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नजरिया /शौर्यपथ / बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के गांव लौटने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इस स्थिति में मनरेगा के वार्षिक बजट को लगभग 60,000 करोड़ रुपये से लगभग एक लाख करोड़ रुपये करके सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है। जिस तरह से रोजगार की मांग के समाचार मिल रहे हैं, उससे तो लगता है कि वह 40,000 करोड़ रुपये की एकमुश्त वृद्धि भी पर्याप्त नहीं है। जैसा कि मनरेगा के कानून में प्रावधान है, अधिक मांग होने पर संसाधन वृद्धि के लिए गुंजाइश बनी रहनी चाहिए। हालांकि मजदूरों को अब शहरी उद्योग और राज्य वापस भी बुलाने लगे हैं। लौटने के लिए मजदूरों को तरह-तरह से प्रलोभन देने की शुरुआत हो चुकी है। मजदूरों को वापस काम पर लाने के लिए विशेष श्रमिक रेल की भी मांग हो रही है। इसके बावजूद मोटे तौर पर अनुमान है कि करीब 30 प्रतिशत मजदूर गांव में ही रह जाएंगे, इसलिए अभी मनरेगा की बहुत मांग है।
मनरेगा के बढ़ते दायरे के इस दौर में हमें बहुत सावधान रहना चाहिए और यह देखना चाहिए कि किन कारणों से इस अच्छी योजना के बहुत अनुकूल परिणाम नहीं मिले हैं। इसका एक प्रमुख कारण तरह-तरह का भ्रष्टाचार रहा है। एक प्रचलन है कि प्रधान या सरपंच अपने नजदीकी अनेक व्यक्तियों के नाम से जॉब कार्ड बनवाकर अपने पास रख लेते हैं। मनरेगा का कार्य जल्दबाजी में मशीनों का उपयोग करके आधा-अधूरा कराते हैं व फिर इन जॉब कार्ड पर मजदूरी दर्ज कर बैंक खातों में डाल दी जाती है। फिर प्रधान साहब इस मजदूरी का बड़ा हिस्सा अपने नजदीकी व्यक्तियों से ले लेते हैं। कुछ अन्य जिम्मेदार लोगों को भी हिस्सा मिल जाता है।
इस अनियमितता का असर यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में तो मनरेगा कार्य उत्साहवद्र्धक लगते हैं, पर गांवों में पूछने पर पता चलता है कि जरूरमंदों को रोजगार बहुत कम मिला। एक अन्य समस्या यह रही है कि मजदूरी मिलने में बहुत देर होती है। इस तरह जरूरत के समय राहत देने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। मजदूर पहले मेहनत करे, फिर बार-बार दूर के बैंक जाकर पता करे कि उसका पैसा आया है कि नहीं, यह न्यायसंगत नहीं है।
अत: कोरोना के दौर में मनरेगा से जुड़े भ्रष्टाचार को दूर करना और भी अधिक जरूरी हो गया है। ध्यान रहे, जो असरदार लोग भ्रष्टाचार करते रहे हैं, वे आज भी हैं। अत: सरकारों की ओर से विशेष प्रयास जरूरी हैं। एक सप्ताह काम करो और उसी सप्ताह के अंत में पूरी मजदूरी मिल जाए, तो अपनी जरूरतों को पूरा करने में लोगों को बहुत मदद मिलेगी। मनरेगा कानून में मजदूरों की ओर से मांग उठने पर एक प्रक्रिया के अंतर्गत रोजगार मिलता है। इसमें कुछ देर लग सकती है, जबकि आज अनेक जगहों पर तुरंत रोजगार देने की जरूरत है। अत: कानूनी प्रक्रियाओं में कुछ ढील देकर सरकारी स्तर पर अपनी पहल से भी रोजगार की व्यवस्था हो सकती है। हां, इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा कि जो भी कार्य हों, वे वास्तविक उपयोगिता के हों।
मनरेगा व अधिक रोजगार देने वाली सरकारी स्कीमों को बढ़ाने के साथ यह समय गांवों के सामाजिक ताने-बाने को सुधारने के लिए भी अनुकूल है। अनेक गांवों में किसान और मजदूर में दूरी आ गई है, जिससे किसान मशीनों की ओर अधिक बढ़ने लगे और मजदूर प्रवासी मजदूरी की ओर। इन बढ़ती दूरियों से किसी को लाभ नहीं हुआ। अब समय है, इन दूरियों को पाटने का, विभिन्न समुदायों की आपसी नजदीकी बढ़ाने का। इस तरह गांव में खेती-किसानी के कार्यों में मजदूरों को गरिमामय माहौल में अधिक कार्य मिल सकेगा। गांव से छुआछूत और भेदभाव जैसी बुराई को पूरी तरह दूर करने के विशेष प्रयास भी होने चाहिए। सभी मजहबों, जातियों व समुदायों के बीच एकता बढ़नी चाहिए, जिससे गांव के सामान्य हित के कार्य में सब आपसी सहयोग से योगदान कर सकें। इस तरह की एकता व समरसता के कारण लोगों को नशे से दूर रहने में भी मदद मिलेगी। इससे महिलाओं को अधिक सुरक्षित माहौल मिलेगा, शिक्षा में प्रगति होगी।
यह सकारात्मक सोच वाले ग्रामीणों के लिए भी कुछ कर दिखाने का समय है। अपने स्तर पर और सरकार के साथ मिलकर वे तमाम योजनाओं को साकार करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) भारत डोगरा, सामाजिक कार्यकर्ता
सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ / कोरोना के तेज होते संक्रमण के बीच सोमवार को भारत अनलॉक होने की ओर एक बड़ा कदम उठाएगा, अब जितना महत्व जहान का होगा, उससे कहीं अधिक जान का होगा। जहां एक ओर, मॉल खुल जाएंगे, वहीं आधे से ज्यादा धर्मस्थल भी गुलजार हो जाएंगे। रेस्तरां, बाजार में रौनक बढ़ जाएगी, लेकिन यह रौनक तभी सार्थक कही जाएगी, जब संक्रमण काबू में रहेगा। संक्रमण होते ही वह इलाका सील हो जाएगा, लेकिन गौर करने की बात यह है कि अब लगभग सभी सरकारें संक्रमण का जोखिम उठाते हुए भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहती हैं। केंद्र सरकार के साथ-साथ उन राज्य सरकारों के लिए भी अनलॉक होना मजबूरी है, जिनका खजाना तेजी से खाली हो रहा है। जिन इलाकों में संक्रमण की रफ्तार तेज है, वहां राज्य सरकारों के पास अधिकार है कि वे किसी भी सीमा तक लॉकडाउन रख सकती हैं।
संपूर्णता में देखें, तो ज्यादातर गांव और शहर अब खुल चुके हैं और आज से जैसे-जैसे सार्वजनिक वाहनों की सड़कों पर वापसी होने लगेगी, वैसे-वैसे चहल-पहल बढ़ती जाएगी। इस बीच लोगों को यह सतत ध्यान रखना होगा कि भारत में प्रतिदिन 10,000 के करीब मामले सामने आने लगे हैं, करीब 7,000 लोग जान गंवा चुके हैं और 2.50 लाख से अधिक संक्रमित हो चुके हैं। इसी में एक सुखद संकेत यह भी है कि करीब 1.20 लाख लोग ठीक हो चुके हैं। बहरहाल, जब हम अपने जहान की चिंता में निकल पड़े हैं, तो सबसे बड़ा यह सवाल लोगों को मथ रहा है कि आखिर कोरोना कब पीछा छोडे़गा? देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के दो वरिष्ठ विशेषज्ञ अधिकारियों ने अनुमान लगाया है कि भारत को सितंबर के मध्य में कोरोना संक्रमण से मुक्ति मिलेगी। इन दोनों अधिकारियों, अनिल कुमार और रुपाली रॉय का शोध इपेडिमियोलॉजी इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इन आला अधिकारियों ने बेलीज गणितीय प्रणाली का इस्तेमाल करके नतीजा निकाला है कि कोरोना लगभग तीन महीने का मेहमान है। संक्रामक रोगों के प्रभाव के आकलन के लिए प्रचलित इस गणितीय प्रणाली को मोटे तौर पर अगर हम समझें, तो जब संक्रमितों की कुल संख्या ठीक होने व मरने वालों की सम्मिलित संख्या के बराबर पहुंच जाएगी, तब इस बीमारी का अंत होगा। 19 मई को पहली बार इस प्रणाली से की गई गणना के अनुसार, हम उस राह पर 42 प्रतिशत चल चुके थे और अभी कोरोना की यात्रा 50 प्रतिशत ही पूरी हुई है। सितंबर के मध्य में यह यात्रा 100 प्रतिशत पर पहुंच जाएगी और तभी कोरोना का अंत होगा।
अब सवाल यह कि यह गणना कितनी सटीक है? वैसे, वैज्ञानिक-गणितीय गणनाएं अमूमन गलत नहीं होतीं, पर अहम सवाल यह कि इन गणनाओं में इस्तेमाल डाटा कितने पुख्ता हैं? देश में कोरोना-जांच कितनी होनी चाहिए और कितनी हो रही है? कुछ जगहों पर तो कोरोना संक्रमण के हल्के मामलों की गणना ही नहीं हो रही, सिर्फ गंभीर मामले दर्ज किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर, यह गणितीय भविष्यवाणी भी हमें परोक्ष रूप से प्रेरित करती है कि हम कोरोना को कतई हल्के में न लें। कोरोना संक्रमण से हरसंभव तरीके से बचें। शंका हो, तो जांच करने-कराने में रत्ती भर कोताही न बरतें। सतर्कता सोलह आना होगी, हमारे आंकडे़ दुरुस्त होंगे, तो हम महामारी को बेहतर ढंग से पटकनी दे पाएंगे।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / धीरे-धीरे देश खुलने लगा है। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर आने लगी है। इसी कड़ी में स्कूल खोलने का प्रस्ताव भी है। जब जून-जुलाई में कोरोना संक्रमण के शीर्ष स्तर पर पहुंचने की आशंका हो और संक्रमित मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही हो, तब बच्चों को स्कूल बुलाने का निर्णय जल्दबाजी भरा और नौनिहालों के लिए घातक हो सकता है। यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि विद्यालयों में तमाम इंतजाम के बाद भी दो गज की दूरी का पालन करना कठिन होगा, खासतौर से छोटे बच्चों को लेकर चिंता ज्यादा है। लिहाजा सरकार को चाहिए कि वह इस संवेदनशील विषय पर पर्याप्त विचार-विमर्श करे और संक्रमण-दर में स्थिरता आने पर ही कोई फैसला ले। जल्दबाजी में किसी भी प्रकार का निर्णय बच्चों के खिलाफ जा सकता है।
शंकर वर्मा, मीत नगर, शाहदरा
मानसून की दस्तक
अर्थव्यवस्था की तमाम मुश्किलों के बीच एक राहत देने वाली खबर है। मानसून दस्तक दे चुका है। उम्मीद है कि इस बार यह बेहतर साबित होगा। कृषि-प्रधान भारत में मानसून का वक्त पर आना और पर्याप्त बारिश का होना अत्यावश्यक है। मगर हर बार की तरह इस साल भी देश ने मानसूनी बारिश से होने वाले नुकसान से बचने की शायद ही तैयारी की है। सैकड़ों टन अनाज खुले में रखे हुए हैं। खेतों में वाटर रिचार्जिंग के प्रति भी सजगता का अभाव दिख रहा है। साफ है, इस बाबत जब तक कोई सख्त कानून नहीं बनेगा, तस्वीर नहीं बदलेगी। वर्षा जल का संरक्षण कई मायनों में हमारे लिए फायदेमंद हो सकता है।
सुभाष बुड़ावन वाला, रतलाम
चीनी उत्पादों के खिलाफ
भारत में चीनी सामान के बहिष्कार की बात हमेशा से की जाती रही है, पर व्यापक स्तर पर इसे कभी अमल में नहीं लाया गया। मगर अब चीनी उत्पादों के पूर्ण बहिष्कार का समय आ गया है। एक तो कोरोना जैसी महामारी को फैलाने का आरोप चीन पर है, और फिर वह भारत से सीमा-संबंधी विवाद में उलझा हुआ है। वह हमारे सामने लगातार बाधाएं खड़ी कर रहा है। ऐसे में, सभी भारतीयों को चीनी उत्पादों के बहिष्कार का प्रण लेना चाहिए। इसका असर जैसे ही चीन के बाजार पर पडे़गा, उसको अपनी हैसियत का अंदाजा हो जाएगा। भारतीय कितने प्रभावशाली हो गए हैं, इसका एहसास इससे भी होता है कि टिक टॉक के खिलाफ भारतीयों की मुहिम के बाद इस एप की रेटिंग गिरकर जमीन पर आ गई थी। चीनी उत्पादों के बहिष्कार के दो फायदे होंगे। एक तो चीन को सबक मिलेगा, और दूसरा, भारत के कुटीर उद्योगों को नई ताकत मिलेगी। इससे लघु उद्योगों से जुड़े हमारे लोगों की स्थिति सुदृढ़ होगी और हमारे देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
नीतीश पाठक, औरंगाबाद, बिहार
निजीकरण का नया क्षेत्र
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और वहां की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्पेसएक्स के संयुक्त प्रयास से पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर दो यात्रियों को पहुंचाया गया। ऐसा पहली बार हुआ, जब किसी निजी कंपनी के रॉकेट से अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा गया। यह स्पेसएक्स के लिए बेहतरीन उपलब्धि है। भारत को भी इससे सीख लेनी चाहिए। हाल के दिनों में भारत सरकार ने यह घोषणा की भी है कि अंतरिक्ष अभियानों में इसरो के साथ-साथ निजी कंपनियों को बढ़ावा दिया जाएगा। हालांकि, हम अमेरिका से प्रतिस्पद्र्धा नहीं कर सकते, पर यह एक अच्छी शुरुआत है। प्रतिभा और निवेश का सही उपयोग करके ही कठिन लक्ष्यों को साधा जा सकता है। अंतरिक्ष-खोज कार्यक्रम में भारत को आत्मनिर्भर बनाने और विश्व पटल पर एक स्पेस पावर बनाने की दिशा में यह बेहद सराहनीय प्रयास है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
ऋत्विक रवि, टैगोर गार्डन, नई दिल्ली
अम्बिकापुर/ शौर्यपथ / मानव कल्याण एवं समाजिक विकास संगठन द्वारा संचालित शोध प्रोत्साहन मंच के तत्वाधान में विश्व पर्यावरण दिवस के परिपेक्ष में ऑनलाइन सेमिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन की सार्थकता पर था । इस आयोजन में छत्तीसगढ़ प्रदेश स्तर की विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्राध्यापक, एवं समाज सेवकों के द्वारा व्याख्यान ऑनलाइन माध्यमों से प्रस्तुत किए। व्याख्यान की समीक्षा उमेश कुमार पांडे जी के द्वारा किया गया जिनके अनुसार यह कहा गया कि सभी प्राध्यापकों के द्वारा व्याख्यान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के संबंध में बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई जिनमें एक बात तो सामने आती है जो हम सबको यह बताती है कि वर्तमान समय पूरे पृथ्वी में और पर्यावरण संकट की ओर हम सभी का ध्यान आकर्षित कर रहा है . हमें इसमें संतुलन बनाए रखने के लिए आपसी सामंजस्य व भोग विलास की चीजों का उपयोग उसी आशय पर करें ताकि पर्यावरण संरक्षित व संवर्धित हो सके। इस व्याख्यानमाला में शोध प्रोत्साहन मंच के व्हाट्सएप ग्रुप के अंतर्गत प्राध्यापकों एवं अन्य बाैध्दिक जनों के द्वारा आमंत्रित व्याख्यान व प्रस्तुति के आधार पर उत्कृष्ट प्रस्तुति हेतु सभी को विश्व पर्यावरण दिवस के परिपेक्ष्य में *पर्यावरण मित्र* सम्मान से सम्मानित किया गया एवं यह सम्मान पत्र संगठन के संरक्षक आदरणीय ललित मिश्र जी के द्वारा व्हाट्सएप के जरिए प्रेषित किया गया इस अवसर पर सभी प्राध्यापक गण जो कि व्याख्यानमाला में मौजूद थे सह: सम्मान ऑनलाइन माध्यम से अपना प्रमाण पत्र प्राप्त किये जिनमें डा. ए. के. श्रीवास्तव, श्री अजीत कुमार मिश्रा, डॉ आशुतोष पांडेय डॉ. एम. के. मौर्य, डॉक्टर धर दीवान ,डॉ. स्नेहलता बर्डे, डॉ. अजय पाल सिंह, पत्रकार अमित गौतम, ज्ञानी दास मानिकपुरी, धर्मेंद्र श्रीवास्तव , श्रीमती मनीषा दास, अंचल सिन्हा , श्रीमती अर्चना पाठक, श्रीमती पूनम दुबे, श्रीमती अनीता मंदिलवार, श्रीमती आशा पांडेय , वनवासी यादव, कुंज बिहारी सिंह पैकरा ,बालकृष्ण मेहराेत्रा, पुखराज यादव , कृष्ण शरण पटेल, अमन कुमार गुप्ता के साथ अन्य प्राध्यापक व अधिक चिंतक मौजूद रहे इस अवसर पर संगठन के संस्थापक अध्यक्ष के द्वारा इस कार्यक्रम में सभी की सहभागिता एवं सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया गया साथ ही साथ शोध प्रोत्साहन मंच के मार्गदर्शक आदरणीय प्राे. डॉक्टर एस. के. श्रीवास्तव सर एवं प्रदेश संरक्षक आदरणीय ललित मिश्र जी को सह:सम्मान पर्यावरण मित्र सम्मान पत्र प्रदान किया गया । उक्त जानकारी संगठन के संस्थापक अध्यक्ष उमेश पांडेय ने दी ।
ओपिनियन /शौर्यपथ / उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद की एक छोटी सी कॉलोनी है कौशांबी। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की इस कॉलोनी की अकेली विशेषता यही है कि यह बिल्कुल दिल्ली की सीमा पर है। सड़कके इस पार कौशांबी है, उस पार दिल्ली के पटपड़गंज और आनंद विहार। आनंद विहार की गिनती दिल्ली के सबसे प्रदूषित इलाकों में होती है और जिन दिनों यह प्रदूषण अपने चरम पर पहुंचता है, तो जिस सबसे नजदीकी रिहाइशी बस्ती को इसका प्रकोप झेलना पड़ता है, वह कौशांबी ही है। इसी कौशांबी में रहने वाला एक शख्स साल 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा करके रातों-रात राष्ट्रीय परिदृश्य पर छा गया था। आंदोलन का असर इतना ज्यादा हुआ कि कुछ ही महीनों के भीतर जब विधानसभा के चुनाव हुए, तो दिल्ली की जनता ने उस शख्स को मुख्यमंत्री की कुरसी तक पहुंचा दिया।
जब तक उनकी शर्तों के हिसाब से दिल्ली में मुख्यमंत्री निवास का इंतजाम नहीं हो गया, अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के कई दिन बाद तक कौशांबी के अपने फ्लैट से ही काम करते रहे। यानी कुछ दिनों के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री का निवास उत्तर प्रदेश में था। उन दिनों यह भी कहा जाता था कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली के पहले अनिवासी मुख्यमंत्री हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने से उन दिनों अगर कोई सबसे ज्यादा खुश था, तो कौशांबी के निवासी, क्योंकि उनके बीच का एक शख्स दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गया था।
लेकिन अब शायद कौशांबी के यही लोग सबसे ज्यादा निराश भी होंगे। दिल्ली का सबसे ज्यादा प्रदूषण सूंघने वाले इन लोगों के लिए दिल्ली के अस्पतालों के दरवाजे अब बंद हो गए हैं। कोरोना-काल में अरविंद केजरीवाल सरकार ने आदेश जारी करके दिल्ली के अस्पतालों को अब दिल्ली निवासियों के लिए ही आरक्षित कर दिया है। गाजियाबाद ही नहीं, नोएडा, गुड़गांव (अब गुरुग्राम), फरीदाबाद और सोनीपत वगैरह दिल्ली के पड़ोसी जिलों में रहने वाले अब दिल्ली के किसी सरकारी या सरकारी मदद से चल रहे अस्पताल में अपना इलाज नहीं करा सकेंगे, भले ही उन्हें मर्ज दिल्ली से ही क्यों न मिला हो।
पिछले दिनों जब दिल्ली में कोविड-19 का संक्रमण तेजी से बढ़ने लगा, तो हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने दिल्ली से लगी अपनी सीमाओं को सील कर दिया। यह ठीक है कि दिल्ली में कोरोना संक्रमण काफी तेजी से फैल रहा है और मुंबई के बाद यह संक्रमण का सबसे घना क्षेत्र बन गया है, लेकिन सिर्फ इसी से पूरी दिल्ली के साथ संक्रमण क्षेत्र जैसा व्यवहार करते हुए सीमाओं को सील करने की काफी आलोचना हुई। यह एक तरह से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की उस अवधारणा को भी नकारना था, जिसका लाभ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इन दोनों राज्यों को भी मिलता है, लेकिन अब अरविंद केजरीवाल ने इलाज के लिए भी दिल्ली के दरवाजे बंद करके इस अवधारणा को नए रसातल में पहुंचाने की तैयारी कर ली है।
गाजियाबाद, नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद और सोनीपत में कौन लोग रहते हैं? ये ज्यादातर वे लोग हैं, जो या तो सीधे दिल्ली में काम करते हैं या उनके रोजगार किसी न किसी तरह से दिल्ली से जुड़े हुए हैं। ये हर सुबह दिल्ली पहुंचते हैं, दिन भर उसकी जीडीपी में योगदान देते हैं और शाम को थके-हारे मेट्रो, बस, टैंपो वगैरह में धक्के खाते हुए अपने घर वापस आ जाते हैं। पिछले तीन-चार दशक में दिल्ली के भूगोल में यह गुंजाइश लगातार खत्म होती जा रही है कि वह अपने ऐसे सभी कामगारों, पेशेवरों और कारोबारियों को छत मुहैया कर सके। दिल्ली को उन सबकी जरूरत है, पर वह उनकी आवास जरूरत को पूरी करने की स्थिति में नहीं है। सीमित जगह होने के कारण दिल्ली में जमीन-जायदाद की कीमतें भी इस तरह आसमान पर जा पहुंची हैं कि बहुत समृद्ध लोगों के लिए भी वहां आवास बनाना अब आसान नहीं रह गया है। जो सुबह से शाम तक दिल्ली को समृद्ध बनाने में जुटते हैं, वे कभी ऐसी हैसियत में नहीं पहुंच पाते कि वहां अपना घर बना सकें। ऐसे लोग पड़ोसी जिलों में शरण लेने को मजबूर होते हैं और वहां के ‘प्रॉपर्टी बूम’ का कारण बनते हैं। इसमें कोई नई बात भी नहीं है। दुनिया भर में यही होता है। आगे बढ़ते और तरक्की करते हुए नगर इसी तरह विस्तार पाते हैं और फिर महानगर में तब्दील हो जाते हैं।
यही वे स्थितियां रही होंगी, जिनके चलते कभी अरविंद केजरीवाल को कौशांबी में घर लेने को मजबूर होना पड़ा होगा। दिल्ली के जीवन में उन्होंने अपना योगदान पहले नौकरी करके दिया, उसके बाद एक लोकतांत्रिक जनांदोलन चलाकर और फिर उसकी पूरी राजनीति को बदलकर। दिल्ली में हर रोज आने-जाने वाले बाकी लोगों का योगदान हो सकता है कि किसी को इतना उल्लेखनीय न लगे, पर वे भी योगदान तो देते ही हैं।
बहरहाल, दिल्ली सरकार के ताजा फैसले ने बता दिया है कि जिनके लिए इस शहर के भूगोल में जगह नहीं है, उनके लिए स्थानीय सरकार के दिल में भी जगह नहीं है। यह फैसला उस समय हुआ है, जब लॉकडाउन खुलने के बाद कोरोना वायरस का संक्रमण दिल्ली में काफी तेजी से फैल रहा है और पड़ोसी जिलों के तमाम लोग इस जोखिम के बीच हर रोज दिल्ली जाने और वहां से लौटने को मजबूर हैं। दिल्ली में उनके लिए संक्रमण की आशंकाएं अपने निवास वाले जिले से कहीं अधिक हैं, पर दिल्ली में उनके इलाज की संभावनाएं अब शून्य हो चुकी हैं। दुर्भाग्य यह है कि जिन जिलों में उनका निवास है, वहां चिकित्सा सुविधाएं इसी सोच के साथ बहुत ज्यादा विकसित नहीं की गईं कि पड़ोस में दिल्ली तो है ही, पर अब दिल्ली ने भी हाथ झाड़ लिए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार
रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सुरेन्द्र वर्मा ने कहा है कि लगातार 15 साल भष्टाचार और कमीशनखोरी में डूबे रहे भारतीय जनता पार्टी के नेता अब तक अहंकार और आत्ममुग्धता की अवस्था से बाहर ही नहीं आ पा रहे है! तथ्यहिन और आधारहीन बयानबाजी करके वर्चुअल दुनिया में जीने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेता अब वर्चुअल रैली का सहारा लेने की बात कर रहे हैं! असल बात यह है कि छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ना केवल प्रदेश के जनता का विश्वास खो चुकी है बल्कि अब भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी भारतीय जनता पार्टी पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।
वर्मा ने कहा है कि विगत विधानसभा चुनाव 2018 के समय भारतीय जनता पार्टी के आंकड़ों के अनुसार ही छत्तीसगढ़ में लगभग 57 लाख मिस्ड कॉल कार्यकर्ता थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी को 2018 के विधानसभा चुनाव में केवल 40 लाख वोट प्राप्त हुए! अब विष्णुदेव साय ने नए सदस्य जोड़ने के बाद 30 हज़ार लोगों को वर्चुअल रैली में शामिल करने का लक्ष्य रखा है!
विधानसभा चुनाव में 15 सीटों पर सिमटनें के बाद लगातार दो उपचुनाव में भी करारी शिकस्त मिली! नगरी निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश की जनता ने पूरी तरह से नकार दिया! लगातार खिसकते जनाधार से भारतीय जनता पार्टी के नेता मानसिक दिवालियेपन की अवस्था में पहुंच चुके हैं! नान और धान घोटालो के गुनाहगारों को छत्तीसगढ़ की जनता जान भी चुकी है और समझ भी चुकी है! अंतागढ़ में लोकतंत्र का गला घोटने वाले असल गुनहगार भी बेनकाब हो चुके हैं! प्रदेश में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली के जिम्मेदारों को भी छत्तीसगढ़ की जनता ने पहचान लिया है।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सुरेन्द्र वर्मा ने कहा है कि 15 साल के कुशासन और 15 महीने के सुशासन में यह स्पष्ट हो चुका है की कौन सी सरकार जो 2100/- समर्थन मूल्य और ₹300/- बोनस के नाम पर लगातार किसानों से वादाखिलाफी करती रही और कौन सी सरकार है जिन्होंने न केवल तत्काल किसानों की ऋणमाफी की, बल्कि तमाम व्यवधानों और अड़ंगों के बीच धान का समर्थन मूल्य भी पूरे देश में सर्वाधिक ₹2500/- प्रति क्विंटल देने का काम किया है! आदिवासी परिवार को जर्सी गाय, किसानों को 5 एचपी के बिजली बिल माफ जैसे भाजपा के तमाम वादे केवल वचनपत्र तक ही सीमित रहे! वही डेढ़ साल के भीतर कांग्रेस द्वारा किए गए 36 में से 22 बड़े वादे पूरे कर भूपेश सरकार ने जनता का विश्वास जीता है!
आपदा काल में भी भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता कहीं भी जनता की सुविधा और मदद के लिए काम करते हुए नहीं दिखे! जनता के केयर की चिंता के बजाय भाजपा नेताओं को पीएम के केयर फंड की अधिक चिंता रही! आपदा काल में श्रमिकों की दुर्दशा, भूख और थकान के असल गुनाहगार केंद्र की मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता अब उनसे माफी मांगने के बजाय कोरोना संक्रमण के लिए इन्हें ही जिम्मेदार ठहराने लगे हैं!
भाजपा अध्यक्ष द्वारा प्रदेश वापस लौटे श्रमिकों को छोटा आदमी कहां जाना भारतीय जनता पार्टी के पूंजीवादी मानसिकता को प्रमाणित करता है! असलियत यह है कि भारतीय जनता पार्टी में कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनाधार वाले नेताओं के हक का गला घोटने की प्रवृत्ति चरम पर है!
रमन सिंह के दागी चेहरे को छत्तीसगढ़ की जनता के साथ ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी पहचान लिया है और इसी लिए सीधे तौर स्वीकार करने से बच रही है! रामविचार नेताम, ननकीराम कंवर, कृष्णमूर्ति बांधी, बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, विजय बघेल, प्रेम प्रकाश पांडे और केदार कश्यप जैसे नेताओं की उपेक्षा कर विष्णुदेव साय को अध्यक्ष बनाना भाजपा के अधिनायकवादी और पूंजीवादी मजबूरी को प्रमाणित करता है! छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी का रिमोट कंट्रोल रमन सिंह के हाथ में ही बनाए रखना भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की मजबूरी को ही साबित करता है!
आपदा के दौरान छत्तीसगढ़ के भारतीय जनता पार्टी के नेता, जनता की मदद करने के बजाय ग़लत बयानी कर उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं! प्रदेश के सीएसआर फंड विभिन्न माध्यमों से प्राप्त दान और सहयोग राशि के साथ ही भाजपा के सांसदों के वेतन और सांसद निधि का पैसा भी राज्य के हक को बाईपास करके इनके द्वारा पीएम केयर फंड में जमा कराया गया।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / शासकीय अंग्रेजी माध्यम उच्चतर माध्यमिक शाला राजनांदगांव में प्रवेश प्रारंभ हो रहा है। जिसका संचालन सर्वेश्वर दास नगर पालिक निगम उच्चतर माध्यमिक शाला में किया जाना है। शाला में कक्षा पहली से कक्षा 12वीं तक की कक्षाएं लगेंगी।
स्कूल की प्राचार्य श्रीमती आशा मेनन ने बताया कि कक्षा पहली, दूसरी, तीसरी में किसी भी माध्यम से आए हुए विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा। कक्षा 4थी से कक्षा 12वीं तक अंग्रेजी माध्यम से अध्ययनरत विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा। कक्षा 11वीं से विज्ञान समूह के विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाएगा। प्रवेश आवेदन पत्र सर्वेश्वर दास नगर पालिक निगम विद्यालय राजनांदगांव में 15 जून से उपलब्ध होंगे।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा ने राजनांदगांव शहर के शंकरपुर वार्ड में कोरोना पॉजिटिव मरीज मिलने के बाद इस क्षेत्र का निरीक्षण किया। कलेक्टर श्री वर्मा ने शंकरपुर क्षेत्र को कन्टेंटमेंट जोन घोषित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को अंदर आने और बाहर जाने की अनुमति नहीं होगी। कन्टेंटमेंट जोन में सब्जी, दूध और आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराने के निर्देश अधिकारियों को दिए। श्री वर्मा ने कहा कि इस क्षेत्र में जिन परिवारों को पीडीएस से राशन नहीं मिला है उन्हें प्राथमिकता से उपलब्ध कराएं।
उन्होंने ने कहा कि कोई भी बिना कारण घर से बाहर न निकले। इस क्षेत्र में पुलिस बल तैनात करने के निर्देश दिए और कहा कि जोन में सतर्कता के साथ कड़ी निगरानी रखे। मौके पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मिथलेश चौधरी, आयुक्त नगर निगम चंद्रकांत कौशिक, एसडीएम राजनांदगांव मुकेश रावटे उपस्थित थे।
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