर, 1 चम्मच काली मिर्च, 5-7 केसर के लच्छे, पाव चम्मच इलायची पावडर।
विधि : 1 किलो ताजे एवं साफ-सुथरे आंवले लेकर पानी में तीन दिन भीगने दें। इसके बाद उन्हें पानी से निकालकर कांटों से गोद लें और चूना पानी में घोलकर उसमें आंवले को तीन दिन तक भीगने दें। चौथे दिन साफ पानी से धोकर मिश्री तथा पानी में उन्हें भाप दें। फिर कपड़े पर फैलाकर सुखा लें।
अब चाशनी बनाकर उसमें आंवले छोड़ दें और पकाएं। जब आंवले अच्छी तरह गल जाएं तब उसमें काली मिर्च, केसर और इलायची मिला दें। तत्पश्चात मुरब्बा ठंडा करके मर्तबान में भरकर रख दें। तैयार आंवले का मुरब्बा दिल को ताकत और दिमाग को तरोताजा करने साथ-साथ सेहत के बहुत ही लाभदायी है।
भरवां आंवले का अचार
सामग्री : 1 किलो ताजे बड़े आकार के आंवले, 100 ग्राम राई, 100 ग्राम सरसों, 100 ग्राम पिसी लाल मिर्च, आधा चम्मच हल्दी, 25 ग्राम सौंफ, चुटकीभर हींग, 500 ग्राम मीठा तेल, नमक स्वादानुसार।
विधि : आंवलों को धोकर कपड़े से साफ पौंछ कीजिए। अब एक बर्तन में आंवले डालकर दो बड़े चम्मच तेल डालकर धीमी आंच पर पकाएं। हल्के से पकने पर उन्हें आंच से उतार कर ठंडा कर लें। तत्पश्चात आंवलों की गुठलियां अलग कर दें।
अब कड़ाही में तेल गरम करके उसे थोड़ा-सा ठंडा कर लें। इस तेल में उपरोक्त सभी मसालें डालकर चलाएं। पूरी तरह ठंडा होने पर आंवले में चम्मच की सहायता से मसाला भर दें और जार में भरकर बंद कर दें। लीजिए तैयार है आंवले का स्वादिष्ट चटपटा भरवां अचार। आंवला पाचनशक्ति बढ़ाकर भूख बढ़ाता है आलस्य को दूर करता है।
आंवले की तरी वाली सब्जी
सामग्री : 200 ग्राम बेसन, 10-15 कली सूखे आंवले (जो बाजार में सूखे हुए मिलते हैं), 4-5 हरी मिर्च, 4-5 कली लहसुन, अदरक एक गांठ (बारीक कटी हुई), 250 ग्राम प्याज (किसी हुई), 1 चम्मच लाल मिर्च, 1 चम्मच सूखा धनिया, 1 चम्मच हल्दी, 2 बड़े चम्मच मॉयन के लिए तेल 1/2 (आधा) चम्मच सौंफ, जीरा, अजवाइन, तेलपात, स्वादानुसार नमक, गरम मसाला, तलने के लिए तेल।
खुरमे बनाने की विधि : सबसे पहले 10-15 सूखे आंवलों को गरम तेल में तलिए, ठंडा होने पर बारीक मिक्सी में पीसिए। आंवला और बेसन साथ में मिलाकर छान लीजिए। ऊपर दी गई सामग्री में से आधी सामग्री बेसन के साथ मिला लीजिए (प्याज, हरी मिर्च, अदरक, लहसुन, सौंफ, अजवाइन, लाल मिर्च, स्वादानुसार नमक, मॉयन के लिए दो चम्मच तेल) आदि सभी सामग्री डालकर खुरमे की तरह आटा गूंथ लें। गैस पर कड़ाही रखकर तेल गरम करके गूंथे हुए आटे की छोटे, गोल, चपटे खुरमे बनाकर तलिए, सुनहरा होने पर निकालिए।
तरी के लिए सामग्री : सबसे पहले कड़ाही में दो बड़े चम्मच तेल डालकर गरम करें। फिर उसमें जीरा व तेजपान और उपरोक्त बची हुई आधी सामग्री (अदरक, हरी मिर्च, प्याज, लहसुन) डालकर सुनहरा होने तक भूनें। फिर उसमें एक-एक चम्मच सूखा धनिया, लाल मिर्च, हल्दी डालकर भूनें।
जब मसाले तेल छोड़ने लगे तो आधा लीटर पानी डालकर एक उबाली लें, और आंवले के खुरमे डाल दें। फिर 15 से 20 मिनट तक पकने दें। पकने के बाद आधा चम्मच गरम मसाला व हरा धनिया डालकर गर्म-गर्म पराठे के साथ सर्व करें।
धर्म संसार / शौर्यपथ / सांदीपनि ऋषि विष्णु के मत्स्य अवतार की कथा के बाद कहते हैं कि अब मैं तुम्हें श्रीहरि के कच्छप अवतार की कथा सुनाता हूं।
फिर सांदिपनि ऋषि महाराज महाबली और उनके असुरों एवं इंद्र और उनके देवताओं द्वारा समुद्र मंथन, अमृत वितरण के दौरान युद्ध और असुरों द्वारा धनवंतरि देव से अमृत का कलश छुड़ाकर भाग जाना फिर श्रीहरि के मोहिनी रूप में प्रकट होने की कथा को श्रीकृष्ण और बलराम को सुनाते हैं।
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
सभी असुर अमृत कलश के अमृत को पहले पीने की होड़ के चलते आपस में लड़ते हैं तभी मोहिनी रूप धारण कर भगवान विष्णु असुरों के समक्ष प्रकट होकर नृत्य करने लगते हैं। सभी का ध्यान उस ओर चला जाता है। राहु, केतु और महाबली सभी दैत्य उनका नृत्य देखने के बाद पूछते हैं सुंदरी कौन हो तुम? सभी देवता भी वहां आकर खड़े हो जाते हैं।
मोहिनी रूप धारण किए विष्णु पहले तो कहते हैं कि मैं स्वच्छंद नारी हूं। कुलीन लोगों का मनोरंजन करती हूं। फिर वे असुरों को धर्म और न्याय की बात बताकर लुभाते हैं और कहते हैं कि जो उच्च कुल का होता है वह कलह को छोड़कर न्याय करता है। फिर मोहिनी असुरों को अपने शब्द और मोहजाल में फांसकर कहती हैं कि मैं यही सोचकर इतनी दूर से आपकी सभा देखने आई थी कि परंतु यहां तो कलह कलेश है, द्वैष है, अन्याय है तो यहां मेरा मन नहीं लगेगा। अच्छा मैं चलती हूं। तभी एक असुर कहता है, हे मोहिनी तुम्हारे यहां आने से ऐसा लगा जैसे वसंत ऋतु आ गई हो। अगर हम यह कलह छोड़कर द्वैष मिटा दें तो क्या तुम यहां रुकोगी? और हम सबका मनोरंजन करोगी?
मोहिनी कहती हैं बड़े चतुर हो परंतु तुमने न्याय की बात नहीं की? तब असुर कहता है हम अन्याय भी नहीं करेंगे। तब मोहिनी कहती हैं परंतु इसका निर्णय कौन करेगा? तब वह असुर कहता है तुम। महाबली भी कहते हैं हां तुम। हम न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म का सारा निर्णय तुम पर छोड़ते हैं। यह सुनकर मोहिनी कहती हैं प्रमाण। तब एक असुर अमृत कलश दिखाकर कहता है प्रमाण तो ये है। ये है अमृत कलश जिसे चाहे पिला दो और जिसे चाहे प्यासा मार डालो।
फिर मोहिनी उस असुर के हाथ से अमृत कलश लेकर कहती हैं, ना ना ना, इतना बड़ा उत्तरदायित्व मेरे कंधों पर ना डालो। मेरे कंधे बड़े कोमल है। मेरा मन बड़ा चंचल है। शास्त्र कहता है कि कुलीन पुरुषों को किसी स्वच्छंद नारी पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। तुम महर्षि कश्यप के कुल से हो, फिर सोच लो।
तब महाबली कहते हैं, देवी बड़े से बड़ा वीर, कुलीन, महात्मा और योगी जब किसी सुंदर स्त्री के नयनों से घायल हो जाता है तो वह अपना सबकुछ उसकी ठोकरों में डाल देता है। तब उसे उचित-अनुचित, पाप-पुण्य का कोई भान नहीं रहता। यही दशा हमारी है। जो तुम्हारी इच्छा हो वही करो। योग्य-अयोग्य, पात्र-कुपात्र तुम्ही जानों। जिसे अमृत के योग्य समझो उसे अमृत दो और जिसे अपने सौंदर्य के योग्य समझो उसे अपने सौंदर्य का रसपान कराओ और जिसे अपने योग्य समझो उसे अपना आप सौंप दो। जो तुम्हें पा लेगा उसे फिर अमृत की क्या आवश्यकता।
यह सुनकर मोहिनी कहती हैं कि सत्य कहा, प्राणी यदि ऐसा ही समर्पण भगवान के समक्ष कर दे तो तक्षण मुक्ति पा ले। परंतु शायद भगवान नारी के ही रूप में अधिक शक्तिशाली होते हैं। यह सुनकर दैत्य समझ नहीं पाते हैं कि यह मोहिनी क्या कहना चाहती है तभी मोहिनी कहती हैं, अच्छी बात है अब मैं ही न्याय करूंगी। फिर मोहिनी अपनी माया से नृत्यसभा का निर्माण करके सभी देवता और दानवों को अलग-अलग लाइन से बैठा देती हैं। फिर वह कहती हैं कि जैसा कि आपने स्वयं ही कहा है कि मैं जिसे जिस योग्य समझूंगी, उसे उसी रस का पान कराऊंगी। स्वीकार है? सभी देवता और दानव एक साथ कहते हैं स्वीकार है, स्वीकार है परंतु नृत्य के साथ। मोहिनी कहती हैं अच्छा। फिर वह अमृत कलश को एक निश्चित जगह पर रखकर नृत्य करने लगती हैं।
एक ओर देवताओं के राजा इंद्र और दूसरी ओर दैत्यों के राजा महाबली बैठकर नृत्य का आनंद उठाते हैं। फिर मोहिनी नृत्य गान करते हुए ही कलश उठाकर पहले इंद्र को अमृत पान कराती हैं और पुन: कलश को ले जाकर रख देती है। फिर अपनी माया से कलश को बदलकर उस कलश को उठाकर लाती हैं और बली को उस कलश का जल पिलाती हैं और पास ही बैठे दूसरे असुर को भी जल पिलाती हैं। सभी समझते हैं कि ये अमृत है। तभी एक असुर मदमस्त होकर उठता है और मोहिनी के साथ ही नृत्य करने लगता है। यह देखकर दो असुर और उठकर नृत्य करने लगते हैं।
कलश बदल-बदल कर वह देव और असुरों को जल पिलाती रहती हैं। फिर कुछ देव भी अमृत पीने के बाद नृत्य करने लगते हैं। तभी एक असुर मोहिनी के इस छल को देख लेता है। तब वह चुपचाप वेश देवता का धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठ जाता है। उस असुर का यह छल चंद्रदेव देख लेते हैं।
मोहिनी उसे अमृत पिलाने लगती है तभी वह देवता कहते हैं मोहिनी ये तो दानव है। तभी मोहिनी बने भगवान विष्णु अपने असली रूप में प्रकट होकर अपने सुदर्शन चक्र से उस दानव की गर्दन काट देते हैं और फिर वे वहां से अदृश्य हो जाते हैं। यह देखकर बाली कहता है धोका, हमारे साथ धोका हुआ है। यह सुनकर इंद्रदेव कहते हैं आक्रमण और वहां युद्ध प्रारंभ हो जाता है।
सांदीपनि ऋषि कहते हैं तब देवता और असुरों में भयानक युद्ध छिड़ गया जिसे पुराणों में देवासुर संग्राम कहा गया है। अमृत पिकर देवता बलवान हो चुके थे। इसलिए इंद्र के हाथों स्वयं महाराज बली भी मारे गए। लेकिन दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य संजीविनी विद्या जानते थे। इसलिए युद्ध के पश्चात उन्होंने उन सभी दैत्यों को जिनके सिर धड़ से अलग नहीं हुए थे उनको जीवित कर दिया। सबसे पहले उन्होंने राजा बली को जीवित किया।
राजा बली परम भक्त प्रहलाद के पौत्र थे और परमवीर भी थे। इंद्र से उस हार का बदला लेने के लिए शुक्राचार्य ने राजा बली से सौ यज्ञ कराने का अनुष्ठान कराया। 99वें यज्ञ के दौरान शुक्राचार्य ने उनको आशीर्वाद देकर कहा कि अब केवल एक यज्ञ रह गया है और यदि वह भी निर्विघ्न पूरा हो जाए तो आपके 100 यज्ञ पूरे हो जाएंगे और उसी समय इंद्रपद सर्वदा के लिए आपका हो जाएगा। स्वर्ग पर देवताओं का वर्चस्व सदैव के लिए समाप्त हो जाएगा। यह यज्ञ तुम्हारे तप की ही नहीं, हमारे बल और विद्या की भी परीक्षा है। अब देवगुरु बृहस्पति भी देख लेंगे कि समस्त देवताओं को तेजहिन करके यह शुक्राचार्य असुर जाति को त्रिलोकी का राज्य दिला सकता है। यह सुनकर महाबली कहता है कि और विष्णु भी देख लेंगे कि उनकी माया और छल से असुर शक्ति को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता है।
उधर, सभी देवता गुरु बृहस्पति के साथ भगवान विष्णु के पास जाकर कहते हैं प्रभु यदि उसका सौंवा यज्ञपूर्ण हो जाएगा तो वह तीनों लोकों का अधिपति हो जाएगा। विष्णु कहते हैं कि जो तपस्या करेगा और कर्म करेगा वो तो उसका फल पाएगा ही, ये तो प्रकृति का विधान है। इस पर बृहस्पति कहते हैं कि परंतु जो प्रकृति का विधान विनाश की ओर जाने लगे और अधर्म की स्थापना हो तो उसे रोका जाना चाहिए प्रभु। आपको प्रकृति के विधान के ऊपर जाकर दैवीय विधान के माध्यम से इस विनाश को रोकना चाहिए। यह सुनकर विष्णु कहते हैं आपका वचन सत्य है। हम अपने उत्तरदायित्व का अवश्य निर्वाह करेंगे।
फिर सांदीपनि ऋषि बताते हैं कि भगवान विष्णु वामनरूप में अवतार लेकर महाबली की यज्ञशाल के द्वार पर उस समय पहुंचे जब उसका सौवां यज्ञ आरंभ होने वाला था। एक सेवक आकर महाबली को बताता है यज्ञशाला के द्वार पर एक याचक आया है और वह आपसे मिलने की याचना कर रहा है। यह सुनकर शुक्राचार्य कहते हैं कि महाराज यज्ञ का संकल्प करने जा रहे हैं वो जो भी मंगता है, वहीं से देकर भेज दो। तब सेवक कहता है कि मैंने उसे मुंहमांगी भिक्षा लेने की बात कही थी परंतु वह महाराज के हाथों भिक्षा लेने की हठ कर रहा है। जय श्रीकृष्ण।
धर्म संसार / शौर्यपथ / कुण्डली में राहु-केतु परस्पर 6 राशि और 180 अंश की दूरी पर दृष्टिगोचर होते हैं जो सामान्यतः आमने-सामने की राशियों में स्थित प्रतीत होते हैं। कुण्डली में राहु यदि कन्या राशि में है तो राहु अपनी स्वराशि का माना जाता है। यदि राहु कर्क राशि में है तब वह अपनी मूलत्रिकोण राशि में माना जाता है। कुण्डली में राहु यदि वृष राशि मे स्थित है तब यह राहु की उच्च स्थिति होगी। मतान्तर से राहु को मिथुन राशि में भी उच्च का माना जाता है। कुण्डली में राहु वृश्चिक राशि में स्थित है तब वह अपनी नीच राशि में कहलाएगा। मतान्तर से राहु को धनु राशि में नीच का माना जाता है। लेकिन यहां राहु के पहले घर में होने या मंदा होने पर क्या सावधानी रखी जानिए।
कैसा होगा जातक : दौलतमंद तो होगा पर खर्चा बहुत होगा। यहां व्यक्ति की बुद्धि ही उसका साथ देगी बशर्ते वह अति कल्पनावादी न हो। 1 से 6 तक जैसी बुध की हालत वैसी राहु की मानी जाएगी। 7 से 12 तक जैसी केतु की हालत वैसी राहु होगी। पहला घर मंगल और सूर्य से प्रभावित होता है, यह घर किसी सिंहासन की तरह होता है। पहले घर में बैठा ग्रह सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। जातक अपनी योग्यता से बड़ा पद प्राप्त करेगा। इस घर में राहु उच्च के सूर्य के समान परिणाम देगा, लेकिन सूर्य को ग्रहण माना जाएगा अर्थात सूर्य जिस भाव में बैठा है उस भाव के फल प्रभावित होंगे। यदि मंगल, शनि और केतु कमजोर हैं तो राहु बुरे परिणाम देगा अन्यथा यह पहले भाव में अच्छे परिणाम देगा।
5 सावधानियां :
1. व्यर्थ के बोलते रहने से बचें और वाणी पर नियंत्रण रखें।
2. सोच-समझकर बुद्धि से काम लें और अति कल्पना से बचें।
3. व्यर्थ के तंत्र, मंत्र या यंत्र आदि के चक्कर में न पढ़ें।
4. पिता, गुरु और अपने से बड़ों का सम्मान करें।
5. ससुराल पक्ष से संबंध अच्छे रखें। ससुराल वालों से बिजली के उपकरण या नीले कपड़े नहीं लेने चाहिए।
क्या करें :
1. गले में चांदी पहनें।
2. बहते पानी में नारियल भी बहाएं।
3. बहते पानी में 400 ग्राम सुरमा बहाएं।
4. गुरु का उपाय करें।
5. 1:4 के अनुपात में जौ में दूध मिलाएं और बहते पानी में बहाएं।
नजरिया / शौर्यपथ / एक अनुमान है कि भारत में लगभग एक करोड़ 60 लाख ऐसे कामगार हैं, जो सिलाई-कढ़ाई-बुनाई जैसे कामों से जुडे़ हुए हैं। ये कामगार मुख्यत: ग्रामीण भारत में रहते हैं, और हमारे कपड़ा उद्योग की उस जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिस पर शायद ही कभी दुनिया की नजर जाती है। न सिर्फ संख्या बल के लिहाज से यह एक बड़ी तादाद है, बल्कि ये कामगार हमारे कुशल श्रमबल का हिस्सा हैं। पेशेवर गहन जानकारियों के लिहाज से ये लोग काफी हुनरमंद हैं और इन्होंने यह ज्ञान बेहद काबिल मास्टरों से सीखा है, जो सदियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं।
1960 के दशक में पहली बार मैंने पश्चिम बंगाल के गांवों में कपड़े पर सोने की बारीक कढ़ाई का काम होते देखा। वहां पर यह काम सदियों से चलन में रहा है। कहा जाता है कि सोने की कढ़ाई की शुरुआत ईरान में हुई और भारत में यह सल्तनत काल में आई। इन गांवों की कशीदाकारी को बंगाल के नवाबों का संरक्षण हासिल था। वास्तव में, हमारा देश ऐसी ग्रामीण-कार्यशालाओं से भरा पड़ा है, उन्हें आर्थिक मदद और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना अब ये जीवित नहीं रह सकेंगी। महामारी के बाद देश के हथकरघा व दस्तकारी क्षेत्र को जीवित रहने के लिए रास्ता चाहिए। सरकारी एंपोरियमों की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है।
दरअसल, इस संदर्भ में हमारा नजरिया ही गलत है। एक बेहतर हैंडलूम उत्पाद को, जो न सिर्फ मनमोहक, बल्कि पारिस्थितिकी के अनुकूल भी होता है, सहानुभूति के साथ नहीं बेचा जा सकता। उसे मार्केटिंग व रिटेलिंग की आधुनिक तकनीक की जरूरत है। उसे दुनिया में श्रेष्ठतम रूप में पेश किए जाने की आवश्यकता है। प्रतिस्पद्र्धी बाजार में बने रहने का यही एक रास्ता है। यह हम सब जानते हैं कि देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में कृषि के बाद कपड़ा क्षेत्र दूसरे नंबर पर आता है। 200 साल पहले तक दुनिया को कपडे़ का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता हमारा देश था। मगर आजादी के मिलने तक यह अपने ही कपड़ों की कॉपी इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। जाहिर है, कारीगरी की हमारी समृद्ध आर्थिकी के तहस-नहस हो जाने के कारण भारत के ग्रामीण बाजार बुरी तरह प्रभावित हुए।
लेकिन आजादी के बाद सरकार ने अपनी हस्तशिल्प विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश की और चमत्कारिक रूप से भारत ने कई बिसरा दिए गए कौशल को पुनर्जीवित भी कर लिया। यह एक दूरदर्शिता भरा लक्ष्य अवश्य था, मगर इसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सका। भारतीय दस्तकारी की विरासत को सहेजने के लिए निरंतरता से भरा एक प्रगतिशील पुनरोद्धार आंदोलन चलाया गया। इन कपड़ों को ‘विश्वकर्मा’ प्रदर्शनियों की एक शृंखला के रूप में देश-दुनिया में लॉन्च किया गया।
पिछले दो दशकों से भी अधिक वक्त में भारतीय फैशन उद्योग ने काफी प्रगति की है। और बाकी दुनिया के उलट इसके पास डिजाइनरों की एक देशज टीम है। इस टीम में सिर्फ वही नहीं हैं, जो रैंप पर दिखते हैं, बल्कि इसका हिस्सा वे कामगार भी हैं, जो गांवों में बसते हैं। इनमें बुनकर, कशीदाकारी करने वाले, और साज-सज्जा की डिजाइन तैयार करने वाले कारीगर शामिल हैं। ज्यादातर भारतीय वस्त्रों और उनके ग्लैमराइजेशन का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है। महामारी के कारण इस क्षेत्र की हालत को देखते हुए बहुत जरूरी है कि सरकार अपनी तरफ से कोई पहल करे, जैसा उसने 1950 के दशक में किया था, ताकि देश की दस्तकारी को बचाया जा सके। दुनिया आज कपड़ों के उत्पादन में काफी उन्नत मशीनरी का इस्तेमाल करती है और इसका असर क्या होता है, यह हम बनारसी साड़ी के मामले में देख सकते हैं। चीनी उत्पादों ने बनारस के हैंडलूम बाजार को बरबाद कर दिया है। महामारी बाद इस क्षेत्र के कामगारों के लिए आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। वस्त्र के क्षेत्र में एक बौद्धिक संपदा के आगे संकट का सवाल तो खैर है ही।
सरकार को इस क्षेत्र में स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आना चाहिए। ग्रामीण कृषि पृष्ठभूमि में दस्तकारी वाले कपड़ों का बेहतर उत्पादन हो सकता है। इसके लिए बुनियादी ढांचे या कौशल विकास में ज्यादा निवेश की जरूरत भी नहीं। यह दुनिया में हमारा इकलौता ‘मेड इन इंडिया बाइ हैंड’ ब्रांड होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) रितु कुमार, फैशन डिजाइनर
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / जिस देश की सीमा पर तनाव हो, उसका एकजुट होना समय की सबसे बड़ी मांग है। यह एकजुटता देश के जवानों की शहादत का भी सबसे सच्चा सम्मान है। आज जब देश के लोग और तमाम नेता शहीदों का सम्मान कर रहे हैं, उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तब यह हमारे लिए देश के पक्ष में विचार करने का सही समय है। ध्यान रहे, चीन के भी जवान शहीद हुए हैं, लेकिन उनके सम्मान के लिए उसके नेताओं के पास दो शब्द भी नहीं हैं। चीन ने कितने जवान खोए हैं, वह शायद ही बताए, लेकिन भारत में एक-एक जवान की जान कीमती है। वाजिब सम्मान के साथ अपने जवानों की शहादत को सदियों तक याद करना हमारी परंपरा रही है। इस परंपरा के सच्चे सम्मान का ही एक बुनियादी व्यवहार हमारी एकजुटता है।
आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने अपने आपसी मतभेदों को भुला दिया है और वे सरकार व सेना के साथ खड़ी हैं। सीमा पर होने वाला कोई भी संघर्ष किसी एक नेता या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, देश की जिम्मेदारी है। सैनिक देश की रक्षा की शपथ लेते हैं, देश के लिए जान गंवाते हैं। ऐसे में, हमारे रक्षा मंत्री और अन्य नेताओं ने बिल्कुल सही कहा है, शहादत बेकार नहीं जाएगी। यदि हम वाकई चाहते हैं कि शहादत सार्थक हो, तो हमें सबसे पहले एकजुट होने की जरूरत को महसूस करना होगा। राजनीतिक एकजुटता सबसे जरूरी है और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आगामी बैठकों का खास महत्व है। ध्यान रहे, चीन के प्रति हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-आर्थिक-राजनीतिक जुड़ाव हमें किसी निर्णय लेने की प्रक्रिया में संकोची बना देता है। हम एक कदम आगे बढ़ाकर दो कदम पीछे खींच लेते हैं, लेकिन हम मिल-जुलकर यह नहीं देखते कि चीन कदम-दर-कदम कहां से कहां पहुंच गया है। हमें एकजुट होकर इस सच को सामने लाना चाहिए। ध्यान रहे, चीन अपने लोगों को यह नहीं बता रहा कि उसने भारत की जमीन पर कहां-कहां, किस-किस आधार पर दावा कर रखा है। वह गलवान घाटी को चीनी क्षेत्र बता रहा है, तो यह जरूरी है कि हम दुनिया को सच बताएं।
सख्त शासन की वजह से चीन अपने इतिहास, विरासत व पूर्वजों के विरुद्ध चल रहा है, वरना उसे याद रहता कि चीनी धर्मगुरु कन्फ्यूसियस ने कहा था, ‘एकता, वास्तव में, लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की अनुमति देती है, और फिर खुशी हासिल करती है’। चीन एक समय बुद्धमय भी हो गया था, आज भी वहां बुद्ध का बहुत प्रभाव है। उसे सोचना चाहिए कि जिस देश की जमीन पर वह निगाह गड़ाए बैठा है, वह देश उसी बुद्ध का है, जिनके शांति और अहिंसा के संदेश के सामने संसार झुक जाता है। चीन सब भूल गया, पर हमें नहीं भूलना है। सीमा पर तनाव भी हमारे लिए चौतरफा प्रेरणा का समय है। कूटनीतिक, राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और साथ ही कोरोना के मोर्चे पर भी हमें और एकजुट होकर मुकाबला करना है। 45 साल बाद जो शहादत हुई है, वह चेतावनी है कि हमें अपना रास्ता ठीक कर लेना चाहिए। देशसेवा के प्रति समर्पण के अभाव और एकजुटता की कमी की वजह से ही भारतीय लोकतंत्र की शोभा कम होती है और चीन हमारी खामियों के बहाने ही लोकतंत्र और हमारी ताकत का मखौल उड़ाता है। बेशक, हम एकजुट हुए, तो सबको सही जवाब मिल जाएगा।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / चीन से जिस तरह का अंदेशा था, आखिर उसने वही विश्वासघात किया। भारतीय सैनिकों के शहीद होने की खबर से पूरा देश शोकाकुल है। भारत इसका बदला जरूर लेगा, लेकिन पीठ पीछे वार करके नहीं। इस हमले में चीन की कायरता ही नजर आई। इसलिए अब हमें अपनी चीन-नीति बदल लेनी चाहिए। हमें अब मान लेना चाहिए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ कभी नहीं हो सकते। अब चीन से सभी तरह के राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय और सैन्य समीकरण बदल जाने चाहिए। चीन को अलग-थलग करने की लड़ाई अब प्रमुखता से लड़ने की जरूरत है। भारत के लिए यह माकूल समय है, जब लगभग आधी दुनिया चीन के खिलाफ है। अब भारत सन 1962 वाला नहीं रहा। चीन को मजबूत जवाब दिया जाना चाहिए।
आशीष गुसाईं, नई दिल्ली
अश्लीलता के खिलाफ
विगत कुछ वर्षों में आधुनिकता और मनोरंजन के नाम पर फिल्मों समेत वीडियो, गाने आदि में धड़ल्ले से अब अश्लीलता परोसी जाने लगी है। सबसे बड़ी दिक्कत की बात यह है कि लोग इसे आधुनिकता का प्रतीक मानकर सामान्य जीवन में भी उतारने लगे हैं। इससे न केवल भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर गहरा दाग लग रहा है, बल्कि बच्चे, बुजुर्ग, युवा, सभी के मन-मस्तिष्क में अश्लीलता पनपने लगी है। इसी का नतीजा है कि देश के विभिन्न हिस्सों से दुष्कर्म की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। प्राचीन समय में सिनेमा जागरूकता, आचार-व्यवहार, संस्कार, न्याय और सभ्य जीवन शैली सिखाने का एक सशक्त-सकारात्मक माध्यम था, पर आज यह हमारे समाज को दीमक की तरह चट कर रहा है। साफ है, सेंसर बोर्ड इसके लिए जिम्मेदार है। अश्लीलता रोकने की बजाय वह अपनी मोटी कमाई के लिए बेसिर-पैर की फिल्मों को जारी करने की अनुमति देता है। इस प्रवृत्ति पर जल्द से जल्द रोक लगनी चाहिए।
मनकेश्वर महाराज ‘भट्ट’, मधेपुरा
चीन की चाल
सुपर पावर बनने की चीन की चाहत ने आज दुनिया के लिए एक चुनौती खड़ी कर दी है। पहले उसने कोरोना रूपी संकट दुनिया के सामने खड़ा किया और अब अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए भारतीय सीमा में दखल दे रहा है। इस स्थिति में भारत की विदेश नीति कमजोर पड़ती दिख रही है। स्थिति यह है कि चीन ने अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए नेपाल को भी हमारे खिलाफ खड़ा कर दिया है, जबकि अब तक काठमांडू हमारा सबसे विश्वसनीय मित्र रहा है। प्रधानमंत्री को बाकी सभी देशों के साथ मिलकर चीन से आ रही चुनौती से निपटना चाहिए। उन्हें चीन के खिलाफ डटकर खड़ा होना चाहिए।
समरजीत कुमार संजीत, वैशाली
बढ़ती परेशानियां
फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या ने देश में नई बहस छेड़ दी है। यह बताता है कि देश में तनाव और अवसाद के चलते आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। ऐसे मामलों में नौजवान तुलनात्मक रूप से अधिक दिख रहे हैं, जो देश और समाज के लिए गंभीर संकेत है। आज अवसाद और तनाव की समस्या इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि शायद ही कोई इससे अछूता है। सेलिब्रिटी इससे ज्यादा पीड़ित हैं, क्योंकि उन पर पूरे देश और समाज की नजर होती है। परेशानी की बड़ी बात यह है कि लोग इस समस्या पर अपनों से भी खुलकर बातें नहीं करते। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आज भी हमारे देश में शिक्षा की कमी है। घर, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, कहीं पर भी अवसाद या हताशा पर चर्चा नहीं होती, इसे अनसुना कर दिया जाता है। इसी के कारण पीड़ित अपनी समस्या पर बात नहीं कर पाता औरवह अंदर-अंदर घुटता रहता है, और अंत में आत्महत्या की राह चुन लेता है। इस समस्या पर वक्त रहते ध्यान देना होगा।
ममता रानी
काशीपुर, उत्तराखंड
ओपिनियन /शौर्यपथ / भारत और चीन का आपसी रिश्ता एक नाजुक, गंभीर और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। केंद्र सरकार और देश के सामने बड़ा सवाल यही है कि गलवान घाटी में जो ताजा हिंसक झड़प हुई है, जिसमें हमारे 20 अफसर और जवान शहीद हुए, उसका किस तरह से जवाब दिया जाए? आगे की हमारी चीन-नीति क्या हो? इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमें भारत-चीन संबंधों की हकीकत और पृष्ठभूमि पर गौर करना होगा।
सच्चाई यही है कि आजादी मिलने के बाद से ही चीन हमारे लिए सबसे बड़ी सामरिक चुनौती रहा है। इस सच की अनदेखी 1950 के दशक में भारत सरकार ने की। तब हमारा मानना था कि दोनों देश विकासशील हैं, इसलिए उनके हितों में समन्वय बनाया जा सकता है। मगर भारत जहां शांति के पथ पर चल रहा था, वहीं चीन ने अक्साई चिन को अपने कब्जे में ले लिया। जानकारों की मानें, तो उस वक्त बीजिंग सीमाओं को लेकर भारत से समझौता करना चाहता था, लेकिन भारतीय हुकूमत का अपनी भूमि से कोई समझौता न करना एक स्वाभाविक कदम था। सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया, जिसमें हमें भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस युद्ध के बाद भारत और चीन के संबंध सीमित हो गए। इस बीच चीन ने पाकिस्तान से अपने रिश्ते सुधारने शुरू कर दिए, ताकि इस्लामाबाद की नई दिल्ली के प्रति पारंपरिक दुश्मनी का वह फायदा उठा सके। उसने पाकिस्तान की आर्थिक-सामरिक ताकत को मजबूत किया, यहां तक कि उसके परमाणु हथियार कार्यक्रम को भी बुनियादी तौर पर सहायता पहुंचाई। आज भारत को चीन-पाकिस्तान के इसी गठजोड़ का मुकाबला करना है।
चीन-भारत युद्ध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दो बड़ी हिंसक घटनाएं हुई हैं। पहली वारदात साल 1967 में सिक्किम में हुई, जिसमें हमारे 88 सैनिक शहीद हुए थे, जबकि 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों की जान गई। दूसरी झड़प 1975 में अरुणाचल प्रदेश में हुई थी। उसमें असम राइफल्स के जवानों पर हमला किया गया था। इसके बाद बीते 45 वर्षों में गलवान घाटी की घटना से पहले भारत और चीन के सैन्य ‘गश्ती’ दल में आपसी टकराव तो हुए, लेकिन किसी सैनिक ने जान नहीं गंवाई।
दरअसल, वर्ष 1988 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री-काल में भारत ने अपनी चीन-नीति बदली। यह तय किया गया कि बीजिंग के साथ सीमा-विवाद सुलझाने की कोशिश तो होगी, लेकिन साथ-साथ तमाम क्षेत्रों में उसके साथ आपसी सहयोग भी बढ़ाया जाएगा। तब से अब तक हर भारतीय हुकूमत ने कमोबेश इसी नीति का पालन किया है। यही कारण है कि आज भारत और चीन के आर्थिक व व्यापारिक रिश्ते काफी मजबूत व व्यापक हो गए हैं। दिक्कत यह रही कि 1988 की नीति में सीमा-विवाद सुलझाने की बात तो कही गई, लेकिन चीन ने कभी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि, 1993 के बाद दोनों देशों ने यह तय किया था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति के लिए वे आपस में विश्वास बहाली के ठोस उपाय करेंगे। फिर भी, समय-समय पर चीन का रवैया बदलता रहा। यहां तक कि नियंत्रण रेखा को लेकर उसने अपना रुख अब तक स्पष्ट नहीं किया है। इसी वजह से वास्तविक नियंत्रण रेखा के कई स्थानों पर दोनों देशों की सोच एक-दूसरे से अलग है, और दोनों के सैन्य दल आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते हैं।
तो क्या 1988 से चल रही हमारी चीन-नीति पर अब पुनर्विचार करने की जरूरत है? यह तभी हो सकता है, जब भारत सरकार ही नहीं, पूरी सामरिक और राजनीतिक बिरादरी में चीन की चुनौती का सामना करने के लिए दृढ़ एकजुटता बने। बेशक 1978 में अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने के बाद चीन ने बहुत तरक्की कर ली है। उसने मैन्युफैक्चरिंग के मामले में इतनी ताकत हासिल कर ली है कि उसे ‘दुनिया की फैक्टरी’ कहा जाने लगा है। वहां न सिर्फ हर तरह के उत्पाद बनने लगे हैं, बल्कि उनकी दुनिया भर में आपूर्ति भी होने लगी है। मगर यह भी सच है कि चीन के बढ़ते दबाव के कारण और अंतरराष्ट्रीय नियमों की उसके द्वारा की जा रही अनदेखी को देखते हुए पूरी दुनिया चिंतित है और कई देशों ने आपसी सहयोग बनाना शुरू कर दिया है।
हाल के वर्षों में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत ने जिस तरह से आपस में रिश्ते बढ़ाए हैं, उससे भी चीन को ऐतराज है। इन चारों देशों का यह सहयोग अब सामरिक स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, इस चतुष्कोणीय संबंध, यानी क्वाड के साथ-साथ रूस और चीन के साथ मिलकर भारत त्रिपक्षीय बातचीत भी कर रहा है, जिसका स्पष्ट संदेश है कि नई दिल्ली अपने हितों की रक्षा के लिए हर देश से संबंध बढ़ाना चाहती है। भारत बेशक अमेरिका के करीब जाता दिख रहा है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम वाशिंगटन के पिछलग्गू बनकर बीजिंग का विरोध करने को तैयार हैं। हरेक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह हम भी अपनी कूटनीति खुद तैयार कर रहे हैं, जिसमें अपने हितों का पूरा ध्यान रखने का प्रयास किया जा रहा है।
जाहिर है, चीन की ताजा हिंसक कार्रवाई का हमें पूरी दृढ़ता के साथ मुकाबला करना होगा। हाल की घटनाओं को देखकर यही लगता है कि चीन हर हाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कम करना चाहता है। लेकिन हमें हर तरीके से अपने मान-सम्मान की हिफाजत करनी है। इसके साथ-साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा में बदलाव लाने की बीजिंग की हरेक कोशिश को भी नाकाम करना होगा, और हमें ऐसे उपाय भी करने पड़ेंगे कि वह मई, 2020 से पहले की स्थिति में लौटने को मजबूर हो। अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा करते हुए हमें चीन के साथ अपने आर्थिक और व्यापारिक संबंधों की भी समीक्षा करनी होगी। इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान पर संजीदगी से आगे बढ़ना होगा, और मैन्युफैक्र्चंरग के मामले में देश को आगे ले जाना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) विवेक काटजू, पूर्व राजदूत
दुर्ग / शौर्यपथ / शहर के निगम सरकार में कांग्रेस 20 सालो बाद सत्ता में आई है . निगम के सत्ता में आते ही प्रभारी विभागों में सबसे ज्यादा महत्तवपूर्ण विभाग की गिनती में पीडब्ल्यूडी विभाग आता है . निगम की कांग्रेस सरकार ने पीडब्ल्यूडी का प्रभार निगम के सबसे अनुभवी पार्षद अब्दुल गनी को दिया ताकि शहर के विकास कार्य में तेजी आये और गुणवत्ता से समझौता ना हो किन्तु निगम के इन 4-5 महीनो के कार्यकाल में ऐसे कई वाकये सामने आने लगे जिससे निगम के कार्यो में विरोधाभास नजर आने लगा . पीडब्ल्यूडी विभाग की बात करे तो जो कार्य पीडब्ल्यूडी में सदस्य रहते हुए तात्कालिक पार्षद को गलत लग रहा था आज वही पार्षद और पीडब्ल्यूडी प्रभारी अब्दुल गनी को सही लगने लगा ऐसा क्या हुआ इन ५ महीनो में जो प्रभारी के सोंच में आमूलचूल परिवर्तन दिखने लगा .
बता दे कि शिवनाथ नदी मुक्ति धाम के कार्य में 18 प्रतिशत बिलो की निविदा को एमआईसी की पहली बैठक में पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा निरस्त करने की अनुशंसा की गयी थी ये अलग बात है कि 18 प्रतिशत बिलों के इस कार्य जो सांसद सरोज पाण्डेय की अनुशंसा पर हो रहा था के बाद 22 प्रतिशत के कार्य की अनुशंसा को अनुमति प्राप्त हो गयी और बाद में १८ प्रतिशत के मुक्तिधाम के कार्य को भी अनुमति प्राप्त हो गयी एमआईसी की बैठक में . पूर्व पीडब्ल्यूडी प्रभारी दिनेश देवांगन ने शौर्यपथ से चर्चा में कहा कि जब कांग्रेस विपक्ष में थी तब पीडब्ल्यूडी विभाग में सलाहकार समिति में सदस्य रहे अब्दुल गनी १५-२० प्रतिशत बिलों के कार्यो की गुणवत्ता के निम्न स्तर होने की बात कर विरोध करते रहे किन्तु आज जब कांग्रेस की निकाय से लेकर प्रदेश तक सरकार है और अब्दुल गनी पीडब्ल्यूडी प्रभारी है तब उनकी यह निति अब क्यों परिवर्तित हो गयी अब २०-२५ प्रतिशत बिलों कार्य की गुणवत्ता का क्या होगा . क्या अब कांग्रेस के राज में निर्माण के कार्यो की सामग्री की कीमत कम हो गयी क्या महंगाई दर कम हो गयी क्या , मजदूरी कम हो गयी जो अब बिलों रेट पर भी कार्य की अनुशंसा कर रहे है पीडब्ल्यूडी प्रभारी गनी या उन्हें भी मालुम है कि 20-25 प्रतिशत बिलों रेट पर भी कार्य किया जा सकता है . अगर ऐसा है तो क्या सिर्फ तथ्यहीन विरोध कर विपक्ष में रहकर चर्चा में रहना चाहते थे और जनता को गुमराह कर रहे थे .
बता दे कि वर्तमान में ही दुर्ग के एमआईसी भवन में पुताई के कार्य की बात तो ईई गोस्वामी ने बताई किन्तु पुताई , वालपेपर , कांच का दरवाज़ा , खिडकिया आदि के कामो की जानकारी के बारे में ईई गोस्वामी फाइल देख कर बताने की बात कर रहे है किन्तु महीने भर हो गए समय अभाव की बात कहकर जानकारी नहीं दे रहे क्या पीडब्ल्यूडी प्रभारी इस अनियमितता पर कोई सख्त कदम उठाएंगे या फिर मौन रहेंगे . जबकि दो तीन महीने पहले इ एम्आईसी भवन की पुताई को देखने से ही स्पष्ट नजर आता है कि किस स्तर का कार्य हुआ है क्या प्रभारी मामले की निष्पक्ष जाँच करेंगे या सिर्फ मौन रहकर ऐसे कार्यो को बढ़ावा देगे ?
कांग्रेसी कार्यकर्ता भी लगा रहे भेदभाव का आरोप .
पीडब्ल्यूडी प्रभारी तकिया पारा वार्ड से आते है इसी वार्ड के एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने वार्ड की उपेक्षा की बात को सोशल मिडिया में पोस्ट की जबकि इस वार्ड से निगम के कद्दावर मंत्री गनी आते है अगर प्रभारी के वार्ड में ही कांग्रेसी कार्यकर्त्ता उपेक्षा का आरोप लगा रहे है तो फिर शहर की व्यवस्था और आम जनता का क्या होगा . ऐसी चर्चा है कि कांग्रेसी कार्यकर्त्ता के पोस्ट के बाद इस मामले पर हलकी नोकझोक भी हुई थी सच्चाई क्या है ये तो कांग्रेस का अंदरूनी मामला है किन्तु पोस्ट करने वाले कांग्रेसी कार्यकर्त्ता सैफ ने फिर एक पोस्ट की जिसमे उनके द्वारा लिखा गया वाक्य // आज मुझे बहुत तकलीफ हुई नगर निगम दुर्ग जाने के बाद एक मेरे वरिष्ठ नेता मुझे कहते हैं तेरी उंगली बहुत चल रही है Whattsapp मे उंगली कट जाएगी क्या मैं कुछ गलत लिखता हूं // क्या कांग्रेस के वरिष्ट अब कार्यकर्ताओ के सवाल पर ऊँगली काटने तक की धमकी दे सकते है क्या कांग्रेस आलाकमान और शहर विधायक मामले को संज्ञान में लेकर निष्पक्ष जाँच करेंगे . ये वही कार्यकर्ता है जो सालो से विपक्ष में रहने के बाद भी कांग्रेस का दामन नहीं छोड़े आज वही कार्यकर्ता ऐसे शब्द सुनकर निराश हो रहे है ....
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
